गुरुवार, 18 जुलाई 2024

श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) तेरहवाँ अध्याय ( पोस्ट 02 )

# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

( श्रीवृन्दावनखण्ड )

तेरहवाँ अध्याय ( पोस्ट 02 )

 

मुनिवर वेदशिरा और अश्वशिरा का परस्पर के श्राप से क्रमशः कालियनाग और काकभुशुण्ड होना तथा शेषनाग का भूमण्डल को धारण करना

 

श्रीनारद उवाच -
उत्युक्त्वाथ गते विष्णौ मुनिरश्वशिरा नृप ।
साक्षात्काकभुषंडोऽभूद्‌योगींद्रो नीलपर्वते ॥ १५ ॥
रामभक्तो महातेजाः सर्वशास्त्रार्थदीपकः ।
रामायणं जगौ यो वै गरुडाय महात्मने ॥ १६ ॥
चाक्षुषे ह्यन्तरे प्राप्ते दक्षः प्राचेतसो नृप ।
कश्यपाय ददौ कन्या एकादश मनोहराः ॥ १७ ॥
तासां कद्रूश्च या श्रेष्ठा साऽद्यैव रोहिणी स्मृता ।
वसुदेवप्रिया यस्यां बलदेवोऽभवत्सुतः ॥ १८ ॥
सा कद्रूश्च महासर्पान् जनयामास कोटिशः ।
महोद्‌भटान् विषबलानुग्रान् पंचशताननान् ॥ १९ ॥
महाफणिधरान् कांश्चिद्दुःसहांश्च शताननान् ।
तेषां वेदशिरा नाम कालियोऽभून्महाफणी ॥ २० ॥
तेषामादौ फणीन्द्रोऽभूच्छेषोऽनन्तः परात्परः ।
सोऽद्यैव बलदेवोऽस्ति रामोऽनन्तोऽच्युताग्रजः ॥ २१ ॥
एकदा श्रीहरिः साक्षाद्‌भगवान् प्रकृतेः परः ।
शेषं प्राह प्रसन्नात्मा मेघगंभीरया गिरा ॥ २२ ॥


श्रीभगवानुवाच –

भूमंडलं समाधातुं सामर्थ्यं कस्यचिन्न हि ।
तस्मादेनं महीगोलं मूर्ध्नि तं हि समुद्धर ॥ २३ ॥
अनंतविक्रमस्त्वं वै यतोऽनन्त इति स्मृतः ।
इदं कार्यं प्रकर्तव्यं जनकल्याणहेतवे ॥ २४ ॥

नारदजी कहते हैं— नरेश्वर ! यों कहकर भगवान् विष्णु जब चले गये, तब अश्वशिरा मुनि साक्षात् योगीन्द्र काकभुशुण्ड हो गये और नीलपर्वतपर रहने लगे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थको प्रकाशित करनेवाले महातेजस्वी रामभक्त हो गये। उन्होंने ही महात्मा गरुडको रामायणकी कथा सुनायी थी ।। १५-१६॥

 

मिथिलानरेश ! चाक्षुष मन्वन्तर के प्रारम्भ में प्रचेताओं के पुत्र प्रजापति दक्ष ने महर्षि कश्यप को अपनी परम मनोहर ग्यारह कन्याएँ पत्नीरूपमें प्रदान कीं। उन कन्याओं में जो श्रेष्ठ कद्रू थी, वही इस समय वसुदेवप्रिया रोहिणी होकर प्रकट हुई हैं, जिनके पुत्र बलदेवजी हैं। उस कद्रूने करोड़ों महासर्पों को जन्म दिया। वे सभी सर्प अत्यन्त उद्भट, विषरूपी बलसे सम्पन्न, उग्र तथा पाँच सौ फनों से युक्त थे ॥ १७-१९

 

वे महान् मणिरत्न धारण किये रहते थे। उनमें से कोई-कोई सौ मुखोंवाले एवं दुस्सह विषधर थे। उन्हींमें वेदशिरा 'कालिय' नामसे प्रसिद्ध महानाग हुए। उन सबमें प्रथम राजा फणिराज शेष हुए, जो अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं। वे ही आजकल 'बलदेव' के नामसे प्रसिद्ध हैं। वे ही राम, अनन्त और अच्युताग्रज आदि नाम धारण करते हैं ।। २० - २१ ॥

 

एक दिनकी बात है। प्रकृतिसे परे साक्षात् भगवान् श्रीहरिने प्रसन्नचित्त होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें शेषसे कहा ॥ २२ ॥

 

श्रीभगवान् बोले- इस भूमण्डलको अपने ऊपर धारण करनेकी शक्ति दूसरे किसीमें नहीं है, इसलिये इस भूगोलको तुम्हीं अपने मस्तकपर धारण करो। तुम्हारा पराक्रम अनन्त है, इसीलिये तुम्हें 'अनन्त' कहा गया है। जन-कल्याणके हेतु तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिये ।। २३-२४ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से

 

 

1 टिप्पणी:

  1. 💐🌿🌺💐जय श्री हरि:🙏🙏
    ॐ श्री परमात्मने नमः
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    ॐ नमो नारायण हरि:
    जय हो शेषजी महाराज🙏🙏जय श्री कृष्ण गोविंद 🙏💐

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