शुक्रवार, 1 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 
अथ देवऋषी राजन् संपरेतं नृपात्मजम् । 
दर्शयित्वेति होवाच ज्ञातीनां अनुशोचताम् ॥ १ ॥

श्रीनारद उवाच - 
जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते । 
सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम् ॥ २ ॥
कलेवरं स्वमाविश्य शेषमायुः सुहृद्‌वृतः । 
भुङ्‌क्ष्व भोगान् पितृप्रत्तान् अधितिष्ठ नृपासनम् ॥ ३ ॥

जीव उवाच - 
कस्मिन् जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन् । 
कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्‌नृयोनिषु ॥ ४ ॥
बन्धुज्ञात्यरिमध्यस्थ मित्रोदासीनविद्विषः । 
सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथः ॥ ५ ॥
यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः । 
पर्यटन्ति नरेष्वेवं जीवो योनिषु कर्तृषु ॥ ६ ॥
नित्यस्यार्थस्य सम्बन्धो ह्यनित्यो दृश्यते नृषु । 
यावद्यस्य हि सम्बन्धो ममत्वं तावदेव हि ॥ ७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! तदनन्तर देवर्षि नारद ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के सामने प्रत्यक्ष बुलाकर कहा ॥ १ ॥
देवर्षि नारदने कहा—जीवात्मन् ! तुम्हारा कल्याण हो। देखो, तुम्हारे माता-पिता, सुहृद्-सम्बन्धी तुम्हारे वियोग से अत्यन्त शोकाकुल हो रहे हैं ॥ २ ॥ इसलिये तुम अपने शरीर में आ जाओ और शेष आयु अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ ही रहकर व्यतीत करो। अपने पिता के दिये हुए भोगों को भोगो और राजसिंहासन पर बैठो ॥ ३ ॥
जीवात्मा ने कहा—देवर्षिजी ! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियोंमें न जाने कितने जन्मों से भटक रहा हूँ। उनमेंसे ये लोग किस जन्म में मेरे माता-पिता हुए ? ॥ ४ ॥ विभिन्न जन्मों में सभी एक-दूसरे के भाई-बन्धु, नाती-गोती, शत्रु-मित्र, मध्यस्थ, उदासीन और द्वेषी होते रहते हैं ॥ ५ ॥ जैसे सुवर्ण आदि क्रय-विक्रय की वस्तुएँ एक व्यापारी से दूसरेके पास जाती-आती रहती हैं, वैसे ही जीव भी भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न होता रहता है ॥ ६ ॥ इस प्रकार विचार करनेसे पता लगता है कि मनुष्यों की अपेक्षा अधिक दिन ठहरने वाले सुवर्ण आदि पदार्थों का सम्बन्ध भी मनुष्योंके साथ स्थायी नहीं, क्षणिक ही होता है; और जबतक जिसका जिस वस्तुसे सम्बन्ध रहता है, तभीतक उसकी उस वस्तुसे ममता भी रहती है ॥ ७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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