गुरुवार, 21 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

बाढमित्यभ्युपेत्याथ दिती राजन्महामनाः
कश्यपाद्गर्भमाधत्त व्रतं चाञ्जो दधार सा ||५५||
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः ||५६||
नित्यं वनात्सुमनसः फलमूलसमित्कुशान्
पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत् ||५७||
एवं तस्या व्रतस्थाया व्रतच्छिद्रं हरिर्नृप
प्रेप्सुः पर्यचरज्जिह्मो मृगहेव मृगाकृतिः ||५८||
नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते
चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह || ५९||

परीक्षित्‌ ! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी। उसने ‘बहुत ठीक’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। अब दिति अपनी कोखमें भगवान्‌ कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी ॥ ५५ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दिति का अभिप्राय जान बड़ी बुद्धिमानी से अपना वेष बदलकर दिति के आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे ॥ ५६ ॥ वे दिति के लिये प्रतिदिन समय-समयपर वनसे फूल-फल, कन्द-मूल, समिधा, कुश, पत्ते, दूब, मिट्टी और जल लाकर उसकी सेवा में समर्पित करते ॥ ५७ ॥ राजन् ! जिस प्रकार बहेलिया हरिन को मारनेके लिये हरिनकी-सी सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दितिके व्रत-पालनकी त्रुटि पकडऩेके लिये उसकी सेवा करने लगे ॥ ५८ ॥ सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो ? ॥ ५९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

1 टिप्पणी:

  1. 🪷🌹🥀🪷जय श्री हरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तुभ्यम् नमः
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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