शुक्रवार, 12 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

एवं ऐश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । 
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापं उपेयुषः ॥ २० ॥ 
तस्योग्रदण्डसंविग्नाः सर्वे लोकाः सपालकाः । 
अन्यत्रालब्धशरणाः शरणं ययुरच्युतम् ॥ २१ ॥ 
तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः । 
यद्‍गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ २२ ॥ 
इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः । 
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ॥ २३ ॥ 
तेषां आविरभूद्वाणी अरूपा मेघनिःस्वना । 
सन्नादयन्ती ककुभः साधूनां अभयङ्‌करी ॥ २४ ॥ 
मा भैष्ट विबुधश्रेष्ठाः सर्वेषां भद्रमस्तु वः । 
मद्दर्शनं हि भूतानां सर्वश्रेयोपपत्तये ॥ २५ ॥ 
ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य यत् । 
तस्य शान्तिं करिष्यामि कालं तावत्प्रतीक्षत ॥ २६ ॥ 
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । 
धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ॥ 
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । 
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद् हनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर ! इस रूप में भी वह भगवान्‌ का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥ २० ॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्‌की शरण ली ॥ २१ ॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—)‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥ २२ ॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की ॥ २३ ॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥ २४ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥ २५ ॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥ कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥ २७ ॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वर के कारण शक्तिसम्पन्न होने पर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥ २८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀जय श्रीहरि: !!🙏🙏
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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