शुक्रवार, 29 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः
सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो ||३०||
कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति
तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ||३१||
मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पाण्डव
पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदच्युतौ ||३२||

महाराज ! गोपियों ने भगवान्‌ से मिलन के तीव्र काम अर्थात् प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओं ने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवार के सम्बन्ध से, तुमलोगों ने स्नेह से और हमलोगों ने भक्ति से अपने मन को भगवान्‌ में लगाया है ॥ ३० ॥ भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्‌ का चिन्तन करने वाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती (क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्‌ में मन नहीं लगाया था )। सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान्‌ श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये ॥ ३१ ॥ महाराज ! फिर तुम्हारे मौसेरे भाई शिशुपाल और दन्तवक्त्र दोनों ही विष्णुभगवान्‌के मुख्य पार्षद थे। ब्राह्मणोंके शापसे इन दोनोंको अपने पदसे च्युत होना पड़ा था ॥ ३२ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ||२६||
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्यायां तमनुस्मरन्
संरम्भभययोगेन विन्दते तत्स्वरूपताम् ||२७||
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे
वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया ||२८||
कामाद्द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मनः
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ||२९||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) युधिष्ठिर ! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभाव से भगवान्‌ में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोग से नहीं होता ॥ २६ ॥ भृङ्गी कीड़े को लाकर भीत पर अपने छिद्र में बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेग से भृङ्गी का चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है ॥ २७ ॥ यही बात भगवान्‌ श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में भी है। लीला के द्वारा मनुष्य मालूम पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ ही तो हैं। इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये ॥ २८ ॥ एक नहीं, अनेकों मनुष्य काम से, द्वेष से, भय से और स्नेह से अपने मन को भगवान्‌ में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्‌ को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्ति से ॥२९॥ 

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गुरुवार, 28 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीबादरायणिरुवाच
राज्ञस्तद्वच आकर्ण्य नारदो भगवानृषिः
तुष्टः प्राह तमाभाष्य शृण्वत्यास्तत्सदः कथाः ||२१||

श्रीनारद उवाच
निन्दनस्तवसत्कार न्यक्कारार्थं कलेवरम्
प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम् ||२२||
हिंसा तदभिमानेन दण्डपारुष्ययोर्यथा
वैषम्यमिह भूतानां ममाहमिति पार्थिव ||२३||
यन्निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वधः
तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः
परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ||२४||
तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा
स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात्कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ||२५||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सर्वसमर्थ देवर्षि नारद राजाके ये प्रश्न सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने युधिष्ठिर को सम्बोधित करके भरी सभा में सबके सुनते हुए यह कथा कही ॥ २१ ॥

नारदजी ने कहा—युधिष्ठिर ! निन्दा,स्तुति सत्कार और तिरस्कार—इस शरीर के ही तो होते हैं। इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक-ठीक विवेक न होने के कारण ही हुई है ॥२२॥ जब इस शरीर को ही अपना आत्मा मान लिया जाता है, तब ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव बन जाता है। यही सारे भेदभावका मूल है। इसीके कारण ताडऩा और दुर्वचनोंसे पीड़ा होती है ॥ २३ ॥ जिस शरीर में अभिमान हो जाता है कि ‘यह मैं हूँ’, उस शरीर के वध से प्राणियों को अपना वध जान पड़ता है। किन्तु भगवान्‌ में तो जीवों के समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं। वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं—वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं। तब भगवान्‌ के सम्बन्ध में हिंसा की कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है ॥ २४ ॥ इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभाव से या वैरहीन भक्तिभाव से, भय से, स्नेह से अथवा कामना से—कैसे भी हो, भगवान्‌ में अपना मन पूर्णरूप से लगा देना चाहिये । भगवान्‌की दृष्टि से इन भावों में कोई भेद नहीं है ॥ २५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

एतद्वेदितुमिच्छामः सर्व एव वयं मुने
भगवन्निन्दया वेनो द्विजैस्तमसि पातितः ||१६||
दमघोषसुतः पाप आरभ्य कलभाषणात्
सम्प्रत्यमर्षी गोविन्दे दन्तवक्रश्च दुर्मतिः ||१७||
शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम्
श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ||१८||
कथं तस्मिन्भगवति दुरवग्राह्यधामनि
पश्यतां सर्वलोकानां लयमीयतुरञ्जसा ||१९||
एतद्भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना
ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवान्ह्यत्र कारणम् ||२०||

नारदजी ! इसका रहस्य हम सभी जानना चाहते हैं। पूर्वकाल में भगवान्‌ की निन्दा करने के कारण ऋषियोंने राजा वेनको नरकमें डाल दिया था ॥ १६ ॥ यह दमघोषका लडक़ा पापात्मा शिशुपाल और दुर्बुद्धि दन्तवक्त्र—दोनों ही जब से तुतलाकर बोलने लगे थे, तब से अब तक भगवान्‌ से द्वेष ही करते रहे हैं ॥ १७ ॥ अविनाशी परब्रह्म भगवान्‌ श्रीकृष्ण को ये पानी पी-पीकर गाली देते रहे हैं। परंतु इसके फलस्वरूप न तो इनकी जीभ में कोढ़ ही हुआ और न इन्हें घोर अन्धकारमय नरक की ही प्राप्ति हुई ॥ १८ ॥ प्रत्युत जिन भगवान्‌ की प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, उन्हीं में ये दोनों सब के देखते-देखते अनायास ही लीन हो गये—इसका क्या कारण है ? ॥ १९ ॥ हवा के झोंके से लडख़ड़ाती हुई दीपक की लौ के समान मेरी बुद्धि इस विषय में बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अत: इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये ॥ २० ॥

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बुधवार, 27 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

अत्रैवोदाहृतः पूर्वमितिहासः सुरर्षिणा
प्रीत्या महाक्रतौ राजन्पृच्छतेऽजातशत्रवे ||१२||
दृष्ट्वा महाद्भुतं राजा राजसूये महाक्रतौ
वासुदेवे भगवति सायुज्यं चेदिभूभुजः ||१३||
तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ
पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां शृण्वतामिदम् ||१४||

श्रीयुधिष्ठिर उवाच
अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि
वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः ||१५||

राजन् ! इसी विषयमें देवर्षि नारदने बड़े प्रेमसे एक इतिहास कहा था। यह उस समयकी बात है, जब राजसूय यज्ञमें तुम्हारे दादा युधिष्ठिरने उनसे इस सम्बन्धमें एक प्रश्न किया था ॥ १२ ॥ उस महान् राजसूय यज्ञ में राजा युधिष्ठर ने अपनी आँखोंके सामने बड़ी आश्चर्यजनक घटना देखी कि चेदिराज शिशुपाल सबके देखते-देखते भगवान्‌ श्रीकृष्णमें समा गया ॥ १३ ॥ वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे। इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े-बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभा में उस यज्ञमण्डप में ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—अहो ! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान्‌ श्रीकृष्ण में समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्‌ से द्वेष करने वाले शिशुपाल को यह गति कैसे मिली ? ॥ १५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०३)
 
नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यदा सिसृक्षुः पुर आत्मनः परो रजः सृजत्येष पृथक्स्वमायया
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वरः शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ||१०||
कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयं प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत्
य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यतः
तत्प्रत्यनीकानसुरान्सुरप्रियो रजस्तमस्कान्प्रमिणोत्युरुश्रवाः ||११||

जब परमेश्वर अपने लिये शरीरों का निर्माण करना चाहते हैं, तब अपनी माया से रजोगुण की अलग सृष्टि करते हैं। जब वे विचित्र योनियों में रमण करना चाहते हैं, तब सत्त्वगुणकी सृष्टि करते हैं और जब वे शयन करना चाहते हैं, तब तमोगुणको बढ़ा देते हैं ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ सत्यसङ्कल्प हैं। वे ही जगत् की उत्पत्ति के निमित्तभूत प्रकृति और पुरुष के सहकारी एवं आश्रय काल की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे काल के अधीन नहीं, काल ही उनके अधीन है। राजन् ! ये कालस्वरूप ईश्वर जब सत्त्वगुणकी वृद्धि करते हैं, तब सत्त्वमय देवताओंका बल बढ़ाते हैं और तभी वे परमयशस्वी देवप्रिय परमात्मा देवविरोधी रजोगुणी एवं तमोगुणी दैत्यों का संहार करते हैं। वस्तुत: वे सम ही हैं ॥ ११ ॥

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मंगलवार, 26 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान्प्रकृतेः परः
स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ||६||
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः
न तेषां युगपद्रा जन्ह्रास उल्लास एव वा ||७||
जयकाले तु सत्त्वस्य देवर्षीन्रजसोऽसुरान्
तमसो यक्षरक्षांसि तत्कालानुगुणोऽभजत् ||८||
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते
विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ||९||

वास्तव में भगवान्‌ निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृति से परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी माया के गुणों को स्वीकार करके वे बाध्यबाधकभाव को अर्थात् मरने और मारने वाले दोनों के परस्परविरोधी रूपों को ग्रहण करते हैं ॥ ६ ॥ सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये प्रकृति के गुण हैं, परमात्मा के नहीं। परीक्षित्‌ ! इन तीनों गुणों की भी एक साथ ही घटती-बढ़ती नहीं होती ॥ ७ ॥ भगवान्‌ समय-समय के अनुसार गुणों को स्वीकार करते हैं। सत्त्वगुण की वृद्धि के समय देवता और ऋषियोंका, रजोगुणकी वृद्धि के समय दैत्यों का और तमोगुण की वृद्धि के समय वे यक्ष एवं राक्षसोंको अपनाते और उनका अभ्युदय करते हैं ॥ ८ ॥ जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न आश्रयोंमें रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परंतु मन्थन करनेपर वह प्रकट हो जाती है—वैसे ही परमात्मा सभी शरीरोंमें रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते। परंतु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके—उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओंका बाध करके अन्तत: अपने हृदयमें ही अन्तर्यामीरूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीराजोवाच

समः प्रियः सुहृद्ब्रह्मन्भूतानां भगवान्स्वयम्
इन्द्र स्यार्थे कथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ||१||
न ह्यस्यार्थः सुरगणैः साक्षान्निःश्रेयसात्मनः
नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि ||२||
इति नः सुमहाभाग नारायणगुणान्प्रति
संशयः सुमहान्जातस्तद्भवांश्छेत्तुमर्हति ||३||

श्रीऋषिरुवाच
साधु पृष्टं महाराज हरेश्चरितमद्भुतम्
यद्भागवतमाहात्म्यं भगवद्भक्तिवर्धनम् ||४||
गीयते परमं पुण्यमृषिभिर्नारदादिभिः
नत्वा कृष्णाय मुनये कथयिष्ये हरेः कथाम् ||५||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! भगवान्‌ तो स्वभाव से ही भेदभाव से रहित हैं—सम हैं, समस्त प्राणियों के प्रिय और सुहृद् हैं; फिर उन्होंने, जैसे कोई साधारण मनुष्य भेदभाव से अपने मित्र का पक्ष ले और शत्रुओं का अनिष्ट करे, उसी प्रकार इन्द्र के लिये दैत्यों का वध क्यों किया ? ॥ १ ॥ वे स्वयं परिपूर्ण कल्याणस्वरूप हैं, इसीलिये उन्हें देवताओं से कुछ लेना-देना नहीं है । तथा निर्गुण होने के कारण दैत्यों से कुछ वैर-विरोध और उद्वेग भी नहीं है ॥ २ ॥ भगवत्प्रेम के सौभाग्यसे सम्पन्न महात्मन् ! हमारे चित्त में भगवान्‌ के समत्व आदि गुणों के सम्बन्ध में बड़ा भारी सन्देह हो रहा है । आप कृपा करके उसे मिटाइये ॥ ३ ॥ 
श्रीशुकदेवजीने कहा—महाराज ! भगवान्‌ के अद्भुत चरित्रके सम्बन्ध में तुमने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया; क्योंकि ऐसे प्रसङ्ग प्रह्लाद आदि भक्तों की महिमासे परिपूर्ण होते हैं, जिसके श्रवणसे भगवान्‌ की भक्ति बढ़ती है ॥ ४ ॥ इस परम पुण्यमय प्रसङ्ग को नारदादि महात्मागण बड़े प्रेम से गाते रहते हैं । अब मैं अपने पिता श्रीकृष्ण-द्वैपायन मुनि को नमस्कार करके भगवान्‌ की लीला-कथा का वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥

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सोमवार, 25 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

पुंसवन-व्रतकी विधि

एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम् । 
नीत्वाथोपचरेत् साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि ॥ २१ ॥
श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत् । 
पयःश्रृतेन जुहुयात् चरुणा सह सर्पिषा । 
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः ॥ २२ ॥ 
आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः । 
प्रणम्य शिरसा भक्त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया ॥ २३ ॥
आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः । 
दद्यात्पत्‍न्यै चरोः शेषं सुप्रजास्त्वं सुसौभगम् ॥ २४ ॥
एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभोः 
     अभीप्सितार्थं लभते पुमानिह । 
स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं 
     श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥ २५ ॥
कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं 
     वरं त्ववीरा हतकिल्बिषां गतिम् । 
मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरी 
     सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम् ॥ २६ ॥
विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते 
     य आमयावीन्द्रियकल्यदेहम् । 
एतत्पठन्नभ्युदये च कर्मणि 
     अनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम् ॥ २७ ॥
तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान् 
     होमावसाने हुतभुक् श्रीः हरिश्च । 
राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं 
     दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते ॥ २८ ॥

साध्वी स्त्री इस विधि से बारह महीनों तक—पूरे सालभर इस व्रत का आचरण करके मार्गशीर्ष की अमावस्या को उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे ॥ २१ ॥ उस दिन प्रात:काल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्‌ का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञ की विधि से घृतमिश्रित खीर की अग्नि में बारह आहुति दे ॥ २२ ॥ इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दें तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे। भक्तिभाव से माथा टेककर उनके चरणों में प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे ॥ २३ ॥ पहले आचार्य को भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्री को सत्पुत्र और सौभाग्य-दान करनेवाला होता है ॥ २४ ॥
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के इस पुंसवन-व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अुनष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है। स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है ॥ २५ ॥ इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्री को सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपा को श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रत के प्रभाव से रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य माङ्गलिक श्राद्धकर्मोंमें  इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं ॥ २६-२७ ॥ वे सन्तुष्ट होकर हवन के समाप्त होने पर व्रती की समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं । ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता भगवान्‌ लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रती की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्‌! मैंने तुम्हें मरुद्गण की आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दिति के श्रेष्ठ पुंसवन-व्रत का वर्णन भी सुना दिया ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नाम एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 

॥ इति षष्ठ स्कन्ध समाप्त ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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रविवार, 24 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

पुंसवन-व्रतकी विधि

इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह । 
तन्निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत् ॥ १५ ॥
ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा । 
यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद् हरिम् ॥ १६ ॥
पतिं च परया भक्त्या महापुरुषचेतसा । 
प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः । 
बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्‍न्या उच्चावचानि च ॥ १७ ॥ 
कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि । 
पत्‍न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः ॥ १८ ॥
विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन् न विहन्यात् कथञ्चन । 
विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः । 
अर्चेदहरहर्भक्त्या देवं नियममास्थितः ॥ १९ ॥ 
उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः । 
अद्यात् आत्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा ॥ २० ॥

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार परम वरदानी भगवान्‌ लक्ष्मीनारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे ॥ १५ ॥ तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे ॥ १६ ॥ भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान्‌ समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे ॥ १७ ॥ परीक्षित्‌ ! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १८ ॥ यह भगवान्‌ विष्णुका व्रत है। इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोडऩा चाहिये। जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान्‌ विष्णुकी भी पूजा करे ॥ १९ ॥ इसके बाद भगवान्‌ को उनके धाम में पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति के लिये पहले से ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे ॥२०॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

पुंसवन-व्रतकी विधि

युवां तु विश्वस्य विभू जगतः कारणं परम् । 
इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥ ११ ॥
तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेव पुरुषः परः । 
त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ॥ १२ ॥
गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान् । 
त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशयाः । 
नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वं अपाश्रयः ॥ १३ ॥ 
यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । 
तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १४ ॥

‘हे लक्ष्मी-नारायण ! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत् के  अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन् ! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ११ ॥ प्रभो ! आपही इन महामायाके अधीश्वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्न करनेवाली क्रिया ॥ १२ ॥ माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्त:करण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं ॥ १३ ॥ प्रभो ! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अत: मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’ ॥ १४ ॥ 

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शनिवार, 23 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

पुंसवन-व्रतकी विधि
 
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय 
महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिः 
बलिमुपहरामीति । अनेनाहरहर्मन्त्रेण 
विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नान
वास‌उपवीतविभूषण गन्धपुष्पधूपदीपोपहारादि 
उपचारान् सुसमाहित उपाहरेत् ॥ ७ ॥ 
हविःशेषं च जुहुयादनले द्वादशाहुतीः । 
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ॥ ८ ॥
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ । 
भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ॥ ९ ॥
प्रणमेद् दण्डवद्‍भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा । 
दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ॥ १० ॥

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि।’ ‘ओङ्कारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियों के स्वामी भगवान्‌ पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियों को मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहार की सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्र के द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्त से विष्णुभगवान्‌ का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे ॥ ७ ॥ जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा।’ ‘महान् ऐश्वर्योंके अधिपति भगवान्‌ पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्नि में बारह आहुतियाँ दे ॥ ८ ॥ परीक्षित्‌ ! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान्‌ लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं ॥ ९ ॥ इसके बाद भक्तभिावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्‌को साष्टाङ्ग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे— ॥ १० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

पुंसवन-व्रतकी विधि

श्रीराजोवाच - 
व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम् । 
तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति ॥ १ ॥

श्रीशुक उवाच - 
शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्‍भर्तुरनुज्ञया । 
आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः ॥ २ ॥
निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणान् अनुमन्त्र्य च । 
स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्‌कृताम्बरे । 
पूजयेत् प्रातराशात् प्राग् भगवन्तं श्रिया सह ॥ ३ ॥ 
अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते । 
महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये ॥ ४ ॥
यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिमौजसा । 
जुष्ट ईश गुणैः सर्वैः ततोऽसि भगवान् प्रभुः ॥ ५ ॥
विष्णुपत्‍नि महामाये महापुरुषलक्षणे । 
प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे ॥ २ ॥ पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रात:काल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान्‌ लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे ॥ ३ ॥ (इस प्रकार प्रार्थना करे—) ‘प्रभो ! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकलसिद्धिस्वरूप हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ४ ॥ मेरे आराध्यदेव ! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्वर्यों से नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान्‌ कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ५ ॥ माता लक्ष्मीजी ! आप भगवान्‌ की अर्धाङ्गिनी और महामायास्वरूपिणी हैं। भगवान्‌के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ’ ॥ ६ ॥

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शुक्रवार, 22 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

इन्द्र उवाच
अम्ब तेऽहं व्यवसितमुपधार्यागतोऽन्तिकम्
लब्धान्तरोऽच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्मदृक् ||७१||
कृत्तो मे सप्तधा गर्भ आसन्सप्त कुमारकाः
तेऽपि चैकैकशो वृक्णाः सप्तधा नापि मम्रिरे ||७२||
ततस्तत्परमाश्चर्यं वीक्ष्य व्यवसितं मया
महापुरुषपूजायाः सिद्धिः काप्यानुषङ्गिणी ||७३||
आराधनं भगवत ईहमाना निराशिषः
ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशलाः स्मृताः ||७४||
आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्वरम्
को वृणीत गुणस्पर्शं बुधः स्यान्नरकेऽपि यत् ||७५||
तदिदं मम दौर्जन्यं बालिशस्य महीयसि
क्षन्तुमर्हसि मातस्त्वं दिष्ट्या गर्भो मृतोत्थितः ||७६||

श्रीशुक उवाच
इन्द्र स्तयाभ्यनुज्ञातः शुद्धभावेन तुष्टया
मरुद्भिः सह तां नत्वा जगाम त्रिदिवं प्रभुः || ७७||
एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि
मङ्गलं मरुतां जन्म किं भूयः कथयामि ते ||७८||

इन्द्र ने कहा—माता ! मुझे इस बातका पता चल गया था कि तुम किस उद्देश्यसे व्रत कर रही हो। इसीलिये अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मैं स्वर्ग छोडक़र तुम्हारे पास आया। मेरे मनमें तनिक भी धर्म-भावना नहीं थी। इसीसे तुम्हारे व्रतमें त्रुटि होते ही मैंने उस गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ७१ ॥ पहले मैंने उसके सात टुकड़े किये थे। तब वे सातों टुकड़े सात बालक बन गये। इसके बाद मैंने फिर एक-एकके सात-सात टुकड़े कर दिये। तब भी वे न मरे, बल्कि उनचास हो गये ॥ ७२ ॥ यह परम आश्चर्यमयी घटना देखकर मैंने ऐसा निश्चय किया कि परमपुरुष भगवान्‌ की उपासनाकी यह कोई स्वाभाविक सिद्धि है ॥ ७३ ॥ जो लोग निष्काम भावसे भगवान्‌की आराधना करते हैं और दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते, वे ही अपने स्वार्थ और परमार्थमें निपुण हैं ॥ ७४ ॥ भगवान्‌ जगदीश्वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं। वे प्रसन्न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके विषयभोगोंका वरदान माँगे। माताजी ! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं ॥ ७५ ॥ मेरी स्नेहमयी जननी ! तुम सब प्रकार मेरी पूज्या हो। मैंने मूर्खतावश बड़ी दुष्टताका काम किया है। तुम मेरे अपराधको क्षमा कर दो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा गर्भ खण्ड-खण्ड हो जानेसे एक प्रकार मर जानेपर भी फिरसे जीवित हो गया ॥ ७६ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! दिति देवराज इन्द्रके शुद्धभावसे सन्तुष्ट हो गयी। उससे आज्ञा लेकर देवराज इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ उसे नमस्कार किया और स्वर्गमें चले गये ॥ ७७ ॥ राजन् ! यह मरुद्गणका जन्म बड़ा ही मङ्गलमय है। इसके विषयमें तुमने मुझसे जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर समग्ररूप से मैंने तुम्हें दे दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ७८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मरुदुत्पत्तिकथनं नाम अष्टादशोऽध्या‍यः ॥ १८ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

न ममार दितेर्गर्भः श्रीनिवासानुकम्पया
बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौ ण्यस्त्रेण यथा भवान् ||६५||
सकृदिष्ट्वादिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम्
संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः ||६६||
सजूरिन्द्रे ण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन्
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः ||६७||
दितिरुत्थाय ददृशे कुमाराननलप्रभान्
इन्द्रे ण सहितान्देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ||६८||
अथेन्द्र माह ताताहमादित्यानां भयावहम्
अपत्यमिच्छन्त्यचरं व्रतमेतत्सुदुष्करम् ||६९||
एकः सङ्कल्पितः पुत्रः सप्त सप्ताभवन्कथम्
यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ||७०||

परीक्षित्‌ ! जैसे अश्वत्थामा  के ब्रह्मास्त्र  से तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट नहीं हुआ, वैसे ही भगवान्‌ श्रीहरिकी कृपासे दितिका वह गर्भ वज्रके द्वारा टुकड़े-टुकड़े होनेपर भी मरा नहीं ॥ ६५ ॥ इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान्‌ नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्‌की आराधना की थी ॥ ६६ ॥ अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया ॥ ६७ ॥ जब दितिकी आँख खुली, तब उसने देखा कि उसके अग्रिके समान तेजस्वी उनचास बालक इन्द्रके साथ हैं। इससे सुन्दर स्वभाववाली दिति को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६८ ॥ उसने इन्द्र को सम्बोधन करके कहा—‘बेटा ! मैं इस इच्छा से इस अत्यन्त कठिन व्रतका पालन कर रही थी कि तुम अदिति के पुत्रों को भयभीत करने वाला पुत्र उत्पन्न हो ॥६९॥ मैंने केवल एक ही पुत्र के लिये संकल्प किया था, फिर ये उनचास पुत्र कैसे हो गये ? बेटा इन्द्र ! यदि तुम्हें इसका रहस्य मालूम हो, तो सच-सच मुझे बतला दो। झूठ न बोलना’ ॥ ७० ॥

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गुरुवार, 21 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता
अस्पृष्टवार्यधौताङ्घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता ||६०||
लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रा पहृतचेतसः
दितेः प्रविष्ट उदरं योगेशो योगमायया ||६१||
चकर्त सप्तधा गर्भं वज्रेण कनकप्रभम्
रुदन्तं सप्तधैकैकं मा रोदीरिति तान्पुनः ||६२||
तमूचुः पाट्यमानास्ते सर्वे प्राञ्जलयो नृप
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव ||६३||
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः
अनन्यभावान्पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ||६४||

दिति व्रत के नियमों का पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाता ने भी उसे मोह में डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्या के समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी ॥ ६० ॥ योगेश्वर इन्द्र ने देखा कि यह अच्छा अवसर हाथ लगा। वे योगबल से झटपट सोयी हुई दितिके गर्भ में प्रवेश कर गये ॥ ६१ ॥ उन्होंने वहाँ जाकर सोने के समान चमकते हुए गर्भ के वज्र के द्वारा सात टुकड़े कर दिये। जब वह गर्भ रोने लगा, तब उन्होंने ‘मत रो, मत रो’ यह कहकर सातों टुकड़ोंमेंसे एक-एक के और भी सात टुकड़े कर दिये ॥ ६२ ॥ राजन् ! जब इन्द्र उनके टुकड़े-टुकड़े करने लगे, तब उन सबों ने हाथ जोडक़र इन्द्र से कहा—‘देवराज ! तुम हमें क्यों मार रहे हो ? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं’ ॥ ६३ ॥ तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो !’ ॥६४॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

बाढमित्यभ्युपेत्याथ दिती राजन्महामनाः
कश्यपाद्गर्भमाधत्त व्रतं चाञ्जो दधार सा ||५५||
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः ||५६||
नित्यं वनात्सुमनसः फलमूलसमित्कुशान्
पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत् ||५७||
एवं तस्या व्रतस्थाया व्रतच्छिद्रं हरिर्नृप
प्रेप्सुः पर्यचरज्जिह्मो मृगहेव मृगाकृतिः ||५८||
नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते
चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह || ५९||

परीक्षित्‌ ! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी। उसने ‘बहुत ठीक’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। अब दिति अपनी कोखमें भगवान्‌ कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी ॥ ५५ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दिति का अभिप्राय जान बड़ी बुद्धिमानी से अपना वेष बदलकर दिति के आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे ॥ ५६ ॥ वे दिति के लिये प्रतिदिन समय-समयपर वनसे फूल-फल, कन्द-मूल, समिधा, कुश, पत्ते, दूब, मिट्टी और जल लाकर उसकी सेवा में समर्पित करते ॥ ५७ ॥ राजन् ! जिस प्रकार बहेलिया हरिन को मारनेके लिये हरिनकी-सी सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दितिके व्रत-पालनकी त्रुटि पकडऩेके लिये उसकी सेवा करने लगे ॥ ५८ ॥ सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो ? ॥ ५९ ॥

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बुधवार, 20 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच
न हिंस्याद्भूतजातानि न शपेन्नानृतं वदेत्
न छिन्द्यान्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम्|| ४७||
नाप्सु स्नायान्न कुप्येत न सम्भाषेत दुर्जनैः
न वसीताधौतवासः स्रजं च विधृतां क्वचित् ||४८||
नोच्छिष्टं चण्डिकान्नं च सामिषं वृषलाहृतम्
भुञ्जीतोदक्यया दृष्टं पिबेन्नाञ्जलिना त्वपः ||४९||
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा
अनर्चितासंयतवाक्नासंवीता बहिश्चरेत् ||५०||
नाधौतपादाप्रयता नार्द्र पादा उदक्शिराः
शयीत नापराङ्नान्यैर्न नग्ना न च सन्ध्ययोः ||५१||
धौतवासा शुचिर्नित्यं सर्वमङ्गलसंयुता
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्राञ्श्रियमच्युतम् ||५२||
स्त्रियो वीरवतीश्चार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनैः
पतिं चार्च्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम् ||५३||
सांवत्सरं पुंसवनं व्रतमेतदविप्लुतम्
धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुतः ||५४||

कश्यपजी ने उत्तर दिया—प्रिये ! इस व्रत में किसी भी प्राणी को मन, वाणी या क्रिया के द्वारा सताये नहीं, किसीको शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीर के नख और रोएँ न काटे और किसी भी अशुभ वस्तुका स्पर्श न करे ॥ ४७ ॥ जलमें घुसकर स्नान न करे, क्रोध न करे, दुर्जनोंसे बातचीत न करे, बिना धुला वस्त्र न पहने और किसी की पहनी हुई माला न पहने ॥ ४८ ॥ जूठा न खाय, भद्रकाली का प्रसाद या मांसयुक्त अन्नका भोजन न करे। शूद्र का लाया हुआ और रजस्वला का देखा हुआ अन्न भी न खाय और अञ्जलि से जलपान न करे ॥ ४९ ॥ जूठे मुँह, बिना आचमन किये, सन्ध्याके समय, बाल खोले हुए, बिना शृङ्गारके, वाणीका संयम किये बिना और बिना चद्दर ओढ़े घरसे बाहर न निकले ॥ ५० ॥ बिना पैर धोये, अपवित्र अवस्थामें गीले पाँवोंसे, उत्तर या पश्चिम सिर करके, दूसरेके साथ, नग्रावस्थामें तथा सुबह-शाम सोना नहीं चाहिये ॥ ५१ ॥ इस प्रकार इन निषिद्ध कर्मोंका त्याग करके सर्वदा पवित्र रहे, धुला वस्त्र धारण करे और सभी सौभाग्यके चिह्नोंसे सुसज्जित रहे। प्रात:काल कलेवा करनेके पहले ही गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान्‌ नारायणकी पूजा करे ॥ ५२ ॥ इसके बाद पुष्पमाला, चन्दनादि सुगन्धद्रव्य, नैवेद्य और आभूषणादिसे सुहागिनी स्त्रियोंकी पूजा करे तथा पतिकी पूजा करके उसकी सेवामें संलग्र रहे और यह भावना करती रहे कि पतिका तेज मेरी कोखमें स्थित है ॥ ५३ ॥ प्रिये ! इस व्रतका नाम ‘पुंसवन’ है। यदि एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा ॥ ५४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच

पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्र हादेवबान्धवः
संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ||४५||

दितिरुवाच

धारयिष्ये व्रतं ब्रह्मन्ब्रूहि कार्याणि यानि मे
यानि चेह निषिद्धानि न व्रतं घ्नन्ति यान्युत ||४६||

कश्यपजी बोले—कल्याणी ! यदि तुम मेरे बतलाये हुए व्रतका एकवर्षतक विधिपूर्वक पालन करोगी तो तुम्हें इन्द्रको मारनेवाला पुत्र प्राप्त होगा। परंतु यदि किसी प्रकार नियमोंमें त्रुटि हो गयी तो वह देवताओंका मित्र बन जायगा ॥ ४५ ॥
दितिने कहा—ब्रह्मन् ! मैं उस व्रतका पालन करूँगी। आप बतलाइये कि मुझे क्या-क्या करना चाहिये, कौन-कौनसे काम छोड़ देने चाहिये और कौन-से काम ऐसे हैं, जिनसे व्रत भङ्ग नहीं होता ॥ ४६ ॥

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मंगलवार, 19 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

दितिरुवाच
वरदो यदि मे ब्रह्मन्पुत्रमिन्द्र हणं वृणे
अमृत्युं मृतपुत्राहं येन मे घातितौ सुतौ ||३७||
निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत
अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः ||३८||
अहो अर्थेन्द्रि यारामो योषिन्मय्येह मायया
गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम् ||३९||
कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः
धिङ्मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रि यः ||४०||
शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम्
हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ||४१||
न हि कश्चित्प्रियः स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम्
पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च ||४२
प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्न मृषा भवेत्
वधं नार्हति चेन्द्रो ऽपि तत्रेदमुपकल्पते ||४३||
इति सञ्चिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन
उवाच किञ्चित्कुपित आत्मानं च विगर्हयन् ||४४||

दितिने कहा—ब्रह्मन् ! इन्द्र ने विष्णु के हाथों मेरे दो पुत्र मरवाकर मुझे निपूती बना दिया है। इसलिये यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना चाहते हैं तो कृपा करके एक ऐसा अमर पुत्र दीजिये, जो इन्द्रको मार डाले ॥ ३७ ॥
परीक्षित्‌ ! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय ! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्म का अवसर आ पहुँचा ॥ ३८ ॥ देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय ! हाय ! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा ॥ ३९ ॥ इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है ॥ ४० ॥ सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है। इनका मुँह तो ऐसा होता है जैसे शरद्ऋतुका खिला हुआ कमल। बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो। परंतु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो ॥ ४१ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ अपनी लालसाओंकी कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसीसे प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाईतकको मार डालती हैं या मरवा डालती हैं ॥ ४२ ॥ अब तो मैं कह चुका हूँ कि जो तुम माँगोगी, दूँगा। मेरी बात झूठी नहीं होनी चाहिये। परंतु इन्द्र भी वध करनेयोग्य नहीं है। अच्छा, अब इस विषयमें मैं यह युक्ति करता हूँ’ ॥ ४३ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! सर्वसमर्थ कश्यपजी ने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दिति से कहा ॥ ४४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच

वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागमः ||३२||
पतिरेव हि नारीणां दैवतं परमं स्मृतम्
मानसः सर्वभूतानां वासुदेवः श्रियः पतिः ||३३||
स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः
इज्यते भगवान्पुम्भिः स्त्रीभिश्च पतिरूपधृक् ||३४||
तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे
यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्वरम् ||३५||
सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तितः
तं ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ||३६||

कश्यपजी ने कहा—अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझ से माँग लो । पति के प्रसन्न हो जाने पर पत्नी के लिये लोक या परलोक में कौन-सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है ॥ ३२ ॥ शास्त्रों में यह बात स्पष्ट कही गयी है कि पति ही स्त्रियों का परमाराध्य इष्टदेव है । प्रिये ! लक्ष्मीपति भगवान्‌ वासुदेव ही समस्त प्राणियों के हृदयमें विराजमान हैं ॥ ३३ ॥ विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्‌ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं ॥ ३४ ॥ इसलिये प्रिये ! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं ॥ ३५ ॥ कल्याणी ! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है। अब मैं तुम्हारी सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ३६ ॥

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सोमवार, 18 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि मनोज्ञया
बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ||२९||
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापतिः
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हृता ||३०||
एवं शुश्रूषितस्तात भगवान्कश्यपः स्त्रिया
प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ||३१||

कश्यपजी महाराज बड़े विद्वान् और विचारवान् होनेपर भी चतुर दिति की सेवासे मोहित हो गये और उन्होंने विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि ‘मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।’ स्त्रियोंके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ २९ ॥ सृष्टि के प्रभात में ब्रह्माजी ने देखा कि सभी जीव असङ्ग हो रहे हैं, तब उन्होंने अपने आधे शरीर से स्त्रियोंकी रचना की। और स्त्रियों ने पुरुषों की मति अपनी ओर आकर्षित कर ली ॥ ३० ॥ हाँ, तो भैया ! मैं कह रहा था कि दिति ने भगवान्‌ कश्यपकी बड़ी सेवा की। इससे वे उसपर बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने दितिका अभिनन्दन करते हुए उससे मुसकराकर कहा ॥ ३१ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच
हतपुत्रा दितिः शक्र पार्ष्णिग्राहेण विष्णुना
मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ||२३||
कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रि याराममुल्बणम्
अक्लिन्नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ||२४||
कृमिविड्भस्मसंज्ञासीद्यस्येशाभिहितस्य च
भूतध्रुक्तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ||२५||
आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्नद्धचेतसः
मदशोषक इन्द्र स्य भूयाद्येन सुतो हि मे ||२६||
इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम्
शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च ||२७||
भक्त्या परमया राजन्मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः
मनो जग्राह भावज्ञा सस्मितापाङ्गवीक्षणैः ||२८||

श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ विष्णु ने इन्द्र का पक्ष लेकर दितिके दोनों पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष को मार डाला। अत: दिति शोककी आगसे उद्दीप्त क्रोधसे जलकर इस प्रकार सोचने लगी ॥ २३ ॥ ‘सचमुच इन्द्र बड़ा विषयी, क्रूर और निर्दयी है। राम ! राम ! उसने अपने भाइयोंको ही मरवा डाला। वह दिन कब होगा, जब मैं भी उस पापीको मरवाकर आरामसे सोऊँगी ॥ २४ ॥ लोग राजाओंके, देवताओंके शरीरको ‘प्रभु’ कहकर पुकारते हैं; परंतु एक दिन वह कीड़ा, विष्ठा या राखका ढेर हो जाता है, इसके लिये जो दूसरे प्राणियोंको सताता है, उसे अपने सच्चे स्वार्थ या परमार्थका पता नहीं है; क्योंकि इससे तो नरकमें जाना पड़ेगा ॥ २५ ॥ मैं समझती हूँ इन्द्र अपने शरीरको नित्य मानकर मतवाला हो रहा है। उसे अपने विनाशका पता ही नहीं है। अब मैं वह उपाय करूँगी, जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्रका घमंड चूर-चूर कर दे’ ॥ २६ ॥ दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा-शुश्रूषा, विनय-प्रेम और जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी ॥ २७ ॥ वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी ॥ २८ ॥ 

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रविवार, 17 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीराजोवाच

कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो
इन्द्रे ण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः|| २०||
इमे श्रद्दधते ब्रह्मन्नृषयो हि मया सह
परिज्ञानाय भगवंस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ||२१||

श्रीसूत उवाच

तद्विष्णुरातस्य स बादरायणिर्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत्
सभाजयन्सन्निभृतेन चेतसा जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः|| २२||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! मरुद्गण ने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भाव को छोड़ सके और देवराज इन्द्र के द्वारा देवता बना लिये गये ? ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! मेरे साथ यहाँ की सभी ऋषिमण्डली यह बात जानने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो रही है। अत: आप कृपा करके विस्तारसे वह रहस्य बतलाइये ॥ २१ ॥
सूतजी कहते हैं—शौनकजी ! राजा परीक्षित्‌ का प्रश्र थोड़े शब्दों में बड़ा सारगर्भित था। उन्होंने बड़े आदर से पूछा भी था। इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेव जी महाराज ने बड़े ही प्रसन्न चित्त से उनका अभिनन्दन करके यों कहा ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

ह्रादस्य धमनिर्भार्या सूत वातापिमिल्वलम्
योऽगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वलः ||१५||
अनुह्रादस्य सूर्यायां बाष्कलो महिषस्तथा
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्देव्यां तस्याभवद्बलिः ||१६||
बाणज्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोऽभवत्
तस्यानुभावं सुश्लोक्यं पश्चादेवाभिधास्यते ||१७||
बाण आराध्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम्
यत्पार्श्वे भगवानास्ते ह्यद्यापि पुरपालकः ||१८
मरुतश्च दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिकाः
त आसन्नप्रजाः सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मताम् ||१९||

ह्राद की पत्नी थी धमनि। उसके दो पुत्र हुए—वातापि और इल्वल। इस इल्वल ने ही महर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापि को पकाकर उन्हें खिला दिया था ॥ १५ ॥ अनुह्राद की पत्नी सूर्या थी, उसके दो पुत्र हुए— बाष्कल और महिषासुर। प्रह्लादका पुत्र था विरोचन। उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ बलिकी पत्नी का नाम अशना था। उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए। दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है। उसे मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) सुनाऊँगा ॥ १७ ॥ बलिका पुत्र बाणासुर भगवान्‌ शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया। आज भी भगवान्‌ शंकर उसके नगर की रक्षा करने के लिये उसके पास ही रहते हैं ॥ १८ ॥ दिति के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे। उन्हें मरुद्गण कहते हैं। वे सब नि:सन्तान रहे। देवराज इन्द्र ने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ॥ १९ ॥

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शनिवार, 16 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते
यत्र भागवतः श्रीमान्प्रह्रादो बलिरेव च ||१०||
दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ||११||
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुरः सुतान् ||१२||
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं प्रह्लादमेव च
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ||१३||
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्
संह्रादस्य कृतिर्भार्या सूत पञ्चजनं ततः ||१४||

प्रिय परीक्षित्‌! अब मैं कश्यपजी की दूसरी पत्नी दिति से उत्पन्न होनेवाली उस सन्तान- परम्परा का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लाद जी और बलि का जन्म हुआ ॥१०॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें (तीसरे स्कन्धमें) सुना चुका हूँ ॥ ११ ॥ हिरण्यकशिपु की पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भ ने उसका विवाह हिरण्यकशिपु से कर दिया था। कयाधु के चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्लाद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानव से हुआ। उससे राहु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥ १२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपान के समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ ने चक्र से काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पञ्चजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

पौलोम्यामिन्द्र आधत्त त्रीन्पुत्रानिति नः श्रुतम्
जयन्तमृषभं तात तृतीयं मीढुषं प्रभुः ||७||
उरुक्रमस्य देवस्य मायावामनरूपिणः
कीर्तौ पत्न्यां बृहच्छ्लोकस्तस्यासन्सौभगादयः ||८||
तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मनः
पश्चाद्वक्ष्यामहेऽदित्यां यथैवावततार ह ||९||

प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र की पत्नी थीं पुलोमनन्दिनी शची। उनसे, हमने सुना है, उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किये—जयन्त, ऋषभ और मीढ्वान् ॥ ७ ॥ स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही(बलिपर अनुग्रह करने और इन्द्र का राज्य लौटानेके लिये) मायासे वामन (उपेन्द्र) के रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने तीन पग पृथ्वी माँगकर तीनों लोक नाप लिये थे। उनकी पत्नीका नाम था कीर्ति। उससे बृहच्छ्लोक नाम का पुत्र हुआ। उसके सौभग आदि कई सन्तानें हुर्ईं ॥ ८ ॥ कश्यपनन्दन भगवान्‌ वामन ने माता अदिति के गर्भ से क्यों जन्म लिया और इस अवतार में उन्होंने कौन-से गुण, लीलाएँ और पराक्रम प्रकट किये—इसका वर्णन मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) करूँगा ॥ ९ ॥

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शुक्रवार, 15 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच

पृश्निस्तु पत्नी सवितुः सावित्रीं व्याहृतिं त्रयीम्
अग्निहोत्रं पशुं सोमं चातुर्मास्यं महामखान् ||१||
सिद्धिर्भगस्य भार्याङ्ग महिमानं विभुं प्रभुम्
आशिषं च वरारोहां कन्यां प्रासूत सुव्रताम् ||२||
धातुः कुहूः सिनीवाली राका चानुमतिस्तथा
सायं दर्शमथ प्रातः पूर्णमासमनुक्रमात् ||३||
अग्नीन्पुरीष्यानाधत्त क्रियायां समनन्तरः
चर्षणी वरुणस्यासीद्यस्यां जातो भृगुः पुनः ||४||
वाल्मीकिश्च महायोगी वल्मीकादभवत्किल
अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च मित्रावरुणयोर्ऋषी|| ५||
रेतः सिषिचतुः कुम्भे उर्वश्याः सन्निधौ द्रुतम्
रेवत्यां मित्र उत्सर्गमरिष्टं पिप्पलं व्यधात् ||६||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! सविता की पत्नी पृश्नि के गर्भ से आठ सन्तानें हुर्ईं—सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य और पञ्चमहायज्ञ ॥ १ ॥ भग की पत्नी सिद्धि ने महिमा, विभु और प्रभु—ये तीन पुत्र और आशिष् नाम की एक कन्या उत्पन्न की। यह कन्या बड़ी सुन्दरी और सदाचारिणी थी ॥ २ ॥ धाता की चार पत्नियाँ थीं—कुहू, सिनीवाली, राका और अनुमति। उनसे क्रमश: सायं, दर्श, प्रात: और पूर्णमास—ये चार पुत्र हुए ॥ ३ ॥ धाता के छोटे भाई का नाम था—विधाता, उनकी पत्नी क्रिया थी। उससे पुरीष्य नाम के पाँच अग्नियों की उत्पत्ति हुई। वरुण जी की पत्नी का नाम चर्षणी था। उससे भृगुजीने पुन: जन्म ग्रहण किया। इसके पहले वे ब्रह्माजी के पुत्र थे ॥ ४ ॥ महायोगी वाल्मीकि जी भी वरुण के पुत्र थे। वल्मीक से पैदा होनेके कारण ही उनका नाम वाल्मीकि पड़ गया था। उर्वशी को देखकर मित्र और वरुण दोनों का वीर्य स्खलित हो गया था। उसे उन लोगों ने घड़े में रख दिया। उसीसे मुनिवर अगस्त्य और वसिष्ठजी का जन्म हुआ। मित्र की पत्नी थी रेवती। उसके तीन पुत्र हुए—उत्सर्ग, अरिष्ट और पिप्पल ॥ ५-६ ॥ 

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गुरुवार, 14 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच - 

इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम् । 
बभूव शान्तधी राजन् देवी विगतविस्मया ॥ ३६ ॥
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । 
मूर्ध्ना स जगृहे शापं एतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥
जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः । 
वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ३८ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । 
वृत्रस्यासुरजातेश्च कारणं भगवन्मतेः ॥ ३९ ॥
इतिहासं इमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मनः । 
माहात्म्यं विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद् विमुच्यते ॥ ४० ॥
य एतत् प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यतः पठेत् । 
इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥ ४१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ शङ्कर का यह भाषण सुनकर भगवती पार्वती की चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा ॥ ३६ ॥ भगवान्‌ के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वती को बदले में शाप दे सकते थे, परंतु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया ! यही साधु पुरुषका लक्षण है ॥ ३७ ॥ यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्रिसे पैदा हुए। वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत्स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे ॥ ३८ ॥ तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों हुआ और उसे भगवान्‌की ऐसी भक्ति कैसे प्राप्त हुई। उसका पूरा-पूरा विवरण मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ ३९ ॥ महात्मा चित्रकेतुका यह पवित्र इतिहास केवल उनका ही नहीं, समस्त विष्णुभक्तोंका माहात्म्य है; इसे जो सुनता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥ जो पुरुष प्रात:काल उठकर मौन रहकर श्रद्धा के साथ भगवान्‌ का स्मरण करते हुए इस इतिहासका पाठ करता है, उसे परमगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुशापो नाम सप्तदशोऽध्या‍यः ॥ १७ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

वासुदेवे भगवति भक्तिं उद्वहतां नृणाम् । 
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद्व्यपाश्रयः ॥ ३१ ॥
नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ 
     न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । 
विदाम यस्येहितमंशकांशका 
     न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥ ३२ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३ ॥
तस्य चायं महाभागः चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः । 
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४ ॥
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु । 
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥

जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान्‌ वासुदेव के चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत् में  ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें ॥ ३१ ॥ मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं ? ॥ ३२ ॥ भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं ॥ ३३ ॥ प्रिये ! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान्‌ श्रीहरिका ही प्रिय हूँ ॥ ३४ ॥ इसलिये तुम्हें भगवान्‌ के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

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बुधवार, 13 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीरुद्र उवाच - 

दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्‍भुतकर्मणः । 
माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥ २७ ॥
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति । 
स्वर्गापवर्गनरकेषु अपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ २८ ॥
देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वान् ईश्वरलीलया । 
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि । 
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३० ॥

भगवान्‌ शङ्कर ने कहा—सुन्दरि ! दिव्यलीला-विहारी भगवान्‌ के नि:स्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली ॥ २७ ॥ जो लोग भगवान्‌ के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तु के—केवल भगवान्‌ के ही समान भाव से दर्शन होते हैं ॥ २८ ॥ जीवों को भगवान्‌ की लीला से ही देहका संयोग होने के कारण सुख-दु:ख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दु:ख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ३० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

एकः सृजति भूतानि भगवान् आत्ममायया । 
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥ २१ ॥
न तस्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो 
     न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । 
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य 
     सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥
तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां 
     सुखाय दुःखाय हिताहिताय । 
बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः 
     शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥ २३ ॥
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि । 
यन्मन्यसे ह्यसाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥ २४ ॥

श्रीशुक उवाच - 
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । 
जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥ २५ ॥
ततस्तु भगवान्रुद्रो रुद्राणीं इदमब्रवीत् । 
देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च श्रृण्वताम् ॥ २६ ॥

एकमात्र परिपूर्णतम भगवान्‌ ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दु:खकी रचना करते हैं ॥ २१ ॥ माताजी ! भगवान्‌ श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ॥ २२ ॥ तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दु:ख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ॥ २३ ॥ पतिप्राणा देवि ! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु भगवान्‌ शङ्कर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥ तब भगवान्‌ शङ्करने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही ॥ २६ ॥

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सोमवार, 11 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु को पार्वती जी का शाप

श्रीशुक उवाच - 
एवं शप्तश्चित्रकेतुः विमानाद् अवरुह्य सः । 
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥ १६ ॥

चित्रकेतुरुवाच - 
प्रतिगृह्णामि ते शापं आत्मनोऽञ्जलिनाम्बिके । 
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥
संसारचक्र एतस्मिन् जन्तुरज्ञानमोहितः । 
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्‌क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः । 
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥
गुणप्रवाह एतस्मिन्कः शापः को न्वनुग्रहः । 
कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥ २० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! जब पार्वतीजी ने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ १६ ॥
चित्रकेतुने कहा—माता पार्वतीजी ! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोडक़र आपका शाप स्वीकार करता हूँ। क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है ॥ १७ ॥ देवि ! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दु:ख भोगता रहता है ॥ १८ ॥ माताजी ! सुख और दु:खको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दु:खका कर्ता माना करते हैं ॥ १९ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दु:ख ॥ २० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीपार्वति उवाच - 

अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः । 
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥ ११ ॥
न वेद धर्मं किल पद्मयोनिः 
     न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । 
न वै कुमारः कपिलो मनुश्च 
     ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥ १२ ॥
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं 
     जगद्‍गुरुं मङ्‌गलमङ्‌गलं स्वयम् । 
यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् 
     प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥ १३ ॥
नायमर्हति वैकुण्ठ पादमूलोपसर्पणम् । 
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥ १४ ॥
अतः पापीयसीं योनिं आसुरीं याहि दुर्मते । 
यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५ ॥

पार्वतीजी बोलीं—अहो ! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या ? ॥ ११ ॥ जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते। तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाले भगवान्‌ शिव को इस कामसे नहीं रोकते ॥ १२ ॥ ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मङ्गलों को मङ्गल बनाने वाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्‌ का और उनके अनुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है ॥ १३ ॥ इसे अपने बड़प्पनका घमंड है। यह मूर्ख भगवान्‌ श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं ॥ १४ ॥ [चित्रकेतु को सम्बोधन कर] अत: दुर्मते ! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ। ऐसा होनेसे बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे ॥ १५ ॥

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रविवार, 10 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

चित्रकेतुरुवाच - 
एष लोकगुरुः साक्षात् धर्मं वक्ता शरीरिणाम् । 
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः । 
अङ्‌कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति । 
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच - 
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप । 
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् । 
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥

चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥ ६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥ ७ ॥ प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! भगवान्‌ शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान्‌ शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा— ॥ ९-१० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच 

यतश्चान्तर्हितोऽनन्तः तस्यै कृत्वा दिशे नमः । 
विद्याधरश्चित्रकेतुः चचार गगने चरः ॥ १ ॥
स लक्षं वर्षलक्षाणां अव्याहतबलेन्द्रियः । 
स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणैः ॥ २ ॥
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्‌कल्पसिद्धिषु । 
रेमे विद्याधरस्त्रीभिः गापयन् हरिमीश्वरम् ॥ ३ ॥
एकदा स विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता । 
गिरिशं ददृशे गच्छन् परीतं सिद्धचारणैः ॥ ४ ॥
आलिङ्‌ग्याङ्‌कीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि । 
उवाच देव्याः श्रृण्वन्त्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान्‌ सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ॥ १ ॥ महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों तक सब प्रकार के संकल्पों को पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वत की घाटियों में विहार करते रहे। उनके शरीर का बल और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के गुण और लीलाओं का गान करती रहतीं ॥ २-३ ॥ एक दिन चित्रकेतु भगवान्‌ के दिये हुए तेजोमय विमानपर सवार होकर कहीं जा रहे थे। इसी समय उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शङ्कर बड़े-बड़े मुनियोंकी सभामें सिद्ध-चारणोंके बीच बैठे हुए हैं और साथ ही भगवती पार्वतीको अपनी गोदमें बैठाकर एक हाथसे उन्हें आलिङ्गन किये हुए हैं, यह देखकर चित्रकेतु विमानपर चढ़े हुए ही उनके पास चले गये और भगवती पार्वतीको सुना-सुनाकर जोर से हँसने और कहने लगे ॥ ४-५ ॥

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शनिवार, 9 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् । 
आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ॥ ६१ ॥
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिः निर्मुक्तः स्वेन तेजसा । 
ज्ञानविज्ञानसन्तृप्तो मद्‍भक्तः पुरुषो भवेत् ॥ ६२ ॥
एतावानेव मनुजैः योगनैपुण्यबुद्धिभिः । 
स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥ ६३ ॥
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन् अप्रमत्तो वचो मम । 
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥ ६४ ॥

श्रीशुक उवाच - 

आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्‍गुरुः । 
पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ॥ ६५ ॥

जो मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्म के पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है—यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है ॥ ६१ ॥ यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए विषय-भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय ॥ ६२ ॥ जो लोग योगमार्गका तत्त्व समझनेमें निपुण हैं, उनको भलीभाँति समझ लेना चाहिये कि जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर ले ॥ ६३ ॥ राजन्! यदि तुम मेरे इस उपदेश को सावधान होकर श्रद्धाभाव से धारण करोगे तो ज्ञान एवं विज्ञान से सम्पन्न होकर शीघ्र ही सिद्ध हो जाओगे ॥६॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! जगद्गुरु विश्वात्मा भगवान्‌ श्रीहरि चित्रकेतुको इस प्रकार समझा-बुझाकर उनके सामने ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतोः परमात्मदर्शनं नाम षोडशोऽध्या‍यः ॥ १६ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा । 
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । 
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
यदेतद् विस्मृतं पुंसो मद्‍भावं भिन्नमात्मनः । 
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् । 
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचिन् शममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् । 
अभयं चाप्यनीहायां सङ्‌कल्पाद् विरमेत्कविः ॥ ५९ ॥
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः । 
ततोऽनिवृत्तिः अप्राप्तिः दुखस्य च सुखस्य च ॥ ६० ॥

(श्रीभगवान्‌ कहते हैं) सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायता से अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो ॥ ५५ ॥ पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओं का अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओं में अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है ॥ ५६ ॥ जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पडऩा पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है ॥ ५७ ॥ यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ५८ ॥ राजन् ! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है; और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दु:ख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ॥ ५९ ॥ जगत् के सभी स्त्रीपुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दु:खोंसे पिण्ड छूटे; परंतु उन कर्मोंसे न तो उनका दु:ख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ॥ ६० ॥ 

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