शनिवार, 16 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते
यत्र भागवतः श्रीमान्प्रह्रादो बलिरेव च ||१०||
दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ||११||
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुरः सुतान् ||१२||
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं प्रह्लादमेव च
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ||१३||
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्
संह्रादस्य कृतिर्भार्या सूत पञ्चजनं ततः ||१४||

प्रिय परीक्षित्‌! अब मैं कश्यपजी की दूसरी पत्नी दिति से उत्पन्न होनेवाली उस सन्तान- परम्परा का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लाद जी और बलि का जन्म हुआ ॥१०॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें (तीसरे स्कन्धमें) सुना चुका हूँ ॥ ११ ॥ हिरण्यकशिपु की पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भ ने उसका विवाह हिरण्यकशिपु से कर दिया था। कयाधु के चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्लाद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानव से हुआ। उससे राहु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥ १२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपान के समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ ने चक्र से काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पञ्चजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

1 टिप्पणी:

  1. 🌹🩷🥀जय श्रीमन् नारायण 🙏
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

    जवाब देंहटाएं