शुक्रवार, 22 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

न ममार दितेर्गर्भः श्रीनिवासानुकम्पया
बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौ ण्यस्त्रेण यथा भवान् ||६५||
सकृदिष्ट्वादिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम्
संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः ||६६||
सजूरिन्द्रे ण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन्
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः ||६७||
दितिरुत्थाय ददृशे कुमाराननलप्रभान्
इन्द्रे ण सहितान्देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ||६८||
अथेन्द्र माह ताताहमादित्यानां भयावहम्
अपत्यमिच्छन्त्यचरं व्रतमेतत्सुदुष्करम् ||६९||
एकः सङ्कल्पितः पुत्रः सप्त सप्ताभवन्कथम्
यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ||७०||

परीक्षित्‌ ! जैसे अश्वत्थामा  के ब्रह्मास्त्र  से तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट नहीं हुआ, वैसे ही भगवान्‌ श्रीहरिकी कृपासे दितिका वह गर्भ वज्रके द्वारा टुकड़े-टुकड़े होनेपर भी मरा नहीं ॥ ६५ ॥ इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान्‌ नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्‌की आराधना की थी ॥ ६६ ॥ अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया ॥ ६७ ॥ जब दितिकी आँख खुली, तब उसने देखा कि उसके अग्रिके समान तेजस्वी उनचास बालक इन्द्रके साथ हैं। इससे सुन्दर स्वभाववाली दिति को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६८ ॥ उसने इन्द्र को सम्बोधन करके कहा—‘बेटा ! मैं इस इच्छा से इस अत्यन्त कठिन व्रतका पालन कर रही थी कि तुम अदिति के पुत्रों को भयभीत करने वाला पुत्र उत्पन्न हो ॥६९॥ मैंने केवल एक ही पुत्र के लिये संकल्प किया था, फिर ये उनचास पुत्र कैसे हो गये ? बेटा इन्द्र ! यदि तुम्हें इसका रहस्य मालूम हो, तो सच-सच मुझे बतला दो। झूठ न बोलना’ ॥ ७० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀जय श्रीहरि: !! 🙏
    ॐ श्रीपरमात्मने नमः 🙏
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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