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सोमवार, 18 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि मनोज्ञया
बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ||२९||
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापतिः
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हृता ||३०||
एवं शुश्रूषितस्तात भगवान्कश्यपः स्त्रिया
प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ||३१||

कश्यपजी महाराज बड़े विद्वान् और विचारवान् होनेपर भी चतुर दिति की सेवासे मोहित हो गये और उन्होंने विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि ‘मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।’ स्त्रियोंके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ २९ ॥ सृष्टि के प्रभात में ब्रह्माजी ने देखा कि सभी जीव असङ्ग हो रहे हैं, तब उन्होंने अपने आधे शरीर से स्त्रियोंकी रचना की। और स्त्रियों ने पुरुषों की मति अपनी ओर आकर्षित कर ली ॥ ३० ॥ हाँ, तो भैया ! मैं कह रहा था कि दिति ने भगवान्‌ कश्यपकी बड़ी सेवा की। इससे वे उसपर बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने दितिका अभिनन्दन करते हुए उससे मुसकराकर कहा ॥ ३१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच
हतपुत्रा दितिः शक्र पार्ष्णिग्राहेण विष्णुना
मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ||२३||
कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रि याराममुल्बणम्
अक्लिन्नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ||२४||
कृमिविड्भस्मसंज्ञासीद्यस्येशाभिहितस्य च
भूतध्रुक्तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ||२५||
आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्नद्धचेतसः
मदशोषक इन्द्र स्य भूयाद्येन सुतो हि मे ||२६||
इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम्
शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च ||२७||
भक्त्या परमया राजन्मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः
मनो जग्राह भावज्ञा सस्मितापाङ्गवीक्षणैः ||२८||

श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ विष्णु ने इन्द्र का पक्ष लेकर दितिके दोनों पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष को मार डाला। अत: दिति शोककी आगसे उद्दीप्त क्रोधसे जलकर इस प्रकार सोचने लगी ॥ २३ ॥ ‘सचमुच इन्द्र बड़ा विषयी, क्रूर और निर्दयी है। राम ! राम ! उसने अपने भाइयोंको ही मरवा डाला। वह दिन कब होगा, जब मैं भी उस पापीको मरवाकर आरामसे सोऊँगी ॥ २४ ॥ लोग राजाओंके, देवताओंके शरीरको ‘प्रभु’ कहकर पुकारते हैं; परंतु एक दिन वह कीड़ा, विष्ठा या राखका ढेर हो जाता है, इसके लिये जो दूसरे प्राणियोंको सताता है, उसे अपने सच्चे स्वार्थ या परमार्थका पता नहीं है; क्योंकि इससे तो नरकमें जाना पड़ेगा ॥ २५ ॥ मैं समझती हूँ इन्द्र अपने शरीरको नित्य मानकर मतवाला हो रहा है। उसे अपने विनाशका पता ही नहीं है। अब मैं वह उपाय करूँगी, जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्रका घमंड चूर-चूर कर दे’ ॥ २६ ॥ दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा-शुश्रूषा, विनय-प्रेम और जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी ॥ २७ ॥ वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी ॥ २८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 17 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीराजोवाच

कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो
इन्द्रे ण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः|| २०||
इमे श्रद्दधते ब्रह्मन्नृषयो हि मया सह
परिज्ञानाय भगवंस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ||२१||

श्रीसूत उवाच

तद्विष्णुरातस्य स बादरायणिर्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत्
सभाजयन्सन्निभृतेन चेतसा जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः|| २२||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! मरुद्गण ने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भाव को छोड़ सके और देवराज इन्द्र के द्वारा देवता बना लिये गये ? ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! मेरे साथ यहाँ की सभी ऋषिमण्डली यह बात जानने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो रही है। अत: आप कृपा करके विस्तारसे वह रहस्य बतलाइये ॥ २१ ॥
सूतजी कहते हैं—शौनकजी ! राजा परीक्षित्‌ का प्रश्र थोड़े शब्दों में बड़ा सारगर्भित था। उन्होंने बड़े आदर से पूछा भी था। इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेव जी महाराज ने बड़े ही प्रसन्न चित्त से उनका अभिनन्दन करके यों कहा ॥ २२ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

ह्रादस्य धमनिर्भार्या सूत वातापिमिल्वलम्
योऽगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वलः ||१५||
अनुह्रादस्य सूर्यायां बाष्कलो महिषस्तथा
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्देव्यां तस्याभवद्बलिः ||१६||
बाणज्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोऽभवत्
तस्यानुभावं सुश्लोक्यं पश्चादेवाभिधास्यते ||१७||
बाण आराध्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम्
यत्पार्श्वे भगवानास्ते ह्यद्यापि पुरपालकः ||१८
मरुतश्च दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिकाः
त आसन्नप्रजाः सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मताम् ||१९||

ह्राद की पत्नी थी धमनि। उसके दो पुत्र हुए—वातापि और इल्वल। इस इल्वल ने ही महर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापि को पकाकर उन्हें खिला दिया था ॥ १५ ॥ अनुह्राद की पत्नी सूर्या थी, उसके दो पुत्र हुए— बाष्कल और महिषासुर। प्रह्लादका पुत्र था विरोचन। उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ बलिकी पत्नी का नाम अशना था। उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए। दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है। उसे मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) सुनाऊँगा ॥ १७ ॥ बलिका पुत्र बाणासुर भगवान्‌ शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया। आज भी भगवान्‌ शंकर उसके नगर की रक्षा करने के लिये उसके पास ही रहते हैं ॥ १८ ॥ दिति के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे। उन्हें मरुद्गण कहते हैं। वे सब नि:सन्तान रहे। देवराज इन्द्र ने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ॥ १९ ॥

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शनिवार, 16 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते
यत्र भागवतः श्रीमान्प्रह्रादो बलिरेव च ||१०||
दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ||११||
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुरः सुतान् ||१२||
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं प्रह्लादमेव च
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ||१३||
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्
संह्रादस्य कृतिर्भार्या सूत पञ्चजनं ततः ||१४||

प्रिय परीक्षित्‌! अब मैं कश्यपजी की दूसरी पत्नी दिति से उत्पन्न होनेवाली उस सन्तान- परम्परा का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लाद जी और बलि का जन्म हुआ ॥१०॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें (तीसरे स्कन्धमें) सुना चुका हूँ ॥ ११ ॥ हिरण्यकशिपु की पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भ ने उसका विवाह हिरण्यकशिपु से कर दिया था। कयाधु के चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्लाद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानव से हुआ। उससे राहु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥ १२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपान के समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ ने चक्र से काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पञ्चजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

पौलोम्यामिन्द्र आधत्त त्रीन्पुत्रानिति नः श्रुतम्
जयन्तमृषभं तात तृतीयं मीढुषं प्रभुः ||७||
उरुक्रमस्य देवस्य मायावामनरूपिणः
कीर्तौ पत्न्यां बृहच्छ्लोकस्तस्यासन्सौभगादयः ||८||
तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मनः
पश्चाद्वक्ष्यामहेऽदित्यां यथैवावततार ह ||९||

प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र की पत्नी थीं पुलोमनन्दिनी शची। उनसे, हमने सुना है, उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किये—जयन्त, ऋषभ और मीढ्वान् ॥ ७ ॥ स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही(बलिपर अनुग्रह करने और इन्द्र का राज्य लौटानेके लिये) मायासे वामन (उपेन्द्र) के रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने तीन पग पृथ्वी माँगकर तीनों लोक नाप लिये थे। उनकी पत्नीका नाम था कीर्ति। उससे बृहच्छ्लोक नाम का पुत्र हुआ। उसके सौभग आदि कई सन्तानें हुर्ईं ॥ ८ ॥ कश्यपनन्दन भगवान्‌ वामन ने माता अदिति के गर्भ से क्यों जन्म लिया और इस अवतार में उन्होंने कौन-से गुण, लीलाएँ और पराक्रम प्रकट किये—इसका वर्णन मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) करूँगा ॥ ९ ॥

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शुक्रवार, 15 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच

पृश्निस्तु पत्नी सवितुः सावित्रीं व्याहृतिं त्रयीम्
अग्निहोत्रं पशुं सोमं चातुर्मास्यं महामखान् ||१||
सिद्धिर्भगस्य भार्याङ्ग महिमानं विभुं प्रभुम्
आशिषं च वरारोहां कन्यां प्रासूत सुव्रताम् ||२||
धातुः कुहूः सिनीवाली राका चानुमतिस्तथा
सायं दर्शमथ प्रातः पूर्णमासमनुक्रमात् ||३||
अग्नीन्पुरीष्यानाधत्त क्रियायां समनन्तरः
चर्षणी वरुणस्यासीद्यस्यां जातो भृगुः पुनः ||४||
वाल्मीकिश्च महायोगी वल्मीकादभवत्किल
अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च मित्रावरुणयोर्ऋषी|| ५||
रेतः सिषिचतुः कुम्भे उर्वश्याः सन्निधौ द्रुतम्
रेवत्यां मित्र उत्सर्गमरिष्टं पिप्पलं व्यधात् ||६||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! सविता की पत्नी पृश्नि के गर्भ से आठ सन्तानें हुर्ईं—सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य और पञ्चमहायज्ञ ॥ १ ॥ भग की पत्नी सिद्धि ने महिमा, विभु और प्रभु—ये तीन पुत्र और आशिष् नाम की एक कन्या उत्पन्न की। यह कन्या बड़ी सुन्दरी और सदाचारिणी थी ॥ २ ॥ धाता की चार पत्नियाँ थीं—कुहू, सिनीवाली, राका और अनुमति। उनसे क्रमश: सायं, दर्श, प्रात: और पूर्णमास—ये चार पुत्र हुए ॥ ३ ॥ धाता के छोटे भाई का नाम था—विधाता, उनकी पत्नी क्रिया थी। उससे पुरीष्य नाम के पाँच अग्नियों की उत्पत्ति हुई। वरुण जी की पत्नी का नाम चर्षणी था। उससे भृगुजीने पुन: जन्म ग्रहण किया। इसके पहले वे ब्रह्माजी के पुत्र थे ॥ ४ ॥ महायोगी वाल्मीकि जी भी वरुण के पुत्र थे। वल्मीक से पैदा होनेके कारण ही उनका नाम वाल्मीकि पड़ गया था। उर्वशी को देखकर मित्र और वरुण दोनों का वीर्य स्खलित हो गया था। उसे उन लोगों ने घड़े में रख दिया। उसीसे मुनिवर अगस्त्य और वसिष्ठजी का जन्म हुआ। मित्र की पत्नी थी रेवती। उसके तीन पुत्र हुए—उत्सर्ग, अरिष्ट और पिप्पल ॥ ५-६ ॥ 

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गुरुवार, 14 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच - 

इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम् । 
बभूव शान्तधी राजन् देवी विगतविस्मया ॥ ३६ ॥
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । 
मूर्ध्ना स जगृहे शापं एतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥
जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः । 
वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ३८ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । 
वृत्रस्यासुरजातेश्च कारणं भगवन्मतेः ॥ ३९ ॥
इतिहासं इमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मनः । 
माहात्म्यं विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद् विमुच्यते ॥ ४० ॥
य एतत् प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यतः पठेत् । 
इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥ ४१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ शङ्कर का यह भाषण सुनकर भगवती पार्वती की चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा ॥ ३६ ॥ भगवान्‌ के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वती को बदले में शाप दे सकते थे, परंतु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया ! यही साधु पुरुषका लक्षण है ॥ ३७ ॥ यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्रिसे पैदा हुए। वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत्स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे ॥ ३८ ॥ तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों हुआ और उसे भगवान्‌की ऐसी भक्ति कैसे प्राप्त हुई। उसका पूरा-पूरा विवरण मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ ३९ ॥ महात्मा चित्रकेतुका यह पवित्र इतिहास केवल उनका ही नहीं, समस्त विष्णुभक्तोंका माहात्म्य है; इसे जो सुनता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥ जो पुरुष प्रात:काल उठकर मौन रहकर श्रद्धा के साथ भगवान्‌ का स्मरण करते हुए इस इतिहासका पाठ करता है, उसे परमगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुशापो नाम सप्तदशोऽध्या‍यः ॥ १७ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

वासुदेवे भगवति भक्तिं उद्वहतां नृणाम् । 
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद्व्यपाश्रयः ॥ ३१ ॥
नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ 
     न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । 
विदाम यस्येहितमंशकांशका 
     न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥ ३२ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३ ॥
तस्य चायं महाभागः चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः । 
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४ ॥
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु । 
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥

जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान्‌ वासुदेव के चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत् में  ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें ॥ ३१ ॥ मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं ? ॥ ३२ ॥ भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं ॥ ३३ ॥ प्रिये ! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान्‌ श्रीहरिका ही प्रिय हूँ ॥ ३४ ॥ इसलिये तुम्हें भगवान्‌ के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

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बुधवार, 13 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीरुद्र उवाच - 

दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्‍भुतकर्मणः । 
माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥ २७ ॥
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति । 
स्वर्गापवर्गनरकेषु अपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ २८ ॥
देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वान् ईश्वरलीलया । 
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि । 
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३० ॥

भगवान्‌ शङ्कर ने कहा—सुन्दरि ! दिव्यलीला-विहारी भगवान्‌ के नि:स्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली ॥ २७ ॥ जो लोग भगवान्‌ के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तु के—केवल भगवान्‌ के ही समान भाव से दर्शन होते हैं ॥ २८ ॥ जीवों को भगवान्‌ की लीला से ही देहका संयोग होने के कारण सुख-दु:ख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दु:ख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ३० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

एकः सृजति भूतानि भगवान् आत्ममायया । 
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥ २१ ॥
न तस्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो 
     न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । 
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य 
     सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥
तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां 
     सुखाय दुःखाय हिताहिताय । 
बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः 
     शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥ २३ ॥
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि । 
यन्मन्यसे ह्यसाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥ २४ ॥

श्रीशुक उवाच - 
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । 
जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥ २५ ॥
ततस्तु भगवान्रुद्रो रुद्राणीं इदमब्रवीत् । 
देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च श्रृण्वताम् ॥ २६ ॥

एकमात्र परिपूर्णतम भगवान्‌ ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दु:खकी रचना करते हैं ॥ २१ ॥ माताजी ! भगवान्‌ श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ॥ २२ ॥ तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दु:ख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ॥ २३ ॥ पतिप्राणा देवि ! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु भगवान्‌ शङ्कर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥ तब भगवान्‌ शङ्करने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही ॥ २६ ॥

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सोमवार, 11 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु को पार्वती जी का शाप

श्रीशुक उवाच - 
एवं शप्तश्चित्रकेतुः विमानाद् अवरुह्य सः । 
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥ १६ ॥

चित्रकेतुरुवाच - 
प्रतिगृह्णामि ते शापं आत्मनोऽञ्जलिनाम्बिके । 
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥
संसारचक्र एतस्मिन् जन्तुरज्ञानमोहितः । 
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्‌क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः । 
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥
गुणप्रवाह एतस्मिन्कः शापः को न्वनुग्रहः । 
कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥ २० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! जब पार्वतीजी ने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ १६ ॥
चित्रकेतुने कहा—माता पार्वतीजी ! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोडक़र आपका शाप स्वीकार करता हूँ। क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है ॥ १७ ॥ देवि ! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दु:ख भोगता रहता है ॥ १८ ॥ माताजी ! सुख और दु:खको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दु:खका कर्ता माना करते हैं ॥ १९ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दु:ख ॥ २० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीपार्वति उवाच - 

अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः । 
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥ ११ ॥
न वेद धर्मं किल पद्मयोनिः 
     न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । 
न वै कुमारः कपिलो मनुश्च 
     ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥ १२ ॥
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं 
     जगद्‍गुरुं मङ्‌गलमङ्‌गलं स्वयम् । 
यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् 
     प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥ १३ ॥
नायमर्हति वैकुण्ठ पादमूलोपसर्पणम् । 
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥ १४ ॥
अतः पापीयसीं योनिं आसुरीं याहि दुर्मते । 
यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५ ॥

पार्वतीजी बोलीं—अहो ! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या ? ॥ ११ ॥ जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते। तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाले भगवान्‌ शिव को इस कामसे नहीं रोकते ॥ १२ ॥ ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मङ्गलों को मङ्गल बनाने वाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्‌ का और उनके अनुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है ॥ १३ ॥ इसे अपने बड़प्पनका घमंड है। यह मूर्ख भगवान्‌ श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं ॥ १४ ॥ [चित्रकेतु को सम्बोधन कर] अत: दुर्मते ! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ। ऐसा होनेसे बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे ॥ १५ ॥

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रविवार, 10 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

चित्रकेतुरुवाच - 
एष लोकगुरुः साक्षात् धर्मं वक्ता शरीरिणाम् । 
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः । 
अङ्‌कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति । 
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच - 
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप । 
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् । 
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥

चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥ ६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥ ७ ॥ प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! भगवान्‌ शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान्‌ शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा— ॥ ९-१० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच 

यतश्चान्तर्हितोऽनन्तः तस्यै कृत्वा दिशे नमः । 
विद्याधरश्चित्रकेतुः चचार गगने चरः ॥ १ ॥
स लक्षं वर्षलक्षाणां अव्याहतबलेन्द्रियः । 
स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणैः ॥ २ ॥
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्‌कल्पसिद्धिषु । 
रेमे विद्याधरस्त्रीभिः गापयन् हरिमीश्वरम् ॥ ३ ॥
एकदा स विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता । 
गिरिशं ददृशे गच्छन् परीतं सिद्धचारणैः ॥ ४ ॥
आलिङ्‌ग्याङ्‌कीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि । 
उवाच देव्याः श्रृण्वन्त्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान्‌ सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ॥ १ ॥ महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों तक सब प्रकार के संकल्पों को पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वत की घाटियों में विहार करते रहे। उनके शरीर का बल और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के गुण और लीलाओं का गान करती रहतीं ॥ २-३ ॥ एक दिन चित्रकेतु भगवान्‌ के दिये हुए तेजोमय विमानपर सवार होकर कहीं जा रहे थे। इसी समय उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शङ्कर बड़े-बड़े मुनियोंकी सभामें सिद्ध-चारणोंके बीच बैठे हुए हैं और साथ ही भगवती पार्वतीको अपनी गोदमें बैठाकर एक हाथसे उन्हें आलिङ्गन किये हुए हैं, यह देखकर चित्रकेतु विमानपर चढ़े हुए ही उनके पास चले गये और भगवती पार्वतीको सुना-सुनाकर जोर से हँसने और कहने लगे ॥ ४-५ ॥

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शनिवार, 9 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् । 
आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ॥ ६१ ॥
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिः निर्मुक्तः स्वेन तेजसा । 
ज्ञानविज्ञानसन्तृप्तो मद्‍भक्तः पुरुषो भवेत् ॥ ६२ ॥
एतावानेव मनुजैः योगनैपुण्यबुद्धिभिः । 
स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥ ६३ ॥
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन् अप्रमत्तो वचो मम । 
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥ ६४ ॥

श्रीशुक उवाच - 

आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्‍गुरुः । 
पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ॥ ६५ ॥

जो मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्म के पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है—यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है ॥ ६१ ॥ यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए विषय-भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय ॥ ६२ ॥ जो लोग योगमार्गका तत्त्व समझनेमें निपुण हैं, उनको भलीभाँति समझ लेना चाहिये कि जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर ले ॥ ६३ ॥ राजन्! यदि तुम मेरे इस उपदेश को सावधान होकर श्रद्धाभाव से धारण करोगे तो ज्ञान एवं विज्ञान से सम्पन्न होकर शीघ्र ही सिद्ध हो जाओगे ॥६॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! जगद्गुरु विश्वात्मा भगवान्‌ श्रीहरि चित्रकेतुको इस प्रकार समझा-बुझाकर उनके सामने ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतोः परमात्मदर्शनं नाम षोडशोऽध्या‍यः ॥ १६ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा । 
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । 
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
यदेतद् विस्मृतं पुंसो मद्‍भावं भिन्नमात्मनः । 
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् । 
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचिन् शममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् । 
अभयं चाप्यनीहायां सङ्‌कल्पाद् विरमेत्कविः ॥ ५९ ॥
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः । 
ततोऽनिवृत्तिः अप्राप्तिः दुखस्य च सुखस्य च ॥ ६० ॥

(श्रीभगवान्‌ कहते हैं) सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायता से अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो ॥ ५५ ॥ पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओं का अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओं में अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है ॥ ५६ ॥ जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पडऩा पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है ॥ ५७ ॥ यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ५८ ॥ राजन् ! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है; और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दु:ख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ॥ ५९ ॥ जगत् के सभी स्त्रीपुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दु:खोंसे पिण्ड छूटे; परंतु उन कर्मोंसे न तो उनका दु:ख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ॥ ६० ॥ 

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शुक्रवार, 8 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

संस्तुतो भगवान् एवं अनन्तस्तमभाषत । 
विद्याधरपतिं प्रीतः चित्रकेतुं कुरूद्वह ॥ ४९ ॥

श्रीभगवान् उवाच - 

यन्नारदाङ्‌गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् । 
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । 
शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । 
उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
यथा सुषुप्तः पुरुषो विश्वं पश्यति चात्मनि । 
आत्मानमेकदेशस्थं मन्यते स्वप्न उत्थितः ॥ ५३ ॥
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । 
मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्‌की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान्‌ ने कहा—चित्रकेतो ! देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५० ॥ मैं ही समस्त प्राणियोंके रूपमें हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ और मैं ही पालनकर्ता भी हूँ। शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म दोनों ही मेरे सनातन रूप हैं ॥ ५१ ॥ आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं ॥ ५२ ॥ जैसे स्वप्न में सोया हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारके एक कोनेमें स्थित देखता है, परंतु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्वरकी ही माया हैं—यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये ॥ ५३-५४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

विदितमनन्त समस्तं 
     तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम् । 
विज्ञाप्यं परमगुरोः 
     कियदिव सवितुरिव खद्योतैः ॥ ४६ ॥
नमस्तुभ्यं भगवते 
     सकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय । 
दुरवसितात्मगतये 
     कुयोगिनां भिदा परमहंसाय ॥ ४७ ॥
यं वै श्वसन्तमनु विश्वसृजः श्वसन्ति 
     यं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति । 
भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्ध्नि
     तस्मै नमो भगवतेऽस्तु सहस्रमूर्ध्ने ॥ ४८ ॥ 

हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हैं। अतएव संसार में प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ ॥ ४६ ॥ भगवन् ! आपकी ही अध्यक्षतामें सारे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। कुयोगीजन भेददृष्टिके कारण आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाते। आपका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त शुद्ध है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४७ ॥ आपकी चेष्टा से शक्ति प्राप्त करके ही ब्रह्मा आदि लोकपालगण चेष्टा करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी दृष्टिसे जीवित होकर ही ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करनेमें समर्थ होती हैं। यह भूमण्डल आपके सिरपर सरसों के दाने के समान जान पड़ता है। मैं आप सहस्रशीर्षा भगवान्‌ को बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४८ ॥

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गुरुवार, 7 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

न हि भगवन्नघटितमिदं 
     त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः । 
यन्नाम सकृच्छ्रवणात् 
     पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
अथ भगवन् वयमधुना 
     त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः । 
सुरऋषिणा यदुदितं 
     तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥

भगवन् ! आपके दर्शनमात्र से ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्त: करण का सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है ॥ ४५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०८) नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा गोप्यः कामाद्भय...