गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर्यश्रियादिभिः । 
सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैः चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत् ॥ १२ ॥
न तस्य सम्पदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः । 
सार्वभौमस्य भूश्चेयं अभवन् प्रीतिहेतवः ॥ १३ ॥
तस्यैकदा तु भवनं अङ्‌गिरा भगवान् ऋषिः । 
लोकान् अनुचरन् एतान् उपागच्छद् यदृच्छया ॥ १४ ॥
तं पूजयित्वा विधिवत् प्रत्युत्थानार्हणादिभिः । 
कृतातिथ्यमुपासीदत् सुखासीनं समाहितः ॥ १५ ॥
महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ । 
प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत् ॥ १६ ॥

यों महाराज चित्रकेतु को किसी बात की कमी न थी। सुन्दरता, उदारता, युवावस्था, कुलीनता, विद्या, ऐश्वर्य और सम्पत्ति आदि सभी गुणोंसे वे सम्पन्न थे। फिर भी उनकी पत्नियाँ बाँझ थीं, इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता रहती थी ॥ १२ ॥ वे सारी पृथ्वीके एकछत्र सम्राट् थे, बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ थीं तथा सारी पृथ्वी उनके वशमें थी। सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं, परंतु वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर सकीं ॥ १३ ॥ एक दिन शाप और वरदान देने में समर्थ अङ्गिरा ऋषि स्वच्छन्दरूप से विभिन्न लोकों में विचरते हुए राजा चित्रकेतु के महल में पहुँच गये ॥ १४ ॥ राजा ने प्रत्युत्थान और अर्घ्य आदि से उनकी विधिपूर्वक पूजा की। आतिथ्य-सत्कार हो जानेके बाद जब अङ्गिरा ऋषि सुखपूर्वक आसन पर विराज गये, तब राजा चित्रकेतु भी शान्तभावसे उनके पास ही बैठ गये ॥ १५ ॥ महाराज ! महर्षि अङ्गिराने देखा कि यह राजा बहुत विनयी है और मेरे पास पृथ्वीपर बैठकर मेरी भक्ति कर रहा है। तब उन्होंने चित्रकेतुको सम्बोधित करके उसे आदर देते हुए यह बात कही ॥ १६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीसूत उवाच – 

परीक्षितोऽथ संप्रश्नं भगवान् बादरायणिः । 
निशम्य श्रद्दधानस्य प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच – 

श्रृणुषु अवहितो राजन् इतिहासं इमं यथा । 
श्रुतं द्वैपायनमुखात् नारदाद् देवलादपि ॥ ९ ॥
आसीद् राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप । 
चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङ्‌मही ॥ १० ॥
तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् । 
सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥ ११ ॥

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो ! भगवान्‌ शुकदेवजीने परम श्रद्धालु राजर्षि परीक्षित्‌का यह श्रेष्ठ प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन करते हुए यह बात कही ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! तुम सावधान होकर यह इतिहास सुनो। मैंने इसे अपने पिता व्यासजी, देवर्षि नारद और महर्षि देवलके मुँहसे भी विधिपूर्वक सुना है ॥ ९ ॥ प्राचीन कालकी बात है, शूरसेन देशमें चक्रवर्ती सम्राट् महाराज चित्रकेतु राज्य करते थे। उनके राज्यमें पृथ्वी स्वयं ही प्रजाकी इच्छाके अनुसार अन्न-रस दे दिया करती थी ॥ १० ॥ उनके एक करोड़ रानियाँ थीं और ये स्वयं सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ भी थे। परंतु उन्हें उनमेंसे किसीके भी गर्भसे कोई सन्तान न हुई ॥ ११ ॥ 

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बुधवार, 22 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीपरीक्षिदुवाच - 
रजस्तमःस्वभावस्य ब्रह्मन् वृत्रस्य पाप्मनः । 
नारायणे भगवति कथमासीद् दृढा मतिः ॥ १ ॥
देवानां शुद्धसत्त्वानांऋषीणां चामलात्मनाम् । 
भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते ॥ २ ॥
रजोभिः समसङ्‌ख्याताः पार्थिवैरिह जन्तवः । 
तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादयः ॥ ३ ॥
प्रायो मुमुक्षवस्तेषां केचनैव द्विजोत्तम । 
मुमुक्षूणां सहस्रेषु कश्चिन् मुच्येत सिध्यति ॥ ४ ॥
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । 
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥
वृत्रस्तु स कथं पापः सर्वलोकोपतापनः । 
इत्थं दृढमतिः कृष्ण आसीत् संग्राम उल्बणे ॥ ६ ॥
अत्र नः संशयो भूयान् श्रोतुं कौतूहलं प्रभो । 
यः पौरुषेण समरे सहस्राक्षमतोषयत् ॥ ७ ॥

राजा परीक्षित्‌ ने कहा—भगवन् ! वृत्रासुर का स्वभाव तो बड़ा रजोगुणी-तमोगुणी था। वह देवताओंको कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था। ऐसी स्थिति में भगवान्‌ नारायण के चरणों में उसकी सुदृढ़ भक्ति कैसे हुई ? ॥ १ ॥ हम देखते हैं कि प्राय: शुद्ध सत्त्वमय देवता और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्‌ की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वञ्चित ही रह जाते हैं। सचमुच भगवान्‌ की भक्ति बड़ी दुर्लभ है ॥ २ ॥ भगवन् ! इस जगत् के प्राणी पृथ्वी के धूलिकणों के समान ही असंख्य हैं। उनमेंसे कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं ॥ ३ ॥ ब्रह्मन् ! उनमें भी संसारसे मुक्ति चाहनेवाले तो विरले ही होते हैं और मोक्ष चाहनेवाले हजारोंमें मुक्ति या सिद्धि-लाभ तो कोई-सा ही कर पाता है ॥ ४ ॥ महामुने ! करोड़ों सिद्ध एवं मुक्त पुरुषोंमें भी वैसे शान्तचित्त महापुरुषका मिलना तो बहुत ही कठिन है, जो एकमात्र भगवान्‌के ही परायण हो ॥ ५ ॥ ऐसी अवस्थामें वह वृत्रासुर, जो सब लोगोंको सताता था और बड़ा पापी था, उस भयङ्कर युद्धके अवसरपर भगवान्‌ श्रीकृष्णमें अपनी वृत्तियोंको इस प्रकार दृढ़तासे लगा सका—इसका क्या कारण है ? ॥ ६ ॥ प्रभो ! इस विषयमें हमें बहुत अधिक सन्देह है और सुननेका बड़ा कौतूहल भी है। अहो, वृत्रासुरका बल-पौरुष कितना महान् था कि उसने रणभूमि में देवराज इन्द्र को भी सन्तुष्ट कर दिया ॥ ७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण

तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत ।
यथावद्दीक्षयां चक्रुः पुरुषाराधनेन ह ॥ १८ ॥
अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि ।
अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभिः ॥ १९ ॥
स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप ।
नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ॥ २० ॥
स वाजिमेधेन यथोदितेन 
वितायमानेन मरीचिमिश्रैः ।
इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण-
मिन्द्रो महानास विधूतपापः ॥ २१ ॥
इदं महाख्यानमशेषपाप्मनां 
प्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् ।
भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनं 
महेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः ॥ २२ ॥
पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधाः 
शृण्वन्त्यथो पर्वणि पर्वणीन्द्रियम् ।
धन्यं यशस्यं निखिलाघमोचनं 
रिपुञ्जयं स्वस्त्ययनं तथायुषम् ॥ २३ ॥

परीक्षित्‌ ! इन्द्र के स्वर्ग में आ जाने पर ब्रहमर्षियों ने वहाँ आकर भगवान्‌ की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया ॥ १८ ॥ जब वेदवादी ऋषियोंने उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया तथा देवराज इन्द्रने उस यज्ञके द्वारा सर्वदेवस्वरूप पुरुषोत्तम भगवान्‌की आराधना की, तब भगवान्‌की आराधनाके प्रभावसे वृत्रासुरके वधकी वह बहुत बड़ी पापराशि इस प्रकार भस्म हो गयी, जैसे सूर्योदयसे कुहरेका नाश हो जाता है ॥ १९-२० ॥ जब मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उनसे विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ कराया, तब उसके द्वारा सनातन पुरुष यज्ञपति भगवान्‌की आराधना करके इन्द्र सब पापोंसे छूट गये और पूर्ववत् फिर पूजनीय हो गये ॥ २१ ॥
परीक्षित्‌ ! इस श्रेष्ठ आख्यानमें इन्द्रकी विजय, उनकी पापोंसे मुक्ति और भगवान्‌के प्यारे भक्त वृत्रासुरका वर्णन हुआ है। इसमें तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले भगवान्‌ के अनुग्रह आदि गुणोंका सङ्कीर्तन है। यह सारे पापोंको धो बहाता है और भक्तिको बढ़ाता है ॥ २२ ॥ बुद्धिमान् पुरुषों को चाहिये कि वे इस इन्द्रसम्बन्धी आख्यान को सदा-सर्वदा पढ़ें और सुनें। विशेषत: पर्वों के अवसर पर तो अवश्य ही इसका सेवन करें । यह धन और यश को बढ़ाता है, सारे पापों से छुड़ाता है, शुत्रुपर विजय प्राप्त कराता है, तथा आयु और मङ्गल की अभिवृद्धि करता है ॥२३॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रविजयो नाम त्रयोदशोऽध्या‍यः ॥ १३ ॥ 

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मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण

नभो गतो दिशः सर्वाः सहस्राक्षो विशाम्पते ।
प्रागुदीचीं दिशं तूर्णं प्रविष्टो नृप मानसम् ॥ १४ ॥
स आवसत्पुष्करनालतन्तू-
नलब्धभोगो यदिहाग्निदूतः ।
वर्षाणि साहस्रमलक्षितोऽन्तः 
स ञ्चिन्तयन् ब्रह्मवधाद्विमोक्षम् ॥ १५ ॥
तावत्त्रिणाकं नहुषः शशास 
विद्यातपोयोगबलानुभावः ।
स सम्पदैश्वर्यमदान्धबुद्धि-
र्नीतस्तिरश्चां गतिमिन्द्रपत्न्या ॥ १६॥
ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूत 
ऋतम्भरध्याननिवारिताघः ।
पापस्तु दिग्देवतया हतौजा-
स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्न्या ॥ १७ ॥

राजन् ! देवराज इन्द्र उसके भयसे दिशाओं और आकाशमें भागते फिरे। अन्तमें कहीं भी शरण न मिलनेके कारण उन्होंने पूर्व और उत्तरके कोनेमें स्थित मानसरोवरमें शीघ्रतासे प्रवेश किया ॥ १४ ॥ देवराज इन्द्र मानसरोवरके कमलनालके तन्तुओंमें एक हजार वर्षोंतक छिपकर निवास करते रहे और सोचते रहे कि ब्रह्महत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा। इतने दिनोंतक उन्हें भोजनके लिये किसी प्रकारकी सामग्री न मिल सकी। क्योंकि वे अग्निदेवताके मुखसे भोजन करते हैं और अग्नि देवता जलके भीतर कमलतन्तुओंमें जा नहीं सकते थे ॥ १५ ॥ जबतक देवराज इन्द्र कमलतन्तुओंमें रहे, तबतक अपनी विद्या, तपस्या और योगबलके प्रभावसे राजा नहुष स्वर्गका शासन करते रहे। परंतु जब उन्होंने सम्पत्ति और ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर इन्द्रपत्नी शची के साथ अनाचार करना चाहा, तब शचीने उनसे ऋषियोंका अपराध करवाकर उन्हें शाप दिला दिया—जिससे वे साँप हो गये ॥ १६ ॥ तदनन्तर जब सत्य के परम पोषक भगवान्‌ का ध्यान करने से इन्द्रके पाप नष्टप्राय हो गये, तब ब्राह्मणोंके बुलवानेपर वे पुन: स्वर्गलोकमें गये। कमलवनविहारिणी विष्णुपत्नी लक्ष्मीजी इन्द्रकी रक्षा कर रही थीं और पूर्वोत्तर दिशा के अधिपति रुद्र ने पाप को पहले ही निस्तेज कर दिया था, जिससे वह इन्द्र पर आक्रमण नहीं कर सका ॥ १७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण

श्रीशुक उवाच
एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद्रिपुम् ।
ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥
तयेन्द्रः स्मासहत्तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।
ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥
तां ददर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम् ।
जरया वेपमानाङ्गीं यक्ष्मग्रस्तामसृक्पटाम् ॥ १२ ॥
विकीर्य पलितान् केशांस्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणीम् ।
मीनगन्ध्यसुगन्धेन कुर्वतीं मार्गदूषणम् ॥ १३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! इस प्रकार ब्राह्मणोंसे प्रेरणा प्राप्त करके देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था। अब उसके मारे जानेपर ब्रह्महत्या इन्द्रके पास आयी ॥ १० ॥ उसके कारण इन्द्रको बड़ा क्लेश, बड़ी जलन सहनी पड़ी। उन्हें एक क्षणके लिये भी चैन नहीं पड़ता था। सच है, जब किसी सङ्कोची सज्जनपर कलङ्क लग जाता है, तब उसके धैर्य आदि गुण भी उसे सुखी नहीं कर पाते ॥ ११ ॥ देवराज इन्द्रने देखा कि ब्रह्महत्या साक्षात् चाण्डालीके समान उनके पीछे-पीछे दौड़ी आ रही है। बुढ़ापेके कारण उसके सारे अङ्ग काँप रहे हैं और क्षयरोग उसे सता रहा है। उसके सारे वस्त्र खूनसे लथपथ हो रहे हैं ॥ १२ ॥ वह अपने सफेद-सफेद बालोंको बिखेरे ‘ठहर जा ! ठहर जा !!’ इस प्रकार चिल्लाती आ रही है। उसके श्वासके साथ मछलीकी-सी दुर्गन्ध आ रही है, जिसके कारण मार्ग भी दूषित होता जा रहा है ॥ १३ ॥ 

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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण

इन्द्र उवाच
स्त्रीभूद्रुमजलैरेनो विश्वरूपवधोद्भवम् ।
विभक्तमनुगृह्णद्भिर्वृत्रहत्यां क्व मार्ज्म्यहम् ॥ ५ ॥

श्रीशुक उवाच
ऋषयस्तदुपाकर्ण्य महेन्द्रमिदमब्रुवन् ।
याजयिष्याम भद्रं ते हयमेधेन मा स्म भैः ॥ ६ ॥
हयमेधेन पुरुषं परमात्मानमीश्वरम् ।
इष्ट्वा नारायणं देवं मोक्ष्यसेऽपि जगद्वधात् ॥ ७ ॥
ब्रह्महा पितृहा गोघ्नो मातृहाचार्यहाघवान् ।
श्वादः पुल्कसको वापि शुद्ध्येरन् यस्य कीर्तनात् ॥ ८ ॥
तमश्वमेधेन महामखेन श्रद्धान्वितोऽस्माभिरनुष्ठितेन ।
हत्वापि सब्रह्मचराचरं त्वं न लिप्यसे किं खलनिग्रहेण ॥ ९ ॥

देवराज इन्द्रने उन लोगोंसे कहा—देवताओ और ऋषियो ! मुझे विश्वरूपके वधसे जो ब्रह्महत्या लगी थी, उसे तो स्त्री, पृथ्वी, जल और वृक्षोंने कृपा करके बाँट लिया। अब यदि मैं वृत्रका वध करूँ तो उसकी हत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा ? ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—देवराज इन्द्रकी बात सुनकर ऋषियोंने उनसे कहा—‘देवराज ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम तनिक भी भय मत करो। क्योंकि हम अश्वमेध यज्ञ कराकर तुम्हें सारे पापोंसे मुक्त कर देंगे ॥ ६ ॥ अश्वमेध यज्ञके द्वारा सबके अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमात्मा नारायणदेव की आराधना करके तुम सम्पूर्ण जगत् का वध करने के पापसे भी मुक्त हो सकोगे; फिर वृत्रासुरके वधकी तो बात ही क्या है ॥ ७ ॥ देवराज ! भगवान्‌ के नाम-कीर्तनमात्रसे ही ब्राह्मण, पिता, गौ, माता, आचार्य आदिकी हत्या करनेवाले महापापी, कुत्तेका मांस खानेवाले चाण्डाल और कसाई भी शुद्ध हो जाते हैं ॥ ८ ॥ हमलोग ‘अश्वमेध’ नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उसके द्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान्‌की आराधना करके तुम ब्रह्मापर्यन्त समस्त चराचर जगत्की हत्याके भी पापसे लिप्त नहीं होगे। फिर इस दुष्टको दण्ड देनेके पापसे छूटनेकी तो बात ही क्या है ॥ ९ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण

श्रीशुक उवाच
वृत्रे हते त्रयो लोका विना शक्रेण भूरिद ।
सपाला ह्यभवन् सद्यो विज्वरा निर्वृतेन्द्रियाः ॥ १ ॥
देवर्षिपितृभूतानि दैत्या देवानुगाः स्वयम् ।
प्रतिजग्मुः स्वधिष्ण्यानि ब्रह्मेशेन्द्रादयस्ततः ॥ २ ॥

श्रीराजोवाच
इन्द्रस्यानिर्वृतेर्हेतुं श्रोतुमिच्छामि भो मुने ।
येनासन् सुखिनो देवा हरेर्दुःखं कुतोऽभवत् ॥ ३ ॥

श्रीशुक उवाच
वृत्रविक्रमसंविग्नाः सर्वे देवाः सहर्षिभिः ।
तद्वधायार्थयन्निन्द्रं नैच्छद्भीतो बृहद्वधात् ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—महादानी परीक्षित्‌ ! वृत्रासुरकी मृत्युसे इन्द्रके अतिरिक्त तीनों लोक और लोकपाल तत्क्षण परम प्रसन्न हो गये। उनका भय, उनकी चिन्ता जाती रही ॥ १ ॥ युद्ध समाप्त होनेपर देवता, ऋषि, पितर, भूत, दैत्य और देवताओंके अनुचर गन्धर्व आदि इन्द्रसे बिना पूछे ही अपने-अपने लोकको लौट गये। इसके पश्चात् ब्रह्मा, शङ्कर और इन्द्र आदि भी चले गये ॥२॥
राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! मैं देवराज इन्द्रकी अप्रसन्नताका कारण सुनना चाहता हूँ। जब वृत्रासुरके वधसे सभी देवता सुखी हुए, तब इन्द्रको दु:ख होनेका क्या कारण था ? ॥ ३ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! जब वृत्रासुरके पराक्रमसे सभी देवता और ऋषि-महर्षि अत्यन्त भयभीत हो गये, तब उन लोगोंने उसके वधके लिये इन्द्रसे प्रार्थना की; परन्तु वे ब्रह्महत्याके भयसे उसे मारना नहीं चाहते थे ॥ ४ ॥

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रविवार, 19 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

वृत्रासुरका वध

निगीर्णोऽप्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गतः । 
महापुरुषसन्नद्धो योगमायाबलेन च ॥ ३१ ॥
भित्त्वा वज्रेण तत्कुक्षिं निष्क्रम्य बलभिद् विभुः । 
उच्चकर्त शिरः शत्रोः गिरिश्रृङ्‌गमिवौजसा ॥ ३२ ॥
वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः 
     कृन्तन् समन्तात् परिवर्तमानः । 
न्यपातयत् तावदहर्गणेन 
     यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥
तदा च खे दुन्दुभयो विनेदुः 
     गन्धर्वसिद्धाः समहर्षिसङ्‌घाः । 
वार्त्रघ्नलिङ्‌गैस्तमभिष्टुवाना 
     मन्त्रैर्मुदा कुसुमैरभ्यवर्षन् ॥ ३४ ॥
वृत्रस्य देहान् निष्क्रान्तं आत्मज्योतिररिन्दम । 
पश्यतां सर्वदेवानां अलोकं समपद्यत ॥ ३५ ॥

बल दैत्य का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने महापुरुष-विद्या (नारायणकवच) से अपने को सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमाया का बल था ही। इसलिये वृत्रासुर के निगल लेने पर—उसके पेट में पहुँचकर भी वे मरे नहीं ॥३१॥ उन्होंने अपने वज्र से उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेट से निकलकर बड़े वेग से उसका पर्वत-शिखर के समान उँचा सिर काट डाला ॥३२॥ सूर्यादि ग्रहों की उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गति में जितना समय लगता है, उतने दिनों में अर्थात् एक वर्ष में वृत्रवध का योग उपस्थित होनेपर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्र ने उसकी गरदन को सब ओर से काटकर भूमिपर गिरा दिया ॥३३॥उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। महर्षियों के साथ गन्धर्व, सिद्ध आदि वृत्रघाती इन्द्र का पराक्रम सूचित करनेवाले मन्त्रों से उनकी स्तुति करके बड़े आनन्द के साथ उनपर पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ ३४ ॥ शत्रुदमन परीक्षित्‌ ! उस समय वृत्रासुर के शरीर से उसकी आत्मज्योति बाहर निकली और इन्द्र आदि सब लोगों के देखते-देखते सर्वलोकातीत भगवान्‌ के स्वरूप में लीन हो गयी ॥ ३५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे वृत्रोवधो नाम द्वादशोऽध्या‍यः ॥ १२ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुरका वध

कृत्वाधरां हनुं भूमौ दैत्यो दिव्युत्तरां हनुम् 
नभोगम्भीरवक्त्रेण लेलिहोल्बणजिह्वया ॥ २७ ॥ 
दंष्ट्राभिः कालकल्पाभिः ग्रसन्निव जगत्त्रयम् । 
अतिमात्रमहाकाय आक्षिपन् तरसा गिरीन् ॥ २८ ॥ 
गिरिराट् पादचारीव पद्‍भ्यां निर्जरयन् महीम् । 
जग्रास स समासाद्य वज्रिणं सहवाहनम् ॥ २९ ॥ 
वृत्रग्रस्तं तमालोक्य सप्रजापतयः सुराः । 
महाप्राणो महावीर्यो महासर्प एव द्विपम् । 
हा कष्टमिति निर्विण्णाः चुक्रुशुः समहर्षयः ॥ ३० ॥ 

अब पैरों से चलने-फिरनेवाले पर्वतराज के समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुर ने अपनी ठोड़ी को धरती से और ऊपर के होठ को स्वर्ग से लगाया तथा आकाश के समान गहरे मुँह, साँप के समान भयावनी जीभ एवं मृत्युके समान कराल दाढ़ों से मानो त्रिलोकी को निगलता, अपने पैरों की चोट से पृथ्वी को रौंदता और प्रबल वेग से पर्वतों को उलटता- पलटता वह इन्द्र के पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथी के सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथी को निगल जाय। प्रजापतियों और महर्षियों के साथ देवताओं ने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्र को निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुखी हो गये तथा ‘हाय-हाय ! बड़ा अनर्थ हो गया।’ यों कहकर विलाप करने लगे ॥ २७—३० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर...