शुक्रवार, 8 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

संस्तुतो भगवान् एवं अनन्तस्तमभाषत । 
विद्याधरपतिं प्रीतः चित्रकेतुं कुरूद्वह ॥ ४९ ॥

श्रीभगवान् उवाच - 

यन्नारदाङ्‌गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् । 
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । 
शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । 
उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
यथा सुषुप्तः पुरुषो विश्वं पश्यति चात्मनि । 
आत्मानमेकदेशस्थं मन्यते स्वप्न उत्थितः ॥ ५३ ॥
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । 
मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्‌की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान्‌ ने कहा—चित्रकेतो ! देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५० ॥ मैं ही समस्त प्राणियोंके रूपमें हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ और मैं ही पालनकर्ता भी हूँ। शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म दोनों ही मेरे सनातन रूप हैं ॥ ५१ ॥ आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं ॥ ५२ ॥ जैसे स्वप्न में सोया हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारके एक कोनेमें स्थित देखता है, परंतु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्वरकी ही माया हैं—यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये ॥ ५३-५४ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

विदितमनन्त समस्तं 
     तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम् । 
विज्ञाप्यं परमगुरोः 
     कियदिव सवितुरिव खद्योतैः ॥ ४६ ॥
नमस्तुभ्यं भगवते 
     सकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय । 
दुरवसितात्मगतये 
     कुयोगिनां भिदा परमहंसाय ॥ ४७ ॥
यं वै श्वसन्तमनु विश्वसृजः श्वसन्ति 
     यं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति । 
भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्ध्नि
     तस्मै नमो भगवतेऽस्तु सहस्रमूर्ध्ने ॥ ४८ ॥ 

हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हैं। अतएव संसार में प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ ॥ ४६ ॥ भगवन् ! आपकी ही अध्यक्षतामें सारे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। कुयोगीजन भेददृष्टिके कारण आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाते। आपका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त शुद्ध है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४७ ॥ आपकी चेष्टा से शक्ति प्राप्त करके ही ब्रह्मा आदि लोकपालगण चेष्टा करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी दृष्टिसे जीवित होकर ही ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करनेमें समर्थ होती हैं। यह भूमण्डल आपके सिरपर सरसों के दाने के समान जान पड़ता है। मैं आप सहस्रशीर्षा भगवान्‌ को बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४८ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 7 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

न हि भगवन्नघटितमिदं 
     त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः । 
यन्नाम सकृच्छ्रवणात् 
     पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
अथ भगवन् वयमधुना 
     त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः । 
सुरऋषिणा यदुदितं 
     तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥

भगवन् ! आपके दर्शनमात्र से ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्त: करण का सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है ॥ ४५ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

कः क्षेमो निजपरयोः 
     कियान्वार्थः स्वपरद्रुहा धर्मेण । 
स्वद्रोहात्तव कोपः 
     परसम्पीडया च तथाधर्मः ॥ ४२ ॥
न व्यभिचरति तवेक्षा 
     यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः । 
स्थिरचरसत्त्वकदम्बेष्व
     पृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः ॥ ४३ ॥

सकाम धर्म अपना और दूसरेका भी अहित करनेवाला है। उससे अपना या पराया—किसी का कोई भी प्रयोजन और हित सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत सकाम धर्मसे जब अनुष्ठान करनेवालेका चित्त दुखता है, तब आप रुष्ट होते हैं और जब दूसरेका चित्त दुखता है, तब वह धर्म नहीं रहता—अधर्म हो जाता है ॥ ४२ ॥ भगवन् ! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्म का निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं ॥ ४३ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 6 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

जितमजित तदा भवता 
     यदाह भागवतं धर्ममनवद्यम् । 
निष्किञ्चना ये मुनय 
     आत्मारामा यमुपासतेऽपवर्गाय ॥ ४० ॥
विषममतिर्न यत्र नृणां 
     त्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र । 
विषमधिया रचितो यः 
     स ह्यविशुद्धः क्षयिष्णुरधर्मबहुलः ॥ ४१ ॥

हे अजित ! जिस समय आपने विशुद्ध भागवतधर्म का उपदेश किया था, उसी समय आपने सब को जीत लिया । क्योंकि अपने पास कुछ भी संग्रह-परिग्रह न रखनेवाले, किसी भी वस्तु  में अहंता-ममता न करनेवाले आत्माराम सनकादि परमर्षि भी परम साम्य और मोक्ष प्राप्त करनेके लिये उसी भागवतधर्मका आश्रय लेते हैं ॥ ४० ॥ वह भागवतधर्म इतना शुद्ध है कि उसमें सकाम धर्मोंके समान मनुष्योंकी वह विषमबुद्धि नहीं होती कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह तू है और यह तेरा है।’ इसके विपरीत जिस धर्मके मूलमें ही विषमताका बीज बो दिया जाता है, वह तो अशुद्ध, नाशवान् और अधर्मबहुल होता है ॥ ४१ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

विषयतृषो नरपशवो 
     य उपासते विभूतीर्न परं त्वाम् । 
तेषामाशिष ईश तदनु 
     विनश्यन्ति यथा राजकुलम् ॥ ३८ ॥
कामधियस्त्वयि रचिता 
     न परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि । 
ज्ञानात्मन्यगुणमये 
     गुणगणतोऽस्य द्वन्द्वजालानि ॥ ३९ ॥

जो नरपशु केवल विषयभोग ही चाहते हैं, वे आपका भजन न करके आपके विभूतिस्वरूप इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। प्रभो ! जैसे राजकुलका नाश होनेके पश्चात् उसके अनुयायियोंकी जीविका भी जाती रहती है, वैसे ही क्षुद्र उपास्यदेवोंका नाश होनेपर उनके दिये हुए भोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ परमात्मन् ! आप ज्ञानस्वरूप और निर्गुण हैं। इसलिये आपके प्रति की हुई सकाम भावना भी अन्यान्य कर्मोंके समान जन्म-मृत्युरूप फल देनेवाली नहीं होती, जैसे भुने हुए बीजोंसे अङ्कुर नहीं उगते। क्योंकि जीवको जो सुख-दु:ख आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं वे सत्त्वादि गुणों से ही होते हैं, निर्गुणसे नहीं ॥ ३९ ॥ 

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मंगलवार, 5 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

परमाणुपरममहतोः 
     त्वमाद्यन्तान्तरवर्ती त्रयविधुरः । 
आदावन्तेऽपि च सत्त्वानां 
     यद्ध्रुवं तदेवान्तरालेऽपि ॥ ३६ ॥
क्षित्यादिभिरेष किलावृतः 
     सप्तभिर्दशगुणोत्तरैरण्डकोशः । 
यत्र पतत्यणुकल्पः 
     सहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्तः ॥ ३७ ॥

नन्हें-से-नन्हें परमाणु से लेकर बड़े- से-बड़े महत्तत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओं के आदि, अन्त और मध्यमें आप ही विराजमान हैं तथा स्वयं आप आदि, अन्त और मध्य से  रहित हैं । क्योंकि किसी भी पदार्थ के आदि और अन्तमें जो वस्तु रहती है, वही मध्य में भी रहती है ॥ ३६ ॥ यह ब्रह्माण्डकोष, जो पृथ्वी आदि एक-से-एक दसगुने सात आवरणों से घिरा हुआ है, अपने ही समान दूसरे करोड़ों ब्रह्माण्डों के सहित आप में एक परमाणुके समान घूमता रहता है और फिर भी उसे आपकी सीमा का पता नहीं है। इसलिये आप अनन्त हैं ॥ ३७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट,०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

चित्रकेतुरुवाच - 

अजित जितः सममतिभिः 
     साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता । 
विजितास्तेऽपि च भजतां 
     अकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुणः ॥ ३४ ॥
तव विभवः खलु भगवन् 
     जगदुदयस्थितिलयादीनि । 
विश्वसृजस्तेंऽशांशास्तत्र 
     मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥ ३५ ॥

चित्रकेतु ने कहा—अजित ! जितेन्द्रिय एवं समदर्शी साधुओं ने आपको जीत लिया है। आपने भी अपने सौन्दर्य, माधुर्य, कारुण्य आदि गुणोंसे उनको अपने वशमें कर लिया है। अहो, आप धन्य हैं ! क्योंकि जो निष्कामभाव से आपका भजन करते हैं, उन्हें आप करुणापरवश होकर अपने- आपको भी दे डालते हैं ॥ ३४ ॥ भगवन् ! जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आपके लीला- विलास हैं। विश्वनिर्माता ब्रह्मा आदि आपके अंशके भी अंश हैं। फिर भी वे पृथक्-पृथक् अपनेको जगत्कर्ता मानकर झूठमूठ एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं ॥ ३५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 4 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः 
     स्वस्थामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः । 
प्रवृद्धभक्त्या प्रणयाश्रुलोचनः 
     प्रहृष्टरोमानमदादिपुरुषम् ॥ ३१ ॥
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं 
     प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहुः । 
प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो 
     नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम् ॥ ३२ ॥
ततः समाधाय मनो मनीषया 
     बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ । 
नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं 
     जगद्‍गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम् ॥ ३३ ॥

भगवान्‌ शेष का दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतु के सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्त:करण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदय में भक्तिभाव की बाढ़ आ गयी। नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक आये। शरीर का एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थिति में आदिपुरुष भगवान्‌ शेषको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥ उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान्‌ शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्‌की कुछ भी स्तुति न कर सके ॥ ३२ ॥ थोड़ी देर बाद उन्हें बोलनेकी कुछ-कुछ शक्ति प्राप्त हुई। उन्होंने विवेकबुद्धि से मन को समाहित किया और सम्पूर्ण इन्द्रियों की बाह्यवृत्ति को रोका। फिर उन जगद्गुरु की, जिनके स्वरूप का पाञ्चरात्र आदि भक्तिशास्त्रों में वर्णन किया गया है, इस प्रकार स्तुति की ॥ ३३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारदः । 
ययावङ्‌गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो ॥ २६ ॥
चित्रकेतुस्तु विद्यां तां यथा नारदभाषिताम् । 
धारयामास सप्ताहं अब्भक्षः सुसमाहितः ॥ २७ ॥
ततः स सप्तरात्रान्ते विद्यया धार्यमाणया । 
विद्याधराधिपत्यं च लेभेऽप्रतिहतं नृप ॥ २८ ॥
ततः कतिपयाहोभिः विद्ययेद्धमनोगतिः । 
जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥
मृणालगौरं शितिवाससं स्फुरत् 
     किरीटकेयूरकटित्रकङ्‌कणम् । 
प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनं वृतं 
     ददर्श सिद्धेश्वरमण्डलैः प्रभुम् ॥ ३० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! देवर्षि नारद अपने शरणागत भक्त चित्रकेतुको इस विद्याका उपदेश करके महर्षि अङ्गिराके साथ ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २६ ॥ राजा चित्रकेतुने देवर्षि नारदके द्वारा उपदिष्ट विद्याका उनके आज्ञानुसार सात दिनतक केवल जल पीकर बड़ी एकाग्रताके साथ अनुष्ठान किया ॥ २७ ॥ तदनन्तर उस विद्याके अनुष्ठानसे सात रातके पश्चात् राजा चित्रकेतुको विद्याधरोंका अखण्ड आधिपत्य प्राप्त हुआ ॥ २८ ॥ इसके बाद कुछ ही दिनोंमें इस विद्याके प्रभावसे उनका मन और भी शुद्ध हो गया। अब वे देवाधिदेव भगवान्‌ शेषजीके चरणोंके समीप पहुँच गये ॥ २९ ॥ उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शेषजी सिद्धेश्वरोंके मण्डलमें विराजमान हैं। उनका शरीर कमलनालके समान गौरवर्ण है। उसपर नीले रंगका वस्त्र फहरा रहा है। सिरपर किरीट, बाँहोंमें बाजूबंद, कमरमें करधनी और कलाईमें कंगन आदि आभूषण चमक रहे हैं। नेत्र रतनारे हैं और मुखपर प्रसन्नता छा रही है ॥ ३० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६) चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन श्रीशु...