॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)
अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन
दितिरुवाच
वरदो यदि मे ब्रह्मन्पुत्रमिन्द्र हणं वृणे
अमृत्युं मृतपुत्राहं येन मे घातितौ सुतौ ||३७||
निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत
अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः ||३८||
अहो अर्थेन्द्रि यारामो योषिन्मय्येह मायया
गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम् ||३९||
कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः
धिङ्मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रि यः ||४०||
शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम्
हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ||४१||
न हि कश्चित्प्रियः स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम्
पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च ||४२
प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्न मृषा भवेत्
वधं नार्हति चेन्द्रो ऽपि तत्रेदमुपकल्पते ||४३||
इति सञ्चिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन
उवाच किञ्चित्कुपित आत्मानं च विगर्हयन् ||४४||
दितिने कहा—ब्रह्मन् ! इन्द्र ने विष्णु के हाथों मेरे दो पुत्र मरवाकर मुझे निपूती बना दिया है। इसलिये यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना चाहते हैं तो कृपा करके एक ऐसा अमर पुत्र दीजिये, जो इन्द्रको मार डाले ॥ ३७ ॥
परीक्षित् ! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय ! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्म का अवसर आ पहुँचा ॥ ३८ ॥ देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय ! हाय ! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा ॥ ३९ ॥ इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है ॥ ४० ॥ सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है। इनका मुँह तो ऐसा होता है जैसे शरद्ऋतुका खिला हुआ कमल। बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो। परंतु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो ॥ ४१ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ अपनी लालसाओंकी कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसीसे प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाईतकको मार डालती हैं या मरवा डालती हैं ॥ ४२ ॥ अब तो मैं कह चुका हूँ कि जो तुम माँगोगी, दूँगा। मेरी बात झूठी नहीं होनी चाहिये। परंतु इन्द्र भी वध करनेयोग्य नहीं है। अच्छा, अब इस विषयमें मैं यह युक्ति करता हूँ’ ॥ ४३ ॥ प्रिय परीक्षित् ! सर्वसमर्थ कश्यपजी ने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दिति से कहा ॥ ४४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --