शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

वैराग्य- संदीपनी (Post 05)


 

।।श्री हरि:।।

 

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

 

वैराग्य- संदीपनी (Post 05)

 

शान्ति-वर्णन

 

दोहा - रैनि को भूषन इंदु है, दिवस को भूषन भानु ।

दास को भूषन भक्ति है, भक्ति को भूषन ग्यानु ॥ ४३ ॥

ग्यान को भूषन ध्यान है, ध्यान को भूषन त्याग ।

त्याग को भूषन शांतिपद, तुलसी अमल अदाग ॥ ४४ ॥

 

रात्रिका भूषण (शोभा) चन्द्रमा है, दिनका भूषण सूर्य है, सेवक - (भक्त) का भूषण भक्ति है, भक्तिका भूषण ज्ञान है, ज्ञानका भूषण ध्यान है, ध्यानका भूषण त्याग है । तुलसीदासजी कहते हैं कि त्यागका भूषण शान्तिपद (भगवान्का शान्तिमय परमपद) है, जो (सर्वथा) निर्मल और निष्कलंक है ॥ ४३-४४॥

 

चौ०— अमल अदाग शांतिपद सारा ।

          सकल कलेस न करत प्रहारा ॥

          तुलसी उर धारै जो कोई |

          रहै अनंद सिंधु महँ सोई ॥

          बिबिध पाप संभव जो तापा ।

          मिटहिं दोष दुख दुसह कलापा ॥

          परम सांति सुख रहै समाई |

          तहँ उतपात न भेदै आई ॥

          तुलसी ऐसे सीतल संता ।

          सदा रहै एहि भाँति एकंता ॥

          कहा करै खल लोग भुजंगा ।

          कीन्ह्यौ गरल - सील जो अंगा ॥

 

यह निर्मल और निष्कलंक शान्तिपद ही सार (तत्त्व) है। (इसकी प्राप्ति होनेपर) कोई भी क्लेश प्रहार (आक्रमण) नहीं करते (अर्थात् इस स्थितिमें समस्त अविद्याजनित क्लेशोंका नाश हो जाता है) । तुलसीदासजी कहते हैं जो कोई इसे हृदयमें धारण कर लेता है, वह आनन्दसागरमें निमग्न रहता है। विविध पापोंसे उत्पन्न जो ताप (कष्ट) हैं तथा जो दोष एवं असह्य दुःखसमूह हैं, वे मिट जाते हैं और वह उस परमशान्तिरूप सुखमें समा जाता है कि जहाँ कोई भी उत्पात आकर प्रवेश नहीं कर सकता। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे शीतल ( शान्त) संत सदा इसी प्रकार एकान्तमें (केवल एक शान्तिपदरूप परमात्माके परमपदमें) ही निवास करते हैं। जिन्होंने अपने अंगोंको विषस्वभाव बना लिया है, ऐसे सर्परूप दुष्टलोग उन - (संतों) का क्या (बिगाड़) कर सकते हैं ॥ ४५–४७॥

 

दोहा - अति सीतल अतिही अमल, सकल कामना हीन ।

         तुलसी ताहि अतीत गनि, बृत्ति सांति लयलीन ॥ ४८ ॥

 

जो अत्यन्त शीतल, अत्यन्त ही निर्मल (पवित्र) तथा समस्त कामनाओंसे रहित होता है और जिसकी वृत्ति शान्तिमें लवलीन रहती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसीको अतीत (गुणातीत) समझना चाहिये ॥ ४८ ॥

 

चौ०— जो कोइ कोप भरे मुख बैना ।

          सन्मुख हतै गिरा - सर पैना ॥

          तुलसी तऊ लेस रिस नाहीं ।

          सो सीतल कहिए जग माहीं ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि कोई क्रोधमें भरकर मुखसे (कठोर वाणी) बोले और सामने ही वचनरूपी तीखे बाणोंकी वर्षा करे तो भी जिसको लेशमात्र भी रोष न हो उसीको जगत् में शीतल (संत) कहते हैं॥४९॥

 

दोहा - सात दीप नव खंड लौ, तीनि लोक जग माहिं ।

         तुलसी सांति समान सुख, अपर दूसरो नाहिं ॥ ५० ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि सातों द्वीप, नवों खण्ड (नहीं-नहीं) तीनों लोक और जगत् भर  में शान्ति के समान दूसरा कोई सुख नहीं है ॥५०॥

 

चौ०— जहाँ सांति सतगुरु की दई ।

          तहाँ क्रोध की जर जरि गई ॥

          सकल काम बासना बिलानी ।

          तुलसी बहै सांति सहिदानी ॥

          तुलसी सुखद सांति को सागर ।

          संतन गायो करन उजागर ॥

          तामें तन मन रहै समोई ।

          अहं अगिनि नहिं दाहैं कोई ॥

 

जहाँ सद्गुरु की दी हुई शान्ति प्राप्त हुई कि वहीं क्रोध की जड़ जल गयी और समस्त कामना और वासनाएँ बिला गयीं । तुलसीदासजी कहते हैं कि यही शान्तिकी पहचान है । तुलसीदास जी कहते हैं कि जिसे संतों ने सुखदायक, शान्ति का समुद्र और ( ज्ञानका) प्रकाश करने वाला बतलाया है, उसमें यदि कोई तन- मनसे समा जाय - लीन हो रहे तो उसे अहंकार की अग्नि किसी प्रकार नहीं जला सकती ।। ५१-५२ ॥

 

दोहा— अहंकार की अगिनि में, दहत सकल संसार ।

           तुलसी बाँचै संतजन, केवल सांति अधार ॥ ५३ ॥

 

अहंकार की अग्नि में समस्त संसार जल रहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि केवल संतजन ही शान्ति का आधार लेनेके कारण ( उससे) बचते हैं ॥ ५३॥

 

महा सांति जल परसि कै, सांत भए जन जोइ ।

अहं अगिनि ते नहिं दहैं, कोटि करै जो कोइ ॥ ५४॥

 

जो (संत) जन महान् शान्तिरूप जलको स्पर्श करके शान्त हो गये हैं, वे अहंकारकी अग्निसे नहीं जलते, चाहे कोई करोड़ों उपाय करे ॥ ५४ ॥

 

तेज होत तन तरनि को, अचरज मानत लोइ।

तुलसी जो पानी भया, बहुरि न पावक होइ ॥ ५५ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि (उस अहंकाररहित संत के) शरीर का तेज सूर्यका-सा हो जाता है, लोग (उसे देख-देखकर) आश्चर्य मानते हैं; परंतु (शान्ति के द्वारा ) जो जल (के समान शीतल) हो गया है, वह फिर अग्नि (के समान) नहीं हो सकता (उसमें अहंकारका उदय नहीं होता) ॥ ५५ ॥

 

जद्यपि सीतल सम सुखद, जगमें जीवन प्रान ।

तदपि सांति जल जनि गनौ, पावक तेज प्रमान ॥ ५६॥

 

यद्यपि वह शान्तिपद शीतल है, सम है तथा सुखदायक है और जगत्में (संतोंका) जीवन- प्राण है तथापि उसे (साधारण) जल ( के समान) मत समझो, (जलके समान शीतल होनेपर भी ) उसका तेज अग्निके समान है ॥५६॥

 

चौ० - जरै बरै अरु खीझि खिझावै ।

         राग द्वेष महँ जनम गँवावै ॥

         सपनेहुँ सांति नहीं उन देही ।

         तुलसी जहाँ-जहाँ ब्रत एही ॥

 

जो सदा (अहंकार तथा कामनाकी अग्निमें) जलते-बरते रहते हैं, स्वयं क्रोध करके दूसरों को क्रोधित करते हैं और राग-द्वेषमें ही अपना जन्म (जीवन) खो देते हैं— तुलसीदासजी कहते हैं कि जहाँ-जहाँ ऐसा व्रत है (अर्थात् जिन-जिनका ऐसा स्वभाव है) उनके शरीरमें (जीवनमें) स्वप्नमें भी शान्ति नहीं होती ॥ ५७ ॥

 

दोहा—सोइ पंडित सोइ पारखी, सोई संत सुजान।

         सोई सूर सचेत सो, सोई सुभट प्रमान ॥ ५८ ॥

         सोइ ग्यानी सोइ गुनी जन, सोई दाता ध्यानि ।

         तुलसी जाके चित भई, राग द्वेष की हानि ॥५९॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके चित्त से राग-द्वेष का नाश हो गया है, वही पण्डित है, वही (सत्-असत् का ) पारखी है; वही चतुर संत है, वही शूरवीर है, वही सावधान है; वही प्रामाणिक योद्धा है, वही ज्ञानी है, वही गुणवान् पुरुष है, वही दाता है और वही ध्यान- सम्पन्न है ॥ ५८-५९॥

 

चौ० - राग द्वेष की अगिनि बुझानी ।

         काम क्रोध बासना नसानी ॥

         तुलसी जबहि सांति गृह आई ।

         तब उरहीं उर फिरी दोहाई ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जब राग-द्वेषकी अग्नि बुझ गयी, काम, क्रोध और वासना का नाश हो गया और घरमें (अन्तःकरणमें) शान्ति आ गयी, तभी हृदयमें भीतर-ही-भीतर (तुरंत राम की) दोहाई फिर गयी । (फिर अन्तःकरणमें अज्ञान तथा तज्जनित काम-क्रोधादि का साम्राज्य नहीं रहा, वहाँ रामराज्य हो गया, सर्वतोभाव से भगवान् ही छा गये ।) ॥ ६० ॥

 

दोहा - फिरी दोहाई राम की, गे कामादिक भाजि ।

तुलसी ज्यों रबि कें उदय, तुरत जात तम लाजि ॥ ६१ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जब राम की दोहाई फिर गयी (हृदय में भगवान्‌ का प्रकाश तथा विस्तार हो गया), तब कामादि (दोष उसी क्षण वैसे ही) भाग गये, जैसे सूर्य के उदय होते ही उसी क्षण अन्धकार लजा (कर भाग) जाता है ॥ ६१ ॥

 

यह बिराग संदीपनी, सुजन सुचित सुनि लेहु ।

अनुचित बचन बिचारि के, जस सुधारि तस देहु ॥ ६२ ॥

 

सज्जनो ! इस वैराग्य-संदीपनी को सावधान एवं स्थिरचित्त से सुनो और विचारकर अनुचित वचनों को जहाँ जैसा उचित हो सुधार दो ॥ ६२॥

 

॥ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकृत 'वैराग्य-संदीपनी' समाप्त ॥

 

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित  श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

“वैराग्य संदीपनी ”  पुस्तक कोड 114 से



शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

वैराग्य- संदीपनी (Post 04)


 

।।श्री हरि:।।

 

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

 

वैराग्य- संदीपनी (Post 04)

 

संत- महिमा - वर्णन

 

सो०- को बरनै मुख एक, तुलसी महिमा संत की ।

        जिन्ह के बिमल बिबेक, सेस महेस न कहि सकत ॥ ३४ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि एक मुखसे संत की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है | जिनके मलरहित (मायारहित विशुद्ध) विवेक है,वे (सहस्रमुखवाले) शेषजी और (पंचमुख) महेश्वर (शिवजी) भी उसका कथन नहीं कर सकते ॥ ३४ ॥

 

दोहा - महि पत्री करि सिंधु मसि, तरु लेखनी बनाइ ।

         तुलसी गनपत सों तदपि, महिमा लिखी न जाइ ॥ ३५ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि (संतकी महिमा इतनी अपार है कि) पृथ्वीको कागज, समुद्रको दवात और कल्पवृक्ष को कलम बनाकर भी, गणेशजी से भी उसकी महिमा नहीं लिखी जा सकती ॥ ३५ ॥

 

धन्य धन्य माता पिता, धन्य पुत्र बर सोइ ।

तुलसी जो रामहि भजे, जैसेहुँ कैसेहुँ होइ ॥ ३६ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके माता-पिता धन्य-धन्य हैं और वही श्रेष्ठ पुत्र धन्य है, जो जैसे-कैसे भी भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करता है॥३६॥

 

तुलसी जाके बदन ते, धोखेहुँ निकसत राम ।

ताके पग की पगतरी, मेरे तन को चाम ॥ ३७॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके मुख से धोखे से भी 'राम' (नाम) निकल जाता है, उसके पग की जूती मेरे शरीरके चमड़े से बने ॥ ३७ ॥

 

तुलसी भगत सुपच भलौ, भजै रैन दिन राम ।

ऊँचो कुल केहि कामको, जहाँ न हरिको नाम ॥ ३८ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि भक्त चाण्डाल भी अच्छा है, जो रात-दिन भगवान् रामचन्द्रजी का भजन करता है; जहाँ श्रीहरि का नाम न हो, वह ऊँचा कुल किस काम का ॥३८॥

 

अति ऊँचे भूधरनि पर, भुजगन के अस्थान ।

तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान॥ ३९॥

 

तुलसीदास जी कहते हैं कि बहुत ऊँचे पहाड़ों पर (विषधर) सर्पों के रहने के स्थान होते हैं और बहुत नीची जगह में अत्यन्त सुखदायक ऊख, अन्न और जल होता है। (ऐसे ही भजनरहित ऊँचे कुल में अहंकार, मद, काम, क्रोधादि रहते हैं और भजनयुक्त नीच कुल में अति सुखदायिनी भक्ति, शान्ति, सुख आदि होते हैं; इससे वही श्रेष्ठ है) ॥ ३९॥

 

चौ०—  अति अनन्य जो हरि को दासा ।

           रटै नाम निसिदिन प्रति स्वासा ॥

           तुलसी तेहि समान नहिं कोई।

           हम नीकें देखा सब कोई ॥

 

जो श्रीहरिका अनन्य सेवक है और रात- दिन प्रत्येक श्वास में उनका नाम रटता है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके समान कोई नहीं है, मैंने सब को अच्छी तरह से देख लिया है ॥ ४० ॥

 

चौ० - जदपि साधु सबही बिधि हीना ।

         तद्यपि समता के न कुलीना ॥

         यह दिन रैन नाम उच्चरै।

         वह नित मान अगिनि महँ जरै ॥

 

साधु यदि सभी प्रकारसे हीन भी हो तो भी कुलीन - (ऊँचे कुलवाले) की उसके साथ समता नहीं हो सकती; क्योंकि यह (साधु) दिन- रात भगवान्‌ के नाम का उच्चारण करता है और वह (कुलीन) नित्य अभिमान की अग्नि में जला करता है ॥ ४१ ॥

 

दोहा - दास रता एक नाम सों, उभय लोक सुख त्यागि ।

         तुलसी न्यारो है रहै, दहै न दुख की आगि ॥ ४२ ॥

 

भगवान्‌ का सेवक दोनों (पृथ्वी और स्वर्ग) लोकोंका सुख त्यागकर एकमात्र भगवान्‌ के नाम में ही प्रेम करता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि वह संसार से अलग होकर (संसार की आसक्ति को छोड़कर) रहता है, इसलिये दुःखकी अग्निमें नहीं जलता ॥ ४२॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित  श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

“वैराग्य संदीपनी ”  पुस्तक कोड 114 से



गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

वैराग्य- संदीपनी (Post 03)


 

।।श्री हरि:।।

 

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

 

वैराग्य- संदीपनी (Post 03)

 

संत-स्वभाव - वर्णन

 

दोहा - सरल बरन भाषा सरल, सरल अर्थमय मानि ।

         तुलसी सरलै संतजन, ताहि परी पहिचानि ॥ ८ ॥

 

इसमें सरल अक्षर हैं, इसकी सरल भाषा है, इसे सरल अर्थसे भरी हुई मानना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं, जो सरल हृदयके संतजन हैं, उनको इसकी पहचान हो गयी है अर्थात् वे इस वैराग्य-संदीपनीको सरलतासे समझते हैं ॥ ८ ॥

 

चौ०—अति सीतल अति ही सुखदाई ।

          सम दम राम भजन अधिकाई ॥

          जड़ जीवन कौं करै सचेता ।

          जग महँ बिचरत है एहि हेता ॥

 

(संतजन) अत्यन्त शीतल (शान्त-स्वभाव) और अत्यन्त सुखदायक होते हैं। वे मनपर विजय पाये हुए और इन्द्रियोंको दमन करनेवाले तो हैं ही, श्रीराम - भजनकी उनमें विशेषता होती है। वे मूर्ख (संसारासक्त) जीवों को सचेत करते हैं— सावधान करके भगवान्‌ की ओर लगाते हैं और इसी हेतु से जगत् में विचरण करते हैं॥९॥

 

दोहा - तुलसी ऐसे कहुँ कहूँ, धन्य धरनि वह संत ।

         परकाजे परमारथी, प्रीति लिये निबहंत ॥ १० ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं- ऐसे संत कहीं-कहीं (विरले ही) होते हैं। वह पृथ्वी धन्य है जहाँ ऐसे संत हैं, जो पराये कार्यमें तथा परमार्थमें अर्थात् दूसरोंकी सेवामें और परमार्थ-साधनमें निमग्न रहते हैं तथा प्रीतिके साथ (अपने) इस व्रतका निर्वाह करते हैं ॥ १० ॥

                                                                   

की मुख पट दीन्हे रहैं, जथा अर्थ भाषंत ।

तुलसी या संसारमें, सो बिचारजुत संत ॥ ११ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जो या तो मुखपर पर्दा डाले रहता यानी मौन ही रहता है या केवल यथार्थ (सत्य) भाषण करता है, इस संसारमें वही विचारयुक्त (विवेकी) संत है ॥ ११॥

 

बोलै बचन बिचारि कै, लीन्हें संत सुभाव।

तुलसी दुख दुर्बचन के, पंथ देत नहिं पाँव ॥ १२॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि हैं कि वह संत (साधु) स्वभाव को धारण किये हुए विचारकर वचन बोलता है और दुःख तथा दुष्ट वचन के मार्गपर कभी पैर नहीं रखता अर्थात् वह न तो किसीका जी दुखाता है और न दुष्ट वचन बोलता है ॥ १२॥

 

सत्रु न काहू करि गनै, मित्र गनै नहिं काहि ।

तुलसी यह मत संतको, बोलै समता माहि ॥ १३॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि वह न तो किसीको शत्रु करके मानता है और न किसीको मित्र ही मानता है। संतका यही सिद्धान्त है कि वह समता में ही यानी सबको समान समझकर ही बोलता है ॥ १३॥

 

चौ० – अति अनन्यगति इंद्री जीता ।

          जाको हरि बिनु कतहुँ न चीता ॥

          मृग तृष्ना सम जग जिय जानी ।

          तुलसी ताहि संत पहिचानी ॥

 

जो सर्वथा अनन्यगति हो अर्थात् भगवान् के  सिवा अन्य किसीको भी इष्ट मानकर न भजता हो, इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये हुए हो, जिसका चित्त श्रीहरिको छोड़कर कहीं भी न लगता हो और जो जगत् को  अपने जी में मृगतृष्णाके * समान मिथ्या जानता हो, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसीको संत

समझो ॥ १४ ॥

………………………..

*सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे बालूमें जल प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः वहाँ जल नहीं होता और हरिण उसीको जल समझकर प्यास बुझानेके लिये दौड़ता है । उसीको 'मृगतृष्णा' कहते हैं ।

 

दोहा - एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास ।

रामरूप स्वाती जलद, चातक तुलसीदास ॥ १५ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एकमात्र (भगवान् का  ही) आश्रय है, एकमात्र (भगवान् का  ही जिसको) बल है, एकमात्र (उन्हींसे जिसको) आशा है और (उन्हींका) भरोसा है, (जिसके लिये) भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका रूप ही स्वाती नक्षत्रका मेघ है और (जो स्वयं ) चातक (की भाँति उन्हींकी ओर देख रहा है,)  वह संत है ॥ १५ ॥

 

सो जन जगत जहाज है, जाके राग न दोष ।

तुलसी तृष्णा त्यागि कै, गहै सील संतोष ॥ १६॥

 

तुलसीदासजी कहते कहते हैं कि जिसके राग-द्वेष नहीं है और जो तृष्णाको त्यागकर शील तथा संतोषको ग्रहण किये हुए है, वह संत पुरुष जगत् के  (लोगोंको भवसागरसे तारने के) लिये जहाज है ॥ १६॥

 

सील गहनि सब की सहनि, कहनि हीय मुख राम ।

तुलसी रहिए एहि रहनि, संत जनन को काम ॥ १७॥

 

शील (विनय तथा सुशीलता) - को पकड़े रहना, सबकी कठोर बातों और व्यवहारों को सहना; हृदयसे और मुखसे सदा राम- (के नाम तथा लीला - गुणोंको) कहते रहना — तुलसीदासजी कहते हैं कि इस रहनी से रहना ही संतजनोंका काम है ॥ १७॥

 

निज संगी निज सम करत, दुरजन मन दुख दून ।

मलयाचल है संतजन, तुलसी दोष बिहून ॥ १८ ॥  

 

वे अपने संगियों को (जो उनका सत्संग करते हैं, उनको) अपने ही समान बना लेते हैं; किंतु दुर्जनों के मनका दुःख दूना करते हैं (द्वेष की अग्नि से जलते हुए दुर्जनलोग संतों के साथ विशेष द्वेष करके अपने दुःखको बढ़ा लेते हैं) । (परंतु ) तुलसीदासजी कहते हैं कि संत तो (वस्तुतः सदा ) चन्दन के समान शीतल और दोषरहित ही हैं ॥ १८ ॥

 

कोमल बानी संत की, स्रवत अमृतमय आइ |

तुलसी ताहि कठोर मन, सुनत मैन होइ जाइ ॥ १९ ॥

 

संत की वाणी कोमल होती है, उससे अमृतमय (रस) झरा करता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि उसे सुनते ही कठोर मन भी (पिघलाये हुए) मोमके समान (कोमल) हो जाता है॥१९॥

 

अनुभव सुख उतपति करत, भय-भ्रम धेरै उठाइ ।

ऐसी बानी संत की, जो उर भेदै आइ ॥ २० ॥

 

संतकी वाणी ऐसी होती है कि जो अनुभव - सुख - (आत्मानुभूतिके आनन्द) को उत्पन्न करती है, भय और भ्रमको उठाकर अलग रख देती है और आकर हृदयको भेद डालती (हृदयकी अज्ञानग्रन्थिको तोड़ डालती) है॥२०॥

 

सीतल बानी संत की, ससिहू ते अनुमान ।

तुलसी कोटि तपन हरै, जो कोउ धारै कान ॥ २१ ॥

 

संत की शीतल वाणी चन्द्रमा से भी बढ़कर अनुमान की जाती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि जो कोई उसको कानों में धारण करता है, उसके करोड़ों तापों को हर लेती है॥२१॥

 

चौ० – पाप ताप सब सूल नसावै ।

         मोह अंध रबि बचन बहावै ॥

         तुलसी ऐसे सदगुन साधू ।

         बेद मध्य गुन बिदित अगाधू ॥

 

संतजन पाप, ताप और सब प्रकारके शूलोंको नष्ट कर देते हैं। उनके सूर्य-सदृश वचन मोहरूपी अन्धकारका नाश कर डालते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि साधु ऐसे सद्गुणी होते हैं। उनके अगाध गुण वेदोंमें विख्यात हैं ॥ २२॥

 

दोहा-  तन करि मन करि बचन करि, काहू दूखत नाहिं ।

         तुलसी ऐसे संतजन, रामरूप जग माहिं ॥ २३ ॥

 

जो शरीरसे, मनसे और वचनसे किसीपर दोषारोपण नहीं करते, तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत् में  ऐसे संतजन श्रीरामचन्द्रजीके रूप ही हैं॥२३॥

 

मुख दीखत पातक हरै, परसत कर्म बिलाहिं ।

बचन सुनत मन मोहगत, पूरुब भाग मिलाहिं ॥ २४ ॥

 

जिनका मुख दीखते ही पाप नष्ट हो जाते हैं, स्पर्श होते ही कर्म विलीन हो जाते हैं और वचन सुनते ही मनका मोह (अज्ञान) चला जाता है, ऐसे संत पूर्व (जन्मकृत कर्मोंके कारण) सद्भाग्य से ही मिलते हैं ॥ २४॥

 

अति कोमल अरु बिमल रुचि, मानस में मल नाहिं |

तुलसी रत मन होइ रहै, अपने साहिब माहिं ॥ २५॥

 

(संतजन) अत्यन्त कोमल और निर्मल रुचिवाले होते हैं। उनके मनमें पाप नहीं होता । तुलसीदासजी कहते हैं कि वे अपने स्वामीमें नित्य लगे हुए मनवाले होते हैं ॥ २५ ॥

 

जाके मन ते उठि गई, तिल-तिल तृष्ना चाहि ।

मनसा बाचा कर्मना, तुलसी बंदत ताहि ॥ २६॥

 

जिसके मनसे तृष्णा और चाह तिल-तिल उठ गयी है (जरा भी नहीं रही है), तुलसीदास मनसे, वचनसे और कर्मसे उसकी वन्दना करता है॥२६॥

 

कंचन काँचहि सम गनै, कामिनि काष्ठ पषान ।

तुलसी ऐसे संतजन, पृथ्वी ब्रह्म समान ॥२७॥

 

जो सोने और काँचको समान समझते हैं और स्त्रीको काठ-पत्थर-(के समान देखते हैं), तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे संतजन पृथ्वीमें (शुद्ध सच्चिदानन्द) ब्रह्म के समान हैं ॥ २७ ॥

 

चौ० –  कंचन को मृतिका करि मानत ।

           कामिनि काष्ठ सिला पहिचानत ॥

           तुलसी भूलि गयो रस एहा ।

           ते जन प्रगट राम की देहा ॥

 

जो सोने को मिट्टी के समान मानते हैं और स्त्री को काठ-पत्थर के रूप में देखते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि जो इस (विषय) रस को भूल गये हैं, वे (संत) जन श्रीरामचन्द्रजी के मूर्तिमान् शरीर ही हैं ॥ २८ ॥

 

दोहा – आकिंचन इंद्रीदमन, रमन राम इक तार ।

          तुलसी ऐसे संत जन, बिरले या संसार ॥ २९ ॥

 

जो अकिंचन हैं (जिनके पास ममता की कोई भी वस्तु नहीं है), जो इन्द्रियों का दमन किये हुए हैं और जो एकतार (निरन्तर ) राम में ही रमण करते हैं, तुलसीदास जी कहते हैं ऐसे संतजन इस संसारमें बिरले ही हैं ॥ २९॥

 

अहंबाद 'मैं' 'तैं' नहीं, दुष्ट संग नहिं कोइ ।

दुख ते दुख नहिं ऊपजै, सुख तैं सुख नहिं होइ ॥ ३० ॥

सम कंचन काँचै गिनत, सत्रु मित्र सम दोइ ।

तुलसी या संसारमें, कहत संत जन सोइ ॥ ३१ ॥

 

जिसमें न तो अहंकार है, न मैं-तू (या मेरा-तेरा) है, जिसके कोई भी दुष्ट संग नहीं है, जिसको दुःख-(दुःखजनक घटना) से दुःख नहीं होता तथा सुखसे हर्ष नहीं होता, जो सोने और काँच को समान समझता है, जिसको शत्रु-मित्र दोनों समान हैं— तुलसीदासजी कहते हैं कि इस संसार में उसी को संतजन कहते हैं॥ ३०-३१॥

 

बिरले बिरले पाइए, माया त्यागी संत ।

तुलसी कामी कुटिल कलि, केकी केक अनंत ॥ ३२ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग में मायाका त्याग कर देनेवाले संत कोई-कोई ही मिलते हैं, पर (ऊपरसे मीठा बोलनेवाले और मौका लगते ही साँपों को खा जानेवाले) मोर- मोरिनी- जैसे कामी - कुटिल लोगों का अन्त (पार) नहीं है॥३२॥

 

मैं तैं मेट्यो मोह तम, उग्यो आतमा भानु ।

संत राज सो जानिये, तुलसी या सहिदानु ॥ ३३ ॥

 

जिसके आत्मारूपी सूर्य का उदय हो गया और मैं - तू - रूप अज्ञानान्धकार का नाश हो गया, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसको संतराज (संतशिरोमणि) जानना चाहिये; क्योंकि यही उसकी पहचान है ॥ ३३ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित  श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

“वैराग्य संदीपनी ”  पुस्तक कोड 114 से



वैराग्य- संदीपनी (Post 05)

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