॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१२)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः
यदासीत्तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ||४८||
स वै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः
मेने खिलमिवात्मानमुद्यतः स्वर्गकर्मणि ||४९||
अथ मेऽभिहितो देवस्तपोऽतप्यत दारुणम्
नव विश्वसृजो युष्मान्येनादावसृजद्विभुः ||५०||
एषा पञ्चजनस्याङ्ग दुहिता वै प्रजापतेः
असिक्नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम् ||५१||
मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः
मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ||५२||
त्वत्तोऽधस्तात्प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया
मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम् ||५३||
श्रीशुक उवाच
इत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान्विश्वभावनः
स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरिः ||५४||
(श्रीभगवान् जह रहे हैं) प्रिय दक्ष ! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ ४८ ॥ जब मैंने उनमें शक्ति और चेतनाका सञ्चार किया तब देवशिरोमणि ब्रह्मा सृष्टि करनेके लिये उद्यत हुए। परंतु उन्होंने अपनेको सृष्टिकार्यमें असमर्थ-सा पाया ॥ ४९ ॥ उस समय मैंने उन्हें आज्ञा दी कि तप करो। तब उन्होंने घोर तपस्या की और उस तपस्याके प्रभावसे पहले-पहल तुम नौ प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥ प्रिय दक्ष ! देखो, यह पञ्चजन प्रजापतिकी कन्या असिक्री है। इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ५१ ॥ अब तुम गृहस्थोचित स्त्रीसहवासरूप धर्मको स्वीकार करो। यह असिक्री भी उसी धर्मको स्वीकार करेगी। तब तुम इसके द्वारा बहुत-सी प्रजा उत्पन्न कर सकोगे ॥ ५२ ॥ प्रजापते ! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परंतु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी माया से स्त्री-पुरुष के संयोग से ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवा में तत्पर रहेगी ॥ ५३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—विश्वके जीवनदाता भगवान् श्रीहरि यह कहकर दक्ष के सामने ही इस प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे स्वप्न में देखी हुई वस्तु स्वप्न टूटते ही लुप्त हो जाती है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः
शेष आगामी पोस्ट में --