रविवार, 7 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

श्रीनारद उवाच
हिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम्
आत्मानमप्रतिद्वन्द्वमेकराजं व्यधित्सत ||१||
स तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमदारुणम्
ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः ||२||
जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभिः
तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवाः स्थानानि भेजिरे ||३||
तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः
तिर्यगूर्ध्वमधो लोकान्प्रातपद्विष्वगीरितः ||४||
चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तः सद्वीपाद्रि श्चचाल भूः
निपेतुः सग्रहास्तारा जज्वलुश्च दिशो दश ||५||

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर ! अब हिरण्यकशिपु ने यह विचार किया कि ‘मैं अजेय, अजर, अमर और संसार का एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ा तक न हो सके’ ॥ १ ॥ इसके लिये वह मन्दराचल की एक घाटी में जाकर अत्यन्त दारुण तपस्या करने लगा। वहाँ हाथ ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखता हुआ वह पैरके अँगूठेके बल पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २ ॥ उसकी जटाएँ ऐसी चमक रही थीं, जैसे प्रलयकालके सूर्यकी किरणें। जब वह इस प्रकार तपस्यामें संलग्र हो गया, तब देवतालोग अपने-अपने स्थानों और पदों पर पुन: प्रतिष्ठित हो गये ॥ ३ ॥ बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद उसकी तपस्या की आग धूएँ के साथ सिर से निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल के लोकों को जलाने लगी ॥ ४ ॥ उसकी लपट से नदी और समुद्र खौलने लगे। द्वीप और पर्वतों के सहित पृथ्वी डगमगाने लगी। ग्रह और तारे टूट- टूटकर गिरने लगे तथा दसों दिशाओं में मानो आग लग गयी ॥ ५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच

बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।
ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥ ५८॥
यम एतदुपाख्याय तत्रैवान्तरधीयत ।
ज्ञातयो हि सुयज्ञस्य चक्रुर्यत्साम्परायिकम् ॥ ५९॥
अतः शोचत मा यूयं परं चात्मानमेव वा ।
क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः पारक्य एव वा ।
स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम् ॥ ६०॥

श्रीनारद उवाच

इति दैत्यपतेर्वाक्यं दितिराकर्ण्य सस्नुषा ।
पुत्रशोकं क्षणात्त्यक्त्वा तत्त्वे चित्तमधारयत् ॥ ६१॥

हिरण्यकशिपुने कहा—उस छोटे से बालक  (यमराज) की ऐसी ज्ञानपूर्ण बातें सुनकर सब-के-सब दंग रह गये। उशीनर-नरेश के भाई-बन्धु और स्त्रियों ने यह बात समझ ली कि समस्त संसार और इसके सुख-दु:ख अनित्य एवं मिथ्या हैं ॥ ५८ ॥ यमराज यह उपाख्यान सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये। भाई बन्धुओं ने भी सुयज्ञ की अन्त्येष्टि-क्रिया की ॥ ५९ ॥ इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरे के लिये शोक मत करो। इस संसार में कौन अपना है और कौन अपने से भिन्न ? क्या अपना है और क्या पराया ? प्राणियों को अज्ञान के कारण ही यह अपने-पराये का दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धि का और कोई कारण नहीं है ॥ ६० ॥
नारदजी ने कहा—युधिष्ठिर ! अपनी पुत्रवधू के साथ दिति ने हिरण्यकशिपु की यह बात सुनकर उसी क्षण पुत्रशोक का त्याग कर दिया और अपना चित्त परमतत्त्वस्वरूप परमात्मा में लगा दिया ॥ ६१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः

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शनिवार, 6 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

लुब्धको विपिने कश्चित्पक्षिणां निर्मितोऽन्तकः ।
वितत्य जालं विदधे तत्र तत्र प्रलोभयन् ॥ ५०॥
कुलिङ्गमिथुनं तत्र विचरत्समदृश्यत ।
तयोः कुलिङ्गी सहसा लुब्धकेन प्रलोभिता ॥ ५१॥
आसज्जत सिचस्तन्त्र्यां महिष्यः कालयन्त्रिता ।
कुलिङ्गस्तां तथापन्नां निरीक्ष्य भृशदुःखितः ।
स्नेहादकल्पः कृपणः कृपणां पर्यदेवयत् ॥ ५२॥
अहो अकरुणो देवः स्त्रियाकरुणया विभुः ।
कृपणं मामनुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति ॥ ५३॥
कामं नयतु मां देवः किमर्धेनात्मनो हि मे ।
दीनेन जीवता दुःखमनेन विधुरायुषा ॥ ५४॥
कथं त्वजातपक्षांस्तान्मातृहीनान् बिभर्म्यहम् ।
मन्दभाग्याः प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजाः ॥ ५५॥
एवं कुलिङ्गं विलपन्तमारा-
त्प्रियावियोगातुरमश्रुकण्ठम् ।
स एव तं शाकुनिकः शरेण 
विव्याध कालप्रहितो विलीनः ॥ ५६॥
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः ।
नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि ॥ ५७॥

किसी जंगल में एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाता ने मानो उसे पक्षियों के कालरूप में ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिडिय़ों को फँसा लेता ॥ ५० ॥ एक दिन उसने कुलिङ्ग पक्षी के एक जोड़े को चारा चुगते देखा। उनमें से उस बहेलिये ने मादा पक्षी को तो शीघ्र ही फँसा लिया ॥ ५१ ॥ कालवश वह जाल के फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षी को अपनी मादाकी विपत्ति को देखकर बड़ा दु:ख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा ॥ ५२ ॥ उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परंतु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागे के लिये शोक करती हुई बड़ी दीनता से छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या ॥ ५३ ॥ उसकी मौज हो तो मुझे ले जाय। इसके बिना मैं अपना यह अधूरा विधुर जीवन, जो दीनता और दु:खसे भरा हुआ है, लेकर क्या करूँगा ॥ ५४ ॥ अभी मेरे अभागे बच्चों के पर भी नहीं जमे हैं। स्त्री के मर जानेपर उन मातृहीन बच्चोंको मैं कैसे पालूँगा ? ओह ! घोंसले में वे अपनी माँ की बाट देख रहे होंगे’ ॥ ५५ ॥ इस तरह वह पक्षी बहुत-सा विलाप करने लगा। अपनी सहचरी के वियोग से वह आतुर हो रहा था। आँसुओं के मारे उसका गला रुँध गया था। तबतक काल की प्रेरणा से पास ही छिपे हुए उसी बहेलिये ने ऐसा बाण मारा कि वह भी वहीं पर लोट गया ॥ ५६ ॥ मूर्ख रानियो ! तुम्हारी भी यही दशा होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो ! यदि तुमलोग सौ बरस तक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी ॥ ५७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।
यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८॥
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्विदः ।
नान्यथा शक्यते कर्तुं स्वभावः शोचतामिति ॥ ४९॥

प्रकृति के गुणों और उनसे बनी हुई वस्तुओं को सत्य समझना अथवा कहना झूठमूठ का दुराग्रह है। मनोरथ के समय की कल्पित और स्वप्न के समय की दीख पडऩेवाली वस्तुओं के समान इन्द्रियों के द्वारा जो कुछ ग्रहण किया जाता है, सब मिथ्या है ॥ ४८ ॥ इसलिये शरीर और आत्मा का तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीर के लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्मा के लिये ही। परंतु ज्ञान की दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ॥ ४९ ॥

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शुक्रवार, 5 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५॥
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।
भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६॥
यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत्कर्मनिबन्धनम् ।
ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७॥

(तुम्हारी यह मान्यता कि ‘प्राण ही बोलने या सुननेवाला था, सो निकल गया’ मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि सुषुप्ति के समय प्राण तो रहता है, पर न वह बोलता है न सुनता है।) शरीर में सब इन्द्रियों की चेष्टा का हेतुभूत जो महाप्राण है, वह प्रधान होनेपर भी बोलने या सुननेवाला नहीं है; क्योंकि वह जड है। देह और इन्द्रियों के द्वारा सब पदार्थों का द्रष्टा जो आत्मा है, वह शरीर और प्राण दोनों से पृथक् है ॥ ४५ ॥ यद्यपि वह परिच्छिन्न नहीं है, व्यापक है—फिर भी पञ्चभूत, इन्द्रिय और मनसे युक्त नीचे-ऊँचे (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरों को ग्रहण करता और अपने विवेकबल से मुक्त भी हो जाता है। वास्तव में वह इन सबसे अलग है ॥ ४६ ॥ जबतक वह पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, बुद्धि और मन—इन सत्रह तत्त्वोंसे  बने हुए लिङ्गशरीर से युक्त रहता है, तभीतक कर्मों से बँधा रहता है और इस बन्धन के कारण ही माया से होनेवाले मोह और क्लेश बराबर उसके पीछे पड़े रहते हैं ॥ ४७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं 
गृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने 
गृहेऽभिगुप्तोऽस्य हतो न जीवति ॥ ४०॥
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-
र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।
न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-
स्तस्या गुणैरन्यतमो हि बध्यते ॥ ४१॥
इदं शरीरं पुरुषस्य मोहजं 
यथा पृथग्भौतिकमीयते गृहम् ।
यथौदकैः पार्थिवतैजसैर्जनः 
कालेन जातो विकृतो विनश्यति ॥ ४२॥
यथानलो दारुषु भिन्न ईयते 
यथानिलो देहगतः पृथक्स्थितः ।
यथा नभः सर्वगतं न सज्जते 
तथा पुमान् सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३॥
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
यः श्रोता योऽनुवक्तेह स न दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४॥

भाग्य अनुकूल हो तो रास्ते में गिरी हुई वस्तु भी ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती है। परन्तु भाग्य के प्रतिकूल होनेपर घर के भीतर तिजोरी में रखी हुई वस्तु भी खो जाती है। जीव बिना किसी सहारे के दैव की दयादृष्टि से जंगल में भी बहुत दिनों तक जीवित रहता है, परंतु दैव के विपरीत होनेपर घर में सुरक्षित रहनेपर भी मर जाता है ॥ ४० ॥
रानियो ! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मों की कर्मवासना के अनुसार समयपर होती है और उसी के अनुसार उनका जन्म भी होता है। परंतु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है ॥ ४१ ॥ जैसे मनुष्य अपने मकानको अपनेसे अलग और मिट्टीका समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टीका है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है। जैसे बुलबुले आदि पानीके विकार, घड़े आदि मिट्टीके विकार और गहने आदि स्वर्णके विकार समयपर बनते हैं, रूपान्तरित होते हैं तथा नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही इन्हीं तीनोंके विकारसे बना हुआ यह शरीर भी समयपर बन-बिगड़ जाता है ॥ ४२ ॥ जैसे काठमें रहनेवाली व्यापक अग्नि स्पष्ट ही उससे अलग है, जैसे देह में रहनेपर भी वायु का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश सब जगह एक-सा रहनेपर भी किसी के दोष-गुण से लिप्त नहीं होता—वैसे ही समस्त देहेन्द्रियों में रहनेवाला और उनका आश्रय आत्मा भी उनसे अलग और  निर्लिप्त है ॥ ४३ ॥
मूर्खो ! जिसके लिये तुम सब शोक कर रहे हो, वह सुयज्ञ नामका शरीर तो तुम्हारे सामने पड़ा है। तुमलोग इसीको देखते थे। इसमें जो सुननेवाला और बोलनेवाला था, वह तो कभी किसीको नहीं दिखायी पड़ता था। फिर आज भी नहीं दिखायी दे रहा है, तो शोक क्यों ? ॥ ४४ ॥ 

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गुरुवार, 4 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

एवं विलपतीनां वै परिगृह्य मृतं पतिम् ।
अनिच्छतीनां निर्हारमर्कोऽस्तं सन्न्यवर्तत ॥ ३५॥
तत्र ह प्रेतबन्धूनामाश्रुत्य परिदेवितम् ।
आह तान् बालको भूत्वा यमः स्वयमुपागतः ॥ ३६॥

श्री यम उवाच
अहो अमीषां वयसाधिकानां  
विपश्यतां लोकविधिं विमोहः ।
यत्रागतस्तत्र गतं मनुष्यं 
स्वयं सधर्मा अपि शोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७॥
अहो वयं धन्यतमा यदत्र 
त्यक्ताः पितृभ्यां न विचिन्तयामः ।
अभक्ष्यमाणा अबला वृकादिभिः 
स रक्षिता रक्षति यो हि गर्भे ॥ ३८॥
य इच्छयेशः सृजतीदमव्ययो 
य एव रक्षत्यवलुम्पते च यः ।
तस्याबलाः क्रीडनमाहुरीशितु-
श्चराचरं निग्रहसङ्ग्रहे प्रभुः ॥ ३९॥

वे (उशीनर नरेश की रानियां) अपने पति की लाश पकडक़र इसी प्रकार विलाप करती रहीं। उस मुर्दे को वहाँ से दाहके लिये जाने देने की उनकी इच्छा नहीं होती थी। इतने में ही सूर्यास्त हो गया ॥ ३५ ॥ उस समय उशीनरराजा के सम्बन्धियों ने जो विलाप किया था, उसे सुनकर वहाँ स्वयं यमराज बालक के वेष में आये और उन्होंने उन लोगोंसे कहा— ॥ ३६ ॥
यमराज बोले—बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये लोग तो मुझसे सयाने हैं। बराबर लोगों का मरना- जीना देखते हैं, फिर भी इतने मूढ़ हो रहे हैं। अरे ! यह मनुष्य जहाँ से आया था, वहीं चला गया। इन लोगों को भी एक-न-एक दिन वहीं जाना है। फिर झूठमूठ ये लोग इतना शोक क्यों करते हैं ? ॥ ३७ ॥ हम तो तुमसे लाखगुने अच्छे हैं, परम धन्य हैं; क्योंकि हमारे माँ-बाप ने हमें छोड़ दिया है। हमारे शरीरमें पर्याप्त बल भी नहीं है, फिर भी हमें कोई चिन्ता नहीं है। भेडिय़े आदि हिंसक जन्तु हमारा बाल भी बाँका नहीं कर पाते। जिसने गर्भ में रक्षा की थी, वही इस जीवन में भी हमारी रक्षा करता रहता है ॥ ३८ ॥ देवियो ! जो अविनाशी ईश्वर अपनी मौज से इस जगत् को बनाता है, रखता है और बिगाड़ देता है—उस प्रभु का यह एक खिलौनामात्र है। वह इस चराचर जगत् को  दण्ड या पुरस्कार देनेमें समर्थ है ॥ ३९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।
अविवेकश्च चिन्ता च विवेकास्मृतिरेव च ॥ २६॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यमस्य प्रेतबन्धूनां संवादं तं निबोधत ॥ २७॥
उशीनरेष्वभूद्राजा सुयज्ञ इति विश्रुतः ।
सपत्नैर्निहतो युद्धे ज्ञातयस्तमुपासत ॥ २८॥
विशीर्णरत्नकवचं विभ्रष्टाभरणस्रजम् ।
शरनिर्भिन्नहृदयं शयानमसृगाविलम् ॥ २९॥
प्रकीर्णकेशं ध्वस्ताक्षं रभसा दष्टदच्छदम् ।
रजःकुण्ठमुखाम्भोजं छिन्नायुधभुजं मृधे ॥ ३०॥
उशीनरेन्द्रं विधिना तथा कृतं 
पतिं महिष्यः प्रसमीक्ष्य दुःखिताः ।
हताः स्म नाथेति करैरुरो भृशं 
घ्नन्त्यो मुहुस्तत्पदयोरुपापतन् ॥ ३१॥
रुदत्य उच्चैर्दयिताङ्घ्रिपङ्कजं 
सिञ्चन्त्य अस्रैः कुचकुङ्कुमारुणैः ।
विस्रस्तकेशाभरणाः शुचं नृणां 
सृजन्त्य आक्रन्दनया विलेपिरे ॥ ३२॥
अहो विधात्राकरुणेन नः प्रभो 
भवान् प्रणीतो दृगगोचरां दशाम् ।
उशीनराणामसि वृत्तिदः पुरा 
कृतोऽधुना येन शुचां विवर्धनः ॥ ३३॥
त्वया कृतज्ञेन वयं महीपते 
कथं विना स्याम सुहृत्तमेन ते ।
तत्रानुयानं तव वीर पादयोः 
शुश्रूषतीनां दिश यत्र यास्यसि ॥ ३४॥

जन्म, मृत्यु, अनेकों प्रकारके शोक, अविवेक, चिन्ता और विवेककी विस्मृति—सबका कारण यह अज्ञान ही है ॥ २६ ॥ इस विषय में महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास मरे हुए मनुष्य के सम्बन्धियों के साथ यमराजकी बातचीत है। तुमलोग ध्यानसे उसे सुनो ॥ २७ ॥
उशीनर देश में एक बड़ा यशस्वी राजा था। उसका नाम था सुयज्ञ। लड़ाईमें शत्रुओं ने उसे मार डाला। उस समय उसके भाई-बन्धु उसे घेरकर बैठ गये ॥ २८ ॥ उसका जड़ाऊ कवच छिन्नभिन्न हो गया था। गहने और मालाएँ तहस-नहस हो गयीं थीं। बाणों की मार से कलेजा फट गया था। शरीर खूनसे लथपथ था। बाल बिखर गये थे। आँखें धँस गयी थीं। क्रोध के मारे दाँतों से उसके होठ दबे हुए थे। कमल के समान मुख धूल से ढक गया था। युद्धमें उसके शस्त्र और बाँहें कट गयी थीं ॥ २९-३० ॥ रानियों को दैववश अपने पतिदेव उशीनर नरेश की यह दशा देखकर बड़ा दु:ख हुआ । वे ‘हा नाथ ! हम अभागिनें तो बेमौत मारी गयीं।’ यों कहकर बार-बार जोरसे छाती पीटती हुई अपने स्वामी के चरणों के पास गिर पड़ीं ॥ ३१ ॥ वे जोर-जोर से इतना रोने लगीं कि उनके कुच-कुङ्कुम से मिलकर बहते हुए लाल-लाल आँसुओं ने प्रियतम के पादपद्म पखार दिये। उनके केश और गहने इधर-उधर बिखर गये। वे करुण-क्रन्दन के साथ विलाप कर रही थीं, जिसे सुनकर मनुष्यों के हृदय में शोक का संचार हो जाता था ॥ ३२ ॥ ‘हाय ! विधाता बड़ा क्रूर है। स्वामिन् ! उसी ने आज आपको हमारी आँखोंसे ओझल कर दिया। पहले तो आप समस्त देशवासियों के जीवनदाता थे। आज उसीने आपको ऐसा बना दिया कि आप हमारा शोक बढ़ा रहे हैं ॥ ३३ ॥ पतिदेव आप हमसे बड़ा प्रेम करते थे, हमारी थोड़ी-सी सेवा को भी बड़ी करके मानते थे। हाय ! अब आपके बिना हम कैसे रह सकेंगी। हम आपके चरणों की चेरी हैं। वीरवर ! आप जहाँ जा रहे हैं, वहीं चलने की हमें भी आज्ञा दीजिये’ ॥ ३४ ॥ 

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मंगलवार, 2 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

नित्य आत्माव्ययः शुद्धः सर्वगः सर्ववित्परः ।
धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२॥
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते चलतीव भूः ॥ २३॥
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।
याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४॥
एष आत्मविपर्यासो ह्यलिङ्गे लिङ्गभावना ।
एष प्रियाप्रियैर्योगो वियोगः कर्मसंसृतिः ॥ २५॥

वास्तव में आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, सर्वगत, सर्वज्ञ और देह-इन्द्रिय आदि से पृथक् है। वह अपनी अविद्या से ही देह आदि की सृष्टि करके भोगों के साधन सूक्ष्मशरीर को स्वीकार करता है ॥ २२ ॥ जैसे हिलते हुए पानी के साथ उस में प्रतिबिम्बित होनेवाले वृक्ष भी हिलते-से जान पड़ते हैं और घुमायी जाती हुई आँख के साथ सारी पृथ्वी ही घूमती-सी दिखायी देती है, कल्याणी ! वैसे ही विषयों के कारण मन भटकने लगता है और वास्तव में निर्विकार होनेपर भी उसीके समान आत्मा भी भटकता हुआ-सा जान पड़ता है। उसका स्थूल और सूक्ष्मशरीरों से कोई भी सम्बन्ध नहीं है, फिर भी वह सम्बन्धी-सा जान पड़ता है ॥ २३-२४ ॥ सब प्रकार से शरीररहित आत्मा को शरीर समझ लेना—यही तो अज्ञान है। इसी से प्रिय अथवा अप्रिय वस्तुओं का मिलना और बिछुडऩा होता है । इसी से कर्मों के साथ सम्बन्ध हो जाने के कारण संसार में भटकना पड़ता है ॥२५॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

हिरण्यकशिपुर्भ्रातुः सम्परेतस्य दुःखितः ।
कृत्वा कटोदकादीनि भ्रातृपुत्रानसान्त्वयत् ॥ १७॥
शकुनिं शम्बरं धृष्टिं भूतसन्तापनं वृकम् ।
कालनाभं महानाभं हरिश्मश्रुमथोत्कचम् ॥ १८॥
तन्मातरं रुषाभानुं दितिं च जननीं गिरा ।
श्लक्ष्णया देशकालज्ञ इदमाह जनेश्वर ॥ १९॥

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच
अम्बाम्ब हे वधूः पुत्रा वीरं मार्हथ शोचितुम् ।
रिपोरभिमुखे श्लाघ्यः शूराणां वध ईप्सितः ॥ २०॥
भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुव्रते ।
दैवेनैकत्र नीतानामुन्नीतानां स्वकर्मभिः ॥ २१॥

युधिष्ठिर ! भाई की मृत्यु से हिरण्यकशिपु को बड़ा दु:ख हुआ था। जब उसने उसकी अन्त्येष्टि क्रियासे छुट्टी पा ली, तब शकुनि, शम्बर, धृष्ट, भूतसन्तापन, वृक, कालनाभ, महानाभ, हरिश्मश्रु और उत्कच अपने इन भतीजों को सान्त्वना दी ॥ १७-१८ ॥ उनकी माता रुषाभानु को और अपनी माता दिति को देश-काल के अनुसार मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा ॥ १९ ॥
हिरण्यकशिपु ने कहा—मेरी प्यारी माँ, बहू और पुत्रो ! तुम्हें वीर हिरण्याक्ष के लिये किसी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिये। वीर पुरुष तो ऐसा चाहते ही हैं कि लड़ाई के मैदान में अपने शत्रु के सामने उसके दाँत खट्टे करके प्राण त्याग करें; वीरों के लिये ऐसी ही मृत्यु श्लाघनीय होती है ॥ २० ॥ देवि ! जैसे प्याऊ पर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परंतु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मों के फेर से दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं ॥ २१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

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