॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)
अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन
एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि मनोज्ञया
बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ||२९||
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापतिः
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हृता ||३०||
एवं शुश्रूषितस्तात भगवान्कश्यपः स्त्रिया
प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ||३१||
कश्यपजी महाराज बड़े विद्वान् और विचारवान् होनेपर भी चतुर दिति की सेवासे मोहित हो गये और उन्होंने विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि ‘मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।’ स्त्रियोंके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ २९ ॥ सृष्टि के प्रभात में ब्रह्माजी ने देखा कि सभी जीव असङ्ग हो रहे हैं, तब उन्होंने अपने आधे शरीर से स्त्रियोंकी रचना की। और स्त्रियों ने पुरुषों की मति अपनी ओर आकर्षित कर ली ॥ ३० ॥ हाँ, तो भैया ! मैं कह रहा था कि दिति ने भगवान् कश्यपकी बड़ी सेवा की। इससे वे उसपर बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने दितिका अभिनन्दन करते हुए उससे मुसकराकर कहा ॥ ३१ ॥
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