शुक्रवार, 13 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत्
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१५||
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम्
मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१६||
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणः
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१७||
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम्
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१८

यह बुद्धि ही कुलटा स्त्री के समान है। इसके सङ्गसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी ? ॥ १५ ॥ माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ॥ १६ ॥ ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर हैं। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत् का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ॥ १७ ॥ भगवान्‌का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडक़ो अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंस का आश्रय छोडक़र उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है ? ॥ १८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप 

श्रीशुक उवाच 
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया
 वाचः कूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ||१०|| 
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् 
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||११|| 
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान्स्वाश्रयः परः 
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१२|| 
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्गं गतो यथा 
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१३|| 
नानारूपात्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता 
तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१४|| 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे— ॥ १० ॥ ‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिङ्गशरीर ही, जिसे साधारणत: जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है? ॥ ११ ॥ सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियों से भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परंतु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान्‌ हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्‌के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ॥ १२ ॥ जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तज्र्योति:स्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ॥ १३ ॥ यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है। इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना— विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिको अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है ? ॥ १४ ॥

 शेष आगामी पोस्ट में --
 गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 12 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ 

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
 
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः 
धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ||४|| 
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः 
प्रजाविवृद्धये यत्तान्देवर्षिस्तान्ददर्श ह ||५|| 
उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः 
अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ||६||
 तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम् 
बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ||७|| 
नदीमुभयतो वाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् 
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ||८||
 कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः 
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ||९|| 

नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्त:करण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—‘अरे हर्यश्वो ! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुम लोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ॥ ४—६ ॥ देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्याभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?’ ॥ ७—९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में -- 
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

श्रीशुक उवाच

तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभुः ||१||
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप
पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ||२||
तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः
सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ||३||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के शक्तिसञ्चारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पञ्चजनकी पुत्री असिक्री से हर्यश्व नाम के दस हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥ राजन् ! दक्षके ये सभी पुत्र एक आचरण और एक स्वभावके थे। जब उनके पिता दक्षने उन्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी, तब वे तपस्या करनेके विचारसे पश्चिम दिशाकी ओर गये ॥ २ ॥ पश्चिम दिशामें सिन्धुनदी और समुद्रके सङ्गम पर नारायण-सर नाम का एक महान् तीर्थ है। बड़े-बड़े मुनि और सिद्ध पुरुष वहाँ निवास करते हैं ॥ ३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 11 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१२)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः
यदासीत्तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ||४८||
स वै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः
मेने खिलमिवात्मानमुद्यतः स्वर्गकर्मणि ||४९||
अथ मेऽभिहितो देवस्तपोऽतप्यत दारुणम्
नव विश्वसृजो युष्मान्येनादावसृजद्विभुः ||५०||
एषा पञ्चजनस्याङ्ग दुहिता वै प्रजापतेः
असिक्नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम् ||५१||
मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः
मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ||५२||
त्वत्तोऽधस्तात्प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया
मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम् ||५३||

श्रीशुक उवाच

इत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान्विश्वभावनः
स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरिः ||५४||

(श्रीभगवान्‌ जह रहे हैं) प्रिय दक्ष ! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ ४८ ॥ जब मैंने उनमें शक्ति और चेतनाका सञ्चार किया तब देवशिरोमणि ब्रह्मा सृष्टि करनेके लिये उद्यत हुए। परंतु उन्होंने अपनेको सृष्टिकार्यमें असमर्थ-सा पाया ॥ ४९ ॥ उस समय मैंने उन्हें आज्ञा दी कि तप करो। तब उन्होंने घोर तपस्या की और उस तपस्याके प्रभावसे पहले-पहल तुम नौ प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥ प्रिय दक्ष ! देखो, यह पञ्चजन प्रजापतिकी कन्या असिक्री है। इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ५१ ॥ अब तुम गृहस्थोचित स्त्रीसहवासरूप धर्मको स्वीकार करो। यह असिक्री भी उसी धर्मको स्वीकार करेगी। तब तुम इसके द्वारा बहुत-सी प्रजा उत्पन्न कर सकोगे ॥ ५२ ॥ प्रजापते ! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परंतु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी माया से स्त्री-पुरुष के संयोग से ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवा में तत्पर रहेगी ॥ ५३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—विश्वके जीवनदाता भगवान्‌ श्रीहरि यह कहकर दक्ष के सामने ही इस प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे स्वप्न में देखी हुई वस्तु स्वप्न टूटते ही लुप्त हो जाती है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट११)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

श्रीभगवानुवाच

प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान्
यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः ||४३||
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः
ममैष कामो भूतानां यद्भूयासुर्विभूतयः ||४४||
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः
विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ||४५||
तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाकृतिः
अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः ||४६||
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत्किञ्चान्तरं बहिः
संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ||४७||

श्रीभगवान्‌ ने कहा—परम भाग्यवान् दक्ष ! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी, क्योंकि मुझपर श्रद्धा करनेसे तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति परम प्रेमभावका उदय हो गया है ॥ ४३ ॥ प्रजापते ! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत् के  समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों ॥ ४४ ॥ ब्रह्मा, शङ्कर, तुम्हारे जैसे प्रजापति, स्वायम्भुव आदि मनु तथा इन्द्रादि देवेश्वर—ये सब मेरी विभूतियाँ हैं और सभी प्राणियोंकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मन् ! तपस्या मेरा हृदय है, विद्या शरीर है, कर्म आकृति है, यज्ञ अङ्ग हैं, धर्म मन है और देवता प्राण हैं ॥ ४६ ॥ जब यह सृष्टि नहीं थी, तब केवल मैं ही था और वह भी निष्क्रियरूपमें। बाहर- भीतर कहीं भी और कुछ न था। न तो कोई द्रष्टा था और न दृश्य। मैं केवल ज्ञानस्वरूप और अव्यक्त था। ऐसा समझ लो, मानो सब ओर सुषुप्ति-ही-सुषुप्ति छा रही हो ॥ ४७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 9 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रत्त्रिभुवनेश्वरः
वृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः ||३९||
स्तूयमानोऽनुगायद्भिः सिद्धगन्धर्वचारणैः
रूपं तन्महदाश्चर्यं विचक्ष्यागतसाध्वसः ||४०||
ननाम दण्डवद्भूमौ प्रहृष्टात्मा प्रजापतिः
न किञ्चनोदीरयितुमशकत्तीव्रया मुदा
आपूरितमनोद्वारैर्ह्रदिन्य इव निर्झरैः ||४१||
तं तथावनतं भक्तं प्रजाकामं प्रजापतिम्
चित्तज्ञः सर्वभूतानामिदमाह जनार्दनः ||४२||

त्रिभुवनपति भगवान्‌ ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था। नारद, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्‌के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये ॥ ३९-४० ॥ प्रजापति दक्ष ने आनन्द से भरकर भगवान्‌ के चरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्द के उद्रेक से उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके ॥ ४१ ॥ परीक्षित्‌ ! प्रजापति दक्ष अत्यन्त नम्रता से झुककर भगवान्‌ के सामने खड़े हो गये। भगवान्‌ सब के हृदय की बात जानते ही हैं, उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी भक्ति और प्रजावृद्धिकी कामना देखकर उनसे यों कहा ॥ ४२ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

श्रीशुक उवाच

इति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्नघमर्षणे
प्रादुरासीत्कुरुश्रेष्ठ भगवान्भक्तवत्सलः ||३५||
कृतपादः सुपर्णांसे प्रलम्बाष्टमहाभुजः
चक्रशङ्खासिचर्मेषु धनुःपाशगदाधरः ||३६||
पीतवासा घनश्यामः प्रसन्नवदनेक्षणः
वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः ||३७||
महाकिरीटकटकः स्फुरन्मकरकुण्डलः
काञ्च्यङ्गुलीयवलय नूपुराङ्गदभूषितः ||३८||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विन्ध्याचल के अघमर्षण तीर्थ में जब प्रजापति दक्ष ने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान्‌ उनके सामने प्रकट हुए ॥ ३५ ॥ उस समय भगवान्‌ गरुडक़े कंधों पर चरण रखे हुए थे। विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट आठ भुजाएँ थीं; उनमें चक्र, शङ्ख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और गदा धारण किये हुए थे ॥ ३६ ॥ वर्षाकालीन मेघ  के समान श्यामल शरीर पर पीताम्बर फहरा रहा था। मुखमण्डल प्रफुल्लित था। नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी। घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी। वक्ष:स्थलपर सुनहरी रेखा—श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी ॥ ३७ ॥ बहुमूल्य किरीट, कंगन, मकराकृति कुण्डल, करधनी, अँगूठी, कड़े, नूपुर और बाजूबंद अपने-अपने स्थानपर सुशोभित थे ॥ ३८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 8 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-
मनामरूपो भगवाननन्तः
नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-
र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदतु ||३३||
यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां 
यथाशयं देहगतो विभाति
यथानिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं 
स ईश्वरो मे कुरुतां मनोरथम् ||३४||

प्रभो ! आप अनन्त हैं। आपका न तो कोई प्राकृत नाम है और न कोई प्राकृत रूप; फिर भी जो आपके चरणकमलोंका भजन करते हैं, उनपर अनुग्रह करनेके लिये आप अनेक रूपोंमें प्रकट होकर अनेकों लीलाएँ करते हैं तथा उन-उन रूपों एवं लीलाओं के अनुसार अनेकों नाम धारण कर लेते हैं। परमात्मन् ! आप मुझपर कृपा-प्रसाद कीजिये ॥ ३३ ॥ लोगोंकी उपासनाएँ प्राय: साधारण कोटिकी होती हैं। अत: आप सबके हृदयमें रहकर उनकी भावनाके अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओंके रूपमें प्रतीत होते रहते हैं—ठीक वैसे ही जैसे हवा गन्धका आश्रय लेकर सुगन्धित प्रतीत होती है; परन्तु वास्तवमें सुगन्धित नहीं होती। ऐसे सबकी भावनाओंका अनुसरण करनेवाले प्रभु मेरी अभिलाषा पूर्ण करें ॥ ३४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

यस्मिन्यतो येन च यस्य यस्मै 
यद्यो यथा कुरुते कार्यते च
परावरेषां परमं प्राक्प्रसिद्धं 
तद्ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ||३०||
यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै 
विवादसंवादभुवो भवन्ति
कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं 
तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने ||३१||
अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-
रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मणोः
अवेक्षितं किञ्चन योगसाङ्ख्ययोः 
समं परं ह्यनुकूलं बृहत्तत् ||३२||

भगवन् ! आप में ही यह सारा जगत् स्थित है; आपसे ही निकला है और आपने—और किसी के सहारे नहीं— अपने-आप से ही इसका निर्माण किया है। यह आपका ही है और आपके लिये ही है। इसके रूपमें बननेवाले भी आप हैं और बनानेवाले भी आप ही हैं। बनने-बनानेकी विधि भी आप ही हैं। आप ही सबसे काम लेनेवाले भी हैं। जब कार्य और कारणका भेद नहीं था, तब भी आप स्वयंसिद्ध स्वरूपसे स्थित थे। इसीसे आप सबके कारण भी हैं। सच्ची बात तो यह है कि आप जीव-जगत् के भेद और स्वगतभेद से सर्वथा रहित एक, अद्वितीय हैं। आप स्वयं ब्रह्म हैं। आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३० ॥ प्रभो ! आपकी ही शक्तियाँ वादी-प्रतिवादियोंके विवाद और संवाद (ऐकमत्य) का विषय होती हैं और उन्हें बार-बार मोहमें डाल दिया करती हैं। आप अनन्त अप्राकृत कल्याण-गुणगणोंसे युक्त एवं स्वयं अनन्त हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३१ ॥ भगवन् ! उपासकलोग कहते हैं कि हमारे प्रभु हस्त-पादादि से युक्त साकार-विग्रह हैं और सांख्यवादी कहते हैं कि भगवान्‌ हस्त-पादादि विग्रहसे रहित—निराकार हैं। यद्यपि इस प्रकार वे एक ही वस्तुके दो परस्परविरोधी धर्मोंका वर्णन करते हैं, परंतु फिर भी उसमें विरोध नहीं है। क्योंकि दोनों एक ही परम वस्तुमें स्थित हैं। बिना आधारके हाथ-पैर आदिका होना सम्भव नहीं और निषेधकी भी कोई-न-कोई अवधि होनी ही चाहिये। आप वही आधार और निषेधकी अवधि हैं। इसलिये आप साकार, निराकार दोनोंसे ही अविरुद्ध सम परब्रह्म हैं ॥ ३२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा ना...