सोमवार, 2 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

यम और यमदूतोंका संवाद

एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां
सङ्कीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम्
विक्रुश्य पुत्रमघवान्यदजामिलोऽपि
नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम् ||२४||
प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं
देव्या विमोहितमतिर्बत माययालम्
त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां
वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः ||२५||
एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते
सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्
ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां
स्यात्पातकं तदपि हन्त्युरुगायवादः ||२६||
ते देवसिद्धपरिगीतपवित्रगाथा
ये साधवः समदृशो भगवत्प्रपन्नाः
तान्नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान्
नैषां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे ||२७||

(यमराज कह रहे हैं) भगवान्‌के गुण, लीला और नामोंका भलीभाँति कीर्तन मनुष्योंके पापोंका सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिलने मरनेके समय चञ्चल चित्तसे अपने पुत्रका नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया। इस नामाभासमात्रसे ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्तिकी प्राप्ति भी हो गयी ॥ २४ ॥ बड़े-बड़े विद्वानोंकी बुद्धि कभी भगवान्‌ की माया से मोहित हो जाती है। वे कर्मोंके मीठे-मीठे फलोंका वर्णन करनेवाली अर्थवादरूपिणी वेदवाणीमें ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञष्ठञ्ज६/३९ (३३६-३३७) यागादि बड़े-बड़े कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नाम की महिमा को नहीं जानते। यह कितने खेद की बात है ॥ २५ ॥ प्रिय दूतो ! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान्‌ अनन्तमें ही सम्पूर्ण अन्त:करणसे अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं। वे मेरे दण्डके पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, परन्तु यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान्‌का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है ॥ २६ ॥ जो समदर्शी साधु भगवान्‌ को ही अपना साध्य और साधन दोनों समझकर उनपर निर्भर हैं, बड़े-बड़े देवता और सिद्ध उनके पवित्र चरित्रोंका प्रेमसे गान करते रहते हैं। मेरे दूतो ! भगवान्‌की गदा उनकी सदा रक्षा करती रहती है। उनके पास तुमलोग कभी भूलकर भी मत फटकना। उन्हें दण्ड देने की सामर्थ्य न हम में है और न साक्षात् काल में ही ॥ २७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

यम और यमदूतोंका संवाद

धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं 
न वै विदुरृषयो नापि देवाः
न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः 
कुतो नु विद्याधरचारणादयः ||१९||
स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः
प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ||२०||
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ||२१||
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां धर्मः परः स्मृतः
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ||२२||
नामोच्चारणमाहात्म्यं हरेः पश्यत पुत्रकाः
अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ||२३||

(यमराज कह रहे हैं) स्वयं भगवान्‌ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं ॥ १९ ॥ भगवान्‌के द्वारा निर्मित भागवतधर्म परम शुद्ध और अत्यन्त गोपनीय है। उसे जानना बहुत ही कठिन है। जो उसे जान लेता है, वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। दूतो ! भागवतधर्मका रहस्य हम बारह व्यक्ति ही जानते हैं—ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान्‌ शङ्कर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्मपितामह, बलि, शुकदेवजी और मैं (धर्मराज) ॥ २०-२१ ॥ इस जगत्में जीवोंके लिये बस, यही सबसे बड़ा कर्तव्य—परम धर्म—है कि वे नाम-कीर्तन आदि उपायोंसे भगवान्‌के चरणोंमें भक्तिभाव प्राप्त कर लें ॥ २२ ॥ प्रिय दूतो ! भगवान्‌के नामोच्चारणकी महिमा तो देखो, अजामिल-जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करने- मात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया ॥ २३ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 1 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

यम और यमदूतोंका संवाद

अहं महेन्द्रो निर्ऋतिः प्रचेताः 
सोमोऽग्निरीशः पवनो विरिञ्चिः
आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या 
मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः ||१४||
अन्ये च ये विश्वसृजोऽमरेशा 
भृग्वादयोऽस्पृष्टरजस्तमस्काः
यस्येहितं न विदुः स्पृष्टमायाः 
सत्त्वप्रधाना अपि किं ततोऽन्ये ||१५||
यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा 
हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते
आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां 
चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम् ||१६||
तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितुः 
परस्य मायाधिपतेर्महात्मनः
प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-
श्चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावाः ||१७||
भूतानि विष्णोः सुरपूजितानि 
दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भुतानि
रक्षन्ति तद्भक्तिमतः परेभ्यो 
मत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ||१८||

(यमराज कह रहे हैं) दूतो ! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शङ्कर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता—सब-के-सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी माया के अधीन हैं तथा भगवान्‌ कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—इस बातको नहीं जानते। तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है ॥ १४-१५ ॥ दूतो ! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान् पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्रको नहीं देख सकते—वैसे ही अन्त:करणमें अपने साक्षीरूपसे स्थित परमात्माको कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय या वाणी आदि किसी भी साधनके द्वारा नहीं जान सकता ॥ १६ ॥ वे प्रभु सबके स्वामी और स्वयं परम स्वतन्त्र हैं। उन्हीं मायापति पुरुषोत्तम के दूत उन्हींके समान परम मनोहर रूप, गुण और स्वभावसे सम्पन्न होकर इस लोक में प्राय: विचरण किया करते हैं ॥ १७ ॥ विष्णुभगवान्‌के सुरपूजित एवं परम अलौकिक पार्षदोंका दर्शन बड़ा दुर्लभ है। वे भगवान्‌के भक्तजनोंको उनके शत्रुओंसे, मुझसे और अग्रि आदि सब विपत्तियोंसे सर्वथा सुरक्षित रखते हैं ॥ १८ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

यम और यमदूतोंका संवाद

श्रीशुक उवाच

इति देवः स आपृष्टः प्रजासंयमनो यमः
प्रीतः स्वदूतान्प्रत्याह स्मरन्पादाम्बुजं हरेः ||११||

यम उवाच

परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च 
ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्वम्
यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा 
नस्योतवद्यस्य वशे च लोकः ||१२||
यो नामभिर्वाचि जनं निजायां 
बध्नाति तन्त्र्यामिव दामभिर्गाः
यस्मै बलिं त इमे नामकर्म- 
निबन्धबद्धाश्चकिता वहन्ति ||१३||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब दूतोंने इस प्रकार प्रश्न किया, तब देवशिरोमणि प्रजाके शासक भगवान्‌ यमराजने प्रसन्न होकर श्रीहरिके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए उनसे कहा ॥ ११ ॥
यमराजने कहा—दूतो ! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत् के  स्वामी हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् सूतमें वस्त्रके समान ओतप्रोत है। उन्हींके अंश ब्रह्मा, विष्णु और शङ्कर इस जगत् की  उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हींने इस सारे जगत् को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है ॥ १२ ॥ मेरे प्यारे दूतो ! जैसे किसान अपने बैलोंको पहले छोटी-छोटी रस्सियोंमें बाँधकर फिर उन रस्सियोंको एक बड़ी आड़ी रस्सीमें बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान्‌ने भी ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमरूप छोटी-छोटी नामकी रस्सियोंमें बाँधकर फिर सब नामोंको वेदवाणी रूप बड़ी रस्सीमें बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्मरूप बन्धनमें बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं ॥ १३ ॥ 

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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

यम और यमदूतोंका संवाद

यमदूता ऊचुः

कति सन्तीह शास्तारो जीवलोकस्य वै प्रभो
त्रैविध्यं कुर्वतः कर्म फलाभिव्यक्तिहेतवः ||४||
यदि स्युर्बहवो लोके शास्तारो दण्डधारिणः
कस्य स्यातां न वा कस्य मृत्युश्चामृतमेव वा ||५||
किन्तु शास्तृबहुत्वे स्याद्बहूनामिह कर्मिणाम्
शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम् ||६
अतस्त्वमेको भूतानां सेश्वराणामधीश्वरः
शास्ता दण्डधरो नॄणां शुभाशुभविवेचनः ||७||
तस्य ते विहितो दण्डो न लोके वर्ततेऽधुना
चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैराज्ञा ते विप्रलम्भिता ||८||
नीयमानं तवादेशादस्माभिर्यातनागृहान्
व्यामोचयन्पातकिनं छित्त्वा पाशान्प्रसह्य ते ||९||
तांस्ते वेदितुमिच्छामो यदि नो मन्यसे क्षमम्
नारायणेत्यभिहिते मा भैरित्याययुर्द्रुतम् ||१०||

यमदूतोंने कहा—प्रभो ! संसारके जीव तीन प्रकारके कर्म करते हैं—पाप, पुण्य अथवा दोनोंसे मिश्रित। इन जीवोंको उन कर्मोंका फल देनेवाले शासक संसारमें कितने हैं ? ॥ ४ ॥ यदि संसारमें दण्ड देनेवाले बहुत-से शासक हों, तो किसे सुख मिले और किसे दु:ख—इसकी व्यवस्था एक-सी न हो सकेगी ॥ ५ ॥ संसारमें कर्म करनेवालोंके अनेक होनेके कारण यदि उनके शासक भी अनेक हों, तो उन शासकोंका शासकपना नाममात्रका ही होगा, जैसे एक सम्राट्के अधीन बहुत-से नाममात्रके सामन्त होते हैं ॥ ६ ॥ इसलिये हम तो ऐसा समझते हैं कि अकेले आप ही समस्त प्राणियों और उनके स्वामियोंके भी अधीश्वर हैं। आप ही मनुष्योंके पाप और पुण्यके निर्णायक, दण्डदाता और शासक हैं ॥ ७ ॥ प्रभो ! अबतक संसारमें कहीं भी आपके द्वारा नियत किये हुए दण्डकी अवहेलना नहीं हुई थी; किन्तु इस समय चार अद्भुत सिद्धोंने आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन कर दिया है ॥ ८ ॥ प्रभो ! आपकी आज्ञासे हमलोग एक पापीको यातनागृहकी ओर ले जा रहे थे, परन्तु उन्होंने बलपूर्वक आपके फंदे काटकर उसे छुड़ा दिया ॥ ९ ॥ हम आपसे उनका रहस्य जानना चाहते हैं। यदि आप हमें सुननेका अधिकारी समझें तो कहें। प्रभो ! बड़े ही आश्चर्यकी बात हुई कि इधर तो अजामिलके मुँहसे ‘नारायण !’ यह शब्द निकला और उधर वे ‘डरो मत’, डरो मत ! कहते हुए झटपट वहाँ आ पहुँचे ॥ १० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

यम और यमदूतोंका संवाद

श्रीराजोवाच

निशम्य देवः स्वभटोपवर्णितं प्रत्याह किं तानपि धर्मराजः
एवं हताज्ञो विहतान्मुरारेर्नैदेशिकैर्यस्य वशे जनोऽयम् ||१||
यमस्य देवस्य न दण्डभङ्गः कुतश्चनर्षे श्रुतपूर्व आसीत्
एतन्मुने वृश्चति लोकसंशयं न हि त्वदन्य इति मे विनिश्चितम् ||२||

श्रीशुक उवाच

भगवत्पुरुषै राजन्याम्याः प्रतिहतोद्यमाः
पतिं विज्ञापयामासुर्यमं संयमनीपतिम् ||३||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! देवाधिदेव धर्मराजके वशमें सारे जीव हैं और भगवान्‌के पार्षदोंने उन्हींकी आज्ञा भंग कर दी तथा उनके दूतोंको अपमानित कर दिया। जब उनके दूतोंने यमपुरीमें जाकर उनसे अजामिलका वृत्तान्त कह सुनाया, तब सब कुछ सुनकर उन्होंने अपने दूतोंसे क्या कहा ? ॥ १ ॥ ऋषिवर ! मैंने पहले यह बात कभी नहीं सुनी कि किसीने किसी भी कारणसे धर्मराजके शासनका उल्लङ्घन किया हो। भगवन् ! इस विषयमें लोग बहुत सन्देह करेंगे और उसका निवारण आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं कर सकता, ऐसा मेरा निश्चय है ॥ २ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! जब भगवान्‌के पार्षदोंने यमदूतोंका प्रयत्न विफल कर दिया, तब उन लोगोंने संयमनीपुरीके स्वामी एवं अपने शासक यमराजके पास जाकर निवेदन किया ॥ ३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१५)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

एवं स विप्लावितसर्वधर्मा
     दास्याः पतिः पतितो गर्ह्यकर्मणा ।
निपात्यमानो निरये हतव्रतः
     सद्यो विमुक्तो भगवन्नाम गृह्णन् ॥ ४५ ॥
नातः परं कर्मनिबन्धकृन्तनं
     मुमुक्षतां तीर्थपदानुकीर्तनात् ।
न यत्पुनः कर्मसु सज्जते मनो
     रजस्तमोभ्यां कलिलं ततोऽन्यथा ॥ ४६ ॥
य एतं परमं गुह्यं इतिहासमघापहम् ।
श्रृणुयात् श्रद्धया युक्तो यश्च भक्त्यानुकीर्तयेत् ॥ ४७ ॥
न वै स नरकं याति नेक्षितो यमकिङ्‌करैः ।
यद्यप्यमङ्‌गलो मर्त्यो विष्णुलोके महीयते ॥ ४८ ॥
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।
अजामिलोऽप्यगात् धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ४९ ॥

परीक्षित्‌ ! अजामिलने दासीका सहवास करके सारा धर्म-कर्म चौपट कर दिया था। वे अपने निन्दित कर्मके कारण पतित हो गये थे। नियमोंसे च्युत हो जानेके कारण उन्हें नरकमें गिराया जा रहा था। परन्तु भगवान्‌के एक नामका उच्चारण करनेमात्रसे वे उससे तत्काल मुक्त हो गये ॥ ४५ ॥ जो लोग इस संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, उनके लिये अपने चरणोंके स्पर्शसे तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले भगवान्‌ के नामसे बढक़र और कोई साधन नहीं है; क्योंकि नामका आश्रय लेनेसे मनुष्यका मन फिर कर्मके पचड़ोंमें नहीं पड़ता। भगवन्नाम के अतिरिक्त और किसी प्रायश्चित्तका आश्रय लेनेपर मन रजोगुण और तमोगुण से ग्रस्त ही रहता है तथा पापोंका पूरा-पूरा नाश भी नहीं होता ॥ ४६ ॥
परीक्षित्‌ ! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। जो पुरुष श्रद्धा और भक्तिके साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरकमें कभी नहीं जाता। यमराजके दूत तो आँख उठाकर उसकी ओर देखतक नहीं सकते। उस पुरुषका जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोकमें उसकी पूजा होती है ॥ ४७-४८ ॥ परीक्षित्‌ ! देखो—अजामिल जैसे पापीने मृत्युके समय पुत्रके बहाने भगवान्‌के नामका उच्चारण किया ! उसे भी वैकुण्ठकी प्राप्ति हो गयी ! फिर जो लोग श्रद्धाके साथ भगवन्नामका उच्चारण करते हैं, उनकी तो बात ही क्या है ॥ ४९ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे अजामिलोपाख्याने द्वितीयोध्याऽयः ॥ २ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१४)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

श्रीशुक उवाच -
इति जातसुनिर्वेदः क्षणसङ्‌गेन साधुषु ।
गङ्‌गाद्वारमुपेयाय मुक्तसर्वानुबन्धनः ॥ ३९ ॥
स तस्मिन् देवसदन आसीनो योगमास्थितः ।
प्रत्याहृतेन्द्रियग्रामो युयोज मन आत्मनि ॥ ४० ॥
ततो गुणेभ्य आत्मानं वियुज्यात्मसमाधिना ।
युयुजे भगवद् धाम्नि ब्रह्मण्यनुभवात्मनि ॥ ४१ ॥
यर्ह्युपारतधीस्तस्मिन् अद्राक्षीत् पुरुषान्पुरः ।
उपलभ्योपलब्धान् प्राग् ववन्दे शिरसा द्विजः ॥ ४२ ॥
हित्वा कलेवरं तीर्थे गङ्‌गायां दर्शनादनु ।
सद्यः स्वरूपं जगृहे भगवन् पार्श्ववर्तिनाम् ॥ ४३ ॥
साकं विहायसा विप्रो महापुरुषकिङ्‌करैः ।
हैमं विमानमारुह्य ययौ यत्र श्रियः पतिः ॥ ४४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! उन भगवान्‌के पार्षद महात्माओं का केवल थोड़ी ही देर के लिये सत्सङ्ग हुआ था। इतनेसे ही अजामिलके चित्तमें संसारके प्रति तीव्र वैराग्य हो गया। वे सबके सम्बन्ध और मोहको छोडक़र हरद्वार चले गये ॥ ३९ ॥ उस देवस्थानमें जाकर वे भगवान्‌के मन्दिरमें आसनसे बैठ गये और उन्होंने योगमार्गका आश्रय लेकर अपनी सारी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर मनमें लीन कर लिया और मनको बुद्धिमें मिला दिया ॥ ४० ॥ इसके बाद आत्मचिन्तनके द्वारा उन्होंने बुद्धिको विषयोंसे पृथक् कर लिया तथा भगवान्‌के धाम अनुभवस्वरूप परब्रह्ममें जोड़ दिया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार जब अजामिलकी बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ऊपर उठकर भगवान्‌के स्वरूपमें स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं। अजामिल ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया ॥ ४२ ॥ उनका दर्शन पानेके बाद उन्होंने उस तीर्थस्थान में गङ्गाके तटपर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान्‌ के पार्षदों का स्वरूप प्राप्त कर लिया ॥ ४३ ॥ अजामिल भगवान्‌ के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाशमार्ग से भगवान्‌ लक्ष्मीपति के निवासस्थान वैकुण्ठको चले गये ॥ ४४ ॥

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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१३)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

किमिदं स्वप्न आहो स्वित् साक्षाद् दृष्टमिहाद्‍भुतम् ।
क्व याता अद्य ते ये मां व्यकर्षन् पाशपाणयः ॥ ३० ॥
अथ ते क्व गताः सिद्धाः चत्वारश्चारुदर्शनाः ।
व्यामोचयन् नीयमानं बद्ध्वा पाशैरधो भुवः ॥ ३१ ॥
अथापि मे दुर्भगस्य विबुधोत्तमदर्शने ।
भवितव्यं मङ्‌गलेन येनात्मा मे प्रसीदति ॥ ३२ ॥
अन्यथा म्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपतेः ।
वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्वा वक्तुमिहार्हति ॥ ३३ ॥
क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः ।
क्व च नारायणेत्येतद् भगवन्नाम मङ्‌गलम् ॥ ३४ ॥
सोऽहं तथा यतिष्यामि यतचित्तेन्द्रियानिलः ।
यथा न भूय आत्मानं अन्धे तमसि मज्जये ॥ ३५ ॥
विमुच्य तमिमं बन्धं अविद्या कामकर्मजम् ।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥ ३६ ॥
मोचये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्याऽऽत्ममायया ।
विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधमः ॥ ३७ ॥
ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम् ।
धास्ये मनो भगवति शुद्धं तत्कीर्तनादिभिः ॥ ३८ ॥

(अजामिल मन-ही-मन सोच रहा है) ‘मैंने अभी जो अद्भुत दृश्य देखा, क्या यह स्वप्न है ? अथवा जाग्रत् अवस्था का ही प्रत्यक्ष अनुभव है ? अभी-अभी जो हाथोंमें फंदा लेकर मुझे खींच रहे थे, वे कहाँ चले गये ? ॥ ३० ॥ अभी-अभी वे मुझे अपने फंदों में फँसाकर पृथ्वी के नीचे ले जा रहे थे, परन्तु चार अत्यन्त सुन्दर सिद्धों ने आकर मुझे छुड़ा लिया ! वे अब कहाँ चले गये ॥ ३१ ॥ यद्यपि मैं इस जन्मका महापापी हूँ, फिर भी मैंने पूर्वजन्मोंमें अवश्य ही शुभकर्म किये होंगे; तभी तो मुझे इन श्रेष्ठ देवताओंके दर्शन हुए। उनकी स्मृतिसे मेरा हृदय अब भी आनन्दसे भर रहा है ॥ ३२ ॥ मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ। यदि पूर्वजन्ममें मैंने पुण्य न किये होते, तो मरनेके समय मेरी जीभ भगवान्‌के मनोमोहक नामका उच्चारण कैसे कर पाती ? ॥ ३३ ॥ कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रह्मतेजको नष्ट करनेवाला तथा कहाँ भगवान्‌का वह परम मङ्गलमय ‘नारायण’ नाम ! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया) ॥ ३४ ॥ अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणोंको वशमें करके ऐसा प्रयत्न करूँगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालूँ ॥ ३५ ॥ अज्ञानवश मैंने अपनेको शरीर समझकर उसके लिये बड़ी-बड़ी कामनाएँ कीं और उनकी पूर्तिके लिये अनेकों कर्म किये। उन्हींका फल है यह बन्धन ! अब मैं इसे काटकर समस्त प्राणियोंका हित करूँगा, वासनाओंको शान्त कर दूँगा, सबसे मित्रताका व्यवहार करूँगा, दुखियोंपर दया करूँगा और पूरे संयमके साथ रहूँगा ॥ ३६ ॥ भगवान्‌की मायाने स्त्रीका रूप धारण करके मुझ अधमको फाँस लिया और क्रीडामृगकी भाँति मुझे बहुत नाच नचाया। अब मैं अपने-आपको उस मायासे मुक्त करूँगा ॥ ३७ ॥ मैंने सत्य वस्तु परमात्माको पहचान लिया है; अत: अब मैं शरीर आदिमें ‘मैं’ तथा ‘मेरे’का भाव छोडक़र भगवन्नामके कीर्तन आदिसे अपने मनको शुद्ध करूँगा और उसे भगवान्‌ में लगाऊँगा ॥ ३८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

भक्तिमान्भगवत्याशु माहात्म्यश्रवणाद्धरेः ।
अनुतापो महानासीत्स्मरतोऽशुभमात्मनः ॥ २५ ॥
अहो मे परमं कष्टं अभूद् अविजितात्मनः ।
येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायतात्मना ॥ २६ ॥
धिङ्‌मां विगर्हितं सद्‌भिः दुष्कृतं कुलकज्जलम् ।
हित्वा बालां सतीं योऽहं सुरापीमसतीमगाम् ॥ २७ ॥
वृद्धावनाथौ पितरौ नान्यबन्धू तपस्विनौ ।
अहो मयाधुना त्यक्तौ अकृतज्ञेन नीचवत् ॥ २८ ॥
सोऽहं व्यक्तं पतिष्यामि नरके भृशदारुणे ।
धर्मघ्नाः कामिनो यत्र विन्दन्ति यमयातनाः ॥ २९ ॥

सर्वपापापहारी भगवान्‌ की महिमा सुनने से अजामिल के हृदयमें शीघ्र ही भक्तिका उदय हो गया। अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥ (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ ! मैंने एक दासी के गर्भसे पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दु:खकी बात है ॥ २६ ॥ धिक्कार है ! मुझे बार-बार धिक्कार है ! मैं संतोंके द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ ! मैंने अपने कुल में कलङ्क का टीका लगा दिया ! हाय-हाय, मैंने अपनी सती एवं अबोध पत्नीका परित्याग कर दिया और शराब पीनेवाली कुलटाका संसर्ग किया ॥ २७ ॥ मैं कितना नीच हूँ ! मेरे मा-बाप बूढ़े और तपस्वी थे । वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह ! मैं कितना कृतघ्न हूँ ॥ २८ ॥ मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकारकी यमयातना भोगते हैं ॥ २९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६) यम और यमदूतोंका संवाद एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां सङ्कीर...