बुधवार, 20 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच
न हिंस्याद्भूतजातानि न शपेन्नानृतं वदेत्
न छिन्द्यान्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम्|| ४७||
नाप्सु स्नायान्न कुप्येत न सम्भाषेत दुर्जनैः
न वसीताधौतवासः स्रजं च विधृतां क्वचित् ||४८||
नोच्छिष्टं चण्डिकान्नं च सामिषं वृषलाहृतम्
भुञ्जीतोदक्यया दृष्टं पिबेन्नाञ्जलिना त्वपः ||४९||
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा
अनर्चितासंयतवाक्नासंवीता बहिश्चरेत् ||५०||
नाधौतपादाप्रयता नार्द्र पादा उदक्शिराः
शयीत नापराङ्नान्यैर्न नग्ना न च सन्ध्ययोः ||५१||
धौतवासा शुचिर्नित्यं सर्वमङ्गलसंयुता
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्राञ्श्रियमच्युतम् ||५२||
स्त्रियो वीरवतीश्चार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनैः
पतिं चार्च्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम् ||५३||
सांवत्सरं पुंसवनं व्रतमेतदविप्लुतम्
धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुतः ||५४||

कश्यपजी ने उत्तर दिया—प्रिये ! इस व्रत में किसी भी प्राणी को मन, वाणी या क्रिया के द्वारा सताये नहीं, किसीको शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीर के नख और रोएँ न काटे और किसी भी अशुभ वस्तुका स्पर्श न करे ॥ ४७ ॥ जलमें घुसकर स्नान न करे, क्रोध न करे, दुर्जनोंसे बातचीत न करे, बिना धुला वस्त्र न पहने और किसी की पहनी हुई माला न पहने ॥ ४८ ॥ जूठा न खाय, भद्रकाली का प्रसाद या मांसयुक्त अन्नका भोजन न करे। शूद्र का लाया हुआ और रजस्वला का देखा हुआ अन्न भी न खाय और अञ्जलि से जलपान न करे ॥ ४९ ॥ जूठे मुँह, बिना आचमन किये, सन्ध्याके समय, बाल खोले हुए, बिना शृङ्गारके, वाणीका संयम किये बिना और बिना चद्दर ओढ़े घरसे बाहर न निकले ॥ ५० ॥ बिना पैर धोये, अपवित्र अवस्थामें गीले पाँवोंसे, उत्तर या पश्चिम सिर करके, दूसरेके साथ, नग्रावस्थामें तथा सुबह-शाम सोना नहीं चाहिये ॥ ५१ ॥ इस प्रकार इन निषिद्ध कर्मोंका त्याग करके सर्वदा पवित्र रहे, धुला वस्त्र धारण करे और सभी सौभाग्यके चिह्नोंसे सुसज्जित रहे। प्रात:काल कलेवा करनेके पहले ही गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान्‌ नारायणकी पूजा करे ॥ ५२ ॥ इसके बाद पुष्पमाला, चन्दनादि सुगन्धद्रव्य, नैवेद्य और आभूषणादिसे सुहागिनी स्त्रियोंकी पूजा करे तथा पतिकी पूजा करके उसकी सेवामें संलग्र रहे और यह भावना करती रहे कि पतिका तेज मेरी कोखमें स्थित है ॥ ५३ ॥ प्रिये ! इस व्रतका नाम ‘पुंसवन’ है। यदि एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा ॥ ५४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच

पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्र हादेवबान्धवः
संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ||४५||

दितिरुवाच

धारयिष्ये व्रतं ब्रह्मन्ब्रूहि कार्याणि यानि मे
यानि चेह निषिद्धानि न व्रतं घ्नन्ति यान्युत ||४६||

कश्यपजी बोले—कल्याणी ! यदि तुम मेरे बतलाये हुए व्रतका एकवर्षतक विधिपूर्वक पालन करोगी तो तुम्हें इन्द्रको मारनेवाला पुत्र प्राप्त होगा। परंतु यदि किसी प्रकार नियमोंमें त्रुटि हो गयी तो वह देवताओंका मित्र बन जायगा ॥ ४५ ॥
दितिने कहा—ब्रह्मन् ! मैं उस व्रतका पालन करूँगी। आप बतलाइये कि मुझे क्या-क्या करना चाहिये, कौन-कौनसे काम छोड़ देने चाहिये और कौन-से काम ऐसे हैं, जिनसे व्रत भङ्ग नहीं होता ॥ ४६ ॥

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मंगलवार, 19 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

दितिरुवाच
वरदो यदि मे ब्रह्मन्पुत्रमिन्द्र हणं वृणे
अमृत्युं मृतपुत्राहं येन मे घातितौ सुतौ ||३७||
निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत
अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः ||३८||
अहो अर्थेन्द्रि यारामो योषिन्मय्येह मायया
गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम् ||३९||
कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः
धिङ्मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रि यः ||४०||
शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम्
हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ||४१||
न हि कश्चित्प्रियः स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम्
पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च ||४२
प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्न मृषा भवेत्
वधं नार्हति चेन्द्रो ऽपि तत्रेदमुपकल्पते ||४३||
इति सञ्चिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन
उवाच किञ्चित्कुपित आत्मानं च विगर्हयन् ||४४||

दितिने कहा—ब्रह्मन् ! इन्द्र ने विष्णु के हाथों मेरे दो पुत्र मरवाकर मुझे निपूती बना दिया है। इसलिये यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना चाहते हैं तो कृपा करके एक ऐसा अमर पुत्र दीजिये, जो इन्द्रको मार डाले ॥ ३७ ॥
परीक्षित्‌ ! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय ! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्म का अवसर आ पहुँचा ॥ ३८ ॥ देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय ! हाय ! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा ॥ ३९ ॥ इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है ॥ ४० ॥ सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है। इनका मुँह तो ऐसा होता है जैसे शरद्ऋतुका खिला हुआ कमल। बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो। परंतु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो ॥ ४१ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ अपनी लालसाओंकी कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसीसे प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाईतकको मार डालती हैं या मरवा डालती हैं ॥ ४२ ॥ अब तो मैं कह चुका हूँ कि जो तुम माँगोगी, दूँगा। मेरी बात झूठी नहीं होनी चाहिये। परंतु इन्द्र भी वध करनेयोग्य नहीं है। अच्छा, अब इस विषयमें मैं यह युक्ति करता हूँ’ ॥ ४३ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! सर्वसमर्थ कश्यपजी ने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दिति से कहा ॥ ४४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच

वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागमः ||३२||
पतिरेव हि नारीणां दैवतं परमं स्मृतम्
मानसः सर्वभूतानां वासुदेवः श्रियः पतिः ||३३||
स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः
इज्यते भगवान्पुम्भिः स्त्रीभिश्च पतिरूपधृक् ||३४||
तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे
यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्वरम् ||३५||
सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तितः
तं ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ||३६||

कश्यपजी ने कहा—अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझ से माँग लो । पति के प्रसन्न हो जाने पर पत्नी के लिये लोक या परलोक में कौन-सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है ॥ ३२ ॥ शास्त्रों में यह बात स्पष्ट कही गयी है कि पति ही स्त्रियों का परमाराध्य इष्टदेव है । प्रिये ! लक्ष्मीपति भगवान्‌ वासुदेव ही समस्त प्राणियों के हृदयमें विराजमान हैं ॥ ३३ ॥ विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्‌ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं ॥ ३४ ॥ इसलिये प्रिये ! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं ॥ ३५ ॥ कल्याणी ! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है। अब मैं तुम्हारी सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ३६ ॥

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सोमवार, 18 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि मनोज्ञया
बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ||२९||
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापतिः
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हृता ||३०||
एवं शुश्रूषितस्तात भगवान्कश्यपः स्त्रिया
प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ||३१||

कश्यपजी महाराज बड़े विद्वान् और विचारवान् होनेपर भी चतुर दिति की सेवासे मोहित हो गये और उन्होंने विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि ‘मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।’ स्त्रियोंके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ २९ ॥ सृष्टि के प्रभात में ब्रह्माजी ने देखा कि सभी जीव असङ्ग हो रहे हैं, तब उन्होंने अपने आधे शरीर से स्त्रियोंकी रचना की। और स्त्रियों ने पुरुषों की मति अपनी ओर आकर्षित कर ली ॥ ३० ॥ हाँ, तो भैया ! मैं कह रहा था कि दिति ने भगवान्‌ कश्यपकी बड़ी सेवा की। इससे वे उसपर बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने दितिका अभिनन्दन करते हुए उससे मुसकराकर कहा ॥ ३१ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच
हतपुत्रा दितिः शक्र पार्ष्णिग्राहेण विष्णुना
मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ||२३||
कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रि याराममुल्बणम्
अक्लिन्नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ||२४||
कृमिविड्भस्मसंज्ञासीद्यस्येशाभिहितस्य च
भूतध्रुक्तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ||२५||
आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्नद्धचेतसः
मदशोषक इन्द्र स्य भूयाद्येन सुतो हि मे ||२६||
इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम्
शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च ||२७||
भक्त्या परमया राजन्मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः
मनो जग्राह भावज्ञा सस्मितापाङ्गवीक्षणैः ||२८||

श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ विष्णु ने इन्द्र का पक्ष लेकर दितिके दोनों पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष को मार डाला। अत: दिति शोककी आगसे उद्दीप्त क्रोधसे जलकर इस प्रकार सोचने लगी ॥ २३ ॥ ‘सचमुच इन्द्र बड़ा विषयी, क्रूर और निर्दयी है। राम ! राम ! उसने अपने भाइयोंको ही मरवा डाला। वह दिन कब होगा, जब मैं भी उस पापीको मरवाकर आरामसे सोऊँगी ॥ २४ ॥ लोग राजाओंके, देवताओंके शरीरको ‘प्रभु’ कहकर पुकारते हैं; परंतु एक दिन वह कीड़ा, विष्ठा या राखका ढेर हो जाता है, इसके लिये जो दूसरे प्राणियोंको सताता है, उसे अपने सच्चे स्वार्थ या परमार्थका पता नहीं है; क्योंकि इससे तो नरकमें जाना पड़ेगा ॥ २५ ॥ मैं समझती हूँ इन्द्र अपने शरीरको नित्य मानकर मतवाला हो रहा है। उसे अपने विनाशका पता ही नहीं है। अब मैं वह उपाय करूँगी, जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्रका घमंड चूर-चूर कर दे’ ॥ २६ ॥ दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा-शुश्रूषा, विनय-प्रेम और जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी ॥ २७ ॥ वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी ॥ २८ ॥ 

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रविवार, 17 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीराजोवाच

कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो
इन्द्रे ण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः|| २०||
इमे श्रद्दधते ब्रह्मन्नृषयो हि मया सह
परिज्ञानाय भगवंस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ||२१||

श्रीसूत उवाच

तद्विष्णुरातस्य स बादरायणिर्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत्
सभाजयन्सन्निभृतेन चेतसा जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः|| २२||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! मरुद्गण ने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भाव को छोड़ सके और देवराज इन्द्र के द्वारा देवता बना लिये गये ? ॥ २० ॥ ब्रह्मन् ! मेरे साथ यहाँ की सभी ऋषिमण्डली यह बात जानने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो रही है। अत: आप कृपा करके विस्तारसे वह रहस्य बतलाइये ॥ २१ ॥
सूतजी कहते हैं—शौनकजी ! राजा परीक्षित्‌ का प्रश्र थोड़े शब्दों में बड़ा सारगर्भित था। उन्होंने बड़े आदर से पूछा भी था। इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेव जी महाराज ने बड़े ही प्रसन्न चित्त से उनका अभिनन्दन करके यों कहा ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

ह्रादस्य धमनिर्भार्या सूत वातापिमिल्वलम्
योऽगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वलः ||१५||
अनुह्रादस्य सूर्यायां बाष्कलो महिषस्तथा
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्देव्यां तस्याभवद्बलिः ||१६||
बाणज्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोऽभवत्
तस्यानुभावं सुश्लोक्यं पश्चादेवाभिधास्यते ||१७||
बाण आराध्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम्
यत्पार्श्वे भगवानास्ते ह्यद्यापि पुरपालकः ||१८
मरुतश्च दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिकाः
त आसन्नप्रजाः सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मताम् ||१९||

ह्राद की पत्नी थी धमनि। उसके दो पुत्र हुए—वातापि और इल्वल। इस इल्वल ने ही महर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापि को पकाकर उन्हें खिला दिया था ॥ १५ ॥ अनुह्राद की पत्नी सूर्या थी, उसके दो पुत्र हुए— बाष्कल और महिषासुर। प्रह्लादका पुत्र था विरोचन। उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ बलिकी पत्नी का नाम अशना था। उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए। दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है। उसे मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) सुनाऊँगा ॥ १७ ॥ बलिका पुत्र बाणासुर भगवान्‌ शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया। आज भी भगवान्‌ शंकर उसके नगर की रक्षा करने के लिये उसके पास ही रहते हैं ॥ १८ ॥ दिति के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे। उन्हें मरुद्गण कहते हैं। वे सब नि:सन्तान रहे। देवराज इन्द्र ने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ॥ १९ ॥

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शनिवार, 16 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते
यत्र भागवतः श्रीमान्प्रह्रादो बलिरेव च ||१०||
दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ||११||
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुरः सुतान् ||१२||
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं प्रह्लादमेव च
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ||१३||
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्
संह्रादस्य कृतिर्भार्या सूत पञ्चजनं ततः ||१४||

प्रिय परीक्षित्‌! अब मैं कश्यपजी की दूसरी पत्नी दिति से उत्पन्न होनेवाली उस सन्तान- परम्परा का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लाद जी और बलि का जन्म हुआ ॥१०॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें (तीसरे स्कन्धमें) सुना चुका हूँ ॥ ११ ॥ हिरण्यकशिपु की पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भ ने उसका विवाह हिरण्यकशिपु से कर दिया था। कयाधु के चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्लाद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानव से हुआ। उससे राहु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥ १२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपान के समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ ने चक्र से काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पञ्चजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

पौलोम्यामिन्द्र आधत्त त्रीन्पुत्रानिति नः श्रुतम्
जयन्तमृषभं तात तृतीयं मीढुषं प्रभुः ||७||
उरुक्रमस्य देवस्य मायावामनरूपिणः
कीर्तौ पत्न्यां बृहच्छ्लोकस्तस्यासन्सौभगादयः ||८||
तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मनः
पश्चाद्वक्ष्यामहेऽदित्यां यथैवावततार ह ||९||

प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र की पत्नी थीं पुलोमनन्दिनी शची। उनसे, हमने सुना है, उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किये—जयन्त, ऋषभ और मीढ्वान् ॥ ७ ॥ स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही(बलिपर अनुग्रह करने और इन्द्र का राज्य लौटानेके लिये) मायासे वामन (उपेन्द्र) के रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने तीन पग पृथ्वी माँगकर तीनों लोक नाप लिये थे। उनकी पत्नीका नाम था कीर्ति। उससे बृहच्छ्लोक नाम का पुत्र हुआ। उसके सौभग आदि कई सन्तानें हुर्ईं ॥ ८ ॥ कश्यपनन्दन भगवान्‌ वामन ने माता अदिति के गर्भ से क्यों जन्म लिया और इस अवतार में उन्होंने कौन-से गुण, लीलाएँ और पराक्रम प्रकट किये—इसका वर्णन मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) करूँगा ॥ ९ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११) अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्त...