॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – छब्बीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)
नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन
राजोवाच
महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति ॥ १ ॥
ऋषिरुवाच
त्रिगुणत्वात्कर्तुः श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधाः सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥ २ ॥
अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथैव कर्तुः श्रद्धाया वैसादृश्यात्कर्मफलं विसदृशं भवति
या ह्यनाद्यविद्यया कृतकामानां तत्परिणामलक्षणाः सृतयः सहस्रशः प्रवृत्तास्तासां प्राचुर्येणानुवर्णयिष्यामः ॥ ३ ॥
राजोवाच
नरका नाम भगवन् किं देशविशेषा अथवा बहिस्त्रिलोक्या आहोस्विदन्तराल इति ॥ ४ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा—महर्षे ! लोगों को जो ये ऊँची-नीची गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें इतनी विभिन्नता क्यों है ? ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन् ! कर्म करनेवाले पुरुष सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार के होते हैं तथा उनकी श्रद्धाओं में भी भेद रहता है। इस प्रकार स्वभाव और श्रद्धा के भेदसे उनके कर्मों की गतियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और न्यूनाधिकरूप में ये सभी गतियाँ सभी कर्ताओं को प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥ इसी प्रकार निषिद्ध कर्मरूप पाप करनेवालों को भी, उनकी श्रद्धा की असमानता के कारण, समान फल नहीं मिलता। अत: अनादि अविद्या के वशीभूत होकर कामनापूर्वक किये हुए उन निषिद्ध कर्मों के परिणाममें जो हजारों तरहकी नारकी गतियाँ होती हैं, उनका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥
राजा परीक्षित् ने पूछा—भगवन् ! आप जिनका वर्णन करना चाहते हैं, वे नरक इसी पृथ्वी के कोई देशविशेष हैं अथवा त्रिलोकी से बाहर या इसीके भीतर किसी जगह हैं ? ॥ ४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --