सोमवार, 25 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

पुंसवन-व्रतकी विधि

एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम् । 
नीत्वाथोपचरेत् साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि ॥ २१ ॥
श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत् । 
पयःश्रृतेन जुहुयात् चरुणा सह सर्पिषा । 
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः ॥ २२ ॥ 
आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः । 
प्रणम्य शिरसा भक्त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया ॥ २३ ॥
आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः । 
दद्यात्पत्‍न्यै चरोः शेषं सुप्रजास्त्वं सुसौभगम् ॥ २४ ॥
एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभोः 
     अभीप्सितार्थं लभते पुमानिह । 
स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं 
     श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥ २५ ॥
कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं 
     वरं त्ववीरा हतकिल्बिषां गतिम् । 
मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरी 
     सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम् ॥ २६ ॥
विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते 
     य आमयावीन्द्रियकल्यदेहम् । 
एतत्पठन्नभ्युदये च कर्मणि 
     अनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम् ॥ २७ ॥
तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान् 
     होमावसाने हुतभुक् श्रीः हरिश्च । 
राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं 
     दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते ॥ २८ ॥

साध्वी स्त्री इस विधि से बारह महीनों तक—पूरे सालभर इस व्रत का आचरण करके मार्गशीर्ष की अमावस्या को उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे ॥ २१ ॥ उस दिन प्रात:काल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्‌ का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञ की विधि से घृतमिश्रित खीर की अग्नि में बारह आहुति दे ॥ २२ ॥ इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दें तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे। भक्तिभाव से माथा टेककर उनके चरणों में प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे ॥ २३ ॥ पहले आचार्य को भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्री को सत्पुत्र और सौभाग्य-दान करनेवाला होता है ॥ २४ ॥
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के इस पुंसवन-व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अुनष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है। स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है ॥ २५ ॥ इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्री को सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपा को श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रत के प्रभाव से रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य माङ्गलिक श्राद्धकर्मोंमें  इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं ॥ २६-२७ ॥ वे सन्तुष्ट होकर हवन के समाप्त होने पर व्रती की समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं । ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता भगवान्‌ लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रती की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्‌! मैंने तुम्हें मरुद्गण की आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दिति के श्रेष्ठ पुंसवन-व्रत का वर्णन भी सुना दिया ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नाम एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 

॥ इति षष्ठ स्कन्ध समाप्त ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 24 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

पुंसवन-व्रतकी विधि

इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह । 
तन्निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत् ॥ १५ ॥
ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा । 
यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद् हरिम् ॥ १६ ॥
पतिं च परया भक्त्या महापुरुषचेतसा । 
प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः । 
बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्‍न्या उच्चावचानि च ॥ १७ ॥ 
कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि । 
पत्‍न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः ॥ १८ ॥
विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन् न विहन्यात् कथञ्चन । 
विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः । 
अर्चेदहरहर्भक्त्या देवं नियममास्थितः ॥ १९ ॥ 
उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः । 
अद्यात् आत्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा ॥ २० ॥

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार परम वरदानी भगवान्‌ लक्ष्मीनारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे ॥ १५ ॥ तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे ॥ १६ ॥ भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान्‌ समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे ॥ १७ ॥ परीक्षित्‌ ! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १८ ॥ यह भगवान्‌ विष्णुका व्रत है। इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोडऩा चाहिये। जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान्‌ विष्णुकी भी पूजा करे ॥ १९ ॥ इसके बाद भगवान्‌ को उनके धाम में पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति के लिये पहले से ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे ॥२०॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

पुंसवन-व्रतकी विधि

युवां तु विश्वस्य विभू जगतः कारणं परम् । 
इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥ ११ ॥
तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेव पुरुषः परः । 
त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ॥ १२ ॥
गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान् । 
त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशयाः । 
नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वं अपाश्रयः ॥ १३ ॥ 
यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । 
तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १४ ॥

‘हे लक्ष्मी-नारायण ! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत् के  अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन् ! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ११ ॥ प्रभो ! आपही इन महामायाके अधीश्वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्न करनेवाली क्रिया ॥ १२ ॥ माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्त:करण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं ॥ १३ ॥ प्रभो ! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अत: मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’ ॥ १४ ॥ 

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शनिवार, 23 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

पुंसवन-व्रतकी विधि
 
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय 
महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिः 
बलिमुपहरामीति । अनेनाहरहर्मन्त्रेण 
विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नान
वास‌उपवीतविभूषण गन्धपुष्पधूपदीपोपहारादि 
उपचारान् सुसमाहित उपाहरेत् ॥ ७ ॥ 
हविःशेषं च जुहुयादनले द्वादशाहुतीः । 
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ॥ ८ ॥
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ । 
भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ॥ ९ ॥
प्रणमेद् दण्डवद्‍भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा । 
दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ॥ १० ॥

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि।’ ‘ओङ्कारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियों के स्वामी भगवान्‌ पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियों को मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहार की सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्र के द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्त से विष्णुभगवान्‌ का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे ॥ ७ ॥ जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा।’ ‘महान् ऐश्वर्योंके अधिपति भगवान्‌ पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्नि में बारह आहुतियाँ दे ॥ ८ ॥ परीक्षित्‌ ! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान्‌ लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं ॥ ९ ॥ इसके बाद भक्तभिावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्‌को साष्टाङ्ग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे— ॥ १० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

पुंसवन-व्रतकी विधि

श्रीराजोवाच - 
व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम् । 
तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति ॥ १ ॥

श्रीशुक उवाच - 
शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्‍भर्तुरनुज्ञया । 
आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः ॥ २ ॥
निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणान् अनुमन्त्र्य च । 
स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्‌कृताम्बरे । 
पूजयेत् प्रातराशात् प्राग् भगवन्तं श्रिया सह ॥ ३ ॥ 
अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते । 
महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये ॥ ४ ॥
यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिमौजसा । 
जुष्ट ईश गुणैः सर्वैः ततोऽसि भगवान् प्रभुः ॥ ५ ॥
विष्णुपत्‍नि महामाये महापुरुषलक्षणे । 
प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे ॥ २ ॥ पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रात:काल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान्‌ लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे ॥ ३ ॥ (इस प्रकार प्रार्थना करे—) ‘प्रभो ! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकलसिद्धिस्वरूप हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ४ ॥ मेरे आराध्यदेव ! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्वर्यों से नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान्‌ कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ५ ॥ माता लक्ष्मीजी ! आप भगवान्‌ की अर्धाङ्गिनी और महामायास्वरूपिणी हैं। भगवान्‌के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ’ ॥ ६ ॥

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शुक्रवार, 22 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

इन्द्र उवाच
अम्ब तेऽहं व्यवसितमुपधार्यागतोऽन्तिकम्
लब्धान्तरोऽच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्मदृक् ||७१||
कृत्तो मे सप्तधा गर्भ आसन्सप्त कुमारकाः
तेऽपि चैकैकशो वृक्णाः सप्तधा नापि मम्रिरे ||७२||
ततस्तत्परमाश्चर्यं वीक्ष्य व्यवसितं मया
महापुरुषपूजायाः सिद्धिः काप्यानुषङ्गिणी ||७३||
आराधनं भगवत ईहमाना निराशिषः
ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशलाः स्मृताः ||७४||
आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्वरम्
को वृणीत गुणस्पर्शं बुधः स्यान्नरकेऽपि यत् ||७५||
तदिदं मम दौर्जन्यं बालिशस्य महीयसि
क्षन्तुमर्हसि मातस्त्वं दिष्ट्या गर्भो मृतोत्थितः ||७६||

श्रीशुक उवाच
इन्द्र स्तयाभ्यनुज्ञातः शुद्धभावेन तुष्टया
मरुद्भिः सह तां नत्वा जगाम त्रिदिवं प्रभुः || ७७||
एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि
मङ्गलं मरुतां जन्म किं भूयः कथयामि ते ||७८||

इन्द्र ने कहा—माता ! मुझे इस बातका पता चल गया था कि तुम किस उद्देश्यसे व्रत कर रही हो। इसीलिये अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मैं स्वर्ग छोडक़र तुम्हारे पास आया। मेरे मनमें तनिक भी धर्म-भावना नहीं थी। इसीसे तुम्हारे व्रतमें त्रुटि होते ही मैंने उस गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ७१ ॥ पहले मैंने उसके सात टुकड़े किये थे। तब वे सातों टुकड़े सात बालक बन गये। इसके बाद मैंने फिर एक-एकके सात-सात टुकड़े कर दिये। तब भी वे न मरे, बल्कि उनचास हो गये ॥ ७२ ॥ यह परम आश्चर्यमयी घटना देखकर मैंने ऐसा निश्चय किया कि परमपुरुष भगवान्‌ की उपासनाकी यह कोई स्वाभाविक सिद्धि है ॥ ७३ ॥ जो लोग निष्काम भावसे भगवान्‌की आराधना करते हैं और दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते, वे ही अपने स्वार्थ और परमार्थमें निपुण हैं ॥ ७४ ॥ भगवान्‌ जगदीश्वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं। वे प्रसन्न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके विषयभोगोंका वरदान माँगे। माताजी ! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं ॥ ७५ ॥ मेरी स्नेहमयी जननी ! तुम सब प्रकार मेरी पूज्या हो। मैंने मूर्खतावश बड़ी दुष्टताका काम किया है। तुम मेरे अपराधको क्षमा कर दो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा गर्भ खण्ड-खण्ड हो जानेसे एक प्रकार मर जानेपर भी फिरसे जीवित हो गया ॥ ७६ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! दिति देवराज इन्द्रके शुद्धभावसे सन्तुष्ट हो गयी। उससे आज्ञा लेकर देवराज इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ उसे नमस्कार किया और स्वर्गमें चले गये ॥ ७७ ॥ राजन् ! यह मरुद्गणका जन्म बड़ा ही मङ्गलमय है। इसके विषयमें तुमने मुझसे जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर समग्ररूप से मैंने तुम्हें दे दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ७८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मरुदुत्पत्तिकथनं नाम अष्टादशोऽध्या‍यः ॥ १८ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

न ममार दितेर्गर्भः श्रीनिवासानुकम्पया
बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौ ण्यस्त्रेण यथा भवान् ||६५||
सकृदिष्ट्वादिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम्
संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः ||६६||
सजूरिन्द्रे ण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन्
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः ||६७||
दितिरुत्थाय ददृशे कुमाराननलप्रभान्
इन्द्रे ण सहितान्देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ||६८||
अथेन्द्र माह ताताहमादित्यानां भयावहम्
अपत्यमिच्छन्त्यचरं व्रतमेतत्सुदुष्करम् ||६९||
एकः सङ्कल्पितः पुत्रः सप्त सप्ताभवन्कथम्
यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ||७०||

परीक्षित्‌ ! जैसे अश्वत्थामा  के ब्रह्मास्त्र  से तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट नहीं हुआ, वैसे ही भगवान्‌ श्रीहरिकी कृपासे दितिका वह गर्भ वज्रके द्वारा टुकड़े-टुकड़े होनेपर भी मरा नहीं ॥ ६५ ॥ इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान्‌ नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्‌की आराधना की थी ॥ ६६ ॥ अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया ॥ ६७ ॥ जब दितिकी आँख खुली, तब उसने देखा कि उसके अग्रिके समान तेजस्वी उनचास बालक इन्द्रके साथ हैं। इससे सुन्दर स्वभाववाली दिति को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६८ ॥ उसने इन्द्र को सम्बोधन करके कहा—‘बेटा ! मैं इस इच्छा से इस अत्यन्त कठिन व्रतका पालन कर रही थी कि तुम अदिति के पुत्रों को भयभीत करने वाला पुत्र उत्पन्न हो ॥६९॥ मैंने केवल एक ही पुत्र के लिये संकल्प किया था, फिर ये उनचास पुत्र कैसे हो गये ? बेटा इन्द्र ! यदि तुम्हें इसका रहस्य मालूम हो, तो सच-सच मुझे बतला दो। झूठ न बोलना’ ॥ ७० ॥

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गुरुवार, 21 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता
अस्पृष्टवार्यधौताङ्घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता ||६०||
लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रा पहृतचेतसः
दितेः प्रविष्ट उदरं योगेशो योगमायया ||६१||
चकर्त सप्तधा गर्भं वज्रेण कनकप्रभम्
रुदन्तं सप्तधैकैकं मा रोदीरिति तान्पुनः ||६२||
तमूचुः पाट्यमानास्ते सर्वे प्राञ्जलयो नृप
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव ||६३||
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः
अनन्यभावान्पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ||६४||

दिति व्रत के नियमों का पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाता ने भी उसे मोह में डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्या के समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी ॥ ६० ॥ योगेश्वर इन्द्र ने देखा कि यह अच्छा अवसर हाथ लगा। वे योगबल से झटपट सोयी हुई दितिके गर्भ में प्रवेश कर गये ॥ ६१ ॥ उन्होंने वहाँ जाकर सोने के समान चमकते हुए गर्भ के वज्र के द्वारा सात टुकड़े कर दिये। जब वह गर्भ रोने लगा, तब उन्होंने ‘मत रो, मत रो’ यह कहकर सातों टुकड़ोंमेंसे एक-एक के और भी सात टुकड़े कर दिये ॥ ६२ ॥ राजन् ! जब इन्द्र उनके टुकड़े-टुकड़े करने लगे, तब उन सबों ने हाथ जोडक़र इन्द्र से कहा—‘देवराज ! तुम हमें क्यों मार रहे हो ? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं’ ॥ ६३ ॥ तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो !’ ॥६४॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

बाढमित्यभ्युपेत्याथ दिती राजन्महामनाः
कश्यपाद्गर्भमाधत्त व्रतं चाञ्जो दधार सा ||५५||
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः ||५६||
नित्यं वनात्सुमनसः फलमूलसमित्कुशान्
पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत् ||५७||
एवं तस्या व्रतस्थाया व्रतच्छिद्रं हरिर्नृप
प्रेप्सुः पर्यचरज्जिह्मो मृगहेव मृगाकृतिः ||५८||
नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते
चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह || ५९||

परीक्षित्‌ ! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी। उसने ‘बहुत ठीक’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। अब दिति अपनी कोखमें भगवान्‌ कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी ॥ ५५ ॥ प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दिति का अभिप्राय जान बड़ी बुद्धिमानी से अपना वेष बदलकर दिति के आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे ॥ ५६ ॥ वे दिति के लिये प्रतिदिन समय-समयपर वनसे फूल-फल, कन्द-मूल, समिधा, कुश, पत्ते, दूब, मिट्टी और जल लाकर उसकी सेवा में समर्पित करते ॥ ५७ ॥ राजन् ! जिस प्रकार बहेलिया हरिन को मारनेके लिये हरिनकी-सी सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दितिके व्रत-पालनकी त्रुटि पकडऩेके लिये उसकी सेवा करने लगे ॥ ५८ ॥ सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो ? ॥ ५९ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 20 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच
न हिंस्याद्भूतजातानि न शपेन्नानृतं वदेत्
न छिन्द्यान्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम्|| ४७||
नाप्सु स्नायान्न कुप्येत न सम्भाषेत दुर्जनैः
न वसीताधौतवासः स्रजं च विधृतां क्वचित् ||४८||
नोच्छिष्टं चण्डिकान्नं च सामिषं वृषलाहृतम्
भुञ्जीतोदक्यया दृष्टं पिबेन्नाञ्जलिना त्वपः ||४९||
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा
अनर्चितासंयतवाक्नासंवीता बहिश्चरेत् ||५०||
नाधौतपादाप्रयता नार्द्र पादा उदक्शिराः
शयीत नापराङ्नान्यैर्न नग्ना न च सन्ध्ययोः ||५१||
धौतवासा शुचिर्नित्यं सर्वमङ्गलसंयुता
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्राञ्श्रियमच्युतम् ||५२||
स्त्रियो वीरवतीश्चार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनैः
पतिं चार्च्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम् ||५३||
सांवत्सरं पुंसवनं व्रतमेतदविप्लुतम्
धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुतः ||५४||

कश्यपजी ने उत्तर दिया—प्रिये ! इस व्रत में किसी भी प्राणी को मन, वाणी या क्रिया के द्वारा सताये नहीं, किसीको शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीर के नख और रोएँ न काटे और किसी भी अशुभ वस्तुका स्पर्श न करे ॥ ४७ ॥ जलमें घुसकर स्नान न करे, क्रोध न करे, दुर्जनोंसे बातचीत न करे, बिना धुला वस्त्र न पहने और किसी की पहनी हुई माला न पहने ॥ ४८ ॥ जूठा न खाय, भद्रकाली का प्रसाद या मांसयुक्त अन्नका भोजन न करे। शूद्र का लाया हुआ और रजस्वला का देखा हुआ अन्न भी न खाय और अञ्जलि से जलपान न करे ॥ ४९ ॥ जूठे मुँह, बिना आचमन किये, सन्ध्याके समय, बाल खोले हुए, बिना शृङ्गारके, वाणीका संयम किये बिना और बिना चद्दर ओढ़े घरसे बाहर न निकले ॥ ५० ॥ बिना पैर धोये, अपवित्र अवस्थामें गीले पाँवोंसे, उत्तर या पश्चिम सिर करके, दूसरेके साथ, नग्रावस्थामें तथा सुबह-शाम सोना नहीं चाहिये ॥ ५१ ॥ इस प्रकार इन निषिद्ध कर्मोंका त्याग करके सर्वदा पवित्र रहे, धुला वस्त्र धारण करे और सभी सौभाग्यके चिह्नोंसे सुसज्जित रहे। प्रात:काल कलेवा करनेके पहले ही गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान्‌ नारायणकी पूजा करे ॥ ५२ ॥ इसके बाद पुष्पमाला, चन्दनादि सुगन्धद्रव्य, नैवेद्य और आभूषणादिसे सुहागिनी स्त्रियोंकी पूजा करे तथा पतिकी पूजा करके उसकी सेवामें संलग्र रहे और यह भावना करती रहे कि पतिका तेज मेरी कोखमें स्थित है ॥ ५३ ॥ प्रिये ! इस व्रतका नाम ‘पुंसवन’ है। यदि एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा ॥ ५४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) पुंसवन-व्रतकी विधि एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश ह...