सोमवार, 30 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

श्रीशुक उवाच

तस्यासन् विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत ।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम ॥ १ ॥
स वै बर्हिषि देवेभ्यो भागं प्रत्यक्षमुच्चकैः ।
अददद्यस्य पितरो देवाः सप्रश्रयं नृप ॥ २ ॥
स एव हि ददौ भागं परोक्षमसुरान् प्रति ।
यजमानोऽवहद्भागं मातृस्नेहवशानुगः ॥ ३ ॥
तद्देवहेलनं तस्य धर्मालीकं सुरेश्वरः ।
आलक्ष्य तरसा भीतस्तच्छीर्षाण्यच्छिनद्रुषा ॥ ४ ॥
सोमपीथं तु यत्तस्य शिर आसीत्कपिञ्जलः ।
कलविङ्कः सुरापीथमन्नादं यत्स तित्तिरिः ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! हमने सुना है कि विश्वरूपके तीन सिर थे। वे एक मुँह से सोमरस तथा दूसरे से सुरा पीते थे और तीसरे से अन्न खाते थे ॥ १ ॥ उनके पिता त्वष्टा आदि बारह आदित्य देवता थे, इसलिये वे यज्ञके समय प्रत्यक्षरूपमें ऊँचे स्वरसे बोलकर बड़े विनयके साथ देवताओंको आहुति देते थे ॥ २ ॥ साथ ही वे छिप-छिपकर असुरोंको भी आहुति दिया करते थे। उनकी माता असुर-कुलकी थीं, इसीलिये वे मातृस्नेहके वशीभूत होकर यज्ञ करते समय उस प्रकार असुरोंको भाग पहुँचाया करते थे ॥ ३ ॥ देवराज इन्द्रने देखा कि इस प्रकार वे देवताओंका अपराध और धर्मकी ओटमें कपट कर रहे हैं। इससे इन्द्र डर गये और क्रोधमें भरकर उन्होंने बड़ी फुर्तीसे उनके तीनों सिर काट लिये ॥ ४ ॥ विश्वरूपका सोमरस पीनेवाला सिर पपीहा, सुरापान करनेवाला गौरैया और अन्न खानेवाला तीतर हो गया ॥ ५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

नारायणकवच का उपदेश

श्रीशुक उवाच

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ||४१||
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् || ४२||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जो पुरुष इस नारायणकवच को समय पर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदरसे झुक जाते हैं और वह सब प्रकारके भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४१ ॥ परीक्षित्‌ ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का  उपभोग करने लगे ॥ ४२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारायणधर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः

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रविवार, 29 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

नारायणकवच का उपदेश

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन्द्विजः
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरुधन्वनि ||३८||
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ||३९||
गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्शिराः
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ||४०||

देवराज ! प्राचीन काल की बात है, एक कौशिकगोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरुभूमिमें त्याग दिया ॥ ३८ ॥ जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उस के ऊपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमानपर बैठकर निकले ॥ ३९ ॥ वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमानसहित आकाश से पृथ्वीपर गिर पड़े । इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही। जब उन्हें वालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायणकवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मणदेवता की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को गये ॥४० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

नारायणकवच का उपदेश
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्
विजेष्यसेऽञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ||३५||
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ||३६||
न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ||३७||

देवराज इन्द्र ! मैंने तुम्हें यह नारायणकवच सुना दिया। इस कवचसे तुम अपनेको सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य-यूथपतियोंको जीत लोगे ॥ ३५ ॥ इस नारायणकवच को धारण करनेवाला पुरुष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता अथवा पैरसे छू देता है, वह तत्काल समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत-पिशाचादि और बाघ आदि हिंसक जीवोंसे कभी किसी प्रकारका भय नहीं होता ॥ ३७ ॥ 

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शनिवार, 28 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

नारायणकवच का उपदेश

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ||३१||
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्
भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ||३२||
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान्हरिः
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ||३३||
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः
प्रहापय लोकभयं स्वनेन 
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ||३४||

‘जितना भी कार्य अथवा कारणरूप जगत् है, वह वास्तवमें भगवान्‌ ही हैं’—इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायँ ॥ ३१ ॥ जो लोग ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान्‌ का स्वरूप समस्त विकल्पों—भेदों से रहित है; फिर भी वे अपनी माया-शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं, यह बात निश्चितरूप से सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान्‌ श्रीहरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ॥ ३२-३३ ॥ जो अपने भयङ्कर अट्टहाससे सब लोगोंके भयको भगा देते हैं और अपने तेजसे सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान्‌ नृसिंह दिशा-विदिशा में, नीचे-ऊपर, बाहर- भीतर—सब ओर हमारी रक्षा करें’ ॥ ३४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

नारायणकवच का उपदेश

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव च ||२७||
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपानुकीर्तनात्
प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ||२८||
गरुडो भगवान्स्तोत्र स्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ||२९||
सर्वापद्भ्यो हरेर्नाम रूपयानायुधानि नः
बुद्धीन्द्रि यमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ||३०||

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छलतारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ों वाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हों और जो-जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों—वे सभी भगवान्‌ के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायँ ॥ २७-२८ ॥ बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान्‌ गरुड और विष्वक्सेन जी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें ॥ २९ ॥ श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ॥ ३० ॥

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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

नारायणकवच का उपदेश
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ- 
पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो 
भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ||२५||
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-
मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि
चक्षूंषि चर्मन्छतचन्द्र छादय 
द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ||२६||

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान्‌ श्रीकृष्णके फूँकनेसे भयङ्कर शब्द करके मेरे शत्रुओंका दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियोंको यहाँसे झटपट भगा दीजिये ॥ २५ ॥ भगवान्‌ की प्यारी तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है। आप भगवान्‌की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दीजिये। भगवान्‌ की प्यारी ढाल ! आप में सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं। आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखें बंद कर दीजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ॥ २६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

नारायणकवच का उपदेश

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि 
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम्
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु 
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ||२३||
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे 
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि
कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो 
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ||२४||

‘सुदर्शन ! आपका आकार चक्र (रथके पहिये) की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि  के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान्‌ की प्रेरणासे सब ओर घूमते रहते हैं। जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूसको जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रु-सेनाको शीघ्र-से-शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ॥ २३ ॥ कौमोद की गदा ! आप से छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है। आप भगवान्‌ अजितकी प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ। इसलिये आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहोंको अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओंको चूर-चूर कर दीजिये ॥ २४ ॥ 

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गुरुवार, 26 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

नारायणकवच का उपदेश

मां केशवो गदया प्रातरव्याद्  
गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्र पाणिः ||२०||
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा 
सायं त्रिधामावतु माधवो माम्
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे 
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ||२१||
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः 
प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते 
विश्वेश्वरो भगवान्कालमूर्तिः ||२२||

प्रात:काल भगवान्‌ केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ आनेपर भगवान्‌ गोविन्द अपनी बाँसुरी लेकर, दोपहरके पहले भगवान्‌ नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहरको भगवान्‌ विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ॥ २० ॥ तीसरे पहरमें भगवान्‌ मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें। सायंकालमें ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त  के बाद हृषीकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्धरात्रि के समय अकेले भगवान्‌ पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ॥ २१ ॥ रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान्‌ जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान्‌ विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

नारायणकवच का उपदेश

धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्-  
द्वंद्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् 
बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ||१८||
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्  
बुद्धस्तु पाषण्डगणप्रमादात्
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु 
धर्मावनायोरुकृतावतारः ||१९||

भगवान्‌ धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्रिय भगवान्‌ ऋषभदेव सुख-दु:ख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञभगवान्‌ लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टोंसे और श्रीशेषजी क्रोधवश नामक सर्पों के गण से मेरी रक्षा करें ॥ १८ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें। धर्मरक्षा के लिये महान् अवतार धारण करनेवाले भगवान्‌ कल्कि पापबहुल कलिकालके दोषों से मेरी रक्षा करें ॥ १९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१) विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌...