॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और
अजामिलका परमधामगमन
यथागदं वीर्यतमं उपयुक्तं यदृच्छया ।
अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान् मंत्रोऽप्युदाहृतः ॥ १९ ॥
श्रीशुक उवाच –
ते एवं सुविनिर्णीय धर्मं भागवतं नृप ।
तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन् ॥ २० ॥
जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृतको उसका गुण न जानकर अनजान में पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवाले को अमर बना देता है, वैसे ही अनजान में उच्चारण करनेपर भी भगवान् का नाम [*] अपना फल देकर ही रहता है (वस्तुशक्ति श्रद्धा की अपेक्षा नहीं करती) ॥ १९ ॥
श्रीशुकदेव जी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार भगवान् के पार्षदों ने भागवतधर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया ॥
२०॥
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[*]वस्तु की स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत।
हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृत:। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावक: ।।
‘दुष्टचित्त मनुष्यके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी भगवान् श्रीहरि पापोंको हर लेते हैं। अनजानमें या अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि जलाती ही है।’
शेष आगामी पोस्ट में --