॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०३)
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और
अजामिलका परमधामगमन
न निष्कृतैरुदितैर्ब्रह्मवादिभिः
तथा विशुद्ध्यत्यघवान् व्रतादिभिः ।
यथा हरेर्नामपदैरुदाहृतैः
तदुत्तमश्लोक गुणोपलम्भकम् ॥ ११ ॥
नैकान्तिकं तद्धि कृतेऽपि निष्कृते
मनः पुनर्धावति चेदसत्पथे ।
तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरेः
गुणानुवादः खलु सत्त्वभावनः ॥ १२ ॥
बड़े-बड़े ब्रह्मवादी ऋषियोंने पापोंके बहुत-से प्रायश्चित्त—कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत बतलाये हैं; परंतु उन प्रायश्चित्तोंसे पापीकी वैसी जड़से शुद्धि नहीं होती, जैसी भगवान्के नामोंका, उनसे गुम्फित पदोंका [*] उच्चारण करनेसे होती है। क्योंकि वे नाम पवित्रकीर्ति भगवान्के गुणोंका ज्ञान करानेवाले हैं ॥ ११ ॥ यदि प्रायश्चित्त करनेके बाद भी मन फिरसे कुमार्गमें—पापकी ओर दौड़े, तो वह चरम सीमाका—पूरा-पूरा प्रायश्चित्त नहीं है। इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओंकी जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान्के गुणोंका ही गान करना चाहिये; क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥
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[*] ‘नामपदै:’ कहनेका यह अभिप्राय है कि भगवान्का केवल नाम ‘राम-राम’, ‘कृष्ण-कृष्ण’, ‘हरि-हरि’, ‘नारायण-नारायण’ अन्त:करणकी शुद्धिके लिये—पापोंकी निवृत्तिके लिये पर्याप्त है। ‘नम: नमामि’ इत्यादि क्रिया जोडऩे की भी कोई आवश्यकता नहीं है। नामके साथ बहुवचनका प्रयोग—भगवान् के नाम बहुत-से हैं, किसी का भी सङ्कीर्तन कर ले, इस अभिप्राय से है। एक व्यक्ति सब नामोंका उच्चारण करे, इस अभिप्रायसे नहीं । क्योंकि भगवान् के नाम अनन्त हैं; सब नामों का उच्चारण सम्भव ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् के एक नाम का उच्चारण करनेमात्र से सब पापोंकी निवृत्ति हो जाती है। पूर्ण विश्वास न होने तथा नामोच्चारणके पश्चात् भी पाप करनेके कारण ही उसका अनुभव नहीं होता।
शेष आगामी पोस्ट में --