॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और
अजामिलका परमधामगमन
*नाम-सङ्कीर्तन में देश-काल आदि के नियम भी नहीं हैं | यथा—
न देशकालनियम: शौचाशौचविनिर्णय:। परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते ।।
न देशनियमो राजन्न कालनियमस्तथा। विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने ।।
कालोऽस्ति यज्ञे दाने वा स्नाने कालोऽस्ति सज्जपे। विष्णुसंकीर्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीपते ।।
गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि पिबन्भुञ्जञ्जपंस्तथा। कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्यमुच्यते पापकञ्चुकात् ।।
अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: ।।
‘देश-कालका नियम नहीं है, शौच-अशौच आदिका निर्णय करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। केवल ‘राम-राम’ यह संकीर्तन करनेमात्रसे जीव मुक्त हो जाता है। - - - भगवान् के नाम का संकीर्तन करने में न देश का नियम है और न तो काल का। इसमें कोई सन्देह नहीं। राजन् ! यज्ञ, दान, तीर्थस्नान अथवा विधिपूर्वक जपके लिये शुद्ध कालकी अपेक्षा है, परन्तु भगवन्नामके इस संकीर्तनमें काल-शुद्धिकी कोई आवश्यकता नहीं है। चलते-फिरते, खड़े रहते— सोते, खाते-पीते और जप करते हुए भी ‘कृष्ण-कृष्ण’ ऐसा संकीर्तन करके मनुष्य पाप के केंचुल से छूट जाता है। - - अपवित्र हो या पवित्र—सभी अवस्थाओंमें (चाहे किसी भी अवस्थामें) जो कमलनयन भगवान्का स्मरण करता है, वह बाहर भीतर-पवित्र हो जाता है।’
शेष आगामी पोस्ट में --