॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
स इत्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः ।
गृहान्धकूपान् निष्क्रान्तः सरःपङ्कादिव द्विपः ॥ १५ ॥
कालिन्द्यां विधिवत् स्नात्वा कृतपुण्यजलक्रियः ।
मौनेन संयतप्राणो ब्रह्मपुत्राववन्दत ॥ १६ ॥
अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने ।
भगवान् नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह ॥ १७ ॥
परीक्षित् ! इस प्रकार अङ्गिरा और नारदजीके उपदेशसे विवेकबुद्धि जाग्रत् हो जानेके कारण राजा चित्रकेतु घर-गृहस्थीके अँधेरे कुएँसे उसी प्रकार बाहर निकल पड़े, जैसे कोई हाथी तालाब के कीचड़ से निकल आये ॥ १५ ॥ उन्होंने यमुनाजी में विधिपूर्वक स्नान करके तर्पण आदि धार्मिक क्रियाएँ कीं। तदनन्तर संयतेन्द्रिय और मौन होकर उन्होंने देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिरा के चरणों की वन्दना की ॥ १६ ॥ भगवान् नारद ने देखा कि चित्रकेतु जितेन्द्रिय, भगवद्भक्त और शरणागत हैं। अत: उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उन्हें इस विद्या का उपदेश किया ॥ १७ ॥
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