रविवार, 15 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

श्रीदक्ष उवाच
अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया
असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ||३६||
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम्
विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः ||३७||
एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्धरेः
पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रपः ||३८||
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः
ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ||३९||
नेत्थं पुंसां विरागः स्यात्त्वया केवलिना मृषा
मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ||४०||

दक्षप्रजापतिने कहा—ओ दुष्ट ! तुमने झूठमूठ साधुओं का बाना पहन रखा है। हमारे भोलेभाले बालकोंको भिक्षुकोंका मार्ग दिखाकर तुमने हमारा बड़ा अपकार किया है ॥ ३६ ॥ अभी उन्होंने ब्रह्मचर्यसे ऋषि-ऋण, यज्ञसे देव-ऋण और पुत्रोत्पत्ति से पितृ-ऋण नहीं उतारा था। उन्हें अभी कर्मफलकी नश्वरताके सम्बन्धमें भी कुछ विचार नहीं था। परंतु पापात्मन् ! तुमने उनके दोनों लोकोंका सुख चौपट कर दिया ॥ ३७ ॥ सचमुच तुम्हारे हृदयमें दयाका नाम भी नहीं है। तुम इस प्रकार बच्चोंकी बुद्धि बिगाड़ते फिरते हो। तुमने भगवान्‌के पार्षदोंमें रहकर उनकी कीर्तिमें कलङ्क ही लगाया। सचमुच तुम बड़े निर्लज्ज हो ॥ ३८ ॥ मैं जानता हूँ कि भगवान्‌के पार्षद सदा-सर्वदा दुखी प्राणियोंपर दया करनेके लिये व्यग्र रहते हैं। परंतु तुम प्रेमभावका विनाश करनेवाले हो। तुम उन लोगोंसे भी वैर करते हो, जो किसीसे वैर नहीं करते ॥ ३९ ॥ यदि तुम ऐसा समझते हो कि वैराग्यसे ही स्नेहपाश—विषयासक्तिका बन्धन कट सकता है, तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है; क्योंकि तुम्हारे जैसे झूठमूठ वैराग्यका स्वाँग भरनेवालोंसे किसीको वैराग्य नहीं हो सकता ॥ ४० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

इति तानपि राजेन्द्र प्रजासर्गधियो मुनिः
उपेत्य नारदः प्राह वाचः कूटानि पूर्ववत् ||२९||
दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम
अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः ||३०||
भ्रातॄणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित्
स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ||३१||
एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः
तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष ||३२||
सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः
नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ||३३||
एतस्मिन्काल उत्पातान्बहून्पश्यन्प्रजापतिः
पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ||३४||
चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः
देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ||३५||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहले के समान ही कूट वचन कहे ॥२९॥ उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापति के पुत्रो ! मैं तुमलोगों को जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्ग का अनुसन्धान करो ॥ ३० ॥ जो धर्मज्ञ भाई अपने बड़े भाइयों के श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करता है, वही सच्चा भाई है ! वह पुण्यवान् पुरुष परलोक में मरुद्गणों के साथ आनन्द भोगता है ॥ ३१ ॥ परीक्षित्‌ ! शबलाश्वों को इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगों ने भी अपने भाइयों के मार्ग का ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजी का दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ३२ ॥ वे उस पथ के पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही ॥ ३३ ॥
दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत-से अशकुन हो रहे हैं। उनके चित्तमें पुत्रोंके अनिष्टकी आशङ्का हो आयी। इतनेमें ही उन्हें मालूम हुआ कि पहलेकी भाँति अबकी बार भी नारदजीने मेरे पुत्रों को चौपट कर दिया ॥ ३४ ॥ उन्हें अपने पुत्रोंकी  कर्तव्यच्युति से बड़ा शोक हुआ और वे नारदजीपर बड़े क्रोधित हुए उनके मिलने पर क्रोध के मारे दक्षप्रजापति के होठ फडक़ने लगे और वे आवेश में भरकर नारदजी से बोले ॥ ३५ ॥

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शनिवार, 14 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम्
अन्वतप्यत कः शोचन्सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ||२३||
स भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः
पुत्रानजनयद्दक्षः सवलाश्वान्सहस्रिणः ||२४||
ते च पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः
नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ||२५||
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः
जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तत्र महत्तपः ||२६||
अब्भक्षाः कतिचिन्मासान्कतिचिद्वायुभोजनाः
आराधयन्मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ||२७||
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने
विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ||२८||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! जब दक्षप्रजापतिको  मालूम हुआ कि मेरे शीलवान् पुत्र नारद के उपदेशसे कर्तव्यच्युत हो गये हैं, तब वे शोक से व्याकुल हो गये। उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। सचमुच अच्छी सन्तानका होना भी शोकका ही कारण है ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी ने दक्षप्रजापति को बड़ी सान्त्वना दी। तब उन्होंने पञ्चजन-नन्दिनी असिक्री के गर्भ से एक हजार पुत्र और उत्पन्न किये । उनका नाम था शबलाश्व ॥ २४ ॥ वे भी अपने पिता दक्षप्रजापति की आज्ञा पाकर प्रजासृष्टि के उद्देश्य से तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवर पर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयों ने सिद्धि प्राप्त की थी ॥ २५ ॥ शबलाश्वों ने वहाँ जाकर उस सरोवर में स्नान किया। स्नानमात्रसे ही उनके अन्त:करणके सारे मल धुल गये। अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये ॥ २६ ॥ कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओङ्कारस्वरूप भगवान्‌ नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’ —इस मन्त्र[*] का अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्‌ की आराधना की ॥ २७-२८ ॥ 
.............................................
[*] ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने। विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ।।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत्
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१९||
शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम्
कथं तदनुरूपाय गुणविस्रम्भ्युपक्रमेत् ||२०||
इति व्यवसिता राजन्हर्यश्वा एकचेतसः
प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ||२१||
स्वरब्रह्मणि निर्भात हृषीकेशपदाम्बुजे
अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ||२२||

यह काल ही एक चक्र है। यह निरन्तर घूमता रहता है। इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत् को अपनी ओर खींच रहा है। इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है। यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा ? ॥ १९ ॥ शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्रके  द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मों में लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है। इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयों पर विश्वास कर लेता है। अब वह कर्मों से निवृत्त होने की आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है ?’ ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! हर्यश्वों ने एक मत से यही निश्चय किया और नारदजी की परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथ के पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता ॥ २१ ॥ इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्म में—संगीतलहरी में अभिव्यक्त हुए, भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों में अपने चित्त को अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक- लोकान्तरों में विचरने लगे ॥ २२ ॥

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शुक्रवार, 13 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत्
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१५||
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम्
मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१६||
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणः
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१७||
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम्
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१८

यह बुद्धि ही कुलटा स्त्री के समान है। इसके सङ्गसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी ? ॥ १५ ॥ माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ॥ १६ ॥ ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर हैं। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत् का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ॥ १७ ॥ भगवान्‌का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडक़ो अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंस का आश्रय छोडक़र उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है ? ॥ १८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप 

श्रीशुक उवाच 
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया
 वाचः कूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ||१०|| 
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् 
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||११|| 
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान्स्वाश्रयः परः 
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१२|| 
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्गं गतो यथा 
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१३|| 
नानारूपात्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता 
तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१४|| 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे— ॥ १० ॥ ‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिङ्गशरीर ही, जिसे साधारणत: जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है? ॥ ११ ॥ सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियों से भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परंतु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान्‌ हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्‌के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ॥ १२ ॥ जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तज्र्योति:स्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ॥ १३ ॥ यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है। इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना— विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिको अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है ? ॥ १४ ॥

 शेष आगामी पोस्ट में --
 गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 12 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ 

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
 
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः 
धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ||४|| 
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः 
प्रजाविवृद्धये यत्तान्देवर्षिस्तान्ददर्श ह ||५|| 
उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः 
अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ||६||
 तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम् 
बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ||७|| 
नदीमुभयतो वाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् 
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ||८||
 कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः 
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ||९|| 

नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्त:करण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—‘अरे हर्यश्वो ! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुम लोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ॥ ४—६ ॥ देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्याभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?’ ॥ ७—९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में -- 
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

श्रीशुक उवाच

तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभुः ||१||
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप
पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ||२||
तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः
सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ||३||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के शक्तिसञ्चारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पञ्चजनकी पुत्री असिक्री से हर्यश्व नाम के दस हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥ राजन् ! दक्षके ये सभी पुत्र एक आचरण और एक स्वभावके थे। जब उनके पिता दक्षने उन्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी, तब वे तपस्या करनेके विचारसे पश्चिम दिशाकी ओर गये ॥ २ ॥ पश्चिम दिशामें सिन्धुनदी और समुद्रके सङ्गम पर नारायण-सर नाम का एक महान् तीर्थ है। बड़े-बड़े मुनि और सिद्ध पुरुष वहाँ निवास करते हैं ॥ ३ ॥ 

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बुधवार, 11 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१२)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः
यदासीत्तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ||४८||
स वै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः
मेने खिलमिवात्मानमुद्यतः स्वर्गकर्मणि ||४९||
अथ मेऽभिहितो देवस्तपोऽतप्यत दारुणम्
नव विश्वसृजो युष्मान्येनादावसृजद्विभुः ||५०||
एषा पञ्चजनस्याङ्ग दुहिता वै प्रजापतेः
असिक्नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम् ||५१||
मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः
मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ||५२||
त्वत्तोऽधस्तात्प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया
मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम् ||५३||

श्रीशुक उवाच

इत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान्विश्वभावनः
स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरिः ||५४||

(श्रीभगवान्‌ जह रहे हैं) प्रिय दक्ष ! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ ४८ ॥ जब मैंने उनमें शक्ति और चेतनाका सञ्चार किया तब देवशिरोमणि ब्रह्मा सृष्टि करनेके लिये उद्यत हुए। परंतु उन्होंने अपनेको सृष्टिकार्यमें असमर्थ-सा पाया ॥ ४९ ॥ उस समय मैंने उन्हें आज्ञा दी कि तप करो। तब उन्होंने घोर तपस्या की और उस तपस्याके प्रभावसे पहले-पहल तुम नौ प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥ प्रिय दक्ष ! देखो, यह पञ्चजन प्रजापतिकी कन्या असिक्री है। इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ५१ ॥ अब तुम गृहस्थोचित स्त्रीसहवासरूप धर्मको स्वीकार करो। यह असिक्री भी उसी धर्मको स्वीकार करेगी। तब तुम इसके द्वारा बहुत-सी प्रजा उत्पन्न कर सकोगे ॥ ५२ ॥ प्रजापते ! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परंतु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी माया से स्त्री-पुरुष के संयोग से ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवा में तत्पर रहेगी ॥ ५३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—विश्वके जीवनदाता भगवान्‌ श्रीहरि यह कहकर दक्ष के सामने ही इस प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे स्वप्न में देखी हुई वस्तु स्वप्न टूटते ही लुप्त हो जाती है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट११)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

श्रीभगवानुवाच

प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान्
यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः ||४३||
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः
ममैष कामो भूतानां यद्भूयासुर्विभूतयः ||४४||
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः
विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ||४५||
तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाकृतिः
अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः ||४६||
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत्किञ्चान्तरं बहिः
संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ||४७||

श्रीभगवान्‌ ने कहा—परम भाग्यवान् दक्ष ! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी, क्योंकि मुझपर श्रद्धा करनेसे तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति परम प्रेमभावका उदय हो गया है ॥ ४३ ॥ प्रजापते ! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत् के  समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों ॥ ४४ ॥ ब्रह्मा, शङ्कर, तुम्हारे जैसे प्रजापति, स्वायम्भुव आदि मनु तथा इन्द्रादि देवेश्वर—ये सब मेरी विभूतियाँ हैं और सभी प्राणियोंकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मन् ! तपस्या मेरा हृदय है, विद्या शरीर है, कर्म आकृति है, यज्ञ अङ्ग हैं, धर्म मन है और देवता प्राण हैं ॥ ४६ ॥ जब यह सृष्टि नहीं थी, तब केवल मैं ही था और वह भी निष्क्रियरूपमें। बाहर- भीतर कहीं भी और कुछ न था। न तो कोई द्रष्टा था और न दृश्य। मैं केवल ज्ञानस्वरूप और अव्यक्त था। ऐसा समझ लो, मानो सब ओर सुषुप्ति-ही-सुषुप्ति छा रही हो ॥ ४७ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

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