सोमवार, 4 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः 
     स्वस्थामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः । 
प्रवृद्धभक्त्या प्रणयाश्रुलोचनः 
     प्रहृष्टरोमानमदादिपुरुषम् ॥ ३१ ॥
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं 
     प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहुः । 
प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो 
     नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम् ॥ ३२ ॥
ततः समाधाय मनो मनीषया 
     बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ । 
नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं 
     जगद्‍गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम् ॥ ३३ ॥

भगवान्‌ शेष का दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतु के सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्त:करण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदय में भक्तिभाव की बाढ़ आ गयी। नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक आये। शरीर का एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थिति में आदिपुरुष भगवान्‌ शेषको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥ उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान्‌ शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्‌की कुछ भी स्तुति न कर सके ॥ ३२ ॥ थोड़ी देर बाद उन्हें बोलनेकी कुछ-कुछ शक्ति प्राप्त हुई। उन्होंने विवेकबुद्धि से मन को समाहित किया और सम्पूर्ण इन्द्रियों की बाह्यवृत्ति को रोका। फिर उन जगद्गुरु की, जिनके स्वरूप का पाञ्चरात्र आदि भक्तिशास्त्रों में वर्णन किया गया है, इस प्रकार स्तुति की ॥ ३३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारदः । 
ययावङ्‌गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो ॥ २६ ॥
चित्रकेतुस्तु विद्यां तां यथा नारदभाषिताम् । 
धारयामास सप्ताहं अब्भक्षः सुसमाहितः ॥ २७ ॥
ततः स सप्तरात्रान्ते विद्यया धार्यमाणया । 
विद्याधराधिपत्यं च लेभेऽप्रतिहतं नृप ॥ २८ ॥
ततः कतिपयाहोभिः विद्ययेद्धमनोगतिः । 
जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥
मृणालगौरं शितिवाससं स्फुरत् 
     किरीटकेयूरकटित्रकङ्‌कणम् । 
प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनं वृतं 
     ददर्श सिद्धेश्वरमण्डलैः प्रभुम् ॥ ३० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! देवर्षि नारद अपने शरणागत भक्त चित्रकेतुको इस विद्याका उपदेश करके महर्षि अङ्गिराके साथ ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २६ ॥ राजा चित्रकेतुने देवर्षि नारदके द्वारा उपदिष्ट विद्याका उनके आज्ञानुसार सात दिनतक केवल जल पीकर बड़ी एकाग्रताके साथ अनुष्ठान किया ॥ २७ ॥ तदनन्तर उस विद्याके अनुष्ठानसे सात रातके पश्चात् राजा चित्रकेतुको विद्याधरोंका अखण्ड आधिपत्य प्राप्त हुआ ॥ २८ ॥ इसके बाद कुछ ही दिनोंमें इस विद्याके प्रभावसे उनका मन और भी शुद्ध हो गया। अब वे देवाधिदेव भगवान्‌ शेषजीके चरणोंके समीप पहुँच गये ॥ २९ ॥ उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शेषजी सिद्धेश्वरोंके मण्डलमें विराजमान हैं। उनका शरीर कमलनालके समान गौरवर्ण है। उसपर नीले रंगका वस्त्र फहरा रहा है। सिरपर किरीट, बाँहोंमें बाजूबंद, कमरमें करधनी और कलाईमें कंगन आदि आभूषण चमक रहे हैं। नेत्र रतनारे हैं और मुखपर प्रसन्नता छा रही है ॥ ३० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 3 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । 
मृण्मयेष्विव मृज्जातिः तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥
यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः । 
अन्तर्बहिश्च विततं व्योमवत् तन्नतोऽस्म्यहम् ॥ २३ ॥
देहेन्द्रियप्राणमनोधियोऽमी 
     यदंशविद्धाः प्रचरन्ति कर्मसु । 
नैवान्यदा लौहमिवाप्रतप्तं 
     स्थानेषु तद्द्रष्ट्रपदेशमेति ॥ २४ ॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय 
महाविभूतिपतये सकलसात्वत परिवृढनिकर 
करकमल कुड्मलोपलालित 
चरणारविन्दयुगल परमपरमेष्ठिन् नमस्ते ॥ २५ ॥ 

यह कार्य-कारणरूप जगत् जिनसे उत्पन्न होता है, जिनमें स्थित है और जिनमें लीन होता है तथा जो मिट्टीकी वस्तुओं में व्याप्त मृत्तिका के समान सबमें ओत-प्रोत हैं—उन परब्रह्मस्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २२ ॥ यद्यपि आप आकाशके समान बाहर-भीतर एकरस व्याप्त हैं, तथापि आपको मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी ज्ञानशक्तिसे नहीं जान सकतीं और प्राण तथा कर्मेन्द्रियाँ अपनी क्रियारूप शक्तिसे स्पर्श भी नहीं कर सकतीं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ २३ ॥ शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्थाओंमें आपके चैतन्यांशसे युक्त होकर ही अपना-अपना काम करते हैं तथा सुषुप्ति और मूर्छा की अवस्थाओंमें आपके चैतन्यांशसे युक्त न होनेके कारण अपना-अपना काम करनेमें असमर्थ हो जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे लोहा अग्रिसे तप्त होनेपर जला सकता है, अन्यथा नहीं। जिसे ‘द्रष्टा’ कहते हैं, वह भी आपका ही एक नाम है; जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें आप उसे स्वीकार कर लेते हैं। वास्तवमें आपसे पृथक् उनका कोई अस्तित्व नहीं है ॥ २४ ॥ ॐकारस्वरूप महाप्रभावशाली महाविभूतिपति भगवान्‌ महापुरुषको नमस्कार है। श्रेष्ठ भक्तोंका समुदाय अपने करकमलोंकी कलियोंसे आपके युगल चरणकमलोंकी सेवामें संलग्न रहता है। प्रभो ! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ’ ॥ २५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि । 
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्‌कर्षणाय च ॥ १८ ॥
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये । 
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ॥ १९ ॥
आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नमः । 
हृषीकेशाय महते नमस्ते विश्वमूर्तये ॥ २० ॥
वचस्युपरतेऽप्राप्य य एको मनसा सह । 
अनामरूपश्चिन्मात्रः सोऽव्यान्नः सदसत्परः ॥ २१ ॥

(देवर्षि नारदने यों उपदेश किया—) ‘ॐकारस्वरूप भगवन् ! आप वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और सङ्कर्षणके रूपमें क्रमश: चित्त, बुद्धि, मन और अहंकारके अधिष्ठाता हैं। मैं आपके इस चतुर्व्यूहरूप का बार-बार नमस्कारपूर्वक ध्यान करता हूँ ॥ १८ ॥ आप विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हैं। आपकी मूर्ति परमानन्दमयी है। आप अपने स्वरूपभूत आनन्दमें ही मग्र और परम शान्त हैं। द्वैतदृष्टि आपको छूतक नहीं सकती। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १९ ॥ अपने स्वरूपभूत आनन्दकी अनुभूतिसे ही आपने मायाजनित राग-द्वेष आदि दोषोंका तिरस्कार कर रखा है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सबकी समस्त इन्द्रियोंके प्रेरक, परम महान् और विराट्स्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥ मनसहित वाणी आपतक न पहुँचकर बीच से ही लौट आती है। उसके उपरत हो जानेपर जो अद्वितीय, नाम-रूपरहित, चेतनमात्र और कार्य-कारण से परे की वस्तु रह जाती है—वह हमारी रक्षा करे ॥ २१ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 2 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

स इत्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः । 
गृहान्धकूपान् निष्क्रान्तः सरःपङ्‌कादिव द्विपः ॥ १५ ॥
कालिन्द्यां विधिवत् स्नात्वा कृतपुण्यजलक्रियः । 
मौनेन संयतप्राणो ब्रह्मपुत्राववन्दत ॥ १६ ॥
अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने । 
भगवान् नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह ॥ १७ ॥

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार अङ्गिरा और नारदजीके उपदेशसे विवेकबुद्धि जाग्रत् हो जानेके कारण राजा चित्रकेतु घर-गृहस्थीके अँधेरे कुएँसे उसी प्रकार बाहर निकल पड़े, जैसे कोई हाथी तालाब के कीचड़ से निकल आये ॥ १५ ॥ उन्होंने यमुनाजी में विधिपूर्वक स्नान करके तर्पण आदि धार्मिक क्रियाएँ कीं। तदनन्तर संयतेन्द्रिय और मौन होकर उन्होंने देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिरा के चरणों की वन्दना की ॥ १६ ॥ भगवान्‌ नारद ने देखा कि चित्रकेतु जितेन्द्रिय, भगवद्भक्त और शरणागत हैं। अत: उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उन्हें इस विद्या का उपदेश किया ॥ १७ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

इत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा । 
विस्मिता मुमुचुः शोकं छित्त्वात्म स्नेहश्रृङ्‌खलाम् ॥ १२ ॥
निर्हृत्य ज्ञातयो ज्ञातेः देहं कृत्वोचिताः क्रियाः । 
तत्यजुर्दुस्त्यजं स्नेहं शोकमोहभयार्तिदम् ॥ १३ ॥
बालघ्न्यो व्रीडितास्तत्र बालहत्याहतप्रभाः । 
बालहत्याव्रतं चेरुः ब्राह्मणैः यन्निरूपितम् । 
यमुनायां महाराज स्मरन्त्यो द्विजभाषितम् ॥ १४ ॥ 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—वह जीवात्मा इस प्रकार कहकर चला गया। उसके सगे-सम्बन्धी उसकी बात सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। उनका स्नेह-बन्धन कट गया और उसके मरनेका शोक भी जाता रहा ॥ १२ ॥ इसके बाद जातिवालों ने बालक की मृत देह को ले जाकर तत्कालोचित संस्कार और और्ध्वदैहिक क्रियाएँ पूर्ण कीं और उस दुस्त्यज स्नेह को छोड़ दिया, जिसके कारण शोक, मोह, भय और दु:खकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥ परीक्षित्‌ ! जिन रानियों ने बच्चे को विष दिया था, वे बालहत्याके कारण श्रीहीन हो गयी थीं और लज्जा के मारे आँख तक नहीं उठा सकती थीं। उन्होंने अङ्गिरा ऋषिके उपदेश को याद करके (मात्सर्यहीन हो) यमुनाजीके तटपर ब्राह्मणोंके आदेशानुसार बालहत्याका प्रायश्चित्त किया ॥ १४ ॥  

शेष आगामी पोस्ट में --
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शुक्रवार, 1 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

एवं योनिगतो जीवः स नित्यो निरहङ्‌कृतः । 
यावद् यत्रोपलभ्येत तावत् स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८ ॥
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक् । 
आत्ममायागुणैर्विश्वं आत्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । 
एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्तॄणां गुणदोषयोः ॥ १० ॥
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् । 
उदासीनवदासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥

जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भ में आकर जबतक जिस शरीर में रहता है, तभीतक उस शरीरको अपना समझता है ॥ ८ ॥ यह जीव नित्य, अविनाशी, सूक्ष्म (जन्मादिरहित), सबका आश्रय और स्वयंप्रकाश है। इसमें स्वरूपत: जन्म-मृत्यु आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी यह ईश्वररूप होनेके कारण अपनी मायाके गुणोंसे ही अपने-आपको विश्वके रूपमें प्रकट कर देता है ॥ ९ ॥ इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्न-भिन्न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है ॥ १० ॥ यह आत्मा कार्य-कारणका साक्षी और स्वतन्त्र है। इसलिये यह शरीर आदिके गुण-दोष अथवा कर्मफलको ग्रहण नहीं करता, सदा उदासीन भावसे स्थित रहता है ॥ ११ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 
अथ देवऋषी राजन् संपरेतं नृपात्मजम् । 
दर्शयित्वेति होवाच ज्ञातीनां अनुशोचताम् ॥ १ ॥

श्रीनारद उवाच - 
जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते । 
सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम् ॥ २ ॥
कलेवरं स्वमाविश्य शेषमायुः सुहृद्‌वृतः । 
भुङ्‌क्ष्व भोगान् पितृप्रत्तान् अधितिष्ठ नृपासनम् ॥ ३ ॥

जीव उवाच - 
कस्मिन् जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन् । 
कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्‌नृयोनिषु ॥ ४ ॥
बन्धुज्ञात्यरिमध्यस्थ मित्रोदासीनविद्विषः । 
सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथः ॥ ५ ॥
यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः । 
पर्यटन्ति नरेष्वेवं जीवो योनिषु कर्तृषु ॥ ६ ॥
नित्यस्यार्थस्य सम्बन्धो ह्यनित्यो दृश्यते नृषु । 
यावद्यस्य हि सम्बन्धो ममत्वं तावदेव हि ॥ ७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! तदनन्तर देवर्षि नारद ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के सामने प्रत्यक्ष बुलाकर कहा ॥ १ ॥
देवर्षि नारदने कहा—जीवात्मन् ! तुम्हारा कल्याण हो। देखो, तुम्हारे माता-पिता, सुहृद्-सम्बन्धी तुम्हारे वियोग से अत्यन्त शोकाकुल हो रहे हैं ॥ २ ॥ इसलिये तुम अपने शरीर में आ जाओ और शेष आयु अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ ही रहकर व्यतीत करो। अपने पिता के दिये हुए भोगों को भोगो और राजसिंहासन पर बैठो ॥ ३ ॥
जीवात्मा ने कहा—देवर्षिजी ! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियोंमें न जाने कितने जन्मों से भटक रहा हूँ। उनमेंसे ये लोग किस जन्म में मेरे माता-पिता हुए ? ॥ ४ ॥ विभिन्न जन्मों में सभी एक-दूसरे के भाई-बन्धु, नाती-गोती, शत्रु-मित्र, मध्यस्थ, उदासीन और द्वेषी होते रहते हैं ॥ ५ ॥ जैसे सुवर्ण आदि क्रय-विक्रय की वस्तुएँ एक व्यापारी से दूसरेके पास जाती-आती रहती हैं, वैसे ही जीव भी भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न होता रहता है ॥ ६ ॥ इस प्रकार विचार करनेसे पता लगता है कि मनुष्यों की अपेक्षा अधिक दिन ठहरने वाले सुवर्ण आदि पदार्थों का सम्बन्ध भी मनुष्योंके साथ स्थायी नहीं, क्षणिक ही होता है; और जबतक जिसका जिस वस्तुसे सम्बन्ध रहता है, तभीतक उसकी उस वस्तुसे ममता भी रहती है ॥ ७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः । 
गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २३ ॥
दृश्यमाना विनार्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः । 
कर्मभिर्ध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २४ ॥
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः । 
देहिनो विविधक्लेश सन्तापकृदुदाहृतः ॥ २५ ॥
तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः । 
द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ २६ ॥

श्रीनारद उवाच - 
एतां मन्त्रोपनिषदं प्रतीच्छ प्रयतो मम । 
यां धारयन् सप्तरात्राद् द्रष्टा सङ्‌कर्षणं प्रभुम् ॥ २७ ॥
यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे 
     शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य । 
सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं
     प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ २८ ॥ 

शूरसेन ! अतएव ये सभी शोक, मोह, भय और दु:ख के कारण हैं, मन के खेल-खिलौने हैं, सर्वथा कल्पित और मिथ्या हैं; क्योंकि ये न होने पर भी दिखायी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि ये एक क्षण दीखने पर भी दूसरे क्षण लुप्त हो जाते हैं । ये गन्धर्वनगर, स्वप्न, जादू और मनोरथ की वस्तुओं के समान सर्वथा असत्य हैं । जो लोग कर्म-वासनाओं से प्रेरित होकर विषयों का चिन्तन करते रहते हैं; उन्हीं का मन अनेक प्रकार के कर्मों की सृष्टि करता है ॥ २३-२४ ॥ जीवात्मा का यह देह—जो पञ्चभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों का संघात है—जीव को विविध प्रकार के क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है ॥ २५ ॥ इसलिये तुम अपने मन को विषयों में भटकने से रोककर शान्त करो, स्वस्थ करो और फिर उस मनके द्वारा अपने वास्तविक स्वरूपका विचार करो तथा इस द्वैत-भ्रममें नित्यत्वकी बुद्धि छोडक़र परम शान्तिस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाओ ॥ २६ ॥
देवर्षि नारदने कहा—राजन् ! तुम एकाग्रचित्त से मुझसे यह मन्त्रोपनिषद् ग्रहण करो। इसे धारण करनेसे सात रातमें ही तुम्हें भगवान्‌ सङ्कर्षणका दर्शन होगा ॥ २७ ॥ नरेन्द्र ! प्राचीन कालमें भगवान्‌ शङ्कर आदि ने श्रीसङ्कर्षणदेव के ही चरणकमलों का आश्रय लिया था । इससे उन्होंने द्वैत- भ्रम का परित्याग कर दिया और उनकी उस महिमा को प्राप्त हुए, जिससे बढक़र तो कोई है ही नहीं, समान भी नहीं है। तुम भी बहुत शीघ्र ही भगवान्‌ के उसी परमपद को प्राप्त कर लोगे ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुसान्त्वनं नाम पञ्चदशोऽध्या‍यः ॥ १५ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

श्रीअङ्‌गिरा उवाच - 

अहं ते पुत्रकामस्य पुत्रदोऽस्म्यङ्‌गिरा नृप । 
एष ब्रह्मसुतः साक्षात् नारदो भगवान् ऋषिः ॥ १७ ॥
इत्थं त्वां पुत्रशोकेन मग्नं तमसि दुस्तरे । 
अतदर्हमनुस्मृत्य महापुरुषगोचरम् ॥ १८ ॥
अनुग्रहाय भवतः प्राप्तौ आवां इह प्रभो । 
ब्रह्मण्यो भगवद्‍भक्तो नावसीदितुमर्हसि ॥ १९ ॥
तदैव ते परं ज्ञानं ददामि गृहमागतः । 
ज्ञात्वान्याभिनिवेशं ते पुत्रमेव ददावहम् ॥ २० ॥
अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । 
एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २१ ॥
शब्दादयश्च विषयाः चला राज्यविभूतयः । 
मही राज्यं बलं कोशो भृत्यामात्याः सुहृज्जनाः ॥ २२ ॥

महर्षि अङ्गिराने कहा—राजन् ! जिस समय तुम पुत्रके लिये बहुत लालायित थे, तब मैंने ही तुम्हें पुत्र दिया था। मैं अङ्गिरा हूँ। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, स्वयं ब्रह्माजीके पुत्र सर्वसमर्थ देवर्षि नारद हैं ॥ १७ ॥ जब हमलोगोंने देखा कि तुम पुत्रशोकके कारण बहुत ही घने अज्ञानान्धकारमें डूब रहे हो, तब सोचा कि तुम भगवान्‌के भक्त हो, शोक करनेयोग्य नहीं हो। अत: तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही हम दोनों यहाँ आये हैं। राजन् ! सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान्‌ और ब्राह्मणोंका भक्त है, उसे किसी अवस्थामें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परंतु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया ॥ २० ॥ अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो कि पुत्रवानोंको कितना दु:ख होता है। यही बात स्त्री, घर, धन, विविध प्रकार के ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ, शब्द-रूप-रस आदि विषय, राज्यवैभव, पृथ्वी, राज्य, सेना, खजाना, सेवक, अमात्य, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सब के लिये है; क्योंकि ये सब-के-सब अनित्य हैं ॥ २१-२२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८) चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन तद्दर्...