शनिवार, 16 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते
यत्र भागवतः श्रीमान्प्रह्रादो बलिरेव च ||१०||
दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ||११||
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुरः सुतान् ||१२||
संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं प्रह्लादमेव च
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ||१३||
शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम्
संह्रादस्य कृतिर्भार्या सूत पञ्चजनं ततः ||१४||

प्रिय परीक्षित्‌! अब मैं कश्यपजी की दूसरी पत्नी दिति से उत्पन्न होनेवाली उस सन्तान- परम्परा का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लाद जी और बलि का जन्म हुआ ॥१०॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें (तीसरे स्कन्धमें) सुना चुका हूँ ॥ ११ ॥ हिरण्यकशिपु की पत्नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भ ने उसका विवाह हिरण्यकशिपु से कर दिया था। कयाधु के चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्लाद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानव से हुआ। उससे राहु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥ १२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपान के समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ ने चक्र से काट लिया था। संह्रादकी पत्नी थी कृति। उससे पञ्चजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

पौलोम्यामिन्द्र आधत्त त्रीन्पुत्रानिति नः श्रुतम्
जयन्तमृषभं तात तृतीयं मीढुषं प्रभुः ||७||
उरुक्रमस्य देवस्य मायावामनरूपिणः
कीर्तौ पत्न्यां बृहच्छ्लोकस्तस्यासन्सौभगादयः ||८||
तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मनः
पश्चाद्वक्ष्यामहेऽदित्यां यथैवावततार ह ||९||

प्रिय परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र की पत्नी थीं पुलोमनन्दिनी शची। उनसे, हमने सुना है, उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किये—जयन्त, ऋषभ और मीढ्वान् ॥ ७ ॥ स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही(बलिपर अनुग्रह करने और इन्द्र का राज्य लौटानेके लिये) मायासे वामन (उपेन्द्र) के रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने तीन पग पृथ्वी माँगकर तीनों लोक नाप लिये थे। उनकी पत्नीका नाम था कीर्ति। उससे बृहच्छ्लोक नाम का पुत्र हुआ। उसके सौभग आदि कई सन्तानें हुर्ईं ॥ ८ ॥ कश्यपनन्दन भगवान्‌ वामन ने माता अदिति के गर्भ से क्यों जन्म लिया और इस अवतार में उन्होंने कौन-से गुण, लीलाएँ और पराक्रम प्रकट किये—इसका वर्णन मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) करूँगा ॥ ९ ॥

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शुक्रवार, 15 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीशुक उवाच

पृश्निस्तु पत्नी सवितुः सावित्रीं व्याहृतिं त्रयीम्
अग्निहोत्रं पशुं सोमं चातुर्मास्यं महामखान् ||१||
सिद्धिर्भगस्य भार्याङ्ग महिमानं विभुं प्रभुम्
आशिषं च वरारोहां कन्यां प्रासूत सुव्रताम् ||२||
धातुः कुहूः सिनीवाली राका चानुमतिस्तथा
सायं दर्शमथ प्रातः पूर्णमासमनुक्रमात् ||३||
अग्नीन्पुरीष्यानाधत्त क्रियायां समनन्तरः
चर्षणी वरुणस्यासीद्यस्यां जातो भृगुः पुनः ||४||
वाल्मीकिश्च महायोगी वल्मीकादभवत्किल
अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च मित्रावरुणयोर्ऋषी|| ५||
रेतः सिषिचतुः कुम्भे उर्वश्याः सन्निधौ द्रुतम्
रेवत्यां मित्र उत्सर्गमरिष्टं पिप्पलं व्यधात् ||६||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! सविता की पत्नी पृश्नि के गर्भ से आठ सन्तानें हुर्ईं—सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य और पञ्चमहायज्ञ ॥ १ ॥ भग की पत्नी सिद्धि ने महिमा, विभु और प्रभु—ये तीन पुत्र और आशिष् नाम की एक कन्या उत्पन्न की। यह कन्या बड़ी सुन्दरी और सदाचारिणी थी ॥ २ ॥ धाता की चार पत्नियाँ थीं—कुहू, सिनीवाली, राका और अनुमति। उनसे क्रमश: सायं, दर्श, प्रात: और पूर्णमास—ये चार पुत्र हुए ॥ ३ ॥ धाता के छोटे भाई का नाम था—विधाता, उनकी पत्नी क्रिया थी। उससे पुरीष्य नाम के पाँच अग्नियों की उत्पत्ति हुई। वरुण जी की पत्नी का नाम चर्षणी था। उससे भृगुजीने पुन: जन्म ग्रहण किया। इसके पहले वे ब्रह्माजी के पुत्र थे ॥ ४ ॥ महायोगी वाल्मीकि जी भी वरुण के पुत्र थे। वल्मीक से पैदा होनेके कारण ही उनका नाम वाल्मीकि पड़ गया था। उर्वशी को देखकर मित्र और वरुण दोनों का वीर्य स्खलित हो गया था। उसे उन लोगों ने घड़े में रख दिया। उसीसे मुनिवर अगस्त्य और वसिष्ठजी का जन्म हुआ। मित्र की पत्नी थी रेवती। उसके तीन पुत्र हुए—उत्सर्ग, अरिष्ट और पिप्पल ॥ ५-६ ॥ 

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गुरुवार, 14 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच - 

इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम् । 
बभूव शान्तधी राजन् देवी विगतविस्मया ॥ ३६ ॥
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । 
मूर्ध्ना स जगृहे शापं एतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥
जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः । 
वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ३८ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । 
वृत्रस्यासुरजातेश्च कारणं भगवन्मतेः ॥ ३९ ॥
इतिहासं इमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मनः । 
माहात्म्यं विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद् विमुच्यते ॥ ४० ॥
य एतत् प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यतः पठेत् । 
इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥ ४१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ शङ्कर का यह भाषण सुनकर भगवती पार्वती की चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा ॥ ३६ ॥ भगवान्‌ के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वती को बदले में शाप दे सकते थे, परंतु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया ! यही साधु पुरुषका लक्षण है ॥ ३७ ॥ यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्रिसे पैदा हुए। वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत्स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे ॥ ३८ ॥ तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों हुआ और उसे भगवान्‌की ऐसी भक्ति कैसे प्राप्त हुई। उसका पूरा-पूरा विवरण मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ ३९ ॥ महात्मा चित्रकेतुका यह पवित्र इतिहास केवल उनका ही नहीं, समस्त विष्णुभक्तोंका माहात्म्य है; इसे जो सुनता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥ जो पुरुष प्रात:काल उठकर मौन रहकर श्रद्धा के साथ भगवान्‌ का स्मरण करते हुए इस इतिहासका पाठ करता है, उसे परमगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुशापो नाम सप्तदशोऽध्या‍यः ॥ १७ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

वासुदेवे भगवति भक्तिं उद्वहतां नृणाम् । 
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद्व्यपाश्रयः ॥ ३१ ॥
नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ 
     न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । 
विदाम यस्येहितमंशकांशका 
     न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥ ३२ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३ ॥
तस्य चायं महाभागः चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः । 
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४ ॥
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु । 
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥

जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान्‌ वासुदेव के चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत् में  ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें ॥ ३१ ॥ मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं ? ॥ ३२ ॥ भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं ॥ ३३ ॥ प्रिये ! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान्‌ श्रीहरिका ही प्रिय हूँ ॥ ३४ ॥ इसलिये तुम्हें भगवान्‌ के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

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बुधवार, 13 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीरुद्र उवाच - 

दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्‍भुतकर्मणः । 
माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥ २७ ॥
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति । 
स्वर्गापवर्गनरकेषु अपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ २८ ॥
देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वान् ईश्वरलीलया । 
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि । 
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३० ॥

भगवान्‌ शङ्कर ने कहा—सुन्दरि ! दिव्यलीला-विहारी भगवान्‌ के नि:स्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली ॥ २७ ॥ जो लोग भगवान्‌ के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तु के—केवल भगवान्‌ के ही समान भाव से दर्शन होते हैं ॥ २८ ॥ जीवों को भगवान्‌ की लीला से ही देहका संयोग होने के कारण सुख-दु:ख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दु:ख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ३० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

एकः सृजति भूतानि भगवान् आत्ममायया । 
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥ २१ ॥
न तस्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो 
     न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । 
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य 
     सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥
तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां 
     सुखाय दुःखाय हिताहिताय । 
बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः 
     शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥ २३ ॥
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि । 
यन्मन्यसे ह्यसाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥ २४ ॥

श्रीशुक उवाच - 
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । 
जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥ २५ ॥
ततस्तु भगवान्रुद्रो रुद्राणीं इदमब्रवीत् । 
देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च श्रृण्वताम् ॥ २६ ॥

एकमात्र परिपूर्णतम भगवान्‌ ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दु:खकी रचना करते हैं ॥ २१ ॥ माताजी ! भगवान्‌ श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ॥ २२ ॥ तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दु:ख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ॥ २३ ॥ पतिप्राणा देवि ! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु भगवान्‌ शङ्कर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥ तब भगवान्‌ शङ्करने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही ॥ २६ ॥

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सोमवार, 11 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु को पार्वती जी का शाप

श्रीशुक उवाच - 
एवं शप्तश्चित्रकेतुः विमानाद् अवरुह्य सः । 
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥ १६ ॥

चित्रकेतुरुवाच - 
प्रतिगृह्णामि ते शापं आत्मनोऽञ्जलिनाम्बिके । 
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥
संसारचक्र एतस्मिन् जन्तुरज्ञानमोहितः । 
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्‌क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः । 
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥
गुणप्रवाह एतस्मिन्कः शापः को न्वनुग्रहः । 
कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥ २० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! जब पार्वतीजी ने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ १६ ॥
चित्रकेतुने कहा—माता पार्वतीजी ! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोडक़र आपका शाप स्वीकार करता हूँ। क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है ॥ १७ ॥ देवि ! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दु:ख भोगता रहता है ॥ १८ ॥ माताजी ! सुख और दु:खको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दु:खका कर्ता माना करते हैं ॥ १९ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दु:ख ॥ २० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीपार्वति उवाच - 

अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः । 
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥ ११ ॥
न वेद धर्मं किल पद्मयोनिः 
     न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । 
न वै कुमारः कपिलो मनुश्च 
     ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥ १२ ॥
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं 
     जगद्‍गुरुं मङ्‌गलमङ्‌गलं स्वयम् । 
यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् 
     प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥ १३ ॥
नायमर्हति वैकुण्ठ पादमूलोपसर्पणम् । 
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥ १४ ॥
अतः पापीयसीं योनिं आसुरीं याहि दुर्मते । 
यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५ ॥

पार्वतीजी बोलीं—अहो ! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या ? ॥ ११ ॥ जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते। तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाले भगवान्‌ शिव को इस कामसे नहीं रोकते ॥ १२ ॥ ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मङ्गलों को मङ्गल बनाने वाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्‌ का और उनके अनुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है ॥ १३ ॥ इसे अपने बड़प्पनका घमंड है। यह मूर्ख भगवान्‌ श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं ॥ १४ ॥ [चित्रकेतु को सम्बोधन कर] अत: दुर्मते ! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ। ऐसा होनेसे बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे ॥ १५ ॥

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रविवार, 10 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

चित्रकेतुरुवाच - 
एष लोकगुरुः साक्षात् धर्मं वक्ता शरीरिणाम् । 
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः । 
अङ्‌कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति । 
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच - 
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप । 
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् । 
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥

चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥ ६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥ ७ ॥ प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! भगवान्‌ शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान्‌ शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा— ॥ ९-१० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्त...