शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध छब्बीसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – छब्बीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन

राजोवाच 
महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति ॥ १ ॥

ऋषिरुवाच 
त्रिगुणत्वात्कर्तुः श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधाः सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥ २ ॥ 
अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथैव कर्तुः श्रद्धाया वैसादृश्यात्कर्मफलं विसदृशं भवति 
या ह्यनाद्यविद्यया कृतकामानां तत्परिणामलक्षणाः सृतयः सहस्रशः प्रवृत्तास्तासां प्राचुर्येणानुवर्णयिष्यामः ॥ ३ ॥

राजोवाच 
नरका नाम भगवन् किं देशविशेषा अथवा बहिस्त्रिलोक्या आहोस्विदन्तराल इति ॥ ४ ॥

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—महर्षे ! लोगों को जो ये ऊँची-नीची गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें इतनी विभिन्नता क्यों है ? ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन् ! कर्म करनेवाले पुरुष सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार के होते हैं तथा उनकी श्रद्धाओं में भी भेद रहता है। इस प्रकार स्वभाव और श्रद्धा के भेदसे उनके कर्मों की गतियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और न्यूनाधिकरूप में ये सभी गतियाँ सभी कर्ताओं को प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥ इसी प्रकार निषिद्ध कर्मरूप पाप करनेवालों को भी, उनकी श्रद्धा की असमानता के कारण, समान फल नहीं मिलता। अत: अनादि अविद्या के वशीभूत होकर कामनापूर्वक किये हुए उन निषिद्ध कर्मों के परिणाममें जो हजारों तरहकी नारकी गतियाँ होती हैं, उनका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥
राजा परीक्षित्‌ ने पूछा—भगवन् ! आप जिनका वर्णन करना चाहते हैं, वे नरक इसी पृथ्वी के कोई देशविशेष हैं अथवा त्रिलोकी से बाहर या इसीके भीतर किसी जगह हैं ? ॥ ४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा – 
दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा । 
हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं 
कं शेषाद्‌भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः ॥ ११ ॥ 
मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्रमूर्धो 
भूगोलं सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम् । 
आनन्त्यादनिमितविक्रमस्य भूम्नः 
को वीर्याण्यधिगणयेत्सहस्रजिह्वः ॥ १२ ॥ 
एवम्प्रभावो भगवाननन्तो 
दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः । 
मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो 
यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति ॥ १३ ॥ 
एता ह्येवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथाकर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिताः कामान् कामयमानैः ॥ १४ ॥ 
एतावतीर्हि राजन् पुंसः प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसदृशा यथाप्रन्नं व्याचख्ये किमन्यत्कथयाम इति ॥ १५ ॥ 

जिनके सुने-सुनाये नामका कोई पीडि़त अथवा पतित पुरुष अकस्मात् अथवा हँसीमें भी उच्चारण कर लेता है तो वह पुरुष दूसरे मनुष्योंके भी सारे पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है—ऐसे शेषभगवान्‌को छोडक़र मुमुक्षु पुरुष और किसका आश्रय ले सकता है ? ॥ ११ ॥ यह पर्वत, नदी और समुद्रादिसे पूर्ण सम्पूर्ण भूमण्डल उन सहस्रशीर्षा भगवान्‌के एक मस्तकपर एक रज:कणके समान रखा हुआ है। वे अनन्त हैं, इसलिये उनके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है। किसीके हजार जीभें हों, तो भी उन सर्वव्यापक भगवान्‌के पराक्रमोंकी गणना करनेका साहस वह कैसे कर सकता है ? ॥ १२ ॥ वास्तवमें उनके वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम हैं। ऐसे प्रभावशाली भगवान्‌ अनन्त रसातलके मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये लीलासे ही पृथ्वीको धारण किये हुए हैं ॥ १३ ॥ राजन् ! भोगोंकी कामनावाले पुरुषोंकी अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली भगवान्‌की रची हुई ये ही गतियाँ हैं। इन्हें जिस प्रकार मैंने गुरुमुखसे सुना था, उसी प्रकार तुम्हें सुना दिया ॥ १४ ॥ मनुष्यको प्रवृत्तिरूप धर्मके परिणाममें प्राप्त होनेवाली जो परस्पर विलक्षण ऊँची-नीची गतियाँ हैं, वे इतनी ही हैं; इन्हें तुम्हारे प्रश्रके अनुसार मैंने सुना दिया। अब बताओ, और क्या सुनाऊँ ? ॥ १५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भूविवरविध्युपवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ 

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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः 
सत्त्वाद्याः प्रकृतिगुणायदीक्षयाऽऽसन् । 
यद्‌रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन् 
नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ॥ ९ ॥ 
मूर्तिं नः पुरुकृपया बभार सत्त्वं 
संशुद्धं सदसदिदं विभाति यत्र । 
यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या - 
मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्यः ॥ १० ॥ 

जिनकी दृष्टि पडऩेसे ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके हेतुभूत सत्त्वादि प्राकृत गुण अपने-अपने कार्यमें समर्थ होते हैं, जिनका स्वरूप ध्रुव (अनन्त) और अकृत (अनादि) है तथा जो अकेले होते हुए ही इस नानात्मक प्रपञ्चको अपनेमें धारण किये हुए हैं—उन भगवान्‌ सङ्कर्षणके तत्त्वको कोई कैसे जान सकता है ॥ ९ ॥ जिनमें यह कार्य-कारणरूप सारा प्रपञ्च भास रहा है तथा अपने निजजनोंका चित्त आकर्षित करनेके लिये की हुई जिनकी वीरतापूर्ण लीलाको परम पराक्रमी सिंहने आदर्श मानकर अपनाया है, उन उदारवीर्य सङ्कर्षण भगवान्‌ने हमपर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण किया है ॥ १० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

ध्यायमानः सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधर- मुनिगणैरनवरतमदमुदितविकृतविह्वललोचनः 
सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमानःस्वपार्षदविबुधयूथपतीनपरिम्लानरागनवतुलसिकामोदमध्वासवेन माद्यन्मधुकरत्रातमधुरगीतश्रियं वैजयन्तीं स्वां वनमालां नीलवासा एककुण्डलो हलककुदि 
कृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान्माहेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्चनीं कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ॥ ७ ॥ 
य एष एवमनुश्रुतो ध्यायमानो मुमुक्षूणामनादि- कालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्नन्थिं 
सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान् भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह 
तुम्बुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ८ ॥ 

देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनिगण भगवान्‌ अनन्तका ध्यान किया करते हैं। उनके नेत्र निरन्तर प्रेममदसे मुदित, चञ्चल और विह्वल रहते हैं। वे सुललित वचनामृतसे अपने पार्षद और देवयूथपोंको सन्तुष्ट करते रहते हैं। उनके अङ्गपर नीलाम्बर और कानोंमें केवल एक कुण्डल जगमगाता रहता है तथा उनका सुभग और सुन्दर हाथ हलकी मूठपर रखा रहता है। वे उदारलीलामय भगवान्‌ सङ्कर्षण गलेमें वैजयन्ती माला धारण किये रहते हैं, जो साक्षात् इन्द्रके हाथी ऐरावतके गलेमें पड़ी हुई सुवर्णकी शृङ्खलाके समान जान पड़ती है। जिसकी कान्ति कभी फीकी नहीं पड़ती, ऐसी नवीन तुलसीकी गन्ध और मधुर मकरन्दसे उन्मत्त हुए भौंरे निरन्तर मधुर गुंजार करके उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं ॥ ७ ॥
परीक्षित्‌ ! इस प्रकार भगवान्‌ अनन्त माहात्म्य श्रवण और ध्यान करनेसे मुमुक्षुओंके हृदयमें आविर्भूत होकर उनकी अनादिकालीन कर्मवासनाओंसे ग्रथित सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक अविद्यामयी हृदयग्रन्थिको तत्काल काट डालते हैं। उनके गुणोंका एक बार ब्रह्माजीके पुत्र भगवान्‌ नारद ने तुम्बुरु गन्धर्व के साथ ब्रह्माजी की सभा में इस प्रकार गान किया था ॥ ८ ॥

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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

यस्याङ्घ्रिकमलयुगलारुणविशदनखमणि- षण्डमण्डलेष्वहिपतयः सह सात्वतर्षभैरेकान्त- 
भक्तियोगेनावनमन्तः स्ववदनानि परिस्फुरत्- कुण्डलप्रभामण्डितगण्डस्थलान्यतिमनोहराणि 
प्रमुदितमनसः खलु विलोकयन्ति ॥ ४ ॥ 
यस्यैव हि नागराजकुमार्य आशिष आशासानाश्चार्वङ्गवलयविलसितविशदविपुल- 
धवलसुभगरुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दन- कुङ्कुमपङ्कानुलेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनो- 
न्मथितहृदयमकरध्वजावेशरुचिरललितस्मितास्तदनुरागमदमुदितमदविघूर्णितारुणकरुणावलोक- 
नयनवदनारविन्दं सव्रीडं किलविलोकयन्ति ॥ ५ ॥ 
स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते ॥६॥ 

भगवान्‌ सङ्कर्षणके चरणकमलोंके गोल-गोल स्वच्छ और अरुणवर्ण नख मणियोंकी पङ्क्तिके समान देदीप्यमान हैं। जब अन्य प्रधान-प्रधान भक्तोंके सहित अनेकों नागराज अनन्य भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम करते हैं, तब उन्हें उन नखमणियोंमें अपने कुण्डल-कान्तिमण्डित कमनीय कपोलोंवाले मनोहर मुखारविन्दोंकी मनमोहिनी झाँकी होती है और उनका मन आनन्दसे भर जाता है ॥ ४ ॥ अनेकों नागराजोंकी कन्याएँ विविध कामनाओंसे उनके अङ्गमण्डलपर चाँदीके खम्भोंके समान सुशोभित उनकी वलयविलसित लंबी-लंबी श्वेतवर्ण सुन्दर भुजाओंपर अरगजा, चन्दन और कुङ्कुमपङ्कका लेप करती हैं। उस समय अङ्गस्पर्शसे मथित हुए उनके हृदयमें कामका सञ्चार हो जाता है। तब वे उनके मदविह्वल सकरुण अरुण नयनकमलोंसे सुशोभित तथा प्रेममदसे मुदित मुखारविन्दकी ओर मधुर मनोहर मुसकानके साथ सलज्ज भावसे निहारने लगती हैं ॥ ५ ॥ वे अनन्त गुणोंके सागर आदिदेव भगवान्‌ अनन्त अपने अमर्ष (असहन- शीलता) और रोषके वेगको रोके हुए वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं ॥ ६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

शुक उवाच 

तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तरआस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्याताऽनन्त इति 
सात्वतीया द्रष्ट्टदृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान- लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्षते ॥ १ ॥ 
यस्येदं क्षितिमण्डले भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते ॥ २ ॥ 
यस्य ह वा इदं कालेनोपसंजिहीर्षतोऽमर्ष- विरचितरुचिरभ्रमद्‌भुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र 
एकादशव्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन्नुदतिष्ठत् ॥ ३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर अनन्त नामसे विख्यात भगवान्‌की तामसी नित्य कला है। यह अहंकाररूपा होनेसे द्रष्टा और दृश्यको खींचकर एक कर देती है, इसलिये पाञ्चरात्र आगम के अनुयायी भक्तजन इसे ‘सङ्कर्षण’ कहते हैं ॥ १ ॥ इन भगवान्‌ अनन्तके एक हजार मस्तक हैं। उनमेंसे एकपर रखा हुआ यह सारा भूमण्डल सरसों के दाने के समान दिखायी देता है ॥ २ ॥ प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जब इन्हें इस विश्वका उपसंहार करनेकी इच्छा होती है, तब इनकी क्रोधवश घूमती हुई मनोहर भ्रुकुटियोंके मध्यभागसे सङ्कर्षण नामक रुद्र प्रकट होते हैं। उनकी व्यूहसंख्या ग्यारह है। वे सभी तीन नेत्रोंवाले होते हैं और हाथमें तीन नोकोंवाले शूल लिये रहते हैं ॥ ३ ॥ 

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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध चौबीसवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – चौबीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन

ततोऽधस्ताद्रसातले दैतेया दानवाः पणयो नाम निवातकवचाः कालेया हिरण्यपुरवासिन इति विबुधप्रत्यनीका उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो भगवतः सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसा प्रतिहतबलावलेपा बिलेशया इव वसन्ति ये वै सरमयेन्द्रदूत्या  वाग्भिर्मन्त्रवर्णाभिरिन्द्राद्बिभ्यति ॥ ३०॥
ततोऽधस्तात्पाताले नागलोकपतयो वासुकिप्रमुखाः शङ्खकुलिकमहाशङ्खश्वेतधनञ्जयधृतराष्ट्रशङ्खचूडकम्बलाश्वतरदेवदत्तादयो महाभोगिनो महामर्षा निवसन्ति येषामु ह वै पञ्चसप्तदशशतसहस्रशीर्षाणां फणासु विरचिता महामणयो रोचिष्णवः पातालविवरतिमिरनिकरं स्वरोचिषा विधमन्ति ॥ ३१ ॥

उसके नीचे रसातलमें पणि नामके दैत्य और दानव रहते हैं। ये निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी भी कहलाते हैं। इनका देवताओंसे विरोध है। ये जन्मसे ही बड़े बलवान् और महान् साहसी होते हैं। किन्तु जिनका प्रभाव सम्पूर्ण लोकोंमें फैला हुआ है, उन श्रीहरिके तेजसे बलाभिमान चूर्ण हो जानेके कारण ये सर्पोंके समान लुक-छिपकर रहते हैं तथा इन्द्रकी दूती सरमाके कहे हुए मन्त्रवर्णरूप [*] वाक्यके कारण सर्वदा इन्द्रसे डरते रहते हैं ॥ ३० ॥
रसातलके नीचे पाताल है। वहाँ शङ्ख, कुलिक, महाशङ्ख, श्वेत, धनञ्जय, धृतराष्ट्र, शङ्खचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि बड़े क्रोधी और बड़े-बड़े फनोंवाले नाग रहते हैं। इनमें वासुकि प्रधान हैं। उनमेंसे किसीके पाँच, किसीके सात, किसीके दस, किसीके सौ और किसीके हजार सिर हैं। उनके फनोंकी दमकती हुई मणियाँ अपने प्रकाशसे पाताललोकका सारा अन्धकार नष्ट कर देती हैं ॥ ३१ ॥

.............................................................
 [*] एक कथा आती है कि जब पणि नामक दैत्योंने पृथ्वीको रसातलमें छिपा लिया; तब इन्द्रने उसे ढूँढऩेके लिये सरमा नामकी एक दूतीको भेजा था। सरमा से दैत्योंने सन्धि करनी चाही, परन्तु सरमा ने सन्धि न करके इन्द्रकी स्तुति करते हुए कहा था—‘हता इन्द्रेण पणय: शयध्वम्’ (हे पणिगण ! तुम इन्द्रके हाथसे मरकर पृथ्वीपर सो जाओ।) इसी शापके कारण उन्हें सदा इन्द्रका डर लगा रहता है।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे राह्वादिस्थितिबिलस्वर्गमर्यादानिरूपणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध चौबीसवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – चौबीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन

ततोऽधस्तात्तलातले मयो नाम दानवेन्द्रस्त्रिपुराधिपतिर्भगवता पुरारिणा त्रिलोकीशं चिकीर्षुणा निर्दग्धस्वपुरत्रयस्तत्प्रसादाल्लब्धपदो मायाविनामाचार्यो महादेवेन परिरक्षितो विगतसुदर्शनभयो महीयते ॥ २८ ॥
ततोऽधस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गणः कुहकतक्षककालियसुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्तः पतत्त्रिराजाधिपतेः पुरुषवाहादनवरतमुद्विजमानाः स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बसङ्गेन क्वचित्प्रमत्ता विहरन्ति ॥ २९ ॥

सुतललोकसे नीचे तलातल है। वहाँ त्रिपुराधिपति दानवराज मय रहता है। पहले तीनों लोकोंको शान्ति प्रदान करनेके लिये भगवान्‌ शङ्करने उसके तीनों पुर भस्म कर दिये थे। फिर उन्हींकी कृपासे उसे यह स्थान मिला। वह मायावियोंका परम गुरु है और महादेवजीके द्वारा सुरक्षित है, इसलिये उसे सुदर्शन चक्रसे भी कोई भय नहीं है। वहाँके निवासी उसका बहुत आदर करते हैं ॥ २८ ॥ उसके नीचे महातलमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले सर्पोंका क्रोधवश नामक एक समुदाय रहता है। उनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं। उनके बड़े-बड़े फन हैं। वे सदा भगवान्‌के वाहन पक्षिराज गरुडज़ीसे डरते रहते हैं; तो भी कभी-कभी अपने स्त्री, पुत्र, मित्र और कुटुम्बके सङ्गसे प्रमत्त होकर विहार करने लगते हैं ॥ २९ ॥

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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध चौबीसवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – चौबीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन

न वै भगवान्नूनममुष्यानुजग्राह यदुत पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामयभोगैश्वर्यमेवातनुतेति ॥२२॥
यत्तद्भगवतानधिगतान्योपायेन याच्ञाच्छलेनापहृतस्वशरीरावशेषितलोकत्रयो वरुणपाशैश्च सम्प्रतिमुक्तो गिरिदर्यां चापविद्ध इति होवाच ॥ २३॥
नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहाय स्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयसः कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम् ॥ २४ ॥
यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामहः किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि ॥ २५ ॥
तस्य महानुभावस्यानुपथममृजितकषायः को वास्मद्विधः परिहीणभगवदनुग्रह उपजिगमिषतीति ॥ २६ ॥
तस्यानुचरितमुपरिष्टाद्विस्तरिष्यते यस्य भगवान् स्वयमखिलजगद्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निजजनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटितः ॥ २७ ॥

भगवान्‌ने यदि बलिको उसके सर्वस्वदानके बदले अपनी विस्मृति करानेवाला यह मायामय भोग और ऐश्वर्य ही दिया तो उन्होंने उसपर यह कोई अनुग्रह नहीं किया ॥ २२ ॥ जिस समय कोई और उपाय न देखकर भगवान्‌ने याचनाके छलसे उसका त्रिलोकीका राज्य छीन लिया और उसके पास केवल उसका शरीरमात्र ही शेष रहने दिया, तब वरुणके पाशोंमें बाँधकर पर्वतकी गुफामें डाल दिये जानेपर उसने कहा था ॥ २३ ॥ ‘खेद है, यह ऐश्वर्यशाली इन्द्र विद्वान् होकर भी अपना सच्चा स्वार्थ सिद्ध करनेमें कुशल नहीं है। इसने सम्मति लेनेके लिये अनन्यभावसे बृहस्पतिजीको अपना मन्त्री बनाया; फिर भी उनकी अवहेलना करके इसने श्रीविष्णुभगवान्‌से उनका दास्य न माँगकर उनके द्वारा मुझसे अपने लिये ये भोग ही माँगे। ये तीन लोक तो केवल एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं, जो अनन्त कालका एक अवयवमात्र है। भगवान्‌के कैङ्कर्यके आगे भला, इन तुच्छ भोगोंका क्या मूल्य है ॥ २४ ॥ हमारे पितामह प्रह्लादजीने—भगवान्‌के हाथों अपने पिता हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर—प्रभुकी सेवाका ही वर माँगा था। भगवान्‌ देना भी चाहते थे, तो भी उनसे दूर करनेवाला समझकर उन्होंने अपने पिताका निष्कण्टक राज्य लेना स्वीकार नहीं किया ॥ २५ ॥ वे बड़े महानुभाव थे। मुझपर तो न भगवान्‌की कृपा ही है और न मेरी वासनाएँ ही शान्त हुई हैं; फिर मेरे-जैसा कौन पुरुष उनके पास पहुँचनेका साहस कर सकता है ? ॥ २६ ॥ राजन् ! इस बलि का चरित हम आगे (अष्टम स्कन्धमें) विस्तारसे कहेंगे। अपने भक्तों के प्रति भगवान्‌ का हृदय दया से भरा रहता है। इसीसे अखिल जगत् के परम पूजनीय गुरु भगवान्‌ नारायण हाथ में गदा लिये सुतल लोकमें राजा बलिके द्वारपर सदा उपस्थित रहते हैं। एक बार जब दिग्विजय करता हुआ घमंडी रावण वहाँ पहुँचा, तब उसे भगवान्‌ ने अपने पैरके अँगूठेकी ठोकरसे ही लाखों योजन दूर फेंक दिया था ॥ २७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध चौबीसवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – चौबीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन

ततोऽधस्तात्सुतले उदारश्रवाः पुण्यश्लोको विरोचनात्मजो बलिर्भगवता महेन्द्रस्य प्रियं चिकीर्षमाणेनादितेर्लब्धकायो भूत्वा वटुवामनरूपेण पराक्षिप्तलोकत्रयो भगवदनुकम्पयैव पुनः प्रवेशित इन्द्रादिष्वविद्यमानया सुसमृद्धया श्रियाभिजुष्टः स्वधर्मेणाराधयंस्तमेव भगवन्तमाराधनीयमपगतसाध्वस आस्तेऽधुनापि ॥ १८ ॥
नो एवैतत्साक्षात्कारो भूमिदानस्य यत्तद्भगवत्यशेषजीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेवे तीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहितमनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्य यद्बिलनिलयैश्वर्यम् ॥ १९ ॥
यस्य ह वाव क्षुतपतनप्रस्खलनादिषु विवशः सकृन्नामाभिगृणन् पुरुषः कर्मबन्धनमञ्जसा विधुनोति यस्य हैव प्रतिबाधनं मुमुक्षवोऽन्यथैवोपलभन्ते ॥ २० ॥
तद्भक्तानामात्मवतां सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव ॥ २१ ॥

वितलके नीचे सुतल लोक है। उसमें महायशस्वी पवित्रकीर्ति विरोचनपुत्र बलि रहते हैं। भगवान्‌ने इन्द्रका प्रिय करनेके लिये अदितिके गर्भसे वटु-वामनरूपमें अवतीर्ण होकर उनसे तीनों लोक छीन लिये थे। फिर भगवान्‌की कृपासे ही उनका इस लोकमें प्रवेश हुआ। यहाँ उन्हें जैसी उत्कृष्ट सम्पत्ति मिली हुई है, वैसी इन्द्रादिके पास भी नहीं है। अत: वे उन्हीं पूज्यतम प्रभु की अपने धर्माचरण द्वारा आराधना करते हुए यहाँ आज भी निर्भयतापूर्वक रहते हैं ॥ १८ ॥ 
राजन् ! सम्पूर्ण जीवोंके नियन्ता एवं आत्मस्वरूप परमात्मा भगवान्‌ वासुदेव-जैसे पूज्यतम, पवित्रतम पात्रके आनेपर उन्हें परम श्रद्धा और आदरके साथ स्थिर चित्तसे दिये हुए भूमिदानका यही कोई मुख्य फल नहीं है कि बलिको सुतल लोकका ऐश्वर्य प्राप्त हो गया। यह ऐश्वर्य तो अनित्य है। किन्तु वह भूमिदान तो साक्षात् मोक्षका ही द्वार है ॥ १९ ॥ भगवान्‌का तो छींकने, गिरने और फिसलनेके समय विवश होकर एक बार नाम लेनेसे भी मनुष्य सहसा कर्म-बन्धनको काट देता है, जब कि मुमुक्षुलोग इस कर्मबन्धनको योगसाधन आदि अन्य अनेकों उपायोंका आश्रय लेनेपर बड़े कष्टसे कहीं काट पाते हैं ॥ २० ॥ अतएव अपने संयमी भक्त और ज्ञानियोंको स्वस्वरूप प्रदान करनेवाले और समस्त प्राणियोंके आत्मा श्रीभगवान्‌ को आत्मभावसे किये हुए भूमिदानका यह फल नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध छब्बीसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

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