॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट१२)
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
अयं हि श्रुतसम्पन्नः शीलवृत्तगुणालयः ।
धृतव्रतो मृदुर्दान्तः सत्यवान् मंत्रविच्छुचिः ॥ ५६ ॥
गुर्वग्न्यतिथिवृद्धानां शुश्रूषुर्निरहङ्कृतः ।
सर्वभूतसुहृत्साधुः मिर्मितवागनसूयकः ॥ ॥ ५७ ॥
एकदासौ वनं यातः पितृसन्देशकृद् द्विजः ।
आदाय तत आवृत्तः फलपुष्पसमित्कुशान् ॥ ५८ ॥
ददर्श कामिनं कञ्चित् शूद्रं सह भुजिष्यया ।
पीत्वा च मधु मैरेयं मदाघूर्णितनेत्रया ॥ ५९ ॥
मत्तया विश्लथन्नीव्या व्यपेतं निरपत्रपम् ।
क्रीडन्तं अनुगायन्तं हसन्तमनयान्तिके ॥ ६० ॥
(यमदूत कह रहे हैं) देवताओ ! आप जानते ही हैं कि यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणोंका तो यह खजाना ही था। ब्रह्मचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था ॥ ५६ ॥ इसने गुरु, अग्नि, अतिथि और वृद्ध पुरुषों की सेवा की थी। अहंकार तो इसमें था ही नहीं। यह समस्त प्राणियों का हित चाहता, उपकार करता, आवश्यकता के अनुसार ही बोलता और किसी के गुणों में दोष नहीं ढूँढ़ता था ॥ ५७ ॥ एक दिन यह ब्राह्मण अपने पिता के आदेशानुसार वन में गया और वहाँसे फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर घरके लिये लौटा ॥ ५८ ॥ लौटते समय इसने देखा कि एक भ्रष्ट शूद्र, जो बहुत कामी और निर्लज्ज है, शराब पीकर किसी वेश्या के साथ विहार कर रहा है। वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। नशे के कारण उसकी आँखें नाच रही हैं, वह अर्धनग्न अवस्था में हो रही है। वह शूद्र उस वेश्या के साथ कभी गाता, कभी हँसता और कभी तरह-तरह की चेष्टाएँ करके उसे प्रसन्न करता है ॥५९-६० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --