बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

श्रीराजोवाच - 

कौ युवां ज्ञानसम्पन्नौ महिष्ठौ च महीयसाम् । 
अवधूतेन वेषेण गूढौ इह समागतौ ॥ १० ॥
चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः । 
मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्‌गिनः ॥ ११ ॥
कुमारो नारद ऋभुः अङ्‌गिरा देवलोऽसितः । 
अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १२ ॥
वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः । 
दुर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातुकर्णस्तथाऽऽरुणिः ॥ १३ ॥
रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः । 
ऋषिर्वेदशिरा बोध्यो मुनिः पञ्चशिखस्तथा ॥ १४ ॥
हिरण्यनाभः कौसल्यः श्रुतदेव ऋतध्वजः । 
एते परे च सिद्धेशाः चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १५ ॥
तस्माद् युवां ग्राम्यपशोः मम मूढधियः प्रभू । 
अन्धे तमसि मग्नस्य ज्ञानदीप उदीर्यताम् ॥ १६ ॥

राजा चित्रकेतु बोले—आप दोनों परम ज्ञानवान् और महान् से भी महान् जान पड़ते हैं तथा अपने को अवधूतवेष में छिपाकर यहाँ आये हैं। कृपा करके बतलाइये, आपलोग हैं कौन? ॥१०॥ मैं जानता हूँ कि बहुत-से भगवान्‌ के प्यारे ब्रह्मवेत्ता मेरे-जैसे विषयासक्त प्राणियोंको उपदेश करनेके लिये उन्मत्त का-सा वेष बनाकर पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरण करते हैं ॥ ११ ॥ सनत्कुमार, नारद, ऋभु, अङ्गिरा, देवल, असित, अपान्तरतम व्यास, मार्कण्डेय, गौतम, वसिष्ठ, भगवान्‌ परशुराम, कपिलदेव, शुकदेव, दुर्वासा, याज्ञवल्क्य, जातूकर्ण्य, आरुणि, रोमश, च्यवन, दत्तात्रेय, आसुरि, पतञ्जलि, वेदशिरा, बोध्यमुनि, पञ्चशिरा, हिरण्यनाभ, कौसल्य, श्रुतदेव और ऋतध्वज—ये सब तथा दूसरे सिद्धेश्वर ऋषि-मुनि ज्ञानदान करनेके लिये पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ १२—१५ ॥ स्वामियो ! मैं विषयभोगोंमें फँसा हुआ, मूढ़बुद्धि ग्राम्य पशु हूँ और अज्ञानके घोर अन्धकार में डूब रहा हूँ। आपलोग मुझे ज्ञानकी ज्योति से प्रकाशके केन्द्र में लाइये ॥ १६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

भूतैर्भूतानि भूतेशः सृजत्यवति हन्त्यजः । 
आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैः अनपेक्षोऽपि बालवत् ॥ ६ ॥
देहेन देहिनो राजन् देहाद् देहोऽभिजायते । 
बीजादेव यथा बीजं देह्यर्थ इव शाश्वतः ॥ ७ ॥
देहदेहिविभागोऽयं अविवेककृतः पुरा । 
जातिव्यक्तिविभागोऽयं यथा वस्तुनि कल्पितः ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच -

एवं आश्वासितो राजा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः । 
विमृज्य पाणिना वक्त्रं आधिम्लानमभाषत ॥ ९ ॥

भगवान्‌ ही समस्त प्राणियोंके अधिपति हैं। उनमें जन्म-मृत्यु अदि विकार बिलकुल नहीं है। उन्हें न किसीकी इच्छा है और न अपेक्षा। वे अपने-आप परतन्त्र प्राणियोंकी सृष्टि कर लेते हैं और उनके द्वारा अन्य प्राणियोंकी रचना, पालन तथा संहार करते हैं—ठीक वैसे ही जैसे बच्चे घर-घरौंदे, खेल-खिलौने बना-बनाकर बिगाड़ते रहते हैं ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! जैसे एक बीज से दूसरा बीज उत्पन्न होता है, वैसे ही पिता की देह द्वारा माता की देह से पुत्र की देह उत्पन्न होती है। पिता-माता और पुत्र जीव के रूप में देही हैं और बाह्यदृष्टि से केवल शरीर। उनमें देही जीव घट आदि कार्योंमें पृथ्वीके समान नित्य है ॥ ७ ॥ राजन् ! जैसे एक ही मृत्तिकारूप वस्तुमें घटत्व आदि जाति और घट आदि व्यक्तियोंका विभाग केवल कल्पनामात्र है, उसी प्रकार यह देही और देहका विभाग भी अनादि एवं अविद्याकल्पित है [*] ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! जब महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद ने इस प्रकार राजा चित्रकेतु को समझाया-बुझाया, तब उन्होंने कुछ धीरज धारण करके शोकसे मुरझाये हुए मुख को हाथसे पोंछा और उनसे कहा— ॥ ९ ॥
.............................................
[*] अनित्य होनेके कारण शरीर असत्य हैं और शरीर असत्य होनेके कारण उनके भिन्न-भिन्न अभिमानी भी असत्य ही हैं। त्रिकालाबाधित सत्य तो एकमात्र परमात्मा ही है। अत: शोक करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।

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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

ऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् । 
शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभिः ॥ १ ॥
कोऽयं स्यात् तव राजेन्द्र भवान् यमनुशोचति । 
त्वं चास्य कतमः सृष्टौ पुरेदानीमतः परम् ॥ २ ॥
यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन वालुकाः । 
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः ॥ ३ ॥
यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च । 
एवं भूतेषु भूतानि चोदितान् ईशमायया ॥ ४ ॥
वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचराः । 
जन्ममृत्योर्यथा पश्चात् प्राङ्‌नैवमधुनापि भोः ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्देके समान अपने मृत पुत्रके पास ही पड़े हुए थे। अब महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद उन्हें सुन्दर-सुन्दर उक्तियोंसे समझाने लगे ॥ १ ॥ उन्होंने कहा—राजेन्द्र ! जिसके लिये तुम इतना शोक कर रहे हो, वह बालक इस जन्म और पहलेके जन्मोंमें तुम्हारा कौन था ? उसके तुम कौन थे ? और अगले जन्मोंमें भी उसके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध रहेगा ? ॥ २ ॥ जैसे जलके वेगसे बालूके कण एक-दूसरेसे जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहमें प्राणियोंका भी मिलन और बिछोह होता रहता है ॥ ३ ॥ राजन् ! जैसे कुछ बीजोंसे दूसरे बीज उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही भगवान्‌की मायासे प्रेरित होकर प्राणियोंसे अन्य प्राणी उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं ॥ ४ ॥ राजन् ! हम, तुम और हमलोगोंके साथ इस जगत् में जितने भी चराचर प्राणी वर्तमान हैं—वे सब अपने जन्मके पहले नहीं थे और मृत्युके पश्चात् नहीं रहेंगे। इससे सिद्ध है कि इस समय भी उनका अस्तित्व नहीं है। क्योंकि सत्य वस्तु तो सब समय एक-सी रहती है ॥ ५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीशुक उवाच – 

विलपन्त्या मृतं पुत्रं इति चित्रविलापनैः । 
चित्रकेतुर्भृशं तप्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥ ५९ ॥
तयोर्विलपतोः सर्वे दम्पत्योस्तदनुव्रताः । 
रुरुदुः स्म नरा नार्यः सर्वमासीदचेतनम् ॥ ६० ॥
एवं कश्मलमापन्नं नष्टसंज्ञमनायकम् । 
ज्ञात्वाङ्‌गिरा नाम मुनिः आजगाम सनारदः ॥ ६१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब सम्राट् चित्रकेतु ने देखा कि मेरी रानी अपने मृत पुत्र के लिये इस प्रकार भाँति-भाँति से विलाप कर रही है, तब वे शोक से अत्यन्त सन्तप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५९ ॥ राजा-रानी के इस प्रकार विलाप करनेपर उनके अनुगामी स्त्री-पुरुष भी दु:खित होकर रोने लगे। इस प्रकार सारा नगर ही शोक से अचेत-सा हो गया ॥ ६० ॥ राजन् ! महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद ने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोक के कारण चेतनाहीन हो रहे हैं, यहाँ तक कि उन्हें समझाने वाला भी कोई नहीं है। तब वे दोनों वहाँ आये ॥ ६१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुविलापो नाम चतुर्शोऽध्या‍यः ॥ १४ ॥ 

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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो 
     यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे । 
परे नु जीवत्यपरस्य या मृतिः 
     विपर्ययश्चेत्त्वमसि ध्रुवः परः ॥ ५४ ॥
न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः 
     शरीरिणामस्तु तदात्मकर्मभिः । 
यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये 
     स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५५ ॥
त्वं तात नार्हसि च मां कृपणामनाथां 
     त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् । 
अञ्जस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद् 
     ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५६ ॥ 
उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्याः 
     त्वां आह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् । 
सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो
     भुङ्‌क्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५७ ॥ 
नाहं तनूज ददृशे हतमङ्‌गला ते 
     मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् । 
किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं 
     नीतोऽघृणेन न श्रृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५८ ॥ 

वे (रानी कृतद्युति) कहने लगीं—‘अरे विधाता ! सचमुच तू बड़ा मूर्ख है, जो अपनी सृष्टि के प्रतिकूल चेष्टा करता है । बड़े आश्चर्य की बात है कि बूढ़े-बूढ़े तो जीते रहें और बालक मर जायँ । यदि वास्तवमें तेरे स्वभाव में ऐसी ही विपरीतता है, तब तो तू जीवों का अमर शत्रु है ॥५४॥ यदि संसार में प्राणियों के जीवन-मरण का कोई क्रम न रहे, तो वे अपने प्रारब्ध के अनुसार जन्मते-मरते रहेंगे। फिर तेरी आवश्यकता ही क्या है । तूने सम्बन्धियों में स्नेह-बन्धन तो इसीलिये डाल रखा है कि वे तेरी सृष्टि को बढ़ायें ? परंतु तू इस प्रकार बच्चों को मारकर अपने किये-कराये पर अपने हाथों पानी फेर रहा है’ ॥ ५५ ॥ फिर वे अपने मृत पुत्र की ओर देखकर कहने लगीं—‘बेटा ! मैं तुम्हारे बिना अनाथ और दीन हो रही हूँ। मुझे छोडक़र इस प्रकार चले जाना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। तनिक आँख खोलकर देखो तो सही, तुम्हारे पिताजी तुम्हारे वियोगमें कितने शोक-सन्तप्त हो रहे हैं। बेटा ! जिस घोर नरकको नि:सन्तान पुरुष बड़ी कठिनाईसे पार कर पाते हैं, उसे हम तुम्हारे सहारे अनायास ही पार कर लेंगे। अरे बेटा ! तुम इस यमराजके साथ दूर मत जाओ। यह तो बड़ा ही निर्दयी है ॥ ५६ ॥ मेरे प्यारे लल्ला ! ओ राजकुमार ! उठो ! बेटा ! देखो, तुम्हारे साथी बालक तुम्हें खेलनेके लिये बुला रहे हैं। तुम्हें सोते-सोते बहुत देर हो गयी, अब भूख लगी होगी। उठो, कुछ खा लो। और कुछ नहीं तो मेरा दूध ही पी लो और अपने स्वजन-सम्बन्धी हमलोगोंका शोक दूर करो ॥ ५७ ॥ प्यारे लाल ! आज मैं तुम्हारे मुखारविन्दपर वह भोली-भाली मुसकराहट और आनन्दभरी चितवन नहीं देख रही हूँ। मैं बड़ी अभागिनी हूँ। हाय-हाय ! अब भी मुझे तुम्हारी सुमधुर तोतली बोली नहीं सुनायी दे रही है। क्या सचमुच निठुर यमराज तुम्हें उस परलोकमें ले गया, जहाँसे फिर कोई लौटकर नहीं आता?’ ॥ ५८ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

ततो नृपान्तःपुरवर्तिनो जना 
     नराश्च नार्यश्च निशम्य रोदनम् । 
आगत्य तुल्यव्यसनाः सुदुःखिताः 
     ताश्च व्यलीकं रुरुदुः कृतागसः ॥ ४९ ॥
श्रुत्वा मृतं पुत्रमलक्षितान्तकं 
     विनष्टदृष्टिः प्रपतम् स्खलन्पथि । 
स्नेहानुबन्धैधितया शुचा भृशं 
     विमूर्च्छितोऽनुप्रकृतिर्द्विजैर्वृतः ॥ ५० ॥
पपात बालस्य स पादमूले 
     मृतस्य विस्रस्तशिरोरुहाम्बरः । 
दीर्घं श्वसन् बाष्पकलोपरोधतो 
     निरुद्धकण्ठो न शशाक भाषितुम् ॥ ५१ ॥
पतिं निरीक्ष्योरुशुचार्पितं तदा 
     मृतं च बालं सुतमेकसन्ततिम् । 
जनस्य राज्ञी प्रकृतेश्च हृद्रुजं 
     सती दधाना विललाप चित्रधा ॥ ५२ ॥
स्तनद्वयं कुङ्‌कुमपङ्‌कमण्डितं 
     निषिञ्चती साञ्जनबाष्पबिन्दुभिः । 
विकीर्य केशान्विगलत्स्रजः सुतं 
     शुशोच चित्रं कुररीव सुस्वरम् ॥ ५३ ॥

तदनन्तर महारानी का रुदन सुनकर रनिवास के सभी स्त्री-पुरुष वहाँ दौड़ आये और सहानुभूतिवश अत्यन्त दुखी होकर रोने लगे। वे हत्यारी रानियाँ भी वहाँ आकर झूठमूठ रोने का ढोंग करने लगीं ॥ ४९ ॥ जब राजा चित्रकेतु को पता लगा कि मेरे पुत्र की अकारण ही मृत्यु हो गयी है, तब अत्यन्त स्नेह के कारण शोकके आवेग से उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वे धीरे-धीरे अपने मन्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ मार्ग में गिरते-पड़ते मृत बालक के पास पहुँचे और मूर्च्छित होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े। उनके केश और वस्त्र इधर-उधर बिखर गये। वे लंबी-लंबी साँस लेने लगे। आँसुओं की अधिकता से उनका गला रुँध गया और वे कुछ भी बोल न सके ॥ ५०-५१ ॥  पतिप्राणा रानी कृतद्युति अपने पति चित्रकेतु को अत्यन्त शोकाकुल और इकलौते नन्हें-से बच्चे को मरा हुआ देख भाँति-भाँति से विलाप करने लगीं । उनका यह दु:ख देखकर मन्त्री आदि सभी उपस्थित मनुष्य शोकग्रस्त हो गये ॥ ५२ ॥ महारानी के नेत्रों से इतने आँसू बह रहे थे कि वे उनकी आँखों का अंजन लेकर केसर और चन्दन से चर्चित वक्ष:स्थल को भिगोने लगे। उनके बाल बिखर रहे थे तथा उनमें गुँथे हुए फूल गिर रहे थे। इस प्रकार वे पुत्र के लिये कुररी पक्षी के समान उच्चस्वर में विविध प्रकार से विलाप कर रही थीं ॥ ५३ ॥

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रविवार, 26 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

एवं सन्दह्यमानानां सपत्‍न्याः पुत्रसम्पदा । 
राज्ञोऽसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत् ॥ ४२ ॥
विद्वेषनष्टमतयः स्त्रियो दारुणचेतसः । 
गरं ददुः कुमाराय दुर्मर्षा नृपतिं प्रति ॥ ४३ ॥
कृतद्युतिरजानन्ती सपत्‍नीनामघं महत् । 
सुप्त एवेति सञ्चिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरद्‍गृहे ॥ ४४ ॥
शयानं सुचिरं बालं उपधार्य मनीषिणी । 
पुत्रमानय मे भद्रे इति धात्रीमचोदयत् ॥ ४५ ॥
सा शयानमुपव्रज्य दृष्ट्वा चोत्तारलोचनम् । 
प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्तं हतास्मीत्यपतद्‍भुवि ॥ ४६ ॥
तस्यास्तदाऽऽकर्ण्य भृशातुरं स्वरं 
     घ्नन्त्याः कराभ्यामुर उच्चकैरपि । 
प्रविश्य राज्ञी त्वरयाऽऽत्मजान्तिकं 
     ददर्श बालं सहसा मृतं सुतम् ॥ ४७ ॥
पपात भूमौ परिवृद्धया शुचा 
     मुमोह विभ्रष्टशिरोरुहाम्बरा ॥ ४८ ॥ 

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार वे रानियाँ अपनी सौतकी गोद भरी देखकर जलती रहती थीं और राजा भी उनकी ओर से उदासीन हो गये थे। फलत: उनके मनमें कृतद्युतिके प्रति बहुत अधिक द्वेष हो गया ॥ ४२ ॥ द्वेषके कारण रानियोंकी बुद्धि मारी गयी। उनके चित्तमें क्रूरता छा गयी। उन्हें अपने पति चित्रकेतुका पुत्र-स्नेह सहन न हुआ। इसलिये उन्होंने चिढक़र नन्हेंसे राजकुमारको विष दे दिया ॥ ४३ ॥ महारानी कृतद्युतिको सौतोंकी इस घोर पापमयी करतूतका कुछ भी पता न था। उन्होंने दूरसे देखकर समझ लिया कि बच्चा सो रहा है। इसलिये वे महलमें इधर-उधर डोलती रहीं ॥ ४४ ॥ बुद्धिमती रानी ने यह देखकर कि बच्चा बहुत देरसे सो रहा है, धाय से कहा—‘कल्याणि ! मेरे लालको ले आ’ ॥ ४५ ॥ धाय ने सोते हुए बालक के पास जाकर देखा कि उसके नेत्रों की पुतलियाँ उलट गयी हैं। प्राण, इन्द्रिय और जीवात्मा ने भी उसके शरीर से विदा ले ली है। यह देखते ही ‘हाय रे ! मैं मारी गयी !’ इस प्रकार कहकर वह धरतीपर गिर पड़ी ॥ ४६ ॥ धाय अपने दोनों हाथों से छाती पीट-पीटकर बड़े आर्तस्वर में जोर-जोर से रोने लगी। उसका रोना सुनकर महारानी कृतद्युति जल्दी-जल्दी अपने पुत्र के शयनगृह में पहुँचीं और उन्होंने देखा कि मेरा छोटा-सा बच्चा अकस्मात् मर गया है ! ॥ ४७ ॥ तब वे अत्यन्त शोक के कारण मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। उनके सिरके बाल बिखर गये और शरीरपरके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये ॥ ४८ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्‍भवः । 
कृतद्युतेः सपत्‍नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत् ॥ ३७ ॥
चित्रकेतोः अतिप्रीतिः यथा दारे प्रजावति । 
न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम् ॥ ३८ ॥
ताः पर्यतप्यन् आत्मानं गर्हयन्त्योऽभ्यसूयया । 
आनपत्येन दुःखेन राज्ञोऽनादरणेन च ॥ ३९ ॥
धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम् । 
सुप्रजाभिः सपत्‍नीभिः दासीमिव तिरस्कृताम् ॥ ४० ॥
दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया । 
अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः ॥ ४१ ॥

माता कृतद्युति को भी अपने पुत्र पर मोह के कारण बहुत ही स्नेह था । परंतु उनकी सौत रानियों के मनमें पुत्रकी कामनासे और भी जलन होने लगी ॥ ३७ ॥ प्रतिदिन बालकका लाड़-प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा ॥ ३८ ॥ इस प्रकार एक तो वे रानियाँ सन्तान न होने के कारण ही दुखी थीं, दूसरे राजा चित्रकेतु ने उनकी उपेक्षा कर दी। अत: वे डाह से अपने को धिक्कारने और मन-ही-मन जलने लगीं ॥ ३९ ॥ वे आपसमें कहने लगीं—‘अरी बहिनो ! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है। पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं। और तो और, स्वयं पतिदेव ही उसे पत्नी करके नहीं मानते। सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कार के योग्य है ॥ ४० ॥ भला, दासियों को क्या दु:ख है ? वे तो अपने स्वामी की सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती रहती हैं । परंतु हम अभागिनी तो इस समय उनसे भी गयी-बीती हो रही हैं और दासियों की दासी के समान बार-बार तिरस्कार पा रही हैं ॥ ४१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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शनिवार, 25 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

अथ काल उपावृत्ते कुमारः समजायत । 
जनयन् शूरसेनानां श्रृण्वतां परमां मुदम् ॥ ३२ ॥
हृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचिरलङ्‌कृतः । 
वाचयित्वाशिषो विप्रैः कारयामास जातकम् ॥ ३३ ॥
तेभ्यो हिरण्यं रजतं वासांस्याभरणानि च । 
ग्रामान् हयान् गजान् प्रादाद् धेनूनां अर्बुदानि षट् ॥ ३४ ॥
ववर्ष कामानन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम् । 
धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः ॥ ३५ ॥
कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेः तनयेऽनुदिनं पितुः । 
यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत ॥ ३६ ॥

तदनन्तर समय आनेपर महारानी कृतद्युतिके गर्भसे एक सुन्दर पुत्रका जन्म हुआ। उसके जन्म- का समाचार पाकर शूरसेन देश की प्रजा बहुत ही आनन्दित हुई ॥ ३२ ॥ सम्राट् चित्रकेतु के आनन्द- का तो कहना ही क्या था। वे स्नान करके पवित्र हुए। फिर उन्होंने वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हो, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर और आशीर्वाद लेकर पुत्र का जातकर्म-संस्कार करवाया ॥ ३३ ॥ उन्होंने उन ब्राह्मणोंको सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण, गाँव, घोड़े, हाथी और छ: अर्बुद गौएँ दान कीं ॥ ३४ ॥ उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके धन, यश और आयुकी वृद्धि के लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं—ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवों का मनोरथ पूर्ण करता है ॥ ३५ ॥ परीक्षित्‌ ! जैसे यदि किसी कंगालको बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा ॥ ३६ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीशुक उवाच – 

इत्यर्थितः स भगवान्कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः । 
श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद् विभुः ॥ २७ ॥
ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणां च भारत । 
नाम्ना कृतद्युतिस्तस्यै यज्ञोच्छिष्टमदाद् द्विजः ॥ २८ ॥
अथाह नृपतिं राजन् भवितैकस्तवात्मजः । 
हर्षशोकप्रदस्तुभ्यं इति ब्रह्मसुतो ययौ ॥ २९ ॥
सापि तत्प्राशनादेव चित्रकेतोरधारयत् । 
गर्भं कृतद्युतिर्देवी कृत्तिकाग्नेरिवात्मजम् ॥ ३० ॥
तस्या अनुदिनं गर्भः शुक्लपक्ष इवोडुपः । 
ववृधे शूरसेनेश तेजसा शनकैर्नृप ॥ ३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान्‌ अङ्गिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया ॥ २७ ॥ परीक्षित्‌ ! राजा चित्रकेतुकी रानियोंमें सबसे बड़ी और सद्गुणवती महारानी कृतद्युति थीं। महर्षि अङ्गिराने उन्हींको यज्ञका अवशेष प्रसाद दिया ॥ २८ ॥ और राजा चित्रकेतुसे कहा—‘राजन् ! तुम्हारी पत्नीके गर्भसे एक पुत्र होगा, जो तुम्हें हर्ष और शोक दोनों ही देगा।’ यों कहकर अङ्गिरा ऋषि चले गये ॥ २९ ॥ उस यज्ञावशेष प्रसादके खानेसे ही महारानी कृतद्युति ने महाराज चित्रकेतुके द्वारा गर्भ धारण किया, जैसे कृत्तिकाने अपने गर्भमें अग्निकुमार को धारण किया था ॥ ३० ॥ राजन् ! शूरसेन देशके राजा चित्रकेतुके तेजसे कृतद्युति का गर्भ शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान दिनोंदिन क्रमश: बढऩे लगा ॥ ३१ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश श्रीराजोवा...