मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

‘इतिहासोत्तम’ में कहा गया है—

श्रुत्वा नामानि तत्रस्थास्तेनोक्तानि हरेर्द्विज। 
नारका नरकान्मुक्ता: सद्य एव महामुने ।।

‘महामुनि ब्राह्मणदेव ! भक्तराज के मुख से नरक में रहनेवाले प्राणियों ने श्रीहरि के नाम का श्रवण किया और वे तत्काल नरकसे मुक्त हो गये।’
यज्ञ-यागादिरूप धर्म अपने अनुष्ठानके लिये जिस पवित्र देश, काल, पात्र, शक्ति, सामग्री, श्रद्धा, मन्त्र, दक्षिणा आदिकी अपेक्षा रखता है, इस कलियुगमें उसका सम्पन्न होना अत्यन्त कठिन है। भगवन्नाम-संकीर्तनके द्वारा उसका फल अनायास ही प्राप्त किया जा सकता है। भगवान्‌ शङ्कर पार्वतीके प्रति कहते हैं—

ईशोऽहं सर्वजगतां नाम्नां विष्णोर्हि जापक:। 
सत्यं सत्यं वदाम्येव हरेर्नान्या गतिर्नृणाम् ।।

‘सम्पूर्ण जगत् का स्वामी होनेपर भी मैं विष्णुभगवान्‌ के नाम का ही जप करता हूँ। मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ, भगवान्‌ को छोडक़र जीवों के लिये अब कर्मकाण्ड आदि कोई भी गति नहीं है।’ श्रीमद्भागवत में ही यह बात आगे आनेवाली है कि सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चा-पूजा से जो फल मिलता है, कलियुगमें वह केवल भगवन्नाम से मिलता है। और भी है कि कलियुग दोषोंका निधि है, परन्तु इसमें एक महान् गुण यह है कि श्रीकृष्णसंकीर्तनमात्र से ही जीव बन्धनमुक्त होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार एक बार के नामोच्चारण की भी अनन्त महिमा शास्त्रों में कही गयी है। यहाँ मूल प्रसङ्ग में ही—‘एकदापि’ कहा गया है; ‘सकृदुच्चारितं’ का उल्लेख किया जा चुका है। बार-बार जो नामोच्चारण का विधान है, वह आगे और पाप न उत्पन्न हो जायँ, इसके लिये है। ऐसे वचन भी मिलते हैं कि भगवान्‌ के नाम का उच्चारण करने से भूत, वर्तमान और भविष्य के सारे ही पाप भस्म हो जाते है, यथा—

वर्तमानं च यत् पापं यद् भूतं यद् भविष्यति। 
तत्सर्वं निर्दहत्याशु गोविन्दानलकीर्तनम् ।।

फिर भी भगवत्प्रेमी जीवको पापोंके नाशपर अधिक दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; उसे तो भक्ति-भावकी दृढ़ताके लिये, भगवान्‌के चरणोंमें अधिकाधिक प्रेम बढ़ता जाय, इस दृष्टि से अहर्निश नित्य-निरन्तर भगवान्‌ के मधुर-मधुर नाम जपते जाना चाहिये। जितनी अधिक निष्कामता होगी, उतनी-ही-उतनी नामकी पूर्णता प्रकट होती जायगी, अनुभव में आती जायगी।

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। 
भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटय: ।।
सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षणानि व्रतानि च। 
तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च ।।
वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुव: शतम्। 
कृष्णनामजपस्यास्य कलां नाहर्न्ति षोडशीम् ।।

‘जिसकी जिह्वापर ‘कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण’ यह मङ्गलमय नाम नृत्य करता रहता है, उसकी कोटि-कोटि महापातकराशि तत्काल भस्म हो जाती है। सारे यज्ञ, लाखों व्रत, सर्वतीर्थ-स्नान, तप, अनेकों उपवास, हजारों वेद-पाठ, पृथ्वीकी सैकड़ों प्रदक्षिणा कृष्णनाम जपके सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हो सकतीं।’
भगवन्नामके कीर्तन में ही यह फल हो, सो बात नहीं। उनके श्रवण और स्मरण में भी वही फल है। दशम स्कन्ध के अन्त में कहेंगे ‘जिनके नामका स्मरण और उच्चारण अमङ्गलघ्न है।’ शिवगीता और पद्मपुराणमें कहा है—

आश्चर्ये वा भये शोके क्षते वा मम नाम य:। 
व्याजेन वा स्मरेद्यस्तु स याति परमां गतिम् ।।
प्रयाणे चाप्रयाणे च यन्नाम स्मरतां नृणाम्। 
सद्यो नश्यति पापौघो नमस्तस्मै चिदात्मने ।।

‘भगवान्‌ कहते हैं कि आश्चर्य, भय, शोक, क्षत (चोट लगने) आदि के अवसर पर जो मेरा नाम बोल उठता है या किसी व्याज से स्मरण करता है, वह परमगति को प्राप्त होता है। मृत्यु या जीवन—चाहे जब कभी भगवान्‌का नाम स्मरण करनेवाले मनुष्योंकी पाप-राशि तत्काल नष्ट हो जाती है। उन चिदात्मा प्रभुको नमस्कार है।’

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*नाम-सङ्कीर्तन में देश-काल आदि के नियम भी नहीं हैं | यथा—

न देशकालनियम: शौचाशौचविनिर्णय:। परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते ।।

न देशनियमो राजन्न कालनियमस्तथा। विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने ।।
कालोऽस्ति यज्ञे दाने वा स्नाने कालोऽस्ति सज्जपे। विष्णुसंकीर्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीपते ।।
गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि पिबन्भुञ्जञ्जपंस्तथा। कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्यमुच्यते पापकञ्चुकात् ।।

अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: ।।

‘देश-कालका नियम नहीं है, शौच-अशौच आदिका निर्णय करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। केवल ‘राम-राम’ यह संकीर्तन करनेमात्रसे जीव मुक्त हो जाता है। - - - भगवान्‌ के नाम का संकीर्तन करने में न देश का नियम है और न तो काल का। इसमें कोई सन्देह नहीं। राजन् ! यज्ञ, दान, तीर्थस्नान अथवा विधिपूर्वक जपके लिये शुद्ध कालकी अपेक्षा है, परन्तु भगवन्नामके इस संकीर्तनमें काल-शुद्धिकी कोई आवश्यकता नहीं है। चलते-फिरते, खड़े रहते— सोते, खाते-पीते और जप करते हुए भी ‘कृष्ण-कृष्ण’ ऐसा संकीर्तन करके मनुष्य पाप के केंचुल से छूट जाता है। - - अपवित्र हो या पवित्र—सभी अवस्थाओंमें (चाहे किसी भी अवस्थामें) जो कमलनयन भगवान्‌का स्मरण करता है, वह बाहर भीतर-पवित्र हो जाता है।’

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*भगवान्‌के नामका उच्चारण केवल पापको ही निवृत्त करता है, इसका और कोई फल नहीं है, यह धारणा भ्रमपूर्ण है; क्योंकि शास्त्रमें कहा है—

सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।।

‘जिसने हरि’—ये दो अक्षर एक बार भी उच्चारण कर लिये, उसने मोक्ष प्राप्त करनेके लिये परिकर बाँध लिया, फेंट कस ली।’ इस वचनसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम मोक्षका भी साधन है। मोक्षके साथ-ही-साथ यह धर्म, अर्थ और कामका भी साधन है; क्योंकि ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें त्रिवर्ग-सिद्धिका भी नाम ही कारण बतलाया गया है—

न गङ्गा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्। जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:। अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधै: सदक्षिणै:। यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्। दु:खक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।

‘जिसकी जिह्वाके नोकपर ‘हरि’ ये दो अक्षर बसते हैं, उसे गङ्गा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्करकी कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नामसे ही मिल जाता है। जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया। जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणाके सहित अश्वमेध आदि यज्ञोंके द्वारा यजन कर लिया। ‘हरि’ ये दो अक्षर मृत्युके पश्चात् परलोकके मार्गमें प्रयाण करनेवाले प्राणोंके लिये पाथेय (मार्गके लिये भोजन की सामग्री) हैं, संसाररूप रोगोंके लिये सिद्ध औषध हैं और जीवनके दु:ख और क्लेशोंके लिये परित्राण हैं।’
इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम अर्थ, धर्म, काम—इन तीन वर्गोंका भी साधक है। यह बात ‘हरि’, ‘नारायण’ आदि कुछ विशेष नामों के सम्बन्ध में ही नहीं है, प्रत्युत सभी नामों के सम्बन्ध में है; क्योंकि स्थान-स्थान पर यह बात सामान्यरूप से कही गयी है कि अनन्त के नाम, विष्णु के नाम, हरि के नाम इत्यादि। भगवान्‌ के सभी नामों में एक ही शक्ति है।
नाम-सङ्कीर्तन आदिमें वर्ण-आश्रमका भी नियम नहीं है—

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शूद्रान्त्यजातय:।
यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम्। सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति सनातनम् ।।

‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदि जहाँ-तहाँ विष्णुभगवान्‌के नामका अनुकीर्तन करते रहते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त होकर सनातन परमात्माको प्राप्त होते हैं।’

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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

यथागदं वीर्यतमं उपयुक्तं यदृच्छया ।
अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान् मंत्रोऽप्युदाहृतः ॥ १९ ॥

श्रीशुक उवाच –

ते एवं सुविनिर्णीय धर्मं भागवतं नृप ।
तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन् ॥ २० ॥

जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृतको उसका गुण न जानकर अनजान में पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवाले को अमर बना देता है, वैसे ही अनजान में उच्चारण करनेपर भी भगवान्‌ का नाम [*] अपना फल देकर ही रहता है (वस्तुशक्ति श्रद्धा की अपेक्षा नहीं करती) ॥ १९ ॥ 
श्रीशुकदेव जी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार भगवान्‌ के पार्षदों ने भागवतधर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया ॥
 २०॥
....................................................
[*]वस्तु की स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत। 

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृत:। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावक: ।।

‘दुष्टचित्त मनुष्यके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी भगवान्‌ श्रीहरि पापोंको हर लेते हैं। अनजानमें या अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि जलाती ही है।’

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

अथैनं मापनयत कृताशेषाघनिष्कृतम् ।
यदसौ भगवन्नाम म्रियमाणः समग्रहीत् ॥ १३ ॥
साङ्‌केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा ।
वैकुण्ठनामग्रहणं अशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥
पतितः स्खलितो भग्नः सन्दष्टस्तप्त आहतः ।
हरिरित्यवशेनाह पुमान्नार्हति यातनाम् ॥ १५ ॥
गुरूणां च लघूनां च गुरूणि च लघूनि च ।
प्रायश्चित्तानि पापानां ज्ञात्वोक्तानि महर्षिभिः ॥ १६ ॥
तैस्तान्यघानि पूयन्ते तपोदानजपादिभिः ।
नाधर्मजं तद् हृदयं तदपीशाङ्‌घ्रिसेवया ॥ १७ ॥
अज्ञानादथवा ज्ञानात् उत्तमश्लोकनाम यत् ।
सङ्‌कीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानलः ॥ १८ ॥

इसलिये यमदूतो ! तुमलोग अजामिल को मत ले जाओ। इसने सारे पापों का प्रायश्चित्त कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय [*] भगवान्‌ के नाम का उच्चारण किया है ॥ १३ ॥
बड़े-बड़े महात्मा पुरुष यह बात जानते हैं कि संकेतमें (किसी दूसरे अभिप्रायसे), परिहासमें, तान अलापनेमें अथवा किसीकी अवहेलना करनेमें भी यदि कोई भगवान्‌के नामोंका उच्चारण करता है तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ॥ जो मनुष्य गिरते समय, पैर फिसलते समय, अङ्ग-भङ्ग होते समय और साँपके डँसते, आगमें जलते तथा चोट लगते समय भी विवशतासे ‘हरि- हरि’ कहकर भगवान्‌के नामका उच्चारण कर लेता है, वह यमयातनाका पात्र नहीं रह जाता ॥ १५ ॥ महर्षियोंने जानबूझकर बड़े पापोंके लिये बड़े और छोटे पापोंके लिये छोटे प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ १६ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि उन तपस्या, दान, जप आदि प्रायश्चित्तोंके द्वारा वे पाप नष्ट हो जाते हैं। परन्तु उन पापोंसे मलिन हुआ उसका हृदय शुद्ध नहीं होता। भगवान्‌के चरणोंकी सेवासे वह भी शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ 
यमदूतो ! जैसे जान या अनजान में र्ईंधनसे अग्नि का स्पर्श हो जाय तो वह भस्म हो ही जाता है, वैसे ही जान-बूझकर या अनजान में भगवान्‌ के नामों का सङ्कीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं ॥ १८ ॥ 
...........................................
[*] पापकी निवृत्तिके लिये भगवन्नामका एक अंश ही पर्याप्त है, जैसे ‘राम’ का ‘रा’। इसने तो सम्पूर्ण नामका उच्चारण कर लिया। मरते समय का अर्थ ठीक मरने का क्षण ही नहीं है, क्योंकि मरनेके क्षण जैसे कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि करनेके लिये विधि नहीं हो सकती, वैसे नामोच्चारणकी भी नहीं है। इसलिये ‘म्रियमाण’ शब्दका यह अभिप्राय है कि अब आगे इससे कोई पाप होनेकी सम्भावना नहीं है।

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शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

न निष्कृतैरुदितैर्ब्रह्मवादिभिः
     तथा विशुद्ध्यत्यघवान् व्रतादिभिः ।
यथा हरेर्नामपदैरुदाहृतैः
     तदुत्तमश्लोक गुणोपलम्भकम् ॥ ११ ॥
नैकान्तिकं तद्धि कृतेऽपि निष्कृते
     मनः पुनर्धावति चेदसत्पथे ।
तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरेः
     गुणानुवादः खलु सत्त्वभावनः ॥ १२ ॥

बड़े-बड़े ब्रह्मवादी ऋषियोंने पापोंके बहुत-से प्रायश्चित्त—कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत बतलाये हैं; परंतु उन प्रायश्चित्तोंसे पापीकी वैसी जड़से शुद्धि नहीं होती, जैसी भगवान्‌के नामोंका, उनसे गुम्फित पदोंका [*] उच्चारण करनेसे होती है। क्योंकि वे नाम पवित्रकीर्ति भगवान्‌के गुणोंका ज्ञान करानेवाले हैं ॥ ११ ॥ यदि प्रायश्चित्त करनेके बाद भी मन फिरसे कुमार्गमें—पापकी ओर दौड़े, तो वह चरम सीमाका—पूरा-पूरा प्रायश्चित्त नहीं है। इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओंकी जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान्‌के गुणोंका ही गान करना चाहिये; क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥
.....................................................
[*] ‘नामपदै:’ कहनेका यह अभिप्राय है कि भगवान्‌का केवल नाम ‘राम-राम’, ‘कृष्ण-कृष्ण’, ‘हरि-हरि’, ‘नारायण-नारायण’ अन्त:करणकी शुद्धिके लिये—पापोंकी निवृत्तिके लिये पर्याप्त है। ‘नम: नमामि’ इत्यादि क्रिया जोडऩे की भी कोई आवश्यकता नहीं है। नामके साथ बहुवचनका प्रयोग—भगवान्‌ के नाम बहुत-से हैं, किसी का भी सङ्कीर्तन कर ले, इस अभिप्राय से है। एक व्यक्ति सब नामोंका उच्चारण करे, इस अभिप्रायसे नहीं । क्योंकि भगवान्‌ के नाम अनन्त हैं; सब नामों का उच्चारण सम्भव ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान्‌ के एक नाम का उच्चारण करनेमात्र से सब पापोंकी निवृत्ति हो जाती है। पूर्ण विश्वास न होने तथा नामोच्चारणके पश्चात् भी पाप करनेके कारण ही उसका अनुभव नहीं होता।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि ।
यद् व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरेः ॥ ७ ॥
एतेनैव ह्यघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम् ।
यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम् ॥ ८ ॥
स्तेनः सुरापो मित्रध्रुग् ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
स्त्रीराजपितृगोहन्ता ये च पातकिनोऽपरे ॥ ९ ॥
सर्वेषां अप्यघवतां इदमेव सुनिष्कृतम् ।
नामव्याहरणं विष्णोः यतस्तद् विषया मतिः ॥ १० ॥

यमदूतो ! इसने (अजामिल ने) कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशिका पूरा-पूरा प्रायश्चित्त कर लिया है। क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान्‌ के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया है ॥ ७ ॥ जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरोंका उच्चारण किया, उसी समय केवल उतनेसे ही इस पापीके समस्त पापोंका प्रायश्चित्त हो गया ॥ ८ ॥ चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रह्मघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगोंका संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गायको मारनेवाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभीके लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है कि भगवान्‌के नामोंका उच्चारण [*] किया जाय; क्योंकि भगवन्नामोंके उच्चारणसे मनुष्यकी बुद्धि भगवान्‌के गुण, लीला और स्वरूपमें रम जाती है और स्वयं भगवान्‌की उसके प्रति आत्मीयबुद्धि हो जाती ‘मेरे दूर होनेके कारण द्रौपदीने जोर-जोरसे ‘गोविन्द, गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रन्दन करके मुझे पुकारा। वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे हृदयसे उसका भार क्षणभरके लिये भी नहीं हटता है ॥ ९-१० ॥ 
........................................................
[*] इस प्रसङ्गमें ‘नाम-व्याहरण’का अर्थ नामोच्चारणमात्र ही है। भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं—

यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्। ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति ।।

(मेरे दूर होने के कारण द्रौपदीजी ने जोर-जोर से ‘गोविन्द-गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रंदन करके मुझे पुकारा | वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे ह्रदय से उसका भार क्षणभर के लिए भी नहीं हटता)
 
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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

श्रीशुक उवाच -
एवं ते भगवद्दूता यमदूताभिभाषितम् ।
उपधार्याथ तान् राजन् प्रत्याहुर्नयकोविदाः ॥ १ ॥
श्रीविष्णुदूता ऊचुः -
अहो कष्टं धर्मदृशां अधर्मः स्पृशते सभाम् ।
यत्रादण्ड्येष्वपापेषु दण्डो यैर्ध्रियते वृथा ॥ २ ॥
प्रजानां पितरो ये च शास्तारः साधवः समाः ।
यदि स्यात्तेषु वैषम्यं कं यान्ति शरणं प्रजाः ॥ ३ ॥
यद् यद् आचरति श्रेयान् इतरः तत् तदीहते ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ४ ॥
यस्याङ्‌के शिर आधाय लोकः स्वपिति निर्वृतः ।
स्वयं धर्ममधर्मं वा न हि वेद यथा पशुः ॥ ५ ॥
स कथं न्यर्पितात्मानं कृतमैत्रमचेतनम् ।
विस्रम्भणीयो भूतानां सघृणो द्रोग्धुमर्हति ॥ ६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के नीतिनिपुण एवं धर्मका मर्म जाननेवाले पार्षदोंने यमदूतोंका यह अभिभाषण सुनकर उनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
भगवान्‌के पार्षदोंने कहा—यमदूतो ! यह बड़े आश्चर्य और खेदकी बात है कि धर्मज्ञोंकी सभामें अधर्म प्रवेश कर रहा है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियोंको व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है ॥ २ ॥ जो प्रजाके रक्षक हैं, शासक हैं, समदर्शी और परोपकारी हैं—यदि वे ही प्रजाके प्रति विषमताका व्यवहार करने लगें तो फिर प्रजा किसकी शरण लेगी ? ॥ ३ ॥ सत्पुरुष जैसा आचरण करते हैं, साधारण लोग भी वैसा ही करते हैं। वे अपने आचरणके द्वारा जिस कर्मको धर्मानुकूल प्रमाणित कर देते हैं, लोग उसीका अनुकरण करने लगते हैं ॥ ४ ॥ साधारण लोग पशुओंके समान धर्म और अधर्मका स्वरूप न जानकर किसी सत्पुरुषपर विश्वास कर लेते हैं, उसकी गोद में सिर रखकर निर्भय और निश्चिन्त सो जाते हैं ॥ ५ ॥ वही दयालु सत्पुरुष, जो प्राणियोंका अत्यन्त विश्वासपात्र है और जिसे मित्रभावसे अपना हितैषी समझकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है, उन अज्ञानी जीवोंके साथ कैसे विश्वासघात कर सकता है ? ॥ ६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पहला अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट१३)

अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ

दृष्ट्वा तां कामलिप्तेन बाहुना परिरम्भिताम् ।
जगाम हृच्छयवशं सहसैव विमोहितः ॥ ६१ ॥
स्तम्भयन् आत्मनात्मानं यावत्सत्त्वं यथाश्रुतम् ।
न शशाक समाधातुं मनो मदनवेपितम् ॥ ६२ ॥
तन्निमित्तस्मरव्याज ग्रहग्रस्तो विचेतनः ।
तामेव मनसा ध्यायन् स्वधर्माद् विरराम ह ॥ ६३ ॥
तामेव तोषयामास पित्र्येणार्थेन यावता ।
ग्राम्यैर्मनोरमैः कामैः प्रसीदेत यथा तथा ॥ ६४ ॥
विप्रां स्वभार्यामप्रौढां कुले महति लम्भिताम् ।
विससर्जाचिरात्पापः स्वैरिण्यापाङ्‌गविद्धधीः ॥ ६५ ॥
यतस्ततश्चोपनिन्ये न्यायतोऽन्यायतो धनम् ।
बभारास्याः कुटुम्बिन्याः कुटुम्बं मन्दधीरयम् ॥ ६६ ॥
यदसौ शास्त्रमुल्लङ्‌घ्य स्वैरचार्यतिगर्हितः ।
अवर्तत चिरं कालं अघायुः अशुचिर्मलात् ॥ ६७ ॥
तत एनं दण्डपाणेः सकाशं कृतकिल्बिषम् ।
नेष्यामोऽकृतनिर्वेशं यत्र दण्डेन शुद्ध्यति ॥ ६८ ॥

(यमदूत कह रहे हैं) निष्पाप पुरुषो ! शूद्रकी भुजाओंमें अङ्गरागादि कामोद्दीपक वस्तुएँ लगी हुर्ई थीं और वह उनसे उस कुलटाका आलिङ्गन कर रहा था। अजामिल उन्हें इस अवस्थामें देखकर सहसा मोहित और कामके वश हो गया ॥ ६१ ॥ यद्यपि अजामिलने अपने धैर्य और ज्ञानके अनुसार अपने काम-वेगसे विचलित मनको रोकनेकी बहुत-बहुत चेष्टाएँ कीं, परन्तु पूरी शक्ति लगा देनेपर भी वह अपने मनको रोकनेमें असमर्थ रहा ॥ ६२ ॥ उस वेश्याको निमित्त बनाकर काम-पिशाचने अजामिलके मनको ग्रस लिया। इसकी सदाचार और शास्त्रसम्बन्धी चेतना नष्ट हो गयी। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया ॥ ६३ ॥ अजामिल सुन्दर-सुन्दर वस्त्र-आभूषण आदि वस्तुएँ, जिनसे वह प्रसन्न होती, ले आता। यहाँ तक कि इसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति देकर भी उसी कुलटा को रिझाया। यह ब्राह्मण उसी प्रकारकी चेष्टा करता, जिससे वह वेश्या प्रसन्न हो ॥ ६४ ॥ उस स्वच्छन्दचारिणी कुलटा की तिरछी चितवनने इसके मनको ऐसा लुभा लिया कि इसने अपनी कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नीतकका परित्याग कर दिया। इसके पापकी भी भला कोई सीमा है ॥ ६५ ॥ यह कुबुद्धि न्यायसे, अन्यायसे जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहींसे उठा लाता। उस वेश्याके बड़े कुटुम्बका पालन करनेमें ही यह व्यस्त रहता ॥ ६६ ॥ इस पापीने शास्त्राज्ञाका उल्लङ्घन करके स्वच्छन्द आचरण किया है। यह सत्पुरुषोंके द्वारा निन्दित है। इसने बहुत दिनोंतक वेश्याके मल-समान अपवित्र अन्नसे अपना जीवन व्यतीत किया है, इसका सारा जीवन ही पापमय है ॥ ६७ ॥ इसने अबतक अपने पापोंका कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया है। इसलिये अब हम इस पापीको दण्डपाणि भगवान्‌ यमराजके पास ले जायँगे। वहाँ यह अपने पापोंका दण्ड भोगकर शुद्ध हो जायगा ॥ ६८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे अजामिलोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९) विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और  अजामिलका परमधा...