॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०६)
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
स एवं वर्तमानोऽज्ञो मृत्युकाल उपस्थिते ।
मतिं चकार तनये बाले नारायणाह्वये ॥ २७ ॥
स पाशहस्तान् त्रीन् दृष्ट्वा पुरुषान् अति दारुणान् ।
वक्रतुण्डान् ऊर्ध्वरोम्ण आत्मानं नेतुमागतान् ॥ २८ ॥
दूरे क्रीडनकासक्तं पुत्रं नारायणाह्वयम् ।
प्लावितेन स्वरेणोच्चैः आजुहावाकुलेन्द्रियः ॥ २९ ॥
निशम्य म्रियमाणस्य मुखतो हरिकीर्तनम् ।
भर्तुर्नाम महाराज पार्षदाः सहसाऽपतन् ॥ ३० ॥
विकर्षतोऽन्तर्हृदयाद् दासीपतिमजामिलम् ।
यमप्रेष्यान् विष्णुदूता वारयामासुरोजसा ॥ ३१ ॥
वह मूर्ख इसी प्रकार अपना जीवन बिता रहा था कि मृत्युका समय आ पहुँचा। अब वह अपने पुत्र बालक नारायणके सम्बन्धमें ही सोचने-विचारने लगा ॥ २७ ॥ इतनेमें ही अजामिल ने देखा कि उसे ले जानेके लिये अत्यन्त भयावने तीन यमदूत आये हैं। उनके हाथोंमें फाँसी है, मुँह टेढ़े-टेढ़े हैं और शरीरके रोएँ खड़े हुए हैं ॥ २८ ॥ उस समय बालक नारायण वहाँसे कुछ दूरी पर खेल रहा था।
यमदूतोंको देखकर अजामिल अत्यन्त व्याकुल हो गया और उसने बहुत ऊँचे स्वरसे पुकारा— ‘नारायण !’ ॥ २९ ॥ भगवान् के पार्षदों ने देखा कि यह मरते समय हमारे स्वामी भगवान् नारायण का नाम ले रहा है, उनके नाम का कीर्तन कर रहा है; अत: वे बड़े वेगसे झटपट वहाँ आ पहुंचे ||३०|| उस समय यमराज के दूत दासीपति अजामिल के शरीर में से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। विष्णुदूतों ने उन्हें बलपूर्वक रोक दिया ॥ ३१ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --