॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
वृत्रासुर का पूर्वचरित्र
रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर्यश्रियादिभिः ।
सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैः चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत् ॥ १२ ॥
न तस्य सम्पदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः ।
सार्वभौमस्य भूश्चेयं अभवन् प्रीतिहेतवः ॥ १३ ॥
तस्यैकदा तु भवनं अङ्गिरा भगवान् ऋषिः ।
लोकान् अनुचरन् एतान् उपागच्छद् यदृच्छया ॥ १४ ॥
तं पूजयित्वा विधिवत् प्रत्युत्थानार्हणादिभिः ।
कृतातिथ्यमुपासीदत् सुखासीनं समाहितः ॥ १५ ॥
महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ ।
प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
यों महाराज चित्रकेतु को किसी बात की कमी न थी। सुन्दरता, उदारता, युवावस्था, कुलीनता, विद्या, ऐश्वर्य और सम्पत्ति आदि सभी गुणोंसे वे सम्पन्न थे। फिर भी उनकी पत्नियाँ बाँझ थीं, इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता रहती थी ॥ १२ ॥ वे सारी पृथ्वीके एकछत्र सम्राट् थे, बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ थीं तथा सारी पृथ्वी उनके वशमें थी। सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं, परंतु वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर सकीं ॥ १३ ॥ एक दिन शाप और वरदान देने में समर्थ अङ्गिरा ऋषि स्वच्छन्दरूप से विभिन्न लोकों में विचरते हुए राजा चित्रकेतु के महल में पहुँच गये ॥ १४ ॥ राजा ने प्रत्युत्थान और अर्घ्य आदि से उनकी विधिपूर्वक पूजा की। आतिथ्य-सत्कार हो जानेके बाद जब अङ्गिरा ऋषि सुखपूर्वक आसन पर विराज गये, तब राजा चित्रकेतु भी शान्तभावसे उनके पास ही बैठ गये ॥ १५ ॥ महाराज ! महर्षि अङ्गिराने देखा कि यह राजा बहुत विनयी है और मेरे पास पृथ्वीपर बैठकर मेरी भक्ति कर रहा है। तब उन्होंने चित्रकेतुको सम्बोधित करके उसे आदर देते हुए यह बात कही ॥ १६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --