बुधवार, 8 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध 
एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान्‌ की स्तुति

करालदंष्ट्रं करवालचञ्चल- 
क्षुरान्तजिह्वं भ्रुकुटीमुखोल्बणम्
स्तब्धोर्ध्वकर्णं गिरिकन्दराद्भुत- 
व्यात्तास्यनासं हनुभेदभीषणम् ||२१||
दिविस्पृशत्कायमदीर्घपीवर 
ग्रीवोरुवक्षःस्थलमल्पमध्यमम्
चन्द्रांशुगौरैश्छुरितं तनूरुहै-
र्विष्वग्भुजानीकशतं नखायुधम् ||२२||
दुरासदं सर्वनिजेतरायुध- 
प्रवेकविद्रावितदैत्यदानवम्
प्रायेण मेऽयं हरिणोरुमायिना 
वधः स्मृतोऽनेन समुद्यतेन किम् ||२३||
एवं ब्रुवंस्त्वभ्यपतद्गदायुधो 
नदन्नृसिंहं प्रति दैत्यकुञ्जरः
अलक्षितोऽग्नौ पतितः पतङ्गमो 
यथा नृसिंहौजसि सोऽसुरस्तदा ||२४||

(भगवान् की) दाढ़ें बड़ी विकराल थीं। तलवार की तरह लपलपाती हुई छूरे की धार के समान तीखी जीभ थी। टेढ़ी भौंहों से उनका मुख और भी दारुण हो रहा था। कान निश्चल एवं ऊपर की ओर उठे हुए थे। फूली हुई नासिका और खुला हुआ मुँह पहाड क़ी गुफा के समान अद्भुत जान पड़ता था। फटे हुए जबड़ोंसे उसकी भयङ्करता बहुत बढ़ गयी थी ॥ २१ ॥ विशाल शरीर स्वर्गका स्पर्श कर रहा था। गरदन कुछ नाटी और मोटी थी। छाती चौड़ी और कमर बहुत पतली थी। चन्द्रमाकी किरणोंके समान सफेद रोएँ सारे शरीरपर चमक रहे थे, चारों ओर सैकड़ों भुजाएँ फैली हुई थीं, जिनके बड़े-बड़े नख आयुधका काम देते थे ॥ २२ ॥ उनके पास फटकने
तक का साहस किसी को न होता था। चक्र आदि अपने निज आयुध तथा वज्र आदि अन्य श्रेष्ठ शस्त्रोंके द्वारा उन्होंने सारे दैत्य-दानवोंको भगा दिया। हिरण्यकशिपु सोचने लगा— हो-न-हो महामायावी विष्णुने ही मुझे मार डालनेके लिये यह ढंग रचा है; परंतु इसकी इन चालोंसे हो ही क्या सकता है ॥ २३ ॥ इस प्रकार कहता और सिंहनाद करता हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु हाथमें गदा लेकर नृसिंह- भगवान्‌पर टूट पड़ा। परंतु जैसे पतंगा  आग में गिरकर अदृश्य हो जाता है, वैसे ही वह दैत्य भगवान्‌के तेजके भीतर जाकर लापता हो गया ॥ २४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध 
एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान्‌ की स्तुति

सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं 
व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः
अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन्   
स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम् ||१८||
स सत्त्वमेनं परितो विपश्यन् 
स्तम्भस्य मध्यादनुनिर्जिहानम्
नायं मृगो नापि नरो विचित्र-
महो किमेतन्नृमृगेन्द्र रूपम् ||१९||
मीमांसमानस्य समुत्थितोऽग्रतो 
नृसिंहरूपस्तदलं भयानकम्
प्रतप्तचामीकरचण्डलोचनं 
स्फुरत्सटाकेशरजृम्भिताननम् ||२०||

इसी समय अपने सेवक प्रह्लाद और ब्रह्माकी वाणी सत्य करने और समस्त पदार्थोंमें अपनी व्यापकता दिखानेके लिये सभाके भीतर उसी खंभेमें बड़ा ही विचित्र रूप धारण करके भगवान्‌ प्रकट हुए । वह रूप न तो पूरा-पूरा सिंह का ही था और न मनुष्यका ही ॥ १८ ॥ जिस समय हिरण्यकशिपु शब्द करने वाले की इधर-उधर खोज कर रहा था, उसी समय खंभे के भीतर से निकलते हुए उस अद्भुत प्राणी को उसने देखा । वह सोचने लगा—अहो, यह न तो मनुष्य है और न पशु; फिर यह नृसिंह के रूप में कौन-सा अलौकिक जीव है ! ॥ १९ ॥  जिस समय हिरण्यकशिपु इस उधेड़-बुन में लगा हुआ था, उसी समय उसके बिलकुल सामने ही नृसिंहभगवान्‌ खड़े हो गये। उनका वह रूप अत्यधिक भयावना था। तपाये हुए सोने के समान पीली-पीली भयानक आँखें थीं। जँभाई लेनेसे गरदन के बाल इधर-उधर लहरा रहे थे ॥ २० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 7 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध 
एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान्‌ की स्तुति

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच

व्यक्तं त्वं मर्तुकामोऽसि योऽतिमात्रं विकत्थसे
मुमूर्षूणां हि मन्दात्मन्ननु स्युर्विक्लवा गिरः ||१२||
यस्त्वया मन्दभाग्योक्तो मदन्यो जगदीश्वरः
क्वासौ यदि स सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते ||१३||
सोऽहं विकत्थमानस्य शिरः कायाद्धरामि ते
गोपायेत हरिस्त्वाद्य यस्ते शरणमीप्सितम् ||१४||
एवं दुरुक्तैर्मुहुरर्दयन्रुषा 
सुतं महाभागवतं महासुरः
खड्गं प्रगृह्योत्पतितो वरासनात्   
स्तम्भं तताडातिबलः स्वमुष्टिना ||१५||
तदैव तस्मिन्निनदोऽतिभीषणो 
बभूव येनाण्डकटाहमस्फुटत्
यं वै स्वधिष्ण्योपगतं त्वजादयः 
श्रुत्वा स्वधामात्ययमङ्ग मेनिरे ||१६||
स विक्रमन्पुत्रवधेप्सुरोजसा 
निशम्य निर्ह्रादमपूर्वमद्भुतम्
अन्तःसभायां न ददर्श तत्पदं 
वितत्रसुर्येन सुरारियूथपाः ||१७||

हिरण्यकशिपुने कहा—रे मन्दबुद्धि ! तेरे बहकनेकी भी अब हद हो गयी है। यह बात स्पष्ट है कि अब तू मरना चाहता है। क्योंकि जो मरना चाहते हैं, वे ही ऐसी बेसिर-पैर की बातें बका करते हैं ॥ १२ ॥ अभागे ! तूने मेरे सिवा जो और किसीको जगत् का स्वामी बतलाया है, सो देखूँ तो तेरा वह जगदीश्वर कहाँ है। अच्छा, क्या कहा, वह सर्वत्र है ? तो इस खंभेमें क्यों नहीं दीखता ? ॥ १३ ॥ अच्छा, तुझे इस खंभेमें भी दिखायी देता है ! अरे, तू क्यों इतनी डींग हाँक रहा है ? मैं अभी-अभी तेरा सिर धड़से अलग किये देता हूँ। देखता हूँ तेरा वह सर्वस्व हरि, जिसपर तुझे इतना भरोसा है, तेरी कैसे रक्षा करता है ॥ १४ ॥ इस प्रकार वह अत्यन्त बलवान् महादैत्य भगवान्‌ के परम प्रेमी प्रह्लादको बार-बार झिड़कियाँ देता और सताता रहा। जब क्रोधके मारे वह अपनेको रोक न सका, तब हाथमें खड्ग लेकर सिंहासनसे कूद पड़ा और बड़े जोरसे उस खंभेको एक घूँसा मारा ॥ १५ ॥ उसी समय उस खंभेमें एक बड़ा भयङ्कर शब्द हुआ। ऐसा जान पड़ा मानो यह ब्रह्माण्ड ही फट गया हो। वह ध्वनि जब लोकपालों के लोक में पहुँची, तब उसे सुनकर ब्रह्मादि को ऐसा जान पड़ा, मानो उनके लोकों का प्रलय हो रहा हो ॥ १६ ॥ हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को मार डालने के लिये बड़े जोर से झपटा था; परंतु दैत्यसेनापतियों को भी भय से कँपा देनेवाले उस अद्भुत और अपूर्व घोर शब्द को सुनकर वह घबराया हुआ-सा देखने लगा कि यह शब्द करनेवाला कौन है। परंतु उसे सभाके भीतर कुछ भी दिखायी न पड़ा ॥ १७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध 
एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान्‌ की स्तुति

श्रीप्रह्लाद उवाच
न केवलं मे भवतश्च राजन् 
स वै बलं बलिनां चापरेषाम्
परेऽवरेऽमी स्थिरजङ्गमा ये 
ब्रह्मादयो येन वशं प्रणीताः ||८||
स ईश्वरः काल उरुक्रमोऽसा-
वोजः सहः सत्त्वबलेन्द्रि यात्मा
स एव विश्वं परमः स्वशक्तिभिः 
सृजत्यवत्यत्ति गुणत्रयेशः ||९||
जह्यासुरं भावमिमं त्वमात्मनः 
समं मनो धत्स्व न सन्ति विद्विषः
ऋतेऽजितादात्मन उत्पथे स्थिता-
त्तद्धि ह्यनन्तस्य महत्समर्हणम् ||१०||
दस्यून्पुरा षण्ण विजित्य लुम्पतो 
मन्यन्त एके स्वजिता दिशो दश
जितात्मनो ज्ञस्य समस्य देहिनां 
साधोः स्वमोहप्रभवाः कुतः परे ||११||

प्रह्लादजी ने कहा—दैत्यराज ! ब्रह्मा से लेकर तिनकेतक सब छोटे-बड़े, चर-अचर जीवों को भगवान्‌ ने ही अपने वशमें कर रखा है। न केवल मेरे और आपके, बल्कि संसार के समस्त बलवानों के बल भी केवल वही हैं ॥ ८ ॥ वे ही महापराक्रमी सर्वशक्तिमान् प्रभु काल हैं तथा समस्त प्राणियों के इन्द्रियबल, मनोबल, देहबल, धैर्य एवं इन्द्रिय भी वही हैं। वही परमेश्वर अपनी शक्तियोंके द्वारा इस विश्व की रचना, रक्षा और संहार करते हैं। वे ही तीनों गुणों के स्वामी हैं ॥ ९ ॥ आप अपना यह आसुर भाव छोड़ दीजिये। अपने मनको सबके प्रति समान बनाइये। इस संसारमें अपने वशमें न रहनेवाले कुमार्गगामी मनके अतिरिक्त और कोई शत्रु नहीं है। मनमें सबके प्रति समताका भाव लाना ही भगवान्‌की सबसे बड़ी पूजा है ॥ १० ॥ जो लोग अपना सर्वस्व लूटनेवाले इन छ: इन्द्रियरूपी डाकुओंपर तो पहले विजय नहीं प्राप्त करते और ऐसा मानने लगते हैं कि हमने दसों दिशाएँ जीत लीं, वे मूर्ख हैं। हाँ जिस ज्ञानी एवं जितेन्द्रिय महात्माने समस्त प्राणियोंके प्रति समताका भाव प्राप्त कर लिया, उसके अज्ञानसे पैदा होनेवाले काम-क्रोधादि शत्रु भी मर-मिट जाते हैं; फिर बाहरके शत्रु तो रहें ही कैसे ॥ ११ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 6 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध 
एवं ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भगवान्‌ की स्तुति

श्रीनारद उवाच
अथ दैत्यसुताः सर्वे श्रुत्वा तदनुवर्णितम्
जगृहुर्निरवद्यत्वान्नैव गुर्वनुशिक्षितम् ||१||
अथाचार्यसुतस्तेषां बुद्धिमेकान्तसंस्थिताम्
आलक्ष्य भीतस्त्वरितो राज्ञ आवेदयद्यथा ||२||
श्रुत्वा तदप्रियं दैत्यो दुःसहं तनयानयम्
कोपावेशचलद्गात्रः पुत्रं हन्तुं मनो दधे ||३||
क्षिप्त्वा परुषया वाचा प्रह्रादमतदर्हणम्
आहेक्षमाणः पापेन तिरश्चीनेन चक्षुषा ||४||
प्रश्रयावनतं दान्तं बद्धाञ्जलिमवस्थितम्
सर्पः पदाहत इव श्वसन्प्रकृतिदारुणः ||५||
हे दुर्विनीत मन्दात्मन्कुलभेदकराधम
स्तब्धं मच्छासनोद्वृत्तं नेष्ये त्वाद्य यमक्षयम् ||६||
क्रुद्धस्य यस्य कम्पन्ते त्रयो लोकाः सहेश्वराः
तस्य मेऽभीतवन्मूढ शासनं किं बलोऽत्यगाः ||७||

नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीका प्रवचन सुनकर दैत्यबालकोंने उसी समयसे निर्दोष होनेके कारण, उनकी बात पकड़ ली। गुरुजीकी दूषित शिक्षाकी ओर उन्होंने ध्यान ही न दिया ॥ १ ॥ जब गुरुजीने देखा कि उन सभी विद्यार्थियोंकी बुद्धि एकमात्र भगवान्‌में स्थिर हो रही है, तब वे बहुत घबराये और तुरंत हिरण्यकशिपु के पास जाकर निवेदन किया ॥ २ ॥ अपने पुत्र प्रह्लाद की इस असह्य और अप्रिय अनीति को सुनकर क्रोध के मारे उसका शरीर थर-थर काँपने लगा। अन्तमें उसने यही निश्चय किया कि प्रह्लाद को अब अपने ही हाथसे मार डालना चाहिये ॥ ३ ॥
मन और इन्द्रियों को वश में रखनेवाले प्रह्लादजी बड़ी नम्रतासे हाथ जोडक़र चुपचाप हिरण्यकशिपु के सामने खड़े थे और तिरस्कारके सर्वथा अयोग्य थे। परंतु हिरण्यकशिपु स्वभावसे ही क्रूर था। वह पैरकी चोट खाये हुए साँपकी तरह फुफकारने लगा। उसने उनकी ओर पापभरी टेढ़ी नजरसे देखा और कठोर वाणीसे डाँटते हुए कहा— ॥ ४-५ ॥ ‘मूर्ख ! तू बड़ा उद्दण्ड हो गया है। स्वयं तो नीच है ही, अब हमारे कुलके और बालकोंको भी फोडऩा चाहता है ! तूने बड़ी ढिठाईसे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है। आज ही तुझे यमराजके घर भेजकर इसका फल चखाता हूँ ॥ ६ ॥ मैं तनिक-सा क्रोध करता हूँ, तो तीनों लोक और उनके लोकपाल काँप उठते हैं। फिर मूर्ख! तूने किसके बल-बूते पर निडर की तरह मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम किया है?’ ॥७॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः
खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ||५४||
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः
एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत्सर्वत्र तदीक्षणम् ||५५||

भगवान्‌ की भक्तिके प्रभावसे दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र, गोपालक अहीर, पक्षी, मृग और बहुत-से पापी जीव भी भगवद्भावको प्राप्त हो गये हैं ॥ ५४ ॥ इस संसारमें या मनुष्य-शरीरमें जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ अर्थात् एकमात्र परमार्थ इतना ही है कि वह भगवान्‌ श्रीकृष्णकी अनन्य भक्ति प्राप्त करे। उस भक्तिका स्वरूप है सर्वदा, सर्वत्र सब वस्तुओंमें भगवान्‌का दर्शन ॥ ५५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादानुचरिते दैत्यपुत्रानुशासनं नाम सप्तमोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 5 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः
भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां जीवसंज्ञितः ||४९||
देवोऽसुरो मनुष्यो वा यक्षो गन्धर्व एव वा
भजन्मुकुन्दचरणं स्वस्तिमान्स्याद्यथा वयम् ||५०||
नालं द्विजत्वं देवत्वमृषित्वं वासुरात्मजाः
प्रीणनाय मुकुन्दस्य न वृत्तं न बहुज्ञता ||५१||
न दानं न तपो नेज्या न शौचं न व्रतानि च
प्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिरन्यद्विडम्बनम् ||५२||
ततो हरौ भगवति भक्तिं कुरुत दानवाः
आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वभूतात्मनीश्वरे ||५३||

भगवान्‌ श्रीहरि समस्त प्राणियोंके ईश्वर, आत्मा और परम प्रियतम हैं। वे अपने ही बनाये हुए पञ्चभूत और सूक्ष्मभूत आदिके द्वारा निर्मित शरीरोंमें जीवके नामसे कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ देवता, दैत्य, मनुष्य यक्ष अथवा गन्धर्व—कोई भी क्यों न हो—जो भगवान्‌के चरणकमलोंका सेवन करता है, वह हमारे ही समान कल्याणका भाजन होता है ॥ ५० ॥
दैत्यबालको ! भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना, सदाचार और विविध ज्ञानों से सम्पन्न होना तथा दान, तप, यज्ञ, शारीरिक और मानसिक शौच और बड़े-बड़े व्रतोंका अनुष्ठान पर्याप्त नहीं है। भगवान्‌ केवल निष्काम प्रेम-भक्तिसे ही प्रसन्न होते हैं। और सब तो विडम्बनामात्र हैं ॥ ५१-५२ ॥ इसलिये दानव-बन्धुओ ! समस्त प्राणियोंको अपने समान ही समझकर सर्वत्र विराजमान, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की भक्ति करो ॥ ५३ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

निरूप्यतामिह स्वार्थः कियान्देहभृतोऽसुराः
निषेकादिष्ववस्थासु क्लिश्यमानस्य कर्मभिः ||४६||
कर्माण्यारभते देही देहेनात्मानुवर्तिना
कर्मभिस्तनुते देहमुभयं त्वविवेकतः ||४७||
तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः
भजतानीहयात्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ||४८||

भाइयो ! तनिक विचार तो करो—जो जीव गर्भाधान से लेकर मृत्युपर्यन्त सभी अवस्थाओं में अपने कर्मों के अधीन होकर क्लेश-ही-क्लेश भोगता है, उसका इस संसार में स्वार्थ ही क्या है ॥ ४६ ॥ यह जीव सूक्ष्मशरीर को  ही अपना आत्मा मानकर उसके द्वारा अनेकों प्रकार के कर्म करता है और कर्मों के कारण ही फिर शरीर ग्रहण करता है। इस प्रकार कर्म से शरीर और शरीर से कर्मकी परम्परा चल पड़ती है। और ऐसा होता है अविवेक के कारण ॥ ४७ ॥ इसलिये निष्काम भाव से निष्क्रिय आत्मस्वरूप भगवान्‌ श्रीहरि का भजन करना चाहिये। अर्थ, धर्म और काम—सब उन्हीं के आश्रित हैं, बिना उनकी इच्छाके नहीं मिल सकते ॥ ४८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 4 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

कामान्कामयते काम्यैर्यदर्थमिह पूरुषः
स वै देहस्तु पारक्यो भङ्गुरो यात्युपैति च ||४३||
किमु व्यवहितापत्य दारागारधनादयः
राज्यकोशगजामात्य भृत्याप्ता ममतास्पदाः ||४४||
किमेतैरात्मनस्तुच्छैः सह देहेन नश्वरैः
अनर्थैरर्थसङ्काशैर्नित्यानन्दरसोदधेः ||४५||

मनुष्य इस लोक में सकाम कर्मों के द्वारा जिस शरीर के लिये भोग प्राप्त करना चाहता है, वह शरीर ही पराया—स्यार-कुत्तों का भोजन और नाशवान् है। कभी वह मिल जाता है तो कभी बिछुड़ जाता है ॥ ४३ ॥ जब शरीरकी ही यह दशा है—तब इससे अलग रहनेवाले पुत्र, स्त्री, महल, धन, सम्पत्ति, राज्य, खजाने, हाथी- घोड़े, मन्त्री, नौकर-चाकर, गुरुजन और दूसरे अपने कहलानेवालोंकी तो बात ही क्या है ॥ ४४ ॥ ये तुच्छ विषय शरीरके साथ ही नष्ट हो जाते हैं। ये जान तो पड़ते हैं पुरुषार्थके समान, परंतु हैं वास्तवमें अनर्थरूप ही। आत्मा स्वयं ही अनन्त आनन्दका महान् समुद्र है। उसके लिये इन वस्तुओंकी क्या आवश्यकता है ? ॥ ४५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

यदर्थ इह कर्माणि विद्वन्मान्यसकृन्नरः
करोत्यतो विपर्यासममोघं विन्दते फलम् ||४१||
सुखाय दुःखमोक्षाय सङ्कल्प इह कर्मिणः
सदाप्नोतीहया दुःखमनीहायाः सुखावृतः ||४२||

इसके सिवा अपने को बड़ा विद्वान् माननेवाला पुरुष इस लोक में जिस उद्देश्य से बार-बार बहुत-से कर्म करता है, उस उद्देश्यकी प्राप्ति तो दूर रही—उलटा उसे उसके विपरीत ही फल मिलता है और निस्सन्देह मिलता है ॥ ४१ ॥ कर्म में प्रवृत्त होने के दो ही उद्देश्य होते हैं—सुख पाना और दु:ख से छूटना। परंतु जो पहले कामना न होने के कारण सुखमें निमग्न रहता था, उसे ही अब कामना के कारण यहाँ सदा-सर्वदा दु:ख ही भोगना पड़ता है ॥ ४२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) नृसिंहभगवान्‌ का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपु का वध  एवं ...