शुक्रवार, 26 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

न ह्यच्युतं प्रीणयतो बह्वायासोऽसुरात्मजाः । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सिद्धत्वादिह सर्वतः ॥ १९ ॥ 
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु । 
भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥ २० ॥ 
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा । 
एक एव परो ह्यात्मा भगवान् ईश्वरोऽव्ययः ॥ २१ ॥ 
प्रत्यगात्मस्वरूपेण दृश्यरूपेण च स्वयम् । 
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो हि, अनिर्देश्योऽविकल्पितः ॥ २२ ॥ 

मित्रो ! भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिये कोई बहुत परिश्रम या प्रयत्न नहीं करना पड़ता। क्योंकि वे समस्त प्राणियों के आत्मा हैं और सर्वत्र सब की सत्ता के रूप में स्वयंसिद्ध वस्तु हैं ॥ १९ ॥ ब्रह्मा से लेकर तिनके तक छोटे-बड़े समस्त प्राणियोंमें, पञ्चभूतों से बनी हुई वस्तुओं में,पञ्चभूतों में, सूक्ष्म तन्मात्राओं में, महत्तत्त्व में, तीनों गुणों में और गुणों की साम्यावस्था प्रकृति में एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं। वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्यों की खान हैं ॥ २०-२१ ॥ वे ही अन्तर्यामी द्रष्टा के रूप में हैं और वे ही दृश्य जगत् के रूपमें भी हैं । सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होने पर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापक के रूप में उनका निर्वचन किया जाता है। वस्तुत: उनमें एक भी विकल्प नहीं है ॥ २२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

कुटुम्बपोषाय वियन् निजायुः 
     न बुध्यतेऽर्थं विहतं प्रमत्तः । 
सर्वत्र तापत्रयदुःखितात्मा 
     निर्विद्यते न स्वकुटुम्बरामः ॥ १४ ॥ 
वित्तेषु नित्याभिनिविष्टचेता 
     विद्वांश्च दोषं परवित्तहर्तुः । 
प्रेत्येह चाथाप्यजितेन्द्रियस्तद् 
     अशान्तकामो हरते कुटुम्बी ॥ १५ ॥ 
विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बं 
     पुष्णन् स्वलोकाय न कल्पते वै । 
यः स्वीयपारक्यविभिन्नभावः 
     तमः प्रपद्येत यथा विमूढः ॥ १६ ॥ 
यतो न कश्चित् क्व च कुत्रचिद् वा 
     दीनः स्वमात्मानमलं समर्थः । 
विमोचितुं कामदृशां विहार 
     क्रीडामृगो यन्निगडो विसर्गः ॥ १७ ॥ 
ततो विदूरात् परिहृत्य दैत्या 
     दैत्येषु सङ्‌गं विषयात्मकेषु । 
उपेत नारायणमादिदेवं 
     स मुक्तसङ्‌गैः इषितोऽपवर्गः ॥ १८ ॥ 

यह मेरा कुटुम्ब है, इस भाव से उस में वह इतना रम जाता है कि उसी के पालन-पोषण के लिये अपनी अमूल्य आयु को गवाँ देता है और उसे यह भी नहीं जान पड़ता कि मेरे जीवन का वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो रहा है। भला, इस प्रमाद की भी कोई सीमा है। यदि इन कामों में कुछ सुख मिले तो भी एक बात है; परंतु यहाँ तो जहाँ-जहाँ वह जाता है, वहीं-वहीं दैहिक, दैविक और भौतिक ताप उसके हृदय को जलाते ही रहते हैं। फिर भी वैराग्य का उदय नहीं होता। कितनी विडम्बना है ! कुटुम्ब की ममता के फेर में पडक़र वह इतना असावधान हो जाता है, उसका मन धनके चिन्तन में सदा इतना लवलीन रहता है कि वह दूसरे का धन चुराने के लौकिक-पारलौकिक दोषों को जानता हुआ भी कामनाओं को वश में न कर सकने के कारण इन्द्रियों के भोग की लालसा से चोरी कर ही बैठता है ॥ १४-१५ ॥ भाइयो ! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियों के पेट पालने में ही लगा रहता है—कभी भगवद्भजन नहीं करता—वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि अपने पराये का भेद-भाव रहने के कारण उसे भी अज्ञानियों के समान ही तम:प्रधान गति प्राप्त होती है ॥ १६ ॥ जो कामिनियों के मनोरञ्जनका सामान—उनका क्रीडामृग बन रहा है और जिसने अपने पैरों में सन्तान की बेड़ी जकड़ ली है, वह बेचारा गरीब—चाहे कोई भी हो, कहीं भी हो—किसी भी प्रकारसे अपना उद्धार नहीं कर सकता ॥ १७ ॥ इसलिये, भाइयो ! तुमलोग विषयासक्त दैत्यों का सङ्ग दूर से ही छोड़ दो और आदिदेव भगवान्‌ नारायण की शरण ग्रहण करो ! क्योंकि जिन्होंने संसार की आसक्ति छोड़ दी है, उन महात्माओं के वे ही परम प्रियतम और परम गति हैं ॥ १८ ॥

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गुरुवार, 25 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

पुत्रान् स्मरंस्ता दुहितॄर्हृदय्या 
     भ्रातॄन् स्वसॄर्वा पितरौ च दीनौ । 
गृहान् मनोज्ञोः उपरिच्छदांश्च 
     वृत्तीश्च कुल्याः पशुभृत्यवर्गान् ॥ १२ ॥ 
त्यजेत कोशस्कृदिवेहमानः 
     कर्माणि लोभादवितृप्तकामः । 
औपस्थ्यजैह्वं बहुमन्यमानः 
     कथं विरज्येत दुरन्तमोहः ॥ १३ ॥ 

जो अपनी ससुराल गयी हुई प्रिय पुत्रियों, पुत्रों, भाई-बहिनों और दीन अवस्था को प्राप्त पिता-माता, बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर बहुमूल्य सामग्रियों से सजे हुए घरों, कुलपरम्परागत जीविका के साधनों तथा पशुओं और सेवकों के निरन्तर स्मरण में रम गया है, वह भला उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥ १२ ॥ जो जननेन्द्रिय और रसनेन्द्रिय के सुखों को ही सर्वस्व मान बैठा है, जिसकी भोगवासनाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जो लोभवश कर्म-पर-कर्म करता हुआ रेशम के कीड़े की तरह अपने को और भी कड़े बन्धन में जकड़ता जा रहा है और जिसके मो की कोई सीमा नहीं है—वह उनसे किस प्रकार विरक्त हो सकता है और कैसे उनका त्याग कर सकता है ॥ १३ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

को गृहेषु पुमान्सक्तं आत्मानं अजितेन्द्रियः । 
स्नेहपाशैर्दृढैर्बद्धं उत्सहेत विमोचितुम् ॥ ९ ॥ 
को न्वर्थतृष्णां विसृजेत् प्राणेभ्योऽपि य ईप्सितः । 
यं क्रीणात्यसुभिः प्रेष्ठैः तस्करः सेवको वणिक् ॥ १० ॥ 
कथं प्रियाया अनुकम्पितायाः 
     सङ्‌गं रहस्यं रुचिरांश्च मन्त्रान् । 
सुहृत्सु तत्स्नेहसितः शिशूनां 
     कलाक्षराणामनुरक्तचित्तः ॥ ११ ॥ 

दैत्यबालको ! जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, ऐसा कौन-सा पुरुष होगा, जो घर-गृहस्थी में आसक्त और माया-ममता की मजबूत फाँसी में फँसे हुए अपने-आपको उससे छुड़ाने का साहस कर सके ॥ ९ ॥ जिसे चोर, सेवक एवं व्यापारी अपने अत्यन्त प्यारे प्राणों की भी बाजी लगाकर संग्रह करते हैं और इसलिये उन्हें जो प्राणों से भी अधिक वाञ्छनीय है—उस धन की तृष्णा को भला, कौन त्याग सकता है ॥ १० ॥ जो अपनी प्रियतमा पत्नी के एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी-मीठी सलाह पर अपने को निछावर कर चुका है, भाई-बन्धु और मित्रों के स्नेह-पाश में बँध चुका है और नन्हें-नन्हें शिशुओं की तोतली बोली पर लुभा चुका है—भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥ ११ ॥ 

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बुधवार, 24 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

ततो यतेत कुशलः क्षेमाय भवमाश्रितः । 
शरीरं पौरुषं यावत् न विपद्येत पुष्कलम् ॥ ५ ॥ 
पुंसो वर्षशतं ह्यायुः तदर्धं चाजितात्मनः । 
निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेऽन्धं प्रापितस्तमः ॥ ६ ॥ 
मुग्धस्य बाल्ये कौमारे क्रीडतो याति विंशतिः । 
जरया ग्रस्तदेहस्य यात्यकल्पस्य विंशतिः ॥ ७ ॥ 
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा । 
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥ ८ ॥ 

हमारे सिरपर अनेकों प्रकार के भय सवार रहते हैं। इसलिये यह शरीर—जो भगवत्प्राप्ति के लिये पर्याप्त है—जबतक रोग-शोकादिग्रस्त होकर मृत्युके मुख में नहीं चला जाता, तभी तक बुद्धिमान् पुरुष को अपने कल्याणके  लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥ मनुष्य की पूरी आयु सौ वर्ष की है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर लिया है, उनकी आयु का आधा हिस्सा तो यों ही बीत जाता है। क्योंकि वे रात में घोर तमोगुण—अज्ञान से ग्रस्त होकर सोते रहते हैं ॥ ६ ॥ बचपन में उन्हें अपने हित-अहित का ज्ञान नहीं रहता, कुछ बड़े होने पर कुमार अवस्था में वे खेल-कूदमें लग जाते हैं। इस प्रकार बीस वर्ष का तो पता ही नहीं चलता। जब बुढ़ापा शरीर को ग्रस लेता है, तब अन्त के बीस वर्षों में कुछ करने-धरने की शक्ति ही नहीं रह जाती ॥ ७ ॥ रह गयी बीच की कुछ थोड़ी-सी आयु। उसमें कभी न पूरी होनेवाली बड़ी-बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखनेवाला मोह है और घर-द्वार की वह आसक्ति है, जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कुछ कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान ही नहीं रहता। इस प्रकार बची-खुची आयु भी हाथ से निकल जाती है ॥ ८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

प्रह्लाद उवाच
कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह । 
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥ १ ॥ 
यथा हि पुरुषस्येह विष्णोः पादोपसर्पणम् । 
यदेष सर्वभूतानां प्रिय आत्मेश्वरः सुहृत् ॥ २ ॥ 
सुखं ऐन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम् । 
सर्वत्र लभ्यते दैवाद् यथा दुःखमयत्‍नतः ॥ ३ ॥ 
तत्प्रयासो न कर्तव्यो यत आयुर्व्ययः परम् । 
न तथा विन्दते क्षेमं मुकुन्दचरणाम्बुजम् ॥ ४ ॥ 

प्रह्लादजीने कहा—मित्रो ! इस संसार में मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। इसके द्वारा अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। परंतु पता नहीं कब इसका अन्त हो जाय; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को बुढ़ापे या जवानी के भरोसे न रहकर बचपन में ही भगवान्‌ की प्राप्ति कराने वाले साधनों का अनुष्ठान कर लेना चाहिये ॥ १ ॥ इस मनुष्य-जन्म में श्रीभगवान्‌ के चरणों की शरण लेना ही जीवन की एकमात्र सफलता है। क्योंकि भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं ॥ २ ॥ भाइयो ! इन्द्रियों से जो सुख भोगा जाता है, वह तो—जीव चाहे जिस योनिमें रहे—प्रारब्ध के अनुसार सर्वत्र वैसे ही मिलता रहता है, जैसे बिना किसी प्रकार का प्रयत्न किये, निवारण करनेपर भी दु:ख मिलता है ॥ ३ ॥ इसलिये सांसारिक सुख के उद्देश्य से प्रयत्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि स्वयं मिलनेवाली वस्तुके  लिये परिश्रम करना आयु और शक्ति को व्यर्थ गँवाना है। जो इनमें उलझ जाते हैं, उन्हें भगवान्‌ के परम कल्याण-स्वरूप चरणकमलों की प्राप्ति नहीं होती ॥ ४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 23 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

यदाचार्यः परावृत्तो गृहमेधीयकर्मसु
वयस्यैर्बालकैस्तत्र सोपहूतः कृतक्षणैः ||५४||
अथ तान्श्लक्ष्णया वाचा प्रत्याहूय महाबुधः
उवाच विद्वांस्तन्निष्ठां कृपया प्रहसन्निव ||५५||
ते तु तद्गौरवात्सर्वे त्यक्तक्रीडापरिच्छदाः
बाला अदूषितधियो द्वन्द्वारामेरितेहितैः ||५६||
पर्युपासत राजेन्द्र तन्न्यस्तहृदयेक्षणाः
तानाह करुणो मैत्रो महाभागवतोऽसुरः ||५७||

एक दिन गुरुजी गृहस्थी के काम से कहीं बाहर चले गये थे। छुट्टी मिल जाने के कारण समवयस्क बालकों ने प्रह्लाद जी को खेलने के लिये पुकारा ॥ ५४ ॥ प्रह्लादजी परम ज्ञानी थे, उनका प्रेम देखकर उन्होंने उन बालकोंको ही बड़ी मधुर वाणीसे पुकारकर अपने पास बुला लिया। उनसे उनके जन्म-मरण की गति भी छिपी नहीं थी। उनपर कृपा करके हँसते हुए- से उन्हें उपदेश करने लगे ॥ ५५ ॥ युधिष्ठिर ! वे सब अभी बालक ही थे, इसलिये राग-द्वेषपरायण विषयभोगी पुरुषों के उपदेशों से और चेष्टाओं से उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी। इसीसे, और प्रह्लादजी के प्रति आदर-बुद्धि होनेसे उन सबने अपनी खेल-कूदकी सामग्रियोंको छोड़ दिया तथा प्रह्लादजी के पास जाकर उनके चारों ओर बैठ गये और उनके उपदेशमें मन लगाकर बड़े प्रेमसे एकटक उनकी ओर देखने लगे। भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादका हृदय उनके प्रति करुणा और मैत्रीके भावसे भर गया तथा वे उनसे कहने लगे ॥ ५६-५७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादानुचरिते पञ्चमोऽध्यायः

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत्
धर्मो ह्यस्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम् ||५१||
धर्ममर्थं च कामं च नितरां चानुपूर्वशः
प्रह्रादायोचतू राजन्प्रश्रितावनताय च ||५२||
यथा त्रिवर्गं गुरुभिरात्मने उपशिक्षितम्
न साधु मेने तच्छिक्षां द्वन्द्वारामोपवर्णिताम् ||५३||

हिरण्यकशिपु ने ‘अच्छा, ठीक है कहकर गुरुपुत्रों की सलाह मान ली और कहा कि ‘इसे उन धर्मों का उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं’ ॥ ५१ ॥ युधिष्ठिर ! इसके बाद पुरोहित उन्हें लेकर पाठशाला में गये और क्रमश: धर्म, अर्थ और काम—इन तीन पुरुषार्थों की शिक्षा देने लगे। प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवक की भाँति रहते थे ॥ ५२ ॥ परंतु गुरुओंकी वह शिक्षा प्रह्लादको अच्छी न लगी। क्योंकि गुरुजी उन्हें केवल अर्थ, धर्म और कामकी ही शिक्षा देते थे। यह शिक्षा केवल उन लोगोंके लिये है, जो राग-द्वेष आदि द्वन्द्व और विषय- भोगोंमें रस ले रहे हों ॥ ५३ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 22 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

इति तच्चिन्तया किञ्चिन्म्लानश्रियमधोमुखम्
शण्डामर्कावौशनसौ विविक्त इति होचतुः ||४८||
जितं त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवो-
र्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम्
न तस्य चिन्त्यं तव नाथ चक्ष्वहे 
न वै शिशूनां गुणदोषयोः पदम् ||४९||
इमं तु पाशैर्वरुणस्य बद्ध्वा 
निधेहि भीतो न पलायते यथा
बुद्धिश्च पुंसो वयसार्यसेवया 
यावद्गुरुर्भार्गव आगमिष्यति ||५०||

इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु तो मुँह लटकाकर बैठा हुआ है, तब उन्होंने एकान्त में जाकर उससे यह बात कही— ॥ ४८ ॥ ‘स्वामी ! आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। आपके भौंहें टेढ़ी करनेपर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखने में तो आपके लिये चिन्ता की कोई बात नहीं है। भला, बच्चोंके खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है ॥ ४९ ॥ जब तक हमारे पिता शुक्राचार्य जी नहीं आ जाते, तब तक यह डरकर कहीं भाग न जाय। इसलिये इसे वरुणके पाशों से बाँध रखिये। प्राय: ऐसा होता है कि अवस्था की वृद्धि के साथ-साथ और गुरुजनों की सेवा से बुद्धि सुधर जाया करती है’ ॥ ५० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

चिन्तां दीर्घतमां प्राप्तस्तत्कर्तुं नाभ्यपद्यत
एष मे बह्वसाधूक्तो वधोपायाश्च निर्मिताः
तैस्तैद्रोहैरसद्धर्मैर्मुक्तः स्वेनैव तेजसा ||४५||
वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम्
न विस्मरति मेऽनार्यं शुनः शेप इव प्रभुः ||४६||
अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः
नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा ||४७||

वह (हिरण्यकशिपु ) सोचने लगा—‘इसे मैंने बहुत कुछ बुरा- भला कहा, मार डालने के बहुत-से उपाय किये। परंतु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता से अपने प्रभाव से ही बचता गया ॥ ४५ ॥ यह बालक होने पर भी समझदार है और मेरे पास ही नि:शङ्क भाव से रहता है। हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुन:शेप[*] अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारों को न भूलेगा ॥ ४६ ॥ न तो यह किसी से डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है। इसकी शक्ति की थाह नहीं है। अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी। सम्भव है, न भी हो’ ॥ ४७ ॥
...................................... 
[*] शुन:शेप अजीगर्त का मँझला पुत्र था। उसे पिता ने वरुण के यज्ञ में बलि देने के लिये हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व के हाथ बेच दिया था। तब उसके मामा विश्वामित्रजी ने उसकी रक्षा की और वह अपने पिता से विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजी के ही गोत्र में हो गया। यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’के सातवें अध्याय में आवेगी।

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०६) प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश न ह्यच्युतं प्रीणयतो...