॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
वृत्रासुरका वध
अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् ।
भूतैः सृजति भूतानि ग्रसते तानि तैः स्वयम् ॥ १२ ॥
आयुः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं आशिषः पुरुषस्य याः ।
भवन्त्येव हि तत्काले यथानिच्छोर्विपर्ययाः ॥ १३ ॥
तस्मादकीर्तियशसोः जयापजययोरपि ।
समः स्यात्सुखदुःखाभ्यां मृत्युजीवितयोस्तथा ॥ १४ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः ।
तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद स न बध्यते ॥ १५ ॥
पश्य मां निर्जितं शत्रु वृक्णायुधभुजं मृधे ।
घटमानं यथाशक्ति तव प्राणजिहीर्षया ॥ १६ ॥
प्राणग्लहोऽयं समर इष्वक्षो वाहनासनः ।
अत्र न ज्ञायतेऽमुष्य जयोऽमुष्य पराजयः ॥ १७ ॥
जिसे इस बात का पता नहीं है कि भगवान् ही सब का नियन्त्रण करते हैं, वही इस परतन्त्र जीव को स्वतन्त्र कर्ता-भोक्ता मान बैठता है। वस्तुत: स्वयं भगवान् ही प्राणियों के द्वारा प्राणियों की रचना और उन्हीं के द्वारा उनका संहार करते हैं ॥ १२ ॥ जिस प्रकार इच्छा न होनेपर भी समय विपरीत होने से मनुष्य को मृत्यु और अपयश आदि प्राप्त होते हैं—वैसे ही समयकी अनुकूलता होनेपर इच्छा न होनेपर भी उसे आयु, लक्ष्मी, यश और ऐश्वर्य आदि भोग भी मिल जाते हैं ॥ १३ ॥ इसलिये यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दु:ख, जीवन-मरण—इनमें से किसी एक की इच्छा-अनिच्छा न रखकर सभी परिस्थितियों में समभाव से रहना चाहिये—हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना चाहिये ॥ १४ ॥ सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं; अत: जो पुरुष आत्मा को उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोष से लिप्त नहीं होता ॥ १५ ॥ देवराज इन्द्र ! मुझे भी तो देखो; तुमने मेरा हाथ और शस्त्र काटकर एक प्रकार से मुझे परास्त कर दिया है, फिर भी मैं तुम्हारे प्राण लेने के लिये यथाशक्ति प्रयत्न कर ही रहा हूँ ॥ १६ ॥ यह युद्ध क्या है, एक जूए का खेल । इसमें प्राण की बाजी लगती है, बाणों के पासे डाले जाते हैं और वाहन ही चौसर हैं। इसमें पहले से यह बात नहीं मालूम होती कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा ॥१७ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --