॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
पुंसवन-व्रतकी विधि
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय
महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिः
बलिमुपहरामीति । अनेनाहरहर्मन्त्रेण
विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नान
वासउपवीतविभूषण गन्धपुष्पधूपदीपोपहारादि
उपचारान् सुसमाहित उपाहरेत् ॥ ७ ॥
हविःशेषं च जुहुयादनले द्वादशाहुतीः ।
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ॥ ८ ॥
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ ।
भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ॥ ९ ॥
प्रणमेद् दण्डवद्भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा ।
दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ॥ १० ॥
परीक्षित् ! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि।’ ‘ओङ्कारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियों के स्वामी भगवान् पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियों को मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहार की सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्र के द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्त से विष्णुभगवान् का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे ॥ ७ ॥ जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा।’ ‘महान् ऐश्वर्योंके अधिपति भगवान् पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्नि में बारह आहुतियाँ दे ॥ ८ ॥ परीक्षित् ! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं ॥ ९ ॥ इसके बाद भक्तभिावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्को साष्टाङ्ग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे— ॥ १० ॥
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