शनिवार, 30 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट१०)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

जज्ञाते तौ दितेः पुत्रौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्ज्येष्ठो हिरण्याक्षोऽनुजस्ततः ||३९||
हतो हिरण्यकशिपुर्हरिणा सिंहरूपिणा
हिरण्याक्षो धरोद्धारे बिभ्रता शौकरं वपुः ||४०||
हिरण्यकशिपुः पुत्रं प्रह्लादं केशवप्रियम्
जिघांसुरकरोन्नाना यातना मृत्युहेतवे ||४१||
तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम्
भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ||४२||

युधिष्ठिर ! वे ही दोनों दिति के पुत्र हुए। उनमें बड़े का नाम हिरण्यकशिपु था और उससे छोटे का हिरण्याक्ष। दैत्य और दानवोंके समाजमें यही दोनों सर्वश्रेष्ठ थे ॥ ३९ ॥ विष्णुभगवान्‌ ने नृसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकशिपु को और पृथ्वी का उद्धार करनेके समय वराहावतार ग्रहण करके हिरण्याक्ष को मारा ॥ ४० ॥ हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवत्प्रेमी होनेके कारण मार डालना चाहा और इसके लिये उन्हें बहुत-सी यातनाएँ दीं ॥ ४१ ॥ परंतु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्‌ के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे। उनके हृदयमें अटल शान्ति थी। भगवान्‌ के प्रभाव से वे सुरक्षित थे। इसलिये तरह-तरह से चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ ॥ ४२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०९)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीयुधिष्ठिर उवाच
कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः
अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः ||३३||
देहेन्द्रि यासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्
देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमर्हसि ||३४||

श्रीनारद उवाच
एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णुलोकं यदृच्छया
सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम् ||३५||
पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः
दिग्वाससः शिशून्मत्वा द्वाःस्थौ तान्प्रत्यषेधताम् ||३६||
अशपन्कुपिता एवं युवां वासं न चार्हथः
रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विषः
पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्वतः ||३७||
एवं शप्तौ स्वभवनात्पतन्तौ तौ कृपालुभिः
प्रोक्तौ पुनर्जन्मभिर्वां त्रिभिर्लोकाय कल्पताम् ||३८||

राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! भगवान्‌ के पार्षदों को भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था ? भगवान्‌ के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसार में आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय-सी मालूम पड़ती है ॥ ३३ ॥ वैकुण्ठ के रहनेवाले लोग प्राकृत शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंसे रहित होते हैं। उनका प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध किस प्रकार हुआ, यह बात आप अवश्य सुनाइये ॥ ३४ ॥
नारदजीने कहा—एक दिन ब्रह्मा के मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे ॥ ३५ ॥ यों तो वे सबसे प्राचीन हैं, परंतु जान पड़ते हैं ऐसे मानों पाँच-छ: बरसके बच्चे हों। वस्त्र भी नहीं पहनते। उन्हें साधारण बालक समझकर द्वारपालोंने उनको भीतर जानेसे रोक दिया ॥ ३६ ॥ इसपर वे क्रोधित-से हो गये और उन्होंने द्वारपालोंको यह शाप दिया कि ‘मूर्खो ! भगवान्‌ विष्णुके चरण तो रजोगुण और तमोगुणसे रहित हैं। तुम दोनों इनके समीप निवास करनेयोग्य नहीं हो। इसलिये शीघ्र ही तुम यहाँसे पापमयी असुरयोनि में जाओ’ ॥ ३७ ॥ उनके इस प्रकार शाप देते ही जब वे वैकुण्ठ से नीचे गिरने लगे, तब उन कृपालु महात्माओं ने कहा—‘अच्छा तीन जन्मोंमें इस शापको भोगकर तुमलोग फिर इसी वैकुण्ठमें आ जाना’ ॥ ३८ ॥

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शुक्रवार, 29 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः
सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो ||३०||
कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति
तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ||३१||
मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पाण्डव
पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदच्युतौ ||३२||

महाराज ! गोपियों ने भगवान्‌ से मिलन के तीव्र काम अर्थात् प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओं ने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवार के सम्बन्ध से, तुमलोगों ने स्नेह से और हमलोगों ने भक्ति से अपने मन को भगवान्‌ में लगाया है ॥ ३० ॥ भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्‌ का चिन्तन करने वाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती (क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्‌ में मन नहीं लगाया था )। सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान्‌ श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये ॥ ३१ ॥ महाराज ! फिर तुम्हारे मौसेरे भाई शिशुपाल और दन्तवक्त्र दोनों ही विष्णुभगवान्‌के मुख्य पार्षद थे। ब्राह्मणोंके शापसे इन दोनोंको अपने पदसे च्युत होना पड़ा था ॥ ३२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ||२६||
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्यायां तमनुस्मरन्
संरम्भभययोगेन विन्दते तत्स्वरूपताम् ||२७||
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे
वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया ||२८||
कामाद्द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मनः
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ||२९||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) युधिष्ठिर ! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभाव से भगवान्‌ में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोग से नहीं होता ॥ २६ ॥ भृङ्गी कीड़े को लाकर भीत पर अपने छिद्र में बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेग से भृङ्गी का चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है ॥ २७ ॥ यही बात भगवान्‌ श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में भी है। लीला के द्वारा मनुष्य मालूम पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ ही तो हैं। इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये ॥ २८ ॥ एक नहीं, अनेकों मनुष्य काम से, द्वेष से, भय से और स्नेह से अपने मन को भगवान्‌ में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्‌ को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्ति से ॥२९॥ 

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गुरुवार, 28 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीबादरायणिरुवाच
राज्ञस्तद्वच आकर्ण्य नारदो भगवानृषिः
तुष्टः प्राह तमाभाष्य शृण्वत्यास्तत्सदः कथाः ||२१||

श्रीनारद उवाच
निन्दनस्तवसत्कार न्यक्कारार्थं कलेवरम्
प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम् ||२२||
हिंसा तदभिमानेन दण्डपारुष्ययोर्यथा
वैषम्यमिह भूतानां ममाहमिति पार्थिव ||२३||
यन्निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वधः
तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः
परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ||२४||
तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा
स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात्कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ||२५||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सर्वसमर्थ देवर्षि नारद राजाके ये प्रश्न सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने युधिष्ठिर को सम्बोधित करके भरी सभा में सबके सुनते हुए यह कथा कही ॥ २१ ॥

नारदजी ने कहा—युधिष्ठिर ! निन्दा,स्तुति सत्कार और तिरस्कार—इस शरीर के ही तो होते हैं। इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक-ठीक विवेक न होने के कारण ही हुई है ॥२२॥ जब इस शरीर को ही अपना आत्मा मान लिया जाता है, तब ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव बन जाता है। यही सारे भेदभावका मूल है। इसीके कारण ताडऩा और दुर्वचनोंसे पीड़ा होती है ॥ २३ ॥ जिस शरीर में अभिमान हो जाता है कि ‘यह मैं हूँ’, उस शरीर के वध से प्राणियों को अपना वध जान पड़ता है। किन्तु भगवान्‌ में तो जीवों के समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं। वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं—वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं। तब भगवान्‌ के सम्बन्ध में हिंसा की कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है ॥ २४ ॥ इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभाव से या वैरहीन भक्तिभाव से, भय से, स्नेह से अथवा कामना से—कैसे भी हो, भगवान्‌ में अपना मन पूर्णरूप से लगा देना चाहिये । भगवान्‌की दृष्टि से इन भावों में कोई भेद नहीं है ॥ २५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

एतद्वेदितुमिच्छामः सर्व एव वयं मुने
भगवन्निन्दया वेनो द्विजैस्तमसि पातितः ||१६||
दमघोषसुतः पाप आरभ्य कलभाषणात्
सम्प्रत्यमर्षी गोविन्दे दन्तवक्रश्च दुर्मतिः ||१७||
शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम्
श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ||१८||
कथं तस्मिन्भगवति दुरवग्राह्यधामनि
पश्यतां सर्वलोकानां लयमीयतुरञ्जसा ||१९||
एतद्भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना
ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवान्ह्यत्र कारणम् ||२०||

नारदजी ! इसका रहस्य हम सभी जानना चाहते हैं। पूर्वकाल में भगवान्‌ की निन्दा करने के कारण ऋषियोंने राजा वेनको नरकमें डाल दिया था ॥ १६ ॥ यह दमघोषका लडक़ा पापात्मा शिशुपाल और दुर्बुद्धि दन्तवक्त्र—दोनों ही जब से तुतलाकर बोलने लगे थे, तब से अब तक भगवान्‌ से द्वेष ही करते रहे हैं ॥ १७ ॥ अविनाशी परब्रह्म भगवान्‌ श्रीकृष्ण को ये पानी पी-पीकर गाली देते रहे हैं। परंतु इसके फलस्वरूप न तो इनकी जीभ में कोढ़ ही हुआ और न इन्हें घोर अन्धकारमय नरक की ही प्राप्ति हुई ॥ १८ ॥ प्रत्युत जिन भगवान्‌ की प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, उन्हीं में ये दोनों सब के देखते-देखते अनायास ही लीन हो गये—इसका क्या कारण है ? ॥ १९ ॥ हवा के झोंके से लडख़ड़ाती हुई दीपक की लौ के समान मेरी बुद्धि इस विषय में बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अत: इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये ॥ २० ॥

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बुधवार, 27 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

अत्रैवोदाहृतः पूर्वमितिहासः सुरर्षिणा
प्रीत्या महाक्रतौ राजन्पृच्छतेऽजातशत्रवे ||१२||
दृष्ट्वा महाद्भुतं राजा राजसूये महाक्रतौ
वासुदेवे भगवति सायुज्यं चेदिभूभुजः ||१३||
तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ
पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां शृण्वतामिदम् ||१४||

श्रीयुधिष्ठिर उवाच
अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि
वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः ||१५||

राजन् ! इसी विषयमें देवर्षि नारदने बड़े प्रेमसे एक इतिहास कहा था। यह उस समयकी बात है, जब राजसूय यज्ञमें तुम्हारे दादा युधिष्ठिरने उनसे इस सम्बन्धमें एक प्रश्न किया था ॥ १२ ॥ उस महान् राजसूय यज्ञ में राजा युधिष्ठर ने अपनी आँखोंके सामने बड़ी आश्चर्यजनक घटना देखी कि चेदिराज शिशुपाल सबके देखते-देखते भगवान्‌ श्रीकृष्णमें समा गया ॥ १३ ॥ वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे। इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े-बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभा में उस यज्ञमण्डप में ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—अहो ! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान्‌ श्रीकृष्ण में समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्‌ से द्वेष करने वाले शिशुपाल को यह गति कैसे मिली ? ॥ १५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०३)
 
नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यदा सिसृक्षुः पुर आत्मनः परो रजः सृजत्येष पृथक्स्वमायया
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वरः शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ||१०||
कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयं प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत्
य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यतः
तत्प्रत्यनीकानसुरान्सुरप्रियो रजस्तमस्कान्प्रमिणोत्युरुश्रवाः ||११||

जब परमेश्वर अपने लिये शरीरों का निर्माण करना चाहते हैं, तब अपनी माया से रजोगुण की अलग सृष्टि करते हैं। जब वे विचित्र योनियों में रमण करना चाहते हैं, तब सत्त्वगुणकी सृष्टि करते हैं और जब वे शयन करना चाहते हैं, तब तमोगुणको बढ़ा देते हैं ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ सत्यसङ्कल्प हैं। वे ही जगत् की उत्पत्ति के निमित्तभूत प्रकृति और पुरुष के सहकारी एवं आश्रय काल की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे काल के अधीन नहीं, काल ही उनके अधीन है। राजन् ! ये कालस्वरूप ईश्वर जब सत्त्वगुणकी वृद्धि करते हैं, तब सत्त्वमय देवताओंका बल बढ़ाते हैं और तभी वे परमयशस्वी देवप्रिय परमात्मा देवविरोधी रजोगुणी एवं तमोगुणी दैत्यों का संहार करते हैं। वस्तुत: वे सम ही हैं ॥ ११ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 26 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान्प्रकृतेः परः
स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ||६||
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः
न तेषां युगपद्रा जन्ह्रास उल्लास एव वा ||७||
जयकाले तु सत्त्वस्य देवर्षीन्रजसोऽसुरान्
तमसो यक्षरक्षांसि तत्कालानुगुणोऽभजत् ||८||
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते
विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ||९||

वास्तव में भगवान्‌ निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृति से परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी माया के गुणों को स्वीकार करके वे बाध्यबाधकभाव को अर्थात् मरने और मारने वाले दोनों के परस्परविरोधी रूपों को ग्रहण करते हैं ॥ ६ ॥ सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये प्रकृति के गुण हैं, परमात्मा के नहीं। परीक्षित्‌ ! इन तीनों गुणों की भी एक साथ ही घटती-बढ़ती नहीं होती ॥ ७ ॥ भगवान्‌ समय-समय के अनुसार गुणों को स्वीकार करते हैं। सत्त्वगुण की वृद्धि के समय देवता और ऋषियोंका, रजोगुणकी वृद्धि के समय दैत्यों का और तमोगुण की वृद्धि के समय वे यक्ष एवं राक्षसोंको अपनाते और उनका अभ्युदय करते हैं ॥ ८ ॥ जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न आश्रयोंमें रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परंतु मन्थन करनेपर वह प्रकट हो जाती है—वैसे ही परमात्मा सभी शरीरोंमें रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते। परंतु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके—उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओंका बाध करके अन्तत: अपने हृदयमें ही अन्तर्यामीरूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीराजोवाच

समः प्रियः सुहृद्ब्रह्मन्भूतानां भगवान्स्वयम्
इन्द्र स्यार्थे कथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ||१||
न ह्यस्यार्थः सुरगणैः साक्षान्निःश्रेयसात्मनः
नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि ||२||
इति नः सुमहाभाग नारायणगुणान्प्रति
संशयः सुमहान्जातस्तद्भवांश्छेत्तुमर्हति ||३||

श्रीऋषिरुवाच
साधु पृष्टं महाराज हरेश्चरितमद्भुतम्
यद्भागवतमाहात्म्यं भगवद्भक्तिवर्धनम् ||४||
गीयते परमं पुण्यमृषिभिर्नारदादिभिः
नत्वा कृष्णाय मुनये कथयिष्ये हरेः कथाम् ||५||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! भगवान्‌ तो स्वभाव से ही भेदभाव से रहित हैं—सम हैं, समस्त प्राणियों के प्रिय और सुहृद् हैं; फिर उन्होंने, जैसे कोई साधारण मनुष्य भेदभाव से अपने मित्र का पक्ष ले और शत्रुओं का अनिष्ट करे, उसी प्रकार इन्द्र के लिये दैत्यों का वध क्यों किया ? ॥ १ ॥ वे स्वयं परिपूर्ण कल्याणस्वरूप हैं, इसीलिये उन्हें देवताओं से कुछ लेना-देना नहीं है । तथा निर्गुण होने के कारण दैत्यों से कुछ वैर-विरोध और उद्वेग भी नहीं है ॥ २ ॥ भगवत्प्रेम के सौभाग्यसे सम्पन्न महात्मन् ! हमारे चित्त में भगवान्‌ के समत्व आदि गुणों के सम्बन्ध में बड़ा भारी सन्देह हो रहा है । आप कृपा करके उसे मिटाइये ॥ ३ ॥ 
श्रीशुकदेवजीने कहा—महाराज ! भगवान्‌ के अद्भुत चरित्रके सम्बन्ध में तुमने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया; क्योंकि ऐसे प्रसङ्ग प्रह्लाद आदि भक्तों की महिमासे परिपूर्ण होते हैं, जिसके श्रवणसे भगवान्‌ की भक्ति बढ़ती है ॥ ४ ॥ इस परम पुण्यमय प्रसङ्ग को नारदादि महात्मागण बड़े प्रेम से गाते रहते हैं । अब मैं अपने पिता श्रीकृष्ण-द्वैपायन मुनि को नमस्कार करके भगवान्‌ की लीला-कथा का वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट१०) नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा जज्ञाते तौ दिते...