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रविवार, 31 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

श्रीनारद उवाच

भ्रातर्येवं विनिहते हरिणा क्रोडमूर्तिना ।
हिरण्यकशिपू राजन् पर्यतप्यद्रुषा शुचा ॥ १॥
आह चेदं रुषा पूर्णः सन्दष्टदशनच्छदः ।
कोपोज्ज्वलद्भ्यां चक्षुर्भ्यां निरीक्षन् धूम्रमम्बरम् ॥ २॥
करालदंष्ट्रोग्रदृष्ट्या दुष्प्रेक्ष्यभ्रुकुटीमुखः ।
शूलमुद्यम्य सदसि दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३॥
भो भो दानवदैतेया द्विमूर्धंस्त्र्यक्ष शम्बर ।
शतबाहो हयग्रीव नमुचे पाक इल्वल ॥ ४ ॥
विप्रचित्ते मम वचः पुलोमन् शकुनादयः ।
शृणुतानन्तरं सर्वे क्रियतामाशु मा चिरम् ॥ ५॥
सपत्नैर्घातितः क्षुद्रैर्भ्राता मे दयितः सुहृत् ।
पार्ष्णिग्राहेण हरिणा समेनाप्युपधावनैः ॥ ६॥

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर ! जब भगवान्‌ ने वराहावतार धारण करके हिरण्याक्ष को मार डाला, तब भाई के इस प्रकार मारे जाने पर हिरण्यकशिपु रोष से जल-भुन गया और शोक से सन्तप्त हो उठा ॥ १ ॥ वह क्रोध से काँपता हुआ अपने दाँतों से बार-बार होठ चबाने लगा । क्रोध से दहकती हुई आँखों की आग के धूएँ से धूमिल हुए आकाश की ओर देखता हुआ वह कहने लगा ॥ २ ॥ उस समय विकराल दाढ़ों, आग उगलनेवाली उग्र दृष्टि और चढ़ी हुई भौंहों के कारण उसका मुँह देखा न जाता था। भरी सभा में त्रिशूल उठाकर उसने द्विमूर्धा, त्र्यक्ष, शम्बर, शतबाहु, हयग्रीव, नमुचि, पाक, इल्वल, विप्रचित्ति, पुलोमा और शकुन आदिको सम्बोधन करके कहा—‘दैत्यो और दानवो ! तुम सब लोग मेरी बात सुनो और उसके बाद जैसे मैं कहता हूँ, वैसे करो ॥ ३—५ ॥ तुम्हें यह ज्ञात है कि मेरे क्षुद्र शत्रुओं ने मेरे परम प्यारे और हितैषी भाई को विष्णु से मरवा डाला है। यद्यपि वह देवता और दैत्य दोनोंके प्रति समान है, तथापि दौड़-धूप और अनुनय-विनय करके देवताओं ने उसे अपने पक्षमें कर लिया है ॥ ६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट११)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ
रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकोपतापनौ ||४३||
तत्रापि राघवो भूत्वा न्यहनच्छापमुक्तये
रामवीर्यं श्रोष्यसि त्वं मार्कण्डेयमुखात्प्रभो ||४४||
तावत्र क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव
अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ||४५||
वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम्
नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ||४६||

श्रीयुधिष्ठिर उवाच

विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि
ब्रूहि मे भगवन्येन प्रह्लादस्याच्युतात्मता ||४७|

युधिष्ठिर ! वे ही दोनों विश्रवा मुनिके द्वारा केशिनी (कैकसी) के गर्भ से राक्षसों के रूपमें पैदा हुए। उनका नाम था रावण और कुम्भकर्ण। उनके उत्पातोंसे सब लोकों में आग-सी लग गयी थी ॥ ४३ ॥ उस समय भी भगवान्‌ ने उन्हें शाप से छुड़ाने के लिये रामरूप से उनका वध किया। युधिष्ठिर ! मार्कण्डेय मुनि के मुख से तुम भगवान्‌ श्रीरामका चरित्र सुनोगे ॥ ४४ ॥ वे ही दोनों जय-विजय इस जन्ममें तुम्हारी मौसीके लडक़े शिशुपाल और दन्तवक्त्रके रूपमें क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए थे। भगवान्‌ श्रीकृष्णके चक्रका स्पर्श प्राप्त हो जानेसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये और वे सनकादिके शापसे मुक्त हो गये ॥ ४५ ॥ वैरभाव के कारण निरन्तर ही वे भगवान्‌ श्रीकृष्णका चिन्तन किया करते थे। उसी तीव्र तन्मयता के फलस्वरूप वे भगवान्‌ को प्राप्त हो गये और पुन: उनके पार्षद होकर उन्हींके समीप चले गये ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिरजीने पूछा—भगवन् ! हिरण्यकशिपु ने अपने स्नेहभाजन पुत्र प्रह्लाद से इतना द्वेष क्यों किया ? फिर प्रह्लाद तो महात्मा थे ! साथ ही यह भी बतलाइये कि किस साधन से प्रह्लाद भगवन्मय हो गये ॥ ४७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरितोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 30 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट१०)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

जज्ञाते तौ दितेः पुत्रौ दैत्यदानववन्दितौ
हिरण्यकशिपुर्ज्येष्ठो हिरण्याक्षोऽनुजस्ततः ||३९||
हतो हिरण्यकशिपुर्हरिणा सिंहरूपिणा
हिरण्याक्षो धरोद्धारे बिभ्रता शौकरं वपुः ||४०||
हिरण्यकशिपुः पुत्रं प्रह्लादं केशवप्रियम्
जिघांसुरकरोन्नाना यातना मृत्युहेतवे ||४१||
तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम्
भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ||४२||

युधिष्ठिर ! वे ही दोनों दिति के पुत्र हुए। उनमें बड़े का नाम हिरण्यकशिपु था और उससे छोटे का हिरण्याक्ष। दैत्य और दानवोंके समाजमें यही दोनों सर्वश्रेष्ठ थे ॥ ३९ ॥ विष्णुभगवान्‌ ने नृसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकशिपु को और पृथ्वी का उद्धार करनेके समय वराहावतार ग्रहण करके हिरण्याक्ष को मारा ॥ ४० ॥ हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवत्प्रेमी होनेके कारण मार डालना चाहा और इसके लिये उन्हें बहुत-सी यातनाएँ दीं ॥ ४१ ॥ परंतु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्‌ के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे। उनके हृदयमें अटल शान्ति थी। भगवान्‌ के प्रभाव से वे सुरक्षित थे। इसलिये तरह-तरह से चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ ॥ ४२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०९)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीयुधिष्ठिर उवाच
कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः
अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः ||३३||
देहेन्द्रि यासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्
देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमर्हसि ||३४||

श्रीनारद उवाच
एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णुलोकं यदृच्छया
सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम् ||३५||
पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः
दिग्वाससः शिशून्मत्वा द्वाःस्थौ तान्प्रत्यषेधताम् ||३६||
अशपन्कुपिता एवं युवां वासं न चार्हथः
रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विषः
पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्वतः ||३७||
एवं शप्तौ स्वभवनात्पतन्तौ तौ कृपालुभिः
प्रोक्तौ पुनर्जन्मभिर्वां त्रिभिर्लोकाय कल्पताम् ||३८||

राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! भगवान्‌ के पार्षदों को भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था ? भगवान्‌ के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसार में आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय-सी मालूम पड़ती है ॥ ३३ ॥ वैकुण्ठ के रहनेवाले लोग प्राकृत शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंसे रहित होते हैं। उनका प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध किस प्रकार हुआ, यह बात आप अवश्य सुनाइये ॥ ३४ ॥
नारदजीने कहा—एक दिन ब्रह्मा के मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे ॥ ३५ ॥ यों तो वे सबसे प्राचीन हैं, परंतु जान पड़ते हैं ऐसे मानों पाँच-छ: बरसके बच्चे हों। वस्त्र भी नहीं पहनते। उन्हें साधारण बालक समझकर द्वारपालोंने उनको भीतर जानेसे रोक दिया ॥ ३६ ॥ इसपर वे क्रोधित-से हो गये और उन्होंने द्वारपालोंको यह शाप दिया कि ‘मूर्खो ! भगवान्‌ विष्णुके चरण तो रजोगुण और तमोगुणसे रहित हैं। तुम दोनों इनके समीप निवास करनेयोग्य नहीं हो। इसलिये शीघ्र ही तुम यहाँसे पापमयी असुरयोनि में जाओ’ ॥ ३७ ॥ उनके इस प्रकार शाप देते ही जब वे वैकुण्ठ से नीचे गिरने लगे, तब उन कृपालु महात्माओं ने कहा—‘अच्छा तीन जन्मोंमें इस शापको भोगकर तुमलोग फिर इसी वैकुण्ठमें आ जाना’ ॥ ३८ ॥

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शुक्रवार, 29 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः
सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो ||३०||
कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति
तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ||३१||
मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पाण्डव
पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदच्युतौ ||३२||

महाराज ! गोपियों ने भगवान्‌ से मिलन के तीव्र काम अर्थात् प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओं ने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवार के सम्बन्ध से, तुमलोगों ने स्नेह से और हमलोगों ने भक्ति से अपने मन को भगवान्‌ में लगाया है ॥ ३० ॥ भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्‌ का चिन्तन करने वाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती (क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्‌ में मन नहीं लगाया था )। सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान्‌ श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये ॥ ३१ ॥ महाराज ! फिर तुम्हारे मौसेरे भाई शिशुपाल और दन्तवक्त्र दोनों ही विष्णुभगवान्‌के मुख्य पार्षद थे। ब्राह्मणोंके शापसे इन दोनोंको अपने पदसे च्युत होना पड़ा था ॥ ३२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०७)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ||२६||
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्यायां तमनुस्मरन्
संरम्भभययोगेन विन्दते तत्स्वरूपताम् ||२७||
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे
वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया ||२८||
कामाद्द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मनः
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ||२९||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) युधिष्ठिर ! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभाव से भगवान्‌ में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोग से नहीं होता ॥ २६ ॥ भृङ्गी कीड़े को लाकर भीत पर अपने छिद्र में बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेग से भृङ्गी का चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है ॥ २७ ॥ यही बात भगवान्‌ श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में भी है। लीला के द्वारा मनुष्य मालूम पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ ही तो हैं। इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये ॥ २८ ॥ एक नहीं, अनेकों मनुष्य काम से, द्वेष से, भय से और स्नेह से अपने मन को भगवान्‌ में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्‌ को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्ति से ॥२९॥ 

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गुरुवार, 28 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०६)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीबादरायणिरुवाच
राज्ञस्तद्वच आकर्ण्य नारदो भगवानृषिः
तुष्टः प्राह तमाभाष्य शृण्वत्यास्तत्सदः कथाः ||२१||

श्रीनारद उवाच
निन्दनस्तवसत्कार न्यक्कारार्थं कलेवरम्
प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम् ||२२||
हिंसा तदभिमानेन दण्डपारुष्ययोर्यथा
वैषम्यमिह भूतानां ममाहमिति पार्थिव ||२३||
यन्निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वधः
तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः
परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ||२४||
तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा
स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात्कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ||२५||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सर्वसमर्थ देवर्षि नारद राजाके ये प्रश्न सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने युधिष्ठिर को सम्बोधित करके भरी सभा में सबके सुनते हुए यह कथा कही ॥ २१ ॥

नारदजी ने कहा—युधिष्ठिर ! निन्दा,स्तुति सत्कार और तिरस्कार—इस शरीर के ही तो होते हैं। इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक-ठीक विवेक न होने के कारण ही हुई है ॥२२॥ जब इस शरीर को ही अपना आत्मा मान लिया जाता है, तब ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव बन जाता है। यही सारे भेदभावका मूल है। इसीके कारण ताडऩा और दुर्वचनोंसे पीड़ा होती है ॥ २३ ॥ जिस शरीर में अभिमान हो जाता है कि ‘यह मैं हूँ’, उस शरीर के वध से प्राणियों को अपना वध जान पड़ता है। किन्तु भगवान्‌ में तो जीवों के समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं। वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं—वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं। तब भगवान्‌ के सम्बन्ध में हिंसा की कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है ॥ २४ ॥ इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभाव से या वैरहीन भक्तिभाव से, भय से, स्नेह से अथवा कामना से—कैसे भी हो, भगवान्‌ में अपना मन पूर्णरूप से लगा देना चाहिये । भगवान्‌की दृष्टि से इन भावों में कोई भेद नहीं है ॥ २५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०५)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

एतद्वेदितुमिच्छामः सर्व एव वयं मुने
भगवन्निन्दया वेनो द्विजैस्तमसि पातितः ||१६||
दमघोषसुतः पाप आरभ्य कलभाषणात्
सम्प्रत्यमर्षी गोविन्दे दन्तवक्रश्च दुर्मतिः ||१७||
शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम्
श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ||१८||
कथं तस्मिन्भगवति दुरवग्राह्यधामनि
पश्यतां सर्वलोकानां लयमीयतुरञ्जसा ||१९||
एतद्भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना
ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवान्ह्यत्र कारणम् ||२०||

नारदजी ! इसका रहस्य हम सभी जानना चाहते हैं। पूर्वकाल में भगवान्‌ की निन्दा करने के कारण ऋषियोंने राजा वेनको नरकमें डाल दिया था ॥ १६ ॥ यह दमघोषका लडक़ा पापात्मा शिशुपाल और दुर्बुद्धि दन्तवक्त्र—दोनों ही जब से तुतलाकर बोलने लगे थे, तब से अब तक भगवान्‌ से द्वेष ही करते रहे हैं ॥ १७ ॥ अविनाशी परब्रह्म भगवान्‌ श्रीकृष्ण को ये पानी पी-पीकर गाली देते रहे हैं। परंतु इसके फलस्वरूप न तो इनकी जीभ में कोढ़ ही हुआ और न इन्हें घोर अन्धकारमय नरक की ही प्राप्ति हुई ॥ १८ ॥ प्रत्युत जिन भगवान्‌ की प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, उन्हीं में ये दोनों सब के देखते-देखते अनायास ही लीन हो गये—इसका क्या कारण है ? ॥ १९ ॥ हवा के झोंके से लडख़ड़ाती हुई दीपक की लौ के समान मेरी बुद्धि इस विषय में बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अत: इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये ॥ २० ॥

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बुधवार, 27 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०४)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

अत्रैवोदाहृतः पूर्वमितिहासः सुरर्षिणा
प्रीत्या महाक्रतौ राजन्पृच्छतेऽजातशत्रवे ||१२||
दृष्ट्वा महाद्भुतं राजा राजसूये महाक्रतौ
वासुदेवे भगवति सायुज्यं चेदिभूभुजः ||१३||
तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ
पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां शृण्वतामिदम् ||१४||

श्रीयुधिष्ठिर उवाच
अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि
वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः ||१५||

राजन् ! इसी विषयमें देवर्षि नारदने बड़े प्रेमसे एक इतिहास कहा था। यह उस समयकी बात है, जब राजसूय यज्ञमें तुम्हारे दादा युधिष्ठिरने उनसे इस सम्बन्धमें एक प्रश्न किया था ॥ १२ ॥ उस महान् राजसूय यज्ञ में राजा युधिष्ठर ने अपनी आँखोंके सामने बड़ी आश्चर्यजनक घटना देखी कि चेदिराज शिशुपाल सबके देखते-देखते भगवान्‌ श्रीकृष्णमें समा गया ॥ १३ ॥ वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे। इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े-बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभा में उस यज्ञमण्डप में ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—अहो ! यह तो बड़ी विचित्र बात है। परमतत्त्व भगवान्‌ श्रीकृष्ण में समा जाना तो बड़े-बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्‌ से द्वेष करने वाले शिशुपाल को यह गति कैसे मिली ? ॥ १५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०३)
 
नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

यदा सिसृक्षुः पुर आत्मनः परो रजः सृजत्येष पृथक्स्वमायया
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वरः शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ||१०||
कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयं प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत्
य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यतः
तत्प्रत्यनीकानसुरान्सुरप्रियो रजस्तमस्कान्प्रमिणोत्युरुश्रवाः ||११||

जब परमेश्वर अपने लिये शरीरों का निर्माण करना चाहते हैं, तब अपनी माया से रजोगुण की अलग सृष्टि करते हैं। जब वे विचित्र योनियों में रमण करना चाहते हैं, तब सत्त्वगुणकी सृष्टि करते हैं और जब वे शयन करना चाहते हैं, तब तमोगुणको बढ़ा देते हैं ॥ १० ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ सत्यसङ्कल्प हैं। वे ही जगत् की उत्पत्ति के निमित्तभूत प्रकृति और पुरुष के सहकारी एवं आश्रय काल की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे काल के अधीन नहीं, काल ही उनके अधीन है। राजन् ! ये कालस्वरूप ईश्वर जब सत्त्वगुणकी वृद्धि करते हैं, तब सत्त्वमय देवताओंका बल बढ़ाते हैं और तभी वे परमयशस्वी देवप्रिय परमात्मा देवविरोधी रजोगुणी एवं तमोगुणी दैत्यों का संहार करते हैं। वस्तुत: वे सम ही हैं ॥ ११ ॥

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मंगलवार, 26 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०२)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान्प्रकृतेः परः
स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ||६||
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः
न तेषां युगपद्रा जन्ह्रास उल्लास एव वा ||७||
जयकाले तु सत्त्वस्य देवर्षीन्रजसोऽसुरान्
तमसो यक्षरक्षांसि तत्कालानुगुणोऽभजत् ||८||
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते
विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ||९||

वास्तव में भगवान्‌ निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृति से परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी माया के गुणों को स्वीकार करके वे बाध्यबाधकभाव को अर्थात् मरने और मारने वाले दोनों के परस्परविरोधी रूपों को ग्रहण करते हैं ॥ ६ ॥ सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये प्रकृति के गुण हैं, परमात्मा के नहीं। परीक्षित्‌ ! इन तीनों गुणों की भी एक साथ ही घटती-बढ़ती नहीं होती ॥ ७ ॥ भगवान्‌ समय-समय के अनुसार गुणों को स्वीकार करते हैं। सत्त्वगुण की वृद्धि के समय देवता और ऋषियोंका, रजोगुणकी वृद्धि के समय दैत्यों का और तमोगुण की वृद्धि के समय वे यक्ष एवं राक्षसोंको अपनाते और उनका अभ्युदय करते हैं ॥ ८ ॥ जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न आश्रयोंमें रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परंतु मन्थन करनेपर वह प्रकट हो जाती है—वैसे ही परमात्मा सभी शरीरोंमें रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते। परंतु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके—उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओंका बाध करके अन्तत: अपने हृदयमें ही अन्तर्यामीरूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०१)

नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा

श्रीराजोवाच

समः प्रियः सुहृद्ब्रह्मन्भूतानां भगवान्स्वयम्
इन्द्र स्यार्थे कथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ||१||
न ह्यस्यार्थः सुरगणैः साक्षान्निःश्रेयसात्मनः
नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि ||२||
इति नः सुमहाभाग नारायणगुणान्प्रति
संशयः सुमहान्जातस्तद्भवांश्छेत्तुमर्हति ||३||

श्रीऋषिरुवाच
साधु पृष्टं महाराज हरेश्चरितमद्भुतम्
यद्भागवतमाहात्म्यं भगवद्भक्तिवर्धनम् ||४||
गीयते परमं पुण्यमृषिभिर्नारदादिभिः
नत्वा कृष्णाय मुनये कथयिष्ये हरेः कथाम् ||५||

राजा परीक्षित्‌ने पूछा—भगवन् ! भगवान्‌ तो स्वभाव से ही भेदभाव से रहित हैं—सम हैं, समस्त प्राणियों के प्रिय और सुहृद् हैं; फिर उन्होंने, जैसे कोई साधारण मनुष्य भेदभाव से अपने मित्र का पक्ष ले और शत्रुओं का अनिष्ट करे, उसी प्रकार इन्द्र के लिये दैत्यों का वध क्यों किया ? ॥ १ ॥ वे स्वयं परिपूर्ण कल्याणस्वरूप हैं, इसीलिये उन्हें देवताओं से कुछ लेना-देना नहीं है । तथा निर्गुण होने के कारण दैत्यों से कुछ वैर-विरोध और उद्वेग भी नहीं है ॥ २ ॥ भगवत्प्रेम के सौभाग्यसे सम्पन्न महात्मन् ! हमारे चित्त में भगवान्‌ के समत्व आदि गुणों के सम्बन्ध में बड़ा भारी सन्देह हो रहा है । आप कृपा करके उसे मिटाइये ॥ ३ ॥ 
श्रीशुकदेवजीने कहा—महाराज ! भगवान्‌ के अद्भुत चरित्रके सम्बन्ध में तुमने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया; क्योंकि ऐसे प्रसङ्ग प्रह्लाद आदि भक्तों की महिमासे परिपूर्ण होते हैं, जिसके श्रवणसे भगवान्‌ की भक्ति बढ़ती है ॥ ४ ॥ इस परम पुण्यमय प्रसङ्ग को नारदादि महात्मागण बड़े प्रेम से गाते रहते हैं । अब मैं अपने पिता श्रीकृष्ण-द्वैपायन मुनि को नमस्कार करके भगवान्‌ की लीला-कथा का वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-दसवां अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- दसवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

भागवत के दस लक्षण

परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षण विग्रहम् ।
यथा पुरस्ताद् व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो श्रृणु ॥ ४७ ॥

शौनक उवाच ।
यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः ।
चचार तीर्थानि भुवः त्यक्त्वा बंधून् सु-दुस्त्यजान् ॥ ४८ ॥
क्षत्तुः कौशारवेः तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः ।
यद्वा स भगवान् तस्मै पृष्टः तत्त्वं उवाच ह ॥ ४९ ॥
ब्रूहि नः तद् इदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धुत्याग निमित्तं च यथैव आगतवान् पुनः ॥ ५० ॥

सूत उवाच ।
राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यद् अवोचत् महामुनिः ।
तद्वोऽभिधास्ये श्रृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः ॥ ५१ ॥

(श्रीशुकदेवजी कहरहे  हैं) परीक्षित्‌ ! काल का परिमाण, कल्प और उसके अन्तर्गत मन्वन्तरोंका वर्णन आगे चलकर करेंगे। अब तुम पाद्मकल्प का वर्णन सावधान होकर सुनो ॥ ४७ ॥
शौनकजीने पूछा—सूतजी ! आपने हम लोगों से कहा था कि भगवान्‌ के परम भक्त विदुरजी ने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियों को भी छोडक़र पृथ्वीके विभिन्न तीर्थोंमें विचरण किया था ॥ ४८ ॥ उस यात्रामें मैत्रेय ऋषिके साथ अध्यात्मके सम्बन्धमें उनकी बातचीत कहाँ हुई तथा मैत्रेयजीने उनके प्रश्न करनेपर किस तत्त्वका उपदेश किया ? ॥ ४९ ॥ सूतजी ! आपका स्वभाव बड़ा सौम्य है। आप विदुरजी का वह चरित्र हमें सुनाइये। उन्होंने अपने भाई-बन्धुओं को क्यों छोड़ा और फिर उनके पास क्यों लौट आये ? ॥ ५० ॥
सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो ! राजा परीक्षित्‌ने भी यही बात पूछी थी। उनके प्रश्नों के उत्तर में श्रीशुकदेव जी महाराज ने जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगों से कहता हूँ। सावधान होकर सुनिये ॥ ५१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कंधे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इति द्वितीय स्कन्ध समाप्त

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
 
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मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वादश स्कन्ध– तेरहवाँ अध्याय


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

द्वादश स्कन्ध तेरहवाँ अध्याय

 

विभिन्न पुराणों की श्लोक-संख्या और श्रीमद्भागवत की महिमा

 

 सूत उवाच -

 यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः

 वेदैः साङ्‌गपदक्रमोपनिषदैः गायन्ति यं सामगाः ।

 ध्यानावस्थिततद्‌गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो

 यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ १॥

 पृष्ठे भ्राम्यदमन्दमन्दरगिरि ग्रावाग्रकण्डूयनान्

 निद्रालोः कमठाकृतेर्भगवतः श्वासानिलाः पान्तु वः ।

 यत्संस्कारकलानुवर्तनवशाद् वेलानिभेनाम्भसां

 यातायातमतन्द्रितं जलनिधेः नाद्यापि विश्राम्यति ॥ २ ॥

 पुराणसङ्‌ख्यासंभूतिं अस्य वाच्यप्रयोजने ।

 दानं दानस्य माहात्म्यं पाठादेश्च निबोधत ॥ ३ ॥

 ब्राह्मं दश सहस्राणि पाद्मं पञ्चोनषष्टि च ।

 श्रीवैष्णवं त्रयोविंशत् चतुर्विंशति शैवकम् ॥ ४ ॥

 दशाष्टौ श्रीभागवतं नारदं पञ्चविंशति ।

 मार्कण्डं नव वाह्नं च दशपञ्च चतुःशतम् ॥ ५ ॥

 चतुर्दश भविष्यं स्यात् तथा पञ्चशतानि च ।

 दशाष्टौ ब्रह्मवैवर्तं लैङ्‌गमेकादशैव तु ॥ ६ ॥

 चतुर्विंशति वाराहं एकाशीतिसहस्रकम् ।

 स्कान्दं शतं तथा चैकं वामनं दश कीर्तितम् ॥ ७ ॥

 कौर्मं सप्तदशाख्यातं मात्स्यं तत्तु चतुर्दश ।

 एकोनविंशत् सौपर्णं ब्रह्माण्डं द्वादशैव तु ॥ ८ ॥

 एवं पुराणसन्दोहः चतुर्लक्ष उदाहृतः ।

 तत्राष्टदशसाहस्रं श्रीभागवतं इष्यते ॥ ९ ॥

 इदं भगवता पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपङ्‌कजे ।

 स्थिताय भवभीताय कारुण्यात् संप्रकाशितम् ॥ १० ॥

 आदिमध्यावसानेषु वैराग्याख्यानसंयुतम् ।

 हरिलीलाकथाव्रात अमृतानन्दितसत्सुरम् ॥ ११ ॥

 सर्ववेदान्तसारं यद् ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम् ।

 वस्तु अद्वितीयं तन्निष्ठं कैवल्यैकप्रयोजनम् ॥ १२ ॥

 प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम् ।

 ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥

 राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे ।

 यावद्‌ न दृष्यते साक्षात् श्रीमद् भागवतं परम् ॥ १४ ॥

 सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते ।

 तद् रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद् रतिः क्वचित् ॥ १५ ॥

 निम्नगानां यथा गङ्‌गा देवानामच्युतो यथा ।

 वैष्णवानां यथा शम्भुः पुराणानां इदं तथा ॥ १६ ॥

 क्षेत्राणां चैव सर्वेषां यथा काशी ह्यनुत्तमा ।

 तथा पुराणव्रातानां श्रीमद्‌भागवतं द्विजाः ॥ १७ ॥

 श्रीमद्‌भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं

 यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते ।

 तत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविस्कृतं

 तत् श्रृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः ॥ १८ ॥

 कस्मै येन विभासितोऽयमतुलो ज्ञानप्रदीपः पुरा

 तद् रूपेण च नारदाय मुनये कृष्णाय तद् रूपिणा ।

 योगीन्द्राय तदात्मनाथ भगवत् राताय कारुण्यतः

 तच्छुद्धं विमलं विशोकममृतं सत्यं परं धीमहि ॥ १९ ॥

  नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय साक्षिणे ।

 य इदं कृपया कस्मै व्याचचक्षे मुमुक्षवे ॥ २० ॥

 योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे ।

 संसारसर्पदष्टं यो विष्णुरातममूमुचत् ॥ २१ ॥

 भवे भवे यथा भक्तिः पादयोस्तव जायते ।

 तथा कुरुष्व देवेश नाथस्त्वं नो यतः प्रभो ॥ २२ ॥

 नामसङ्‌कीर्तनं यस्य सर्वपाप प्रणाशनम् ।

 प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥ २३ ॥

 

सूतजी कहते हैं—ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तुतियोंके द्वारा जिनके गुण-गानमें संलग्न रहते हैं; साम-सङ्गीतके मर्मज्ञ ऋषि-मुनि अङ्ग, पद, क्रम एवं उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते रहते हैं; योगीलोग ध्यानके द्वारा निश्चल एवं तल्लीन मनसे जिनका भावमय दर्शन प्राप्त करते रहते हैं; किन्तु यह सब करते रहनेपर भी देवता, दैत्य, मनुष्य—कोई भी जिनके वास्तविक स्वरूपको पूर्णतया न जान सका, उन स्वयंप्रकाश परमात्माको नमस्कार है ॥ १ ॥ जिस समय भगवान्‌ ने कच्छपरूप धारण किया था और उनकी पीठपर बड़ा भारी मन्दराचल मथानीकी तरह घूम रहा था, उस समय मन्दराचलकी चट्टानोंकी नोकसे खुजलानेके कारण भगवान्‌को तनिक सुख मिला। वे सो गये और श्वासकी गति तनिक बढ़ गयी। उस समय उस श्वासवायुसे जो समुद्रके जलको धक्का लगा था, उसका संस्कार आज भी उसमें शेष है। आज भी समुद्र उसी श्वासवायुके थपेड़ोंके फलस्वरूप ज्वार-भाटोंके रूपमें दिन-रात चढ़ता-उतरता रहता है, उसे अबतक विश्राम न मिला। भगवान्‌की वही परमप्रभावशाली श्वासवायु आपलोगोंकी रक्षा करे ॥ २ ॥

शौनकजी ! अब पुराणोंकी अलग-अलग श्लोक-संख्या, उनका जोड़, श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय और उसका प्रयोजन भी सुनिये। इसके दानकी पद्धति तथा दान और पाठ आदिकी महिमा भी आपलोग श्रवण कीजिये ॥ ३ ॥ ब्रह्मपुराणमें दस हजार श्लोक, पद्मपुराणमें पचपन हजार, श्रीविष्णुपुराणमें तेईस हजार और शिवपुराणकी श्लोकसंख्या चौबीस हजार है ॥ ४ ॥ श्रीमद्भागवतमें अठारह हजार, नारदपुराणमें पच्चीस हजार, मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा अग्रिपुराणमें पन्द्रह हजार चारसौ श्लोक हैं ॥ ५ ॥ भविष्यपुराणकी श्लोक संख्या चौदह हजार पाँच सौ है और ब्रह्मवैवर्तपुराणकी अठारह हजार तथा लिङ्गपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं ॥ ६ ॥ वराहपुराणमें चौबीस हजार, स्कन्धपुराणकी श्लोक-संख्या इक्यासी हजार एक सौ है और वामनपुराणकी दस हजार ॥ ७ ॥ कूर्मपुराण सत्रह हजार श्लोकोंका और मत्स्यपुराण चौदह हजार श्लोकोंका है। गरुड़पुराणमें उन्नीस हजार श्लोक हैं और ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार ॥ ८ ॥ इस प्रकार सब पुराणोंकी श्लोक संख्या कुल मिलाकर चार लाख होती है। उनमें श्रीमद्भागवत, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अठारह हजार श्लोकोंका है ॥ ९ ॥

शौनकजी ! पहले-पहल भगवान्‌ विष्णुने अपने नाभिकमलपर स्थित एवं संसारसे भयभीत ब्रह्मापर परम करुणा करके इस पुराणको प्रकाशित किया था ॥ १० ॥ इसके आदि, मध्य और अन्तमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी कथाएँ हैं। इस महापुराणमें जो भगवान्‌ श्रीहरिकी लीला कथाएँ हैं, वे तो अमृतस्वरूप हैं ही; उनके सेवनसे सत्पुरुष और देवताओंको बड़ा ही आनन्द मिलता है ॥ ११ ॥ आपलोग जानते हैं कि समस्त उपनिषदोंका सार है ब्रह्म और आत्माका एकत्वरूप अद्वितीय सद्वस्तु। वही श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय है। इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैवल्य-मोक्ष ॥ १२ ॥

जो पुरुष भाद्रपद मासकी पूर्णिमाके दिन श्रीमद्भागवतको सोनेके सिंहासनपर रखकर उसका दान करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है ॥ १३ ॥ संतोंकी सभामें तभीतक दूसरे पुराणोंकी शोभा होती है, जबतक सर्वश्रेष्ठ स्वयं श्रीमद्भागवत महापुराणके दर्शन नहीं होते ॥ १४ ॥ यह श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदोंका सार है। जो इस रस-सुधाका पान करके छक चुका है, वह किसी और पुराण- शास्त्रमें रम नहीं सकता ॥ १५ ॥ जैसे नदियोंमें गङ्गा, देवताओंमें विष्णु और वैष्णवोंमें श्रीशङ्करजी सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही पुराणोंमें श्रीमद्भागवत है ॥ १६ ॥ शौनकादि ऋषियो ! जैसे सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें काशी सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें श्रीमद्भागवतका स्थान सबसे ऊँचा है ॥ १७ ॥ यह श्रीमद्भागवतपुराण सर्वथा निर्दोष है। भगवान्‌के प्यारे भक्त वैष्णव इससे बड़ा प्रेम करते हैं। इस पुराणमें जीवन्मुक्त परमहंसोंके सर्वश्रेष्ठ, अद्वितीय एवं मायाके लेशसे रहित ज्ञानका गान किया गया है। इस ग्रन्थकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि इसका नैष्क्रम्य अर्थात् कर्मोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति भी ज्ञान-वैराग्य एवं भक्तिसे युक्त है। जो इसका श्रवण, पठन और मनन करने लगता है, उसे भगवान्‌की भक्ति प्राप्त हो जाती है और वह मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥

यह श्रीमद्भागवत भगवत्तत्त्वज्ञान का एक श्रेष्ठ प्रकाशक है। इसकी तुलनामें और कोई भी पुराण नहीं है। इसे पहले-पहल स्वयं भगवान्‌ नारायणने ब्रह्माजीके लिये प्रकट किया था। फिर उन्होंने ही ब्रह्माजीके रूपसे देवर्षि नारदको उपदेश किया और नारदजीके रूपसे भगवान्‌ श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको। तदनन्तर उन्होंने ही व्यासरूपसे योगीन्द्र शुकदेवजीको और श्रीशुकदेवजीके रूपसे अत्यन्त करुणावश राजर्षि परीक्षित्‌को उपदेश किया। वे भगवान्‌ परम शुद्ध एवं मायामलसे रहित हैं। शोक और मृत्यु उनके पासतक नहीं फटक सकते। हम सब उन्हीं परम सत्यस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करते हैं ॥ १९ ॥ हम उन सर्वसाक्षी भगवान्‌ वासुदेवको नमस्कार करते हैं, जिन्होंने कृपा करके मोक्षाभिलाषी ब्रह्माजीको इस श्रीमद्भागवत महापुराणका उपदेश किया ॥ २० ॥ साथ ही हम उन योगिराज ब्रह्मस्वरूप श्रीशुकदेवजीको भी नमस्कार करते हैं, जिन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाकर संसार-सर्पसे डसे हुए राजर्षि परीक्षित्‌को मुक्त किया ॥ २१ ॥ देवताओंके आराध्यदेव सर्वेश्वर ! आप ही हमारे एकमात्र स्वामी एवं सर्वस्व हैं। अब आप ऐसी कृपा कीजिये कि बार-बार जन्म ग्रहण करते रहनेपर भी आपके चरणकमलोंमें हमारी अविचल भक्ति बनी रहे ॥ २२ ॥ जिन भगवान्‌के नामोंका सङ्कीर्तन सारे पापोंको सर्वथा नष्ट कर देता है और जिन भगवान्‌के चरणोंमें आत्मसमर्पण, उनके चरणोंमें प्रणति सर्वदाके लिये सब प्रकारके दु:खोंको शान्त कर देती है, उन्हीं परमतत्त्वस्वरूप श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २३ ॥

 

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां द्वादशस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

 

 

 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

॥ बारहवाँ स्कन्ध समाप्त ॥

 

सम्पूर्ण ग्रन्थ समाप्त

 

 

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। तेन त्वदङ्घ्रकमले रङ्क्षत मे यच्छ शाश्वतीम् ॥

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वादश स्कन्ध– बारहवाँ अध्याय (पोस्ट०३)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

द्वादश स्कन्ध बारहवाँ अध्याय (पोस्ट०३)

 

श्रीमद्भागवत की संक्षिप्त विषय-सूची

 

 विप्रशापापदेशेन संहारः स्वकुलस्य च ।

 उद्धवस्य च संवादो वसुदेवस्य चाद्‌भुतः ॥ ४१ ॥

 यत्रात्मविद्या ह्यखिला प्रोक्ता धर्मविनिर्णयः ।

 ततो मर्त्यपरित्याग आत्मयोगानुभावतः ॥ ४२ ॥

 युगलक्षणवृत्तिश्च कलौ नॄणामुपप्लवः ।

 चतुर्विधश्च प्रलय उत्पत्तिस्त्रिविधा तथा ॥ ४३ ॥

 देहत्यागश्च राजर्षेः विष्णुरातस्य धीमतः ।

 शाखाप्रणयनं ऋषेः मार्कण्डेयस्य सत्कथा ॥

 महापुरुषविन्यासः सूर्यस्य जगदात्मनः ॥ ४४ ॥

 इति चोक्तं द्विजश्रेष्ठा यत्पृष्टोऽहं इहास्मि वः ।

 लीलावतारकर्माणि कीर्तितानीह सर्वशः ॥ ४५ ॥

 पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन् ।

 हरये नम इत्युच्चैः मुच्यते सर्वपातकात् ॥ ४६ ॥

सङ्‌कीर्त्यमानो भगवान् अनन्तः

     श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् ।

 प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं

     यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥ ४७ ॥

मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा

     न कथ्यते यद्‌भगवानधोक्षजः ।

 तदेव सत्यं तदुहैव मङ्‌गलं

     तदेव पुण्यं भगवद्‌गुणोदयम् ॥ ४८ ॥

 तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं

     तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् ।

 तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां

     यदुत्तमःश्लोकयशोऽनुगीयते ॥ ४९ ॥

 न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो

     जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् ।

 तद् ध्वाङ्‌क्षतीर्थं न तु हंससेवितं

     यत्राच्युतस्तत्र हि साधवोऽमलाः ॥ ५० ॥

 तद्वाग्विसर्गो जनताघसंप्लवो

     यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि ।

 नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्‌कितानि यत्

     श्रृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥ ५१ ॥

 नैष्कर्म्यमप्यच्युत भाववर्जितं

     न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।

 कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे

     न ह्यर्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम् ॥ ५२ ॥

 यशःश्रियामेव परिश्रमः परो

     वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

 अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयोः

     गुणानुवादश्रवणादरादिभिर्हरेः ॥ ५३ ॥

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः

     क्षिणोत्यभद्राणि च शं तनोति च ।

 सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं

     ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥ ५४ ॥

यूयं द्विजाग्र्या बत भूरिभागा

     यच्छश्वदात्मन्यखिलात्मभूतम् ।

 नारायणं देवमदेवमीशं

     अजस्रभावा भजताविवेश्य ॥ ५५ ॥

हं च संस्मारित आत्मतत्त्वं

     श्रुतं पुरा मे परमर्षिवक्त्रात् ।

 प्रायोपवेशे नृपतेः परीक्षितः

     सदस्यृषीणां महतां च श्रृण्वताम् ॥ ५६ ॥

 एतद्वः कथितं विप्राः कथनीयोरुकर्मणः ।

 माहात्म्यं वासुदेवस्य सर्वाशुभविनाशनम् ॥ ५७ ॥

 य एतत्श्रावयेन्नित्यं यामक्षणमनन्यधीः ।

 श्रद्धावान् योऽनुश्रृणुयात् पुनात्यात्मानमेव सः ॥ ५८ ॥

 द्वादश्यामेकादश्यां वा श्रृण्वन्नायुष्यवान् भवेत् ।

 पठत्यनश्नन् प्रयतः ततो भवत्यपातकी ॥ ५९ ॥

 पुष्करे मथुरायां च द्वारवत्यां यतात्मवान् ।

 उपोष्य संहितामेतां पठित्वा मुच्यते भयात् ॥ ६० ॥

 देवता मुनयः सिद्धाः पितरो मनवो नृपाः ।

 यच्छन्ति कामान् गृणतः श्रृण्वतो यस्य कीर्तनात् ॥ ६१ ॥

 ऋचो यजूंषि सामानि द्विजोऽधीत्यानुविन्दते ।

 मधुकुल्या घृतकुल्याः पयःकुल्याश्च तत्फलम् ॥ ६२ ॥

 पुराणसंहितां एतां अधीत्य प्रयतो द्विजः ।

 प्रोक्तं भगवता यत्तु तत्पदं परमं व्रजेत् ॥ ६३ ॥

 विप्रोऽधीत्याप्नुयात् प्रज्ञां राजन्योदधिमेखलाम् ।

 वैश्यो निधिपतित्वं च शूद्रः शुध्येत पातकात् ॥ ६४ ॥

कलिमलसंहतिकालनोऽखिलेशो

     हरिरितरत्र न गीयते ह्यभीक्ष्णम् ।

 इह तु पुनर्भगवानशेषमूर्तिः

     परिपठितोऽनुपदं कथाप्रसङ्‌गैः ॥ ६५ ॥

तमहमजमनन्तमात्मतत्त्वं

     जगदुदयस्थितिसंयमात्मशक्तिम् ।

 द्युपतिभिरजशक्रशङ्‌कराद्यैः

     दुरवसितस्तवमच्युतं नतोऽस्मि ॥ ६६ ॥

 उपचितनवशक्तिभिः स्व आत्मनि

     उपरचितस्थिरजङ्‌गमालयाय ।

 भगवत उपलब्धिमात्रधाम्ने

     सुरऋषभाय नमः सनातनाय ॥ ६७ ॥

स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽपि

     अजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् ।

 व्यतनुत कृपया यः तत्त्वदीपं पुराणं

     तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ ६८ ॥

 

शौनकादि ऋषियो ! ग्यारहवें स्कन्धमें इस बातका वर्णन हुआ है कि भगवान्‌ ने ब्राह्मणोंके शापके बहाने किस प्रकार यदुवंशका संहार किया। इस स्कन्धमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और उद्धवका संवाद बड़ा ही अद्भुत है ॥ ४१ ॥ उसमें सम्पूर्ण आत्मज्ञान और धर्म-निर्णयका निरूपण हुआ है और अन्तमें यह बात बतायी गयी है कि भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने आत्मयोगके प्रभावसे किस प्रकार मर्त्यलोक का परित्याग किया ॥ ४२ ॥ बारहवें स्कन्धमें विभिन्न युगोंके लक्षण और उनमें रहनेवाले लोगोंके व्यवहारका वर्णन किया गया है तथा यह भी बतलाया गया है कि कलियुगमें मनुष्योंकी गति विपरीत होती है। चार प्रकारके प्रलय और तीन प्रकारकी उत्पत्तिका वर्णन भी इसी स्कन्धमें है ॥ ४३ ॥ इसके बाद परम ज्ञानी राजर्षि परीक्षित्‌के शरीरत्यागकी बात कही गयी है। तदनन्तर वेदोंके शाखा-विभाजनका प्रसङ्ग आया है। मार्कण्डेयजीकी सुन्दर कथा, भगवान्‌ के अङ्ग- उपाङ्गोंका स्वरूपकथन और सबके अन्तमें विश्वात्मा भगवान्‌ सूर्यके गणोंका वर्णन है ॥ ४४ ॥ शौनकादि ऋषियो ! आपलोगोंने इस सत्सङ्गके अवसरपर मुझसे जो कुछ पूछा था, उसका वर्णन मैंने कर दिया। इसमें सन्देह नहीं कि इस अवसरपर मैंने हर तरहसे भगवान्‌की लीला और उनके अवतार- चरित्रोंका ही कीर्तन किया है ॥ ४५ ॥

जो मनुष्य गिरते-पड़ते, फिसलते, दु:ख भोगते अथवा छींकते समय विवशतासे भी ऊँचे स्वरसे बोल उठता है—‘हरये नम:’, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४६ ॥ यदि देश, काल एवं वस्तुसे अपरिच्छिन्न भगवान्‌ श्रीकृष्णके नाम, लीला, गुण आदिका सङ्कीर्तन किया जाय अथवा उनके प्रभाव, महिमा आदिका श्रवण किया जाय तो वे स्वयं ही हृदयमें आ विराजते हैं और श्रवण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुषके सारे दु:ख मिटा देते हैं—ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अन्धकारको और आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है ॥ ४७ ॥ जिस वाणीके द्वारा घट-घटवासी अविनाशी भगवान्‌ के नाम, लीला, गुण आदिका उच्चारण नहीं होता, वह वाणी भावपूर्ण होनेपर भी निरर्थक है—सारहीन है, सुन्दर होनेपर भी असुन्दर है और उत्तमोत्तम विषयोंका प्रतिपादन करनेवाली होनेपर भी असत्कथा है। जो वाणी और वचन भगवान्‌के गुणोंसे परिपूर्ण रहते हैं, वे ही परम पावन हैं, वे ही मङ्गलमय हैं और वे ही परम सत्य हैं ॥ ४८ ॥ जिस वचनके द्वारा भगवान्‌ के परम पवित्र यशका गान होता है, वही परम रमणीय, रुचिकर एवं प्रतिक्षण नया-नया जान पड़ता है। उससे अनन्त कालतक मनको परमानन्दकी अनुभूति होती रहती है। मनुष्योंका सारा शोक, चाहे वह समुद्रके समान लंबा और गहरा क्यों न हो, उस वचनके प्रभावसे सदाके लिये सूख जाता है ॥ ४९ ॥ जिस वाणीसे—चाहे वह रस, भाव, अलङ्कार आदिसे युक्त ही क्यों न हो—जगत् को पवित्र करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण के यश का कभी गान नहीं होता, वह तो कौओं के लिये उच्छिष्ट फेंकने के स्थानके समान अत्यन्त अपवित्र है। मानससरोवर-निवासी हंस अथवा ब्रह्मधाम में विहार करनेवाले भगवच्चरणारविन्दाश्रित परमहंस भक्त उसका कभी सेवन नहीं करते। निर्मल हृदयवाले साधुजन तो वहीं निवास करते हैं, जहाँ भगवान्‌ रहते हैं ॥ ५० ॥ इसके विपरीत जिसमें सुन्दर रचना भी नहीं है और जो व्याकरण आदिकी दृष्टिसे दूषित शब्दोंसे युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्लोकमें भगवान्‌के सुयशसूचक नाम जड़े हुए हैं, वह वाणी लोगोंके सारे पापोंका नाश कर देती है; क्योंकि सत्पुरुष ऐसी ही वाणीका श्रवण, गान और कीर्तन किया करते हैं ॥ ५१ ॥ वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्‌ की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती। फिर जो कर्म भगवान्‌ को अर्पण नहीं किया गया है—वह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो—सर्वदा अमङ्गलरूप, दु:ख देनेवाला ही है; वह तो शोभन—वरणीय हो ही कैसे सकता है ? ॥ ५२ ॥ वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है—केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति। परन्तु भगवान्‌के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है ॥ ५३ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरण-कमलोंकी अविचल स्मृति सारे पाप-ताप और अमङ्गलोंको नष्ट कर देती और परम शान्तिका विस्तार करती है। उसीके द्वारा अन्त:करण शुद्ध हो जाता है, भगवान्‌की भक्ति प्राप्त होती है एवं परवैराग्यसे युक्त भगवान्‌के स्वरूपका ज्ञान तथा अनुभव प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ शौनकादि ऋषियो ! आपलोग बड़े भाग्यवान् हैं। धन्य हैं, धन्य हैं ! क्योंकि आपलोग बड़े प्रेमसे निरन्तर अपने हृदयमें सर्वान्तर्यामी, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् आदिदेव सबके आराध्यदेव एवं स्वयं दूसरे आराध्यदेवसे रहित नारायण भगवान्‌को स्थापित करके भजन करते रहते हैं ॥ ५५ ॥ जिस समय राजर्षि परीक्षित्‌ अनशन करके बड़े-बड़े ऋषियोंकी भरी सभामें सबके सामने श्रीशुकदेवजी महाराजसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुन रहे थे, उस समय वहीं बैठकर मैंने भी उन्हीं परमर्षिके मुखसे इस आत्मतत्त्वका श्रवण किया था। आपलोगोंने उसका स्मरण कराकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। मैं इसके लिये आपलोगोंका बड़ा ऋणी हूँ ॥ ५६ ॥

शौनकादि ऋषियो ! भगवान्‌ वासुदेवकी एक-एक लीला सर्वदा श्रवण-कीर्तन करनेयोग्य है। मैंने इस प्रसङ्गमें उन्हींकी महिमाका वर्णन किया है; जो सारे अशुभ संस्कारोंको धो बहाती है ॥ ५७ ॥ जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे एक पहर अथवा एक क्षण ही प्रतिदिन इसका कीर्तन करता है और जो श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करता है, वह अवश्य ही शरीरसहित अपने अन्त:करणको पवित्र बना लेता है ॥ ५८ ॥ जो पुरुष द्वादशी अथवा एकादशीके दिन इसका श्रवण करता है, वह दीर्घायु हो जाता है और जो संयमपूर्वक निराहार रहकर पाठ करता है, उसके पहलेके पाप तो नष्ट हो ही जाते हैं, पापकी प्रवृत्ति भी नष्ट हो जाती है ॥ ५९ ॥ जो मनुष्य इन्द्रियों और अन्त:करणको अपने वशमें करके उपवासपूर्वक पुष्कर, मथुरा अथवा द्वारकामें इस पुराण-संहिताका पाठ करता है, वह सारे भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ६० ॥ जो मनुष्य इसका श्रवण या उच्चारण करता है, उसके कीर्तनसे देवता, मुनि, सिद्ध, पितर, मनु और नरपति सन्तुष्ट होते हैं और उसकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ६१ ॥ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके पाठसे ब्राह्मणको मधुकुल्या, घृतकुल्या और पय:कुल्या (मधु, घी एवं दूधकी नदियाँ अर्थात् सब प्रकारकी सुख-समृद्धि) की प्राप्ति होती है। वही फल श्रीमद्भागवत के पाठसे भी मिलता है ॥ ६२ ॥ जो द्विज संयमपूर्वक इस पुराणसंहिताका अध्ययन करता है, उसे उसी परमपद की प्राप्ति होती है, जिसका वर्णन स्वयं भगवान्‌ ने किया है ॥ ६३ ॥ इसके अध्ययनसे ब्राह्मण को ऋतम्भरा प्रज्ञा (तत्त्वज्ञानको प्राप्त करानेवाली बुद्धि) की प्राप्ति होती है और क्षत्रियको समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य प्राप्त होता है। वैश्य कुबेरका पद प्राप्त करता है और शूद्र सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६४ ॥

भगवान्‌ ही सबके स्वामी हैं और समूह-के-समूह कलिमलों को ध्वंस करनेवाले हैं। यों तो उनका वर्णन करनेके लिये बहुत-से पुराण हैं, परन्तु उनमें सर्वत्र और निरन्तर भगवान्‌का वर्णन नहीं मिलता। श्रीमद्भागवतमहापुराणमें तो प्रत्येक कथा-प्रसङ्गमें पद-पदपर सर्वस्वरूप भगवान्‌का ही वर्णन हुआ है ॥ ६५ ॥ वे जन्म-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, देशकालादिकृत परिच्छेदोंसे मुक्त एवं स्वयं आत्मतत्त्व ही हैं। जगत्की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करनेवाली शक्तियाँ भी उनकी स्वरूपभूत ही हैं, भिन्न नहीं। ब्रह्मा, शङ्कर, इन्द्र आदि लोकपाल भी उनकी स्तुति करना लेशमात्र भी नहीं जानते। उन्हीं एकरस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६६ ॥ जिन्होंने अपने स्वरूपमें ही प्रकृति आदि नौ शक्तियोंका सङ्कल्प करके इस चराचर जगत्की सृष्टि की है और जो इसके अधिष्ठानरूपसे स्थित हैं तथा जिनका परम पद केवल अनुभूतिस्वरूप है, उन्हीं देवताओंके आराध्यदेव सनातन भगवान्‌के चरणोंमें मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६७ ॥

श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्र थे। इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी। फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मङ्गलमयी, मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया। मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान्‌ श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ॥ ६८ ॥

 

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां

द्वादशस्कन्धे द्वादशस्कन्धार्थनिरूपणं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

 

 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

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