॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)
विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान् की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना
श्रीशुक उवाच
इति तेषां महाराज सुराणामुपतिष्ठताम् ।
प्रतीच्यां दिश्यभूदाविः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २८॥
आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
पर्युपासितमुन्निद्र शरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २९ ॥
दृष्ट्वा तमवनौ सर्व ईक्षणाह्लादविक्लवाः ।
दण्डवत्पतिता राजञ्छनैरुत्थाय तुष्टुवुः ॥ ३० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—महाराज ! जब देवताओं ने इस प्रकार भगवान्की स्तुति की, तब स्वयं शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान् उनके सामने पश्चिम की ओर (अन्तर्देशमें) प्रकट हुए ॥ २८ ॥ भगवान्के नेत्र शरत्कालीन कमलके समान खिले हुए थे। उनके साथ सोलह पार्षद उनकी सेवामें लगे हुए थे। वे देखनेमें सब प्रकारसे भगवान्के समान ही थे। केवल उनके वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि नहीं थी ॥ २९ ॥ परीक्षित् ! भगवान्का दर्शन पाकर सभी देवता आनन्दसे विह्वल हो गये। उन लोगोंने धरतीपर लोटकर साष्टाङ्ग दण्डवत् किया और फिर धीरे-धीरे उठकर वे भगवान् की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
💟नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!
जवाब देंहटाएंॐ नमो भगवते वासुदेवाय तुभ्यम् नमः