शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

श्रीशुक उवाच

इति तेषां महाराज सुराणामुपतिष्ठताम् ।
प्रतीच्यां दिश्यभूदाविः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २८॥
आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
पर्युपासितमुन्निद्र शरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २९ ॥
दृष्ट्वा तमवनौ सर्व ईक्षणाह्लादविक्लवाः ।
दण्डवत्पतिता राजञ्छनैरुत्थाय तुष्टुवुः ॥ ३० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—महाराज ! जब देवताओं ने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति की, तब स्वयं शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान्‌ उनके सामने पश्चिम की ओर (अन्तर्देशमें) प्रकट हुए ॥ २८ ॥ भगवान्‌के नेत्र शरत्कालीन कमलके समान खिले हुए थे। उनके साथ सोलह पार्षद उनकी सेवामें लगे हुए थे। वे देखनेमें सब प्रकारसे भगवान्‌के समान ही थे। केवल उनके वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि नहीं थी ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌का दर्शन पाकर सभी देवता आनन्दसे विह्वल हो गये। उन लोगोंने धरतीपर लोटकर साष्टाङ्ग दण्डवत् किया और फिर धीरे-धीरे उठकर वे भगवान्‌ की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💟नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तुभ्यम् नमः

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पहला अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०८) नारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजय की कथा गोप्यः कामाद्भय...