सोमवार, 15 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

युधिष्ठिर उवाच - 

देवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुव्रत । 
यदात्मजाय शुद्धाय पितादात्साधवे ह्यघम् ॥ ४४ ॥ 
पुत्रान् विप्रतिकूलान् स्वान् पितरः पुत्रवत्सलाः । 
उपालभन्ते शिक्षार्थं नैवाघमपरो यथा ॥ ४५ ॥ 
किमुतानुवशान् साधून् तादृशान् गुरुदेवतान् । 
एतत्कौतूहलं ब्रह्मन् अस्माकं विधम प्रभो । 
पितुः पुत्राय यद्द्वेषो मरणाय प्रयोजितः ॥ ४६ ॥ 

युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्र से द्रोह क्यों किया ॥४४॥ पिता तो स्वभाव से ही अपने पुत्रों से प्रेम करते हैं। यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देने के लिये ही डाँटते हैं, शत्रु की तरह वैर-विरोध तो नहीं करते ॥४५॥ फिर प्रह्लाद–जी जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनों में भगवद्भाव करने वाले पुत्रों से भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है । नारदजी ! आप सब कुछ जानते हैं। हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिता ने द्वेष के कारण पुत्र को मार डालना चाहा । आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये॥४६॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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रविवार, 14 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीं आस्ते संस्पर्शनिर्वृतः । 
अस्पन्दप्रणयानन्द सलिलामीलितेक्षणः ॥ ४१ ॥ 
स उत्तमश्लोकपदारविन्दयोः 
     निषेवयाकिञ्चनसङ्‌गलब्धया । 
तन्वन् परां निर्वृतिमात्मनो मुहुः 
     दुसङ्‌गदीनस्य मनः शमं व्यधात् ॥ ४२ ॥ 
तस्मिन् महाभागवते महाभागे महात्मनि । 
हिरण्यकशिपू राजन् अकरोद् अघमात्मजे ॥ ४३ ॥ 

कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्‌ का कोमल संस्पर्श अनुभव करके (प्रह्लाद)आनन्द में मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्द के आँसुओं से भरे रहते ॥ ४१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमलों की यह भक्ति अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के सङ्ग से ही प्राप्त होती है। इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्द में मग्न रहते ही थे; जिन बेचारों का मन कुसङ्ग के कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिर ! प्रह्लाद भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटि के महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्र को भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करने की चेष्टा करने लगा ॥ ४३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत् तन्मनस्तया । 
कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥ ३७ ॥ 
आसीनः पर्यटन् अश्नन् शयानः प्रपिबन् ब्रुवन् । 
नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भितः ॥ ३८ ॥ 
क्वचिद् रुदति वैकुण्ठ चिन्ताशबलचेतनः । 
क्वचिद् हसति तच्चिन्ता ह्लाद उद्‍गायति क्वचित् ॥ ३९ ॥ 
नदति क्वचिद् उत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् । 
क्वचित्तद्‍भावनायुक्तः तन्मयोऽनुचकार ह ॥ ४० ॥ 

युधिष्ठिर ! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोडक़र भगवान्‌ के ध्यान में जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान्‌ श्रीकृष्ण के अनुग्रहरूप ग्रह ने उनके हृदय को इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत् की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥ ३७ ॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान्‌ मुझे अपनी गोद में लेकर आलिङ्गन कर रहे हैं। इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातों का ध्यान बिलकुल न रहता ॥ ३८ ॥ कभी-कभी भगवान्‌ मुझे छोडक़र चले गये, इस भावना में उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोर से रोने लगते। कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेक से ठठाकर हँसने लगते। कभी उनके ध्यान के मधुर आनन्द का अनुभव करके जोर से गाने लगते ॥ ३९ ॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जा का त्याग करके प्रेम में छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीला के चिन्तन में इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हीं का अनुकरण करने लगते ॥ ४० ॥ 

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शनिवार, 13 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

यस्मिन्महद्‍गुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । 
न तेऽधुना पिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३४ ॥ 
यं साधुगाथासदसि रिपवोऽपि सुरा नृप । 
प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवादृशाः ॥ ३५ ॥ 
गुणैरलमसंख्येयै माहात्म्यं तस्य सूच्यते । 
वासुदेवे भगवति यस्य नैसर्गिकी रतिः ॥ ३६ ॥ 

जैसे भगवान्‌ के गुण अनन्त हैं, वैसे ही प्रह्लादके श्रेष्ठ गुणों की भी कोई सीमा नहीं है। महात्मा लोग सदा से उनका वर्णन करते और उन्हें अपनाते आये हैं। तथापि वे आज भी ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं ॥ ३४ ॥ युधिष्ठिर ! यों तो देवता उनके शत्रु हैं; परंतु फिर भी भक्तोंका चरित्र सुननेके लिये जब उन लोगोंकी सभा होती है, तब वे दूसरे भक्तों को प्रह्लाद के समान कहकर उनका सम्मान करते हैं। फिर आप-जैसे अजातशत्रु भगवद्भक्त उनका आदर करेंगे, इसमें तो सन्देह ही क्या है ॥ ३५ ॥ उनकी महिमा का वर्णन करने के लिये अगणित गुणों के कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं। केवल एक ही गुण—भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है ॥ ३६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच - 
इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः । 
न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥ २९ ॥ 
तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्‍भुताः । 
प्रह्लादोऽभून् महांन् तेषां गुणैर्महदुपासकः ॥ ३० ॥ 
ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । 
आत्मवत्सर्वभूतानां एकः प्रियसुहृत्तमः ॥ ३१ ॥ 
दासवत्सन्नतार्याङ्‌घ्रिः पितृवद् दीनवत्सलः । 
भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुषु ईश्वरभावनः ॥ ३२ ॥ 
विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः ॥ ३२ ॥ 
नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः 
     श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक् । 
दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा 
     प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः ॥ ३३ ॥ 

नारदजी कहते हैं—सबके हृदय में ज्ञान का सञ्चार करनेवाले भगवान्‌ ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर ! दैत्यराज हिरण्यकशिपु के बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परंतु गुणों में सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे ॥ ३० ॥ ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियों के साथ अपने ही समान समता का बर्ताव करते और सब के एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे ॥ ३१ ॥ बड़े लोगों के चरणों में सेवक की तरह झुककर रहते थे। गरीबों पर पिता के समान स्नेह रखते थे। बराबरी वालों से भाई के समान प्रेम करते और गुरुजनों में भगवद्भाव रखते थे। विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनता से सम्पन्न होनेपर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छू तक नहीं गयी थी ॥ ३२ ॥ बड़े-बड़े दु:खोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोक के विषयों को उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परंतु वे उन्हें नि:सार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मन में किसी भी वस्तु की लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्त में कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था ॥ ३३ ॥ 

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शुक्रवार, 12 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

एवं ऐश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । 
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापं उपेयुषः ॥ २० ॥ 
तस्योग्रदण्डसंविग्नाः सर्वे लोकाः सपालकाः । 
अन्यत्रालब्धशरणाः शरणं ययुरच्युतम् ॥ २१ ॥ 
तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः । 
यद्‍गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ २२ ॥ 
इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः । 
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ॥ २३ ॥ 
तेषां आविरभूद्वाणी अरूपा मेघनिःस्वना । 
सन्नादयन्ती ककुभः साधूनां अभयङ्‌करी ॥ २४ ॥ 
मा भैष्ट विबुधश्रेष्ठाः सर्वेषां भद्रमस्तु वः । 
मद्दर्शनं हि भूतानां सर्वश्रेयोपपत्तये ॥ २५ ॥ 
ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य यत् । 
तस्य शान्तिं करिष्यामि कालं तावत्प्रतीक्षत ॥ २६ ॥ 
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । 
धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ॥ 
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । 
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद् हनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर ! इस रूप में भी वह भगवान्‌ का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥ २० ॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्‌की शरण ली ॥ २१ ॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—)‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥ २२ ॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की ॥ २३ ॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥ २४ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥ २५ ॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥ कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥ २७ ॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वर के कारण शक्तिसम्पन्न होने पर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥ २८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । 
इज्यमानो हविर्भागान् अग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ १५ ॥ 
अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । 
तथा कामदुघा गावो नानाश्चर्यपदं नभः ॥ १६ ॥ 
रत्‍नाकराश्च रत्‍नौघान् तत्पत्‍न्यश्चोहुरूर्मिभिः । 
क्षारसीधुघृतक्षौद्र दधिक्षीरामृतोदकाः ॥ १७ ॥ 
शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । 
दधार लोकपालानां एक एव पृथग्गुणान् ॥ १८ ॥ 
स इत्थं निर्जितककुब् एकराड् वियान् प्रियान् । 
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः ॥ १९ ॥ 

युधिष्ठिर ! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्म का पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ॥ १५ ॥ पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा- दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानीके समुद्र भी अपनी पत्नी नदियोंके साथ तरङ्गोंके द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे ॥ १७ ॥ पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणों को धारण करता ॥ १८ ॥ इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपने को प्रिय लगनेवाले विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परंतु इतने विषयों से भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्तत: वह इन्द्रियों का दास ही तो था ॥ १९ ॥

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गुरुवार, 11 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

देवोद्यानश्रिया जुष्टं अध्यास्ते स्म त्रिपिष्टपम् । 
महेन्द्रभवनं साक्षात् निर्मितं विश्वकर्मणा । 
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनं अध्युवासाखिलर्द्धिमत् ॥ ८ ॥
यत्र विद्रुमसोपाना महामारकता भुवः । 
यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्‌क्तयः ॥ ९ ॥ 
यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च । 
पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः ॥ १० ॥ 
कूजद्‌भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः । 
रत्‍नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम् ॥ ११ ॥ 
तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो 
     महामना निर्जितलोक एकराट् । 
रेमेऽभिवन्द्याङ्‌घ्रियुगः सुरादिभिः 
     प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ 
तमङ्‌ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना 
     विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । 
उपासतोपायनपाणिभिर्विना 
     त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ 
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं 
     विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः । 
गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहुः 
     विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ॥ १४ ॥ 

अब वह (हिरण्यकशिपु) नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानों के सौन्दर्य से युक्त स्वर्ग में ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्मा का बनाया हुआ इन्द्र का भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवन में तीनों लोकों का सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ उस महल में मूँगे की सीढिय़ाँ, पन्ने की गचें, स्फटिकमणि की दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिक की कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूध के फेन के समान शय्याएँ, जिनपर मोतियों की झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं ॥ ९-१० ॥ सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरों से रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमि पर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ॥ ११ ॥ उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर ! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथों में  भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ॥ १३ ॥ जब वह अपने पुरुषार्थ से इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर ! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ॥ १४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच - 
एवं वृतः शतधृतिः हिरण्यकशिपोरथ । 
प्रादात् तत् तपसा प्रीतो वरान् तस्य सुदुर्लभान् ॥ १ ॥ 

ब्रह्मोवाच - 
ताते मे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम । 
तथापि वितराम्यङ्‌ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥ २ ॥ 
ततो जगाम भगवान् अमोघानुग्रहो विभुः । 
पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ॥ ३ ॥ 
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद् हेममयं वपुः । 
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ 
स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन्महासुरः । 
देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान् ॥ ५ ॥ 
सिद्धचारणविद्याध्रान् ऋषीन् पितृपतीन् मनून् । 
यक्षरक्षःपिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ ॥ ६ ॥ 
सर्वसत्त्वपतीन्जित्वा वशमानीय विश्वजित् । 
जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥ ७ ॥

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से इस प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवोंके लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परंतु दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥ २ ॥
[नारदजी कहते हैं—]ब्रह्माजीके वरदान कभी झूठे नहीं होते। वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं। वरदान मिल जानेके बाद हिरण्यकशिपुने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् प्रजापतियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोकको चले गये ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीसे वर प्राप्त करनेपर हिरण्यकशिपुका शरीर सुवर्णके समान कान्तिमान् एवं हृष्टपुष्ट हो गया। वह अपने भाईकी मृत्युका स्मरण करके भगवान्‌से द्वेष करने लगा ॥ ४ ॥ उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥ ५—७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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बुधवार, 10 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम
भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ||३५||
नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः
न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ||३६||
व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ||३७||
सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथात्मनः
तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ||३८||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  प्रभो ! आप समस्त वरदाताओं में श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणी से—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि—किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ ॥ ३५—३७ ॥ इन्द्रादि समस्त लोकपालोंमें जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो। तपस्वियों और योगियोंको जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये ॥ ३८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिरण्यकशिपोर्वरयाचनं नाम तृतीयोऽध्यायः

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-
मायुर्लवाद्यवयवैः क्षिणोषि
कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां-
स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ||३१||
त्वत्तः परं नापरमप्यनेज
देजच्च किञ्चिद्व्यतिरिक्तमस्ति
विद्याः कलास्ते तनवश्च सर्वा 
हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः ||३२||
व्यक्तं विभो स्थूलमिदं शरीरं 
येनेन्द्रि यप्राणमनोगुणांस्त्वम्
भुङ्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठ्ये 
अव्यक्त आत्मा पुरुषः पुराणः ||३३||
अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम्
चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ||३४||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागों के द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवों के जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ॥ ३१ ॥ प्रभो ! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आप से भिन्न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी माया से अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भ में स्थित है। आप इसे अपनेमें से ही प्रकट करते हैं ॥ ३२ ॥ प्रभो ! यह व्यक्त ब्रह्माण्ड आपका स्थूल शरीर है। इससे आप इन्द्रिय, प्राण और मनके विषयोंका उपभोग करते हैं। किन्तु उस समय भी आप अपने परम ऐश्वर्यमय स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। वस्तुत: आप पुराणपुरुष, स्थूल-सूक्ष्मसे परे ब्रह्मस्वरूप ही हैं ॥ ३३ ॥ आप अपने अनन्त और अव्यक्त स्वरूप से सारे जगत् में व्याप्त हैं । चेतन और अचेतन दोनों ही आपकी शक्तियाँ हैं । भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३४ ॥

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मंगलवार, 9 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच
कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसावृतम्
अभिव्यनग्जगदिदं स्वयञ्ज्योतिः स्वरोचिषा ||२६||
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति
रजःसत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ||२७||
नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये
प्राणेन्द्रि यमनोबुद्धि विकारैर्व्यक्तिमीयुषे ||२८||
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च 
प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम्
चित्तस्य चित्तैर्मनैन्द्रियाणां 
पतिर्महान्भूतगुणाशयेशः ||२९||
त्वं सप्ततन्तून्वितनोषि तन्वा 
त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च
त्वमेक आत्मात्मवतामनादि-
रनन्तपारः कविरन्तरात्मा ||३०||

हिरण्यकशिपु ने (ब्रह्माजीसे) कहा—कल्प के अन्त में यह सारी सृष्टि काल के द्वारा प्रेरित तमोगुण से, घने अन्धकार से ढक गयी थी। उस समय स्वयंप्रकाशस्वरूप आपने अपने तेजसे पुन: इसे प्रकट किया ॥ २६ ॥ आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २७ ॥ आप ही जगत् के  मूल कारण हैं। ज्ञान और विज्ञान आपकी मूर्ति हैं। प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि विकारों के द्वारा आपने अपने को प्रकट किया है ॥ २८ ॥ आप मुख्यप्राण सूत्रात्माके रूपसे चराचर जगत् को अपने नियन्त्रण में रखते हैं। आप ही प्रजाके रक्षक भी हैं। भगवन् ! चित्त, चेतना, मन और इन्द्रियोंके स्वामी आप ही हैं। पञ्चभूत; शब्दादि विषय और उनके संस्कारोंके रचयिता भी महत्तत्त्वके रूपमें आप ही हैं ॥ २९ ॥ जो वेद होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—इन ऋत्विजों से होनेवाले यज्ञका प्रतिपादन करते हैं, वे आपके ही शरीर हैं। उन्हींके द्वारा अग्रिष्टोम आदि सात यज्ञोंका आप विस्तार करते हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं। क्योंकि आप अनादि, अनन्त, अपार, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं ॥ ३० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

श्रीनारद उवाच
इत्युक्त्वादिभवो देवो भक्षिताङ्गं पिपीलिकैः!
कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ||२२||
स तत्कीचकवल्मीकात्सहओजोबलान्वितः
सर्वावयवसम्पन्नो वज्रसंहननो युवा
उत्थितस्तप्तहेमाभो विभावसुरिवैधसः ||२३||
स निरीक्ष्याम्बरे देवं हंसवाहमुपस्थितम्
ननाम शिरसा भूमौ तद्दर्शनमहोत्सवः ||२४||
उत्थाय प्राञ्जलिः प्रह्व ईक्षमाणो दृशा विभुम्
हर्षाश्रुपुलकोद्भेदो गिरा गद्गदयागृणात् ||२५||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! इतना कहकर ब्रह्माजीने उसके चींटियों से खाये हुए शरीरपर अपने कमण्डलु का दिव्य एवं अमोघ प्रभावशाली जल छिडक़ दिया ॥ २२ ॥ जैसे लकड़ी के ढेर में से आग जल उठे, वैसे ही वह जल छिडक़ते ही बाँस और दीमकों की मिट्टी के बीच से उठ खड़ा हुआ। उस समय उसका शरीर सब अवयवों से पूर्ण एवं बलवान् हो गया था, इन्द्रियों में शक्ति आ गयी थी और मन सचेत हो गया था। सारे अङ्ग वज्र के समान कठोर एवं तपाये हुए सोनेकी तरह चमकीले हो गये थे। वह नवयुवक होकर उठ खड़ा हुआ ॥ २३ ॥ उसने देखा कि आकाशमें हंसपर चढ़े हुए ब्रह्माजी खड़े हैं। उन्हें देखकर उसे बड़ा आनन्द हुआ। अपना सिर पृथ्वीपर रखकर उसने उनको नमस्कार किया ॥ २४ ॥ फिर अञ्जलि बाँधकर नम्रभाव से खड़ा हुआ और बड़े प्रेम से अपने निर्निमेष नयनों से उन्हें देखता हुआ गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगा। उस समय उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ रहे थे और सारा शरीर पुलकित हो रहा था ॥ २५ ॥

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सोमवार, 8 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु की तपस्या और वरप्राप्ति

इति विज्ञापितो देवैर्भगवानात्मभूर्नृप
परितो भृगुदक्षाद्यैर्ययौ दैत्येश्वराश्रमम् ||१४||
न ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकैः
पिपीलिकाभिराचीर्णं मेदस्त्वङ्मांसशोणितम् ||१५||
तपन्तं तपसा लोकान्यथाभ्रापिहितं रविम्
विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ||१६||

श्रीब्रह्मोवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तपःसिद्धोऽसि काश्यप
वरदोऽहमनुप्राप्तो व्रियतामीप्सितो वरः ||१७||
अद्रा क्षमहमेतं ते हृत्सारं महदद्भुतम्
दंशभक्षितदेहस्य प्राणा ह्यस्थिषु शेरते ||१८||
नैतत्पूर्वर्षयश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे
निरम्बुर्धारयेत्प्राणान्को वै दिव्यसमाः शतम् ||१९||
व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेण मनस्विनाम्
तपोनिष्ठेन भवताजितोऽहं दितिनन्दन ||२०||
ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव
मर्तस्य ते ह्यमर्तस्य दर्शनं नाफलं मम ||२१||

युधिष्ठिर ! जब देवताओं ने भगवान्‌ ब्रह्माजी से इस प्रकार निवेदन किया, तब वे भृगु और दक्ष आदि प्रजापतियों के साथ हिरण्यकशिपु के आश्रमपर गये ॥ १४ ॥ वहाँ जाने पर पहले तो वे उसे देख ही न सके; क्योंकि दीमक की मिट्टी, घास और बाँसों से उसका शरीर ढक गया था। चींटियाँ उसकी मेदा, त्वचा, मांस और खून चाट गयी थीं ॥ १५ ॥ बादलों से ढके हुए सूर्य के समान वह अपनी तपस्या के तेज से लोकों को तपा रहा था। उसको देखकर ब्रह्माजी भी विस्मित हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा ॥ १६ ॥
ब्रह्माजीने कहा—बेटा हिरण्यकशिपु ! उठो, उठो। तुम्हारा कल्याण हो। कश्यपनन्दन ! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, बेखटके माँग लो ॥ १७ ॥ मैंने तुम्हारे हृदयका अद्भुत बल देखा। अरे, डाँसों ने तुम्हारी देह खा डाली है। फिर भी तुम्हारे प्राण हड्डियों के सहारे टिके हुए हैं ॥ १८ ॥ ऐसी कठिन तपस्या न तो पहले किसी ऋषि ने की थी और न आगे ही कोई करेगा। भला ऐसा कौन है जो देवताओं के सौ वर्ष तक बिना पानी के जीता रहे ॥ १९ ॥ बेटा हिरण्यकशिपु ! तुम्हारा यह काम बड़े-बड़े धीर पुरुष भी कठिनता से कर सकते हैं। तुमने इस तपोनिष्ठासे मुझे अपने वशमें कर लिया है ॥ २० ॥ दैत्यशिरोमणे ! इसीसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर । अत: तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता ॥ २१ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रह्मलोकं ययुः सुराः
धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते ||६||
दैत्येन्द्र तपसा तप्ता दिवि स्थातुं न शक्नुमः
तस्य चोपशमं भूमन्विधेहि यदि मन्यसे ||७||
लोका न यावन्नङ्क्ष्यन्ति बलिहारास्तवाभिभूः
तस्यायं किल सङ्कल्पश्चरतो दुश्चरं तपः ||८||
श्रूयतां किं न विदितस्तवाथापि निवेदितम्
सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना
अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ||९||
तदहं वर्धमानेन तपोयोगसमाधिना
कालात्मनोश्च नित्यत्वात्साधयिष्ये तथात्मनः ||१०||
अन्यथेदं विधास्येऽहमयथा पूर्वमोजसा
किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्ते वैष्णवादिभिः ||११||
इति शुश्रुम निर्बन्धं तपः परममास्थितः
विधत्स्वानन्तरं युक्तं स्वयं त्रिभुवनेश्वर ||१२||
तवासनं द्विजगवां पारमेष्ठ्यं जगत्पते
भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ||१३||

हिरण्यकशिपु की उस तपोमयी आग की लपटों से स्वर्ग के देवता भी जलने लगे। वे घबराकर स्वर्ग से ब्रह्मलोक में गये और ब्रह्माजी से प्रार्थना करने लगे—‘हे देवताओं के भी आराध्यदेव जगत्पति ब्रह्माजी ! हमलोग हिरण्यकशिपु के तप की ज्वाला से जल रहे हैं। अब हम स्वर्ग में नहीं रह सकते। हे अनन्त ! हे सर्वाध्यक्ष ! यदि आप उचित समझें तो अपनी सेवा करनेवाली जनता का नाश होनेके पहले ही यह ज्वाला शान्त कर दीजिये ॥ ६-७ ॥ भगवन् ! आप सब कुछ जानते ही हैं, फिर भी हम अपनी ओर से आपसे यह निवेदन कर देते हैं कि वह किस अभिप्राय से यह घोर तपस्या कर रहा है। सुनिये, उसका विचार है कि ‘जैसे ब्रह्माजी अपनी तपस्या और योग के प्रभावसे इस चराचर जगत् की सृष्टि करके सब लोकों से ऊपर सत्यलोक में विराजते हैं, वैसे ही मैं भी अपनी उग्र तपस्या और योगके प्रभावसे वही पद और स्थान प्राप्त कर लूँगा। क्योंकि समय असीम है और आत्मा नित्य है। एक जन्ममें नहीं, अनेक जन्मोंमें; एक युग में न सही, अनेक युगों में ॥ ८—१० ॥ अपनी तपस्या की शक्ति से मैं पाप-पुण्यादि के नियमों को पलटकर इस संसार में ऐसा उलट-फेर कर दूँगा, जैसा पहले कभी नहीं था। वैष्णवादि पदों में तो रखा ही क्या है। क्योंकि कल्प के अन्त में उन्हें भी काल के गाल में चला जाना पड़ता है’[*] ॥ ११ ॥ हमने सुना है कि ऐसा हठ करके ही वह (हिरण्यकशिपु) घोर तपस्या में जुटा हुआ है। आप तीनों लोकों के स्वामी हैं। अब आप जो उचित समझें, वही करें ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी ! आपका यह सर्वश्रेष्ठ परमेष्ठि-पद ब्राह्मण एवं गौओं की वृद्धि, कल्याण, विभूति, कुशल और विजय के लिये है। (यदि यह हिरण्यकशिपु के हाथ में चला गया, तो सज्जनों पर सङ्कटों का पहाड़ टूट पड़ेगा) ॥ १३ ॥
................................. 
[*] यद्यपि वैष्णवपद (वैकुण्ठादि नित्यधाम) अविनाशी हैं, परंतु हिरण्यकशिपु अपनी आसुरी बुद्धि के कारण उनको कल्प के अन्त में नष्ट होनेवाला ही मानता था। तामसी बुद्धि में सब बातें विपरीत ही दीखा करती हैं।

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रविवार, 7 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

श्रीनारद उवाच
हिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम्
आत्मानमप्रतिद्वन्द्वमेकराजं व्यधित्सत ||१||
स तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमदारुणम्
ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः ||२||
जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभिः
तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवाः स्थानानि भेजिरे ||३||
तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः
तिर्यगूर्ध्वमधो लोकान्प्रातपद्विष्वगीरितः ||४||
चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तः सद्वीपाद्रि श्चचाल भूः
निपेतुः सग्रहास्तारा जज्वलुश्च दिशो दश ||५||

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर ! अब हिरण्यकशिपु ने यह विचार किया कि ‘मैं अजेय, अजर, अमर और संसार का एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ा तक न हो सके’ ॥ १ ॥ इसके लिये वह मन्दराचल की एक घाटी में जाकर अत्यन्त दारुण तपस्या करने लगा। वहाँ हाथ ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखता हुआ वह पैरके अँगूठेके बल पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २ ॥ उसकी जटाएँ ऐसी चमक रही थीं, जैसे प्रलयकालके सूर्यकी किरणें। जब वह इस प्रकार तपस्यामें संलग्र हो गया, तब देवतालोग अपने-अपने स्थानों और पदों पर पुन: प्रतिष्ठित हो गये ॥ ३ ॥ बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद उसकी तपस्या की आग धूएँ के साथ सिर से निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल के लोकों को जलाने लगी ॥ ४ ॥ उसकी लपट से नदी और समुद्र खौलने लगे। द्वीप और पर्वतों के सहित पृथ्वी डगमगाने लगी। ग्रह और तारे टूट- टूटकर गिरने लगे तथा दसों दिशाओं में मानो आग लग गयी ॥ ५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच

बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।
ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥ ५८॥
यम एतदुपाख्याय तत्रैवान्तरधीयत ।
ज्ञातयो हि सुयज्ञस्य चक्रुर्यत्साम्परायिकम् ॥ ५९॥
अतः शोचत मा यूयं परं चात्मानमेव वा ।
क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः पारक्य एव वा ।
स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम् ॥ ६०॥

श्रीनारद उवाच

इति दैत्यपतेर्वाक्यं दितिराकर्ण्य सस्नुषा ।
पुत्रशोकं क्षणात्त्यक्त्वा तत्त्वे चित्तमधारयत् ॥ ६१॥

हिरण्यकशिपुने कहा—उस छोटे से बालक  (यमराज) की ऐसी ज्ञानपूर्ण बातें सुनकर सब-के-सब दंग रह गये। उशीनर-नरेश के भाई-बन्धु और स्त्रियों ने यह बात समझ ली कि समस्त संसार और इसके सुख-दु:ख अनित्य एवं मिथ्या हैं ॥ ५८ ॥ यमराज यह उपाख्यान सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये। भाई बन्धुओं ने भी सुयज्ञ की अन्त्येष्टि-क्रिया की ॥ ५९ ॥ इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरे के लिये शोक मत करो। इस संसार में कौन अपना है और कौन अपने से भिन्न ? क्या अपना है और क्या पराया ? प्राणियों को अज्ञान के कारण ही यह अपने-पराये का दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धि का और कोई कारण नहीं है ॥ ६० ॥
नारदजी ने कहा—युधिष्ठिर ! अपनी पुत्रवधू के साथ दिति ने हिरण्यकशिपु की यह बात सुनकर उसी क्षण पुत्रशोक का त्याग कर दिया और अपना चित्त परमतत्त्वस्वरूप परमात्मा में लगा दिया ॥ ६१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 6 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

लुब्धको विपिने कश्चित्पक्षिणां निर्मितोऽन्तकः ।
वितत्य जालं विदधे तत्र तत्र प्रलोभयन् ॥ ५०॥
कुलिङ्गमिथुनं तत्र विचरत्समदृश्यत ।
तयोः कुलिङ्गी सहसा लुब्धकेन प्रलोभिता ॥ ५१॥
आसज्जत सिचस्तन्त्र्यां महिष्यः कालयन्त्रिता ।
कुलिङ्गस्तां तथापन्नां निरीक्ष्य भृशदुःखितः ।
स्नेहादकल्पः कृपणः कृपणां पर्यदेवयत् ॥ ५२॥
अहो अकरुणो देवः स्त्रियाकरुणया विभुः ।
कृपणं मामनुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति ॥ ५३॥
कामं नयतु मां देवः किमर्धेनात्मनो हि मे ।
दीनेन जीवता दुःखमनेन विधुरायुषा ॥ ५४॥
कथं त्वजातपक्षांस्तान्मातृहीनान् बिभर्म्यहम् ।
मन्दभाग्याः प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजाः ॥ ५५॥
एवं कुलिङ्गं विलपन्तमारा-
त्प्रियावियोगातुरमश्रुकण्ठम् ।
स एव तं शाकुनिकः शरेण 
विव्याध कालप्रहितो विलीनः ॥ ५६॥
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः ।
नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि ॥ ५७॥

किसी जंगल में एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाता ने मानो उसे पक्षियों के कालरूप में ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिडिय़ों को फँसा लेता ॥ ५० ॥ एक दिन उसने कुलिङ्ग पक्षी के एक जोड़े को चारा चुगते देखा। उनमें से उस बहेलिये ने मादा पक्षी को तो शीघ्र ही फँसा लिया ॥ ५१ ॥ कालवश वह जाल के फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षी को अपनी मादाकी विपत्ति को देखकर बड़ा दु:ख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा ॥ ५२ ॥ उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परंतु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागे के लिये शोक करती हुई बड़ी दीनता से छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या ॥ ५३ ॥ उसकी मौज हो तो मुझे ले जाय। इसके बिना मैं अपना यह अधूरा विधुर जीवन, जो दीनता और दु:खसे भरा हुआ है, लेकर क्या करूँगा ॥ ५४ ॥ अभी मेरे अभागे बच्चों के पर भी नहीं जमे हैं। स्त्री के मर जानेपर उन मातृहीन बच्चोंको मैं कैसे पालूँगा ? ओह ! घोंसले में वे अपनी माँ की बाट देख रहे होंगे’ ॥ ५५ ॥ इस तरह वह पक्षी बहुत-सा विलाप करने लगा। अपनी सहचरी के वियोग से वह आतुर हो रहा था। आँसुओं के मारे उसका गला रुँध गया था। तबतक काल की प्रेरणा से पास ही छिपे हुए उसी बहेलिये ने ऐसा बाण मारा कि वह भी वहीं पर लोट गया ॥ ५६ ॥ मूर्ख रानियो ! तुम्हारी भी यही दशा होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो ! यदि तुमलोग सौ बरस तक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी ॥ ५७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।
यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८॥
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्विदः ।
नान्यथा शक्यते कर्तुं स्वभावः शोचतामिति ॥ ४९॥

प्रकृति के गुणों और उनसे बनी हुई वस्तुओं को सत्य समझना अथवा कहना झूठमूठ का दुराग्रह है। मनोरथ के समय की कल्पित और स्वप्न के समय की दीख पडऩेवाली वस्तुओं के समान इन्द्रियों के द्वारा जो कुछ ग्रहण किया जाता है, सब मिथ्या है ॥ ४८ ॥ इसलिये शरीर और आत्मा का तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीर के लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्मा के लिये ही। परंतु ज्ञान की दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ॥ ४९ ॥

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शुक्रवार, 5 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५॥
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।
भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६॥
यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत्कर्मनिबन्धनम् ।
ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७॥

(तुम्हारी यह मान्यता कि ‘प्राण ही बोलने या सुननेवाला था, सो निकल गया’ मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि सुषुप्ति के समय प्राण तो रहता है, पर न वह बोलता है न सुनता है।) शरीर में सब इन्द्रियों की चेष्टा का हेतुभूत जो महाप्राण है, वह प्रधान होनेपर भी बोलने या सुननेवाला नहीं है; क्योंकि वह जड है। देह और इन्द्रियों के द्वारा सब पदार्थों का द्रष्टा जो आत्मा है, वह शरीर और प्राण दोनों से पृथक् है ॥ ४५ ॥ यद्यपि वह परिच्छिन्न नहीं है, व्यापक है—फिर भी पञ्चभूत, इन्द्रिय और मनसे युक्त नीचे-ऊँचे (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरों को ग्रहण करता और अपने विवेकबल से मुक्त भी हो जाता है। वास्तव में वह इन सबसे अलग है ॥ ४६ ॥ जबतक वह पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, बुद्धि और मन—इन सत्रह तत्त्वोंसे  बने हुए लिङ्गशरीर से युक्त रहता है, तभीतक कर्मों से बँधा रहता है और इस बन्धन के कारण ही माया से होनेवाले मोह और क्लेश बराबर उसके पीछे पड़े रहते हैं ॥ ४७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं 
गृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने 
गृहेऽभिगुप्तोऽस्य हतो न जीवति ॥ ४०॥
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-
र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।
न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-
स्तस्या गुणैरन्यतमो हि बध्यते ॥ ४१॥
इदं शरीरं पुरुषस्य मोहजं 
यथा पृथग्भौतिकमीयते गृहम् ।
यथौदकैः पार्थिवतैजसैर्जनः 
कालेन जातो विकृतो विनश्यति ॥ ४२॥
यथानलो दारुषु भिन्न ईयते 
यथानिलो देहगतः पृथक्स्थितः ।
यथा नभः सर्वगतं न सज्जते 
तथा पुमान् सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३॥
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
यः श्रोता योऽनुवक्तेह स न दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४॥

भाग्य अनुकूल हो तो रास्ते में गिरी हुई वस्तु भी ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती है। परन्तु भाग्य के प्रतिकूल होनेपर घर के भीतर तिजोरी में रखी हुई वस्तु भी खो जाती है। जीव बिना किसी सहारे के दैव की दयादृष्टि से जंगल में भी बहुत दिनों तक जीवित रहता है, परंतु दैव के विपरीत होनेपर घर में सुरक्षित रहनेपर भी मर जाता है ॥ ४० ॥
रानियो ! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मों की कर्मवासना के अनुसार समयपर होती है और उसी के अनुसार उनका जन्म भी होता है। परंतु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है ॥ ४१ ॥ जैसे मनुष्य अपने मकानको अपनेसे अलग और मिट्टीका समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टीका है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है। जैसे बुलबुले आदि पानीके विकार, घड़े आदि मिट्टीके विकार और गहने आदि स्वर्णके विकार समयपर बनते हैं, रूपान्तरित होते हैं तथा नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही इन्हीं तीनोंके विकारसे बना हुआ यह शरीर भी समयपर बन-बिगड़ जाता है ॥ ४२ ॥ जैसे काठमें रहनेवाली व्यापक अग्नि स्पष्ट ही उससे अलग है, जैसे देह में रहनेपर भी वायु का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश सब जगह एक-सा रहनेपर भी किसी के दोष-गुण से लिप्त नहीं होता—वैसे ही समस्त देहेन्द्रियों में रहनेवाला और उनका आश्रय आत्मा भी उनसे अलग और  निर्लिप्त है ॥ ४३ ॥
मूर्खो ! जिसके लिये तुम सब शोक कर रहे हो, वह सुयज्ञ नामका शरीर तो तुम्हारे सामने पड़ा है। तुमलोग इसीको देखते थे। इसमें जो सुननेवाला और बोलनेवाला था, वह तो कभी किसीको नहीं दिखायी पड़ता था। फिर आज भी नहीं दिखायी दे रहा है, तो शोक क्यों ? ॥ ४४ ॥ 

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गुरुवार, 4 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

एवं विलपतीनां वै परिगृह्य मृतं पतिम् ।
अनिच्छतीनां निर्हारमर्कोऽस्तं सन्न्यवर्तत ॥ ३५॥
तत्र ह प्रेतबन्धूनामाश्रुत्य परिदेवितम् ।
आह तान् बालको भूत्वा यमः स्वयमुपागतः ॥ ३६॥

श्री यम उवाच
अहो अमीषां वयसाधिकानां  
विपश्यतां लोकविधिं विमोहः ।
यत्रागतस्तत्र गतं मनुष्यं 
स्वयं सधर्मा अपि शोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७॥
अहो वयं धन्यतमा यदत्र 
त्यक्ताः पितृभ्यां न विचिन्तयामः ।
अभक्ष्यमाणा अबला वृकादिभिः 
स रक्षिता रक्षति यो हि गर्भे ॥ ३८॥
य इच्छयेशः सृजतीदमव्ययो 
य एव रक्षत्यवलुम्पते च यः ।
तस्याबलाः क्रीडनमाहुरीशितु-
श्चराचरं निग्रहसङ्ग्रहे प्रभुः ॥ ३९॥

वे (उशीनर नरेश की रानियां) अपने पति की लाश पकडक़र इसी प्रकार विलाप करती रहीं। उस मुर्दे को वहाँ से दाहके लिये जाने देने की उनकी इच्छा नहीं होती थी। इतने में ही सूर्यास्त हो गया ॥ ३५ ॥ उस समय उशीनरराजा के सम्बन्धियों ने जो विलाप किया था, उसे सुनकर वहाँ स्वयं यमराज बालक के वेष में आये और उन्होंने उन लोगोंसे कहा— ॥ ३६ ॥
यमराज बोले—बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये लोग तो मुझसे सयाने हैं। बराबर लोगों का मरना- जीना देखते हैं, फिर भी इतने मूढ़ हो रहे हैं। अरे ! यह मनुष्य जहाँ से आया था, वहीं चला गया। इन लोगों को भी एक-न-एक दिन वहीं जाना है। फिर झूठमूठ ये लोग इतना शोक क्यों करते हैं ? ॥ ३७ ॥ हम तो तुमसे लाखगुने अच्छे हैं, परम धन्य हैं; क्योंकि हमारे माँ-बाप ने हमें छोड़ दिया है। हमारे शरीरमें पर्याप्त बल भी नहीं है, फिर भी हमें कोई चिन्ता नहीं है। भेडिय़े आदि हिंसक जन्तु हमारा बाल भी बाँका नहीं कर पाते। जिसने गर्भ में रक्षा की थी, वही इस जीवन में भी हमारी रक्षा करता रहता है ॥ ३८ ॥ देवियो ! जो अविनाशी ईश्वर अपनी मौज से इस जगत् को बनाता है, रखता है और बिगाड़ देता है—उस प्रभु का यह एक खिलौनामात्र है। वह इस चराचर जगत् को  दण्ड या पुरस्कार देनेमें समर्थ है ॥ ३९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।
अविवेकश्च चिन्ता च विवेकास्मृतिरेव च ॥ २६॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यमस्य प्रेतबन्धूनां संवादं तं निबोधत ॥ २७॥
उशीनरेष्वभूद्राजा सुयज्ञ इति विश्रुतः ।
सपत्नैर्निहतो युद्धे ज्ञातयस्तमुपासत ॥ २८॥
विशीर्णरत्नकवचं विभ्रष्टाभरणस्रजम् ।
शरनिर्भिन्नहृदयं शयानमसृगाविलम् ॥ २९॥
प्रकीर्णकेशं ध्वस्ताक्षं रभसा दष्टदच्छदम् ।
रजःकुण्ठमुखाम्भोजं छिन्नायुधभुजं मृधे ॥ ३०॥
उशीनरेन्द्रं विधिना तथा कृतं 
पतिं महिष्यः प्रसमीक्ष्य दुःखिताः ।
हताः स्म नाथेति करैरुरो भृशं 
घ्नन्त्यो मुहुस्तत्पदयोरुपापतन् ॥ ३१॥
रुदत्य उच्चैर्दयिताङ्घ्रिपङ्कजं 
सिञ्चन्त्य अस्रैः कुचकुङ्कुमारुणैः ।
विस्रस्तकेशाभरणाः शुचं नृणां 
सृजन्त्य आक्रन्दनया विलेपिरे ॥ ३२॥
अहो विधात्राकरुणेन नः प्रभो 
भवान् प्रणीतो दृगगोचरां दशाम् ।
उशीनराणामसि वृत्तिदः पुरा 
कृतोऽधुना येन शुचां विवर्धनः ॥ ३३॥
त्वया कृतज्ञेन वयं महीपते 
कथं विना स्याम सुहृत्तमेन ते ।
तत्रानुयानं तव वीर पादयोः 
शुश्रूषतीनां दिश यत्र यास्यसि ॥ ३४॥

जन्म, मृत्यु, अनेकों प्रकारके शोक, अविवेक, चिन्ता और विवेककी विस्मृति—सबका कारण यह अज्ञान ही है ॥ २६ ॥ इस विषय में महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास मरे हुए मनुष्य के सम्बन्धियों के साथ यमराजकी बातचीत है। तुमलोग ध्यानसे उसे सुनो ॥ २७ ॥
उशीनर देश में एक बड़ा यशस्वी राजा था। उसका नाम था सुयज्ञ। लड़ाईमें शत्रुओं ने उसे मार डाला। उस समय उसके भाई-बन्धु उसे घेरकर बैठ गये ॥ २८ ॥ उसका जड़ाऊ कवच छिन्नभिन्न हो गया था। गहने और मालाएँ तहस-नहस हो गयीं थीं। बाणों की मार से कलेजा फट गया था। शरीर खूनसे लथपथ था। बाल बिखर गये थे। आँखें धँस गयी थीं। क्रोध के मारे दाँतों से उसके होठ दबे हुए थे। कमल के समान मुख धूल से ढक गया था। युद्धमें उसके शस्त्र और बाँहें कट गयी थीं ॥ २९-३० ॥ रानियों को दैववश अपने पतिदेव उशीनर नरेश की यह दशा देखकर बड़ा दु:ख हुआ । वे ‘हा नाथ ! हम अभागिनें तो बेमौत मारी गयीं।’ यों कहकर बार-बार जोरसे छाती पीटती हुई अपने स्वामी के चरणों के पास गिर पड़ीं ॥ ३१ ॥ वे जोर-जोर से इतना रोने लगीं कि उनके कुच-कुङ्कुम से मिलकर बहते हुए लाल-लाल आँसुओं ने प्रियतम के पादपद्म पखार दिये। उनके केश और गहने इधर-उधर बिखर गये। वे करुण-क्रन्दन के साथ विलाप कर रही थीं, जिसे सुनकर मनुष्यों के हृदय में शोक का संचार हो जाता था ॥ ३२ ॥ ‘हाय ! विधाता बड़ा क्रूर है। स्वामिन् ! उसी ने आज आपको हमारी आँखोंसे ओझल कर दिया। पहले तो आप समस्त देशवासियों के जीवनदाता थे। आज उसीने आपको ऐसा बना दिया कि आप हमारा शोक बढ़ा रहे हैं ॥ ३३ ॥ पतिदेव आप हमसे बड़ा प्रेम करते थे, हमारी थोड़ी-सी सेवा को भी बड़ी करके मानते थे। हाय ! अब आपके बिना हम कैसे रह सकेंगी। हम आपके चरणों की चेरी हैं। वीरवर ! आप जहाँ जा रहे हैं, वहीं चलने की हमें भी आज्ञा दीजिये’ ॥ ३४ ॥ 

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मंगलवार, 2 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

नित्य आत्माव्ययः शुद्धः सर्वगः सर्ववित्परः ।
धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२॥
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते चलतीव भूः ॥ २३॥
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।
याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४॥
एष आत्मविपर्यासो ह्यलिङ्गे लिङ्गभावना ।
एष प्रियाप्रियैर्योगो वियोगः कर्मसंसृतिः ॥ २५॥

वास्तव में आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, सर्वगत, सर्वज्ञ और देह-इन्द्रिय आदि से पृथक् है। वह अपनी अविद्या से ही देह आदि की सृष्टि करके भोगों के साधन सूक्ष्मशरीर को स्वीकार करता है ॥ २२ ॥ जैसे हिलते हुए पानी के साथ उस में प्रतिबिम्बित होनेवाले वृक्ष भी हिलते-से जान पड़ते हैं और घुमायी जाती हुई आँख के साथ सारी पृथ्वी ही घूमती-सी दिखायी देती है, कल्याणी ! वैसे ही विषयों के कारण मन भटकने लगता है और वास्तव में निर्विकार होनेपर भी उसीके समान आत्मा भी भटकता हुआ-सा जान पड़ता है। उसका स्थूल और सूक्ष्मशरीरों से कोई भी सम्बन्ध नहीं है, फिर भी वह सम्बन्धी-सा जान पड़ता है ॥ २३-२४ ॥ सब प्रकार से शरीररहित आत्मा को शरीर समझ लेना—यही तो अज्ञान है। इसी से प्रिय अथवा अप्रिय वस्तुओं का मिलना और बिछुडऩा होता है । इसी से कर्मों के साथ सम्बन्ध हो जाने के कारण संसार में भटकना पड़ता है ॥२५॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

हिरण्यकशिपुर्भ्रातुः सम्परेतस्य दुःखितः ।
कृत्वा कटोदकादीनि भ्रातृपुत्रानसान्त्वयत् ॥ १७॥
शकुनिं शम्बरं धृष्टिं भूतसन्तापनं वृकम् ।
कालनाभं महानाभं हरिश्मश्रुमथोत्कचम् ॥ १८॥
तन्मातरं रुषाभानुं दितिं च जननीं गिरा ।
श्लक्ष्णया देशकालज्ञ इदमाह जनेश्वर ॥ १९॥

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच
अम्बाम्ब हे वधूः पुत्रा वीरं मार्हथ शोचितुम् ।
रिपोरभिमुखे श्लाघ्यः शूराणां वध ईप्सितः ॥ २०॥
भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुव्रते ।
दैवेनैकत्र नीतानामुन्नीतानां स्वकर्मभिः ॥ २१॥

युधिष्ठिर ! भाई की मृत्यु से हिरण्यकशिपु को बड़ा दु:ख हुआ था। जब उसने उसकी अन्त्येष्टि क्रियासे छुट्टी पा ली, तब शकुनि, शम्बर, धृष्ट, भूतसन्तापन, वृक, कालनाभ, महानाभ, हरिश्मश्रु और उत्कच अपने इन भतीजों को सान्त्वना दी ॥ १७-१८ ॥ उनकी माता रुषाभानु को और अपनी माता दिति को देश-काल के अनुसार मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा ॥ १९ ॥
हिरण्यकशिपु ने कहा—मेरी प्यारी माँ, बहू और पुत्रो ! तुम्हें वीर हिरण्याक्ष के लिये किसी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिये। वीर पुरुष तो ऐसा चाहते ही हैं कि लड़ाई के मैदान में अपने शत्रु के सामने उसके दाँत खट्टे करके प्राण त्याग करें; वीरों के लिये ऐसी ही मृत्यु श्लाघनीय होती है ॥ २० ॥ देवि ! जैसे प्याऊ पर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परंतु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मों के फेर से दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं ॥ २१ ॥ 

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सोमवार, 1 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् ।
देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११॥
यत्र यत्र द्विजा गावो वेदा वर्णाश्रमक्रियाः ।
तं तं जनपदं यात सन्दीपयत वृश्चत ॥ १२॥
इति ते भर्तृनिर्देशमादाय शिरसादृताः ।
तथा प्रजानां कदनं विदधुः कदनप्रियाः ॥ १३॥
पुरग्रामव्रजोद्यान क्षेत्रारामाश्रमाकरान् ।
खेटखर्वटघोषांश्च ददहुः पत्तनानि च ॥ १४॥
केचित्खनित्रैर्बिभिदुः सेतुप्राकारगोपुरान् ।
आजीव्यांश्चिच्छिदुर्वृक्षान् केचित्परशुपाणयः ।
प्रादहन् शरणान्येके प्रजानां ज्वलितोल्मुकैः ॥ १५॥
एवं विप्रकृते लोके दैत्येन्द्रानुचरैर्मुहुः ।
दिवं देवाः परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिताः ॥ १६॥

विष्णु की जड़ है द्विजातियोंका धर्म-कर्म; क्योंकि यज्ञ और धर्म ही उसके स्वरूप हैं। देवता, ऋषि, पितर, समस्त प्राणी और धर्मका वही परम आश्रय है ॥११॥ जहाँ-जहाँ ब्राह्मण, गाय, वेद, वर्णाश्रम और धर्म-कर्म हों, उन-उन देशों में तुम लोग जाओ, उन्हें जला दो,उजाड़ डालो’ ॥१२॥ दैत्य तो स्वभाव से ही लोगों को सताकर सुखी होते हैं। दैत्यराज हिरण्यकशिपु की आज्ञा उन्होंने बड़े आदर से सिर झुकाकर स्वीकार की और उसी के अनुसार जनता का नाश करने लगे ॥ १३ ॥ उन्होंने नगर, गाँव, गौओं के रहनेके स्थान, बगीचे, खेत, टहलने के स्थान, ऋषियोंके आश्रम, रत्न आदि की खानें, किसानों की बस्तियाँ, तराई के गाँव,अहीरों की बस्तियाँ और व्यापार के केन्द्र बड़े-बड़े नगर जला डाले ॥ १४ ॥ कुछ दैत्यों ने खोदने के शस्त्रों से बड़े-बड़े पुल, परकोटे और नगर के फाटकों को तोड़-फोड़ डाला तथा दूसरों ने कुल्हाडिय़ों से फले-फूले, हरे-भरे पेड़ काट डाले। कुछ दैत्योंने जलती हुई लकडिय़ों से लोगों के घर जला दिये ॥ १५ ॥ इस प्रकार दैत्यों ने निरीह प्रजाका बड़ा उत्पीडऩ किया। उस समय देवतालोग स्वर्ग छोडक़र छिपे रूपसे पृथ्वी में विचरण करते थे ॥ १६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दूसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्याक्ष का वध होने पर हिरण्यकशिपु 
का अपनी माता और कुटुम्बियों को समझाना

तस्य त्यक्तस्वभावस्य घृणेर्मायावनौकसः ।
भजन्तं भजमानस्य बालस्येवास्थिरात्मनः ॥ ७॥
मच्छूलभिन्नग्रीवस्य भूरिणा रुधिरेण वै ।
असृक्प्रियं तर्पयिष्ये भ्रातरं मे गतव्यथः ॥ ८॥
तस्मिन् कूटेऽहिते नष्टे कृत्तमूले वनस्पतौ ।
विटपा इव शुष्यन्ति विष्णुप्राणा दिवौकसः ॥ ९॥
तावद्यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।
सूदयध्वं तपोयज्ञ स्वाध्यायव्रतदानिनः ॥ १० ॥

(हिरण्यकशिपु दैत्यों और दानवों से कह रहा है) यह विष्णु पहले तो बड़ा शुद्ध और निष्पक्ष था । परंतु अब माया से वराह आदि रूप धारण करने लगा है और अपने स्वभाव से च्युत हो गया है। बच्चे की तरह जो उसकी सेवा करे, उसी की ओर हो जाता है। उसका चित्त स्थिर नहीं है ॥७॥ अब मैं अपने इस शूल से उसका गला काट डालूँगा और उसके खूनकी धारा से अपने रुधिरप्रेमी भाई का तर्पण करूँगा। तब कहीं मेरे हृदयकी पीड़ा शान्त होगी ॥ ८ ॥ उस मायावी शत्रुके नष्ट होनेपर, पेडक़ी जड़ कट जानेपर डालियों की तरह सब देवता अपने-आप सूख जायँगे। क्योंकि उनका जीवन तो विष्णु ही है ॥ ९ ॥ इसलिये तुमलोग इसी समय पृथ्वीपर जाओ। आजकल वहाँ ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी बहुत बढ़ती हो गयी है। वहाँ जो लोग तपस्या, यज्ञ, स्वाध्याय, व्रत और दानादि शुभ कर्म कर रहें हों, उन सबको मार डालो ॥ १० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९) हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन ...