गुरुवार, 16 अगस्त 2018

जय श्री राम


!!श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम !!

"राम त्वमेव भुवनानि विधाय तेषां
संरक्षणाय सुरमानुषतिर्यगादीन् ।
देहान् बिभर्षि न च देहगुणैर्विलिप्तस्-
त्वत्तो बिभेत्यखिलमोहकरी च माया ॥"

(हे राम ! इन सम्पूर्ण भुवनों की रचना करके आप ही इनकी रक्षा के लिए देवता,मनुष्य और तिर्यगादि योनियों में शरीर धारण करते हैं, तथापि देह के गुणों से आप लिप्त नहीं होते | सम्पूर्ण संसार को मोहित करने वाली माया भी आपसे सदा डरती रहती है)
......... (गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक अध्यात्मरामायण से--२|९|९२)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति अन्येऽनु ये ...