गुरुवार, 23 मार्च 2023

अथ देव्याः कवचम्‌ (पोस्ट ०३)

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्‌॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं । ये शंख , चक्र , गदा , शक्ति , हल ,और मूसल , खेटक और तोमर , परशु तथा पाश , कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं । दैत्यों के शरीर का नाश करना , भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना – यही उनके शस्त्र –धारण का उद्देश्य है ॥१३ - १५॥ [कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये - ] महान् रौद्ररूप , अत्यंत घोर पराक्रम , महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि ! तुम महान् भय का नाश करनेवाली हो , तुम्हें नमस्कार है ॥१६॥  तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है । शत्रुओं का भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके ! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री ( इंद्रशक्ति) मेरी रक्षा करे । अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारी मेरी रक्षा करे । पश्चिम दिशा में वारूणी और वायव्यकोण में मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी रक्षा करे ॥१७- १८॥

शेष आगामी पोस्ट में --
................गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीदुर्गासप्तशती पुस्तक (कोड 1281) से


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