॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना
संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम् ।
श्रुतेन भूयसा राजन् अगदेन यथामयम् ॥ ३१ ॥
येनोपसृष्टात्पुरुषात् लोक उद्विजते भृशम् ।
न बुधस्तद्वशं गच्छेद् इच्छन् अभयमात्मनः ॥ ३२ ॥
हेलनं गिरिशभ्रातुः धनदस्य त्वया कृतम् ।
यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षितः ॥ ३३ ॥
तं प्रसादय वत्साशु सन्नत्या प्रश्रयोक्तिभिः ।
न यावन्महतां तेजः कुलं नोऽभिभविष्यति ॥ ३४ ॥
एवं स्वायम्भुवः पौत्रं अनुशास्य मनुर्ध्रुवम् ।
तेनाभिवन्दितः साकं ऋषिभिः स्वपुरं ययौ ॥ ३५ ॥
(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) राजन् ! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है—उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो। क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है। भगवान् तुम्हारा मङ्गल करें ॥ ३१ ॥ क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये ॥ ३२ ॥ तुमने जो यह समझकर कि ये मेरे भाईके मारनेवाले हैं, इतने यक्षोंका संहार किया है, इससे तुम्हारे द्वारा भगवान् शङ्करके सखा कुबेरजीका बड़ा अपराध हुआ है ॥ ३३ ॥ इसलिये बेटा ! जबतक कि महापुरुषोंका तेज हमारे कुलको आक्रान्त नहीं कर लेता; इसके पहले ही विनम्र भाषण और विनयके द्वारा शीघ्र उन्हें प्रसन्न कर लो ॥ ३४ ॥
इस प्रकार स्वायम्भुव मनुने अपने पौत्र ध्रुवको शिक्षा दी। तब ध्रुवजीने उन्हें प्रणाम किया। इसके पश्चात् वे महर्षियोंके सहित अपने लोकको चले गये ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
चतुर्थस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏🌹🙏🌹🙏
जवाब देंहटाएंहे नाथ नारायण वासुदेव: !!