शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान् ।
आराध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ ११ ॥
स त्वं हरेरनुध्यातः तत्पुंसामपि सम्मतः ।
कथं त्ववद्यं कृतवान् अनुशिक्षन्सतां व्रतम् ॥ १२ ॥
तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिलजन्तुषु ।
समत्वेन च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति ॥ १३ ॥
सम्प्रसन्ने भगवति पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः ।
विमुक्तो जीवनिर्मुक्तो ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥ १४ ॥
भूतैः पञ्चभिरारब्धैः योषित्पुरुष एव हि ।
तयोर्व्यवायात् सम्भूतिः योषित्पुरुषयोरिह ॥ १५ ॥
एवं प्रवर्तते सर्गः स्थितिः संयम एव च ।
गुणव्यतिकराद् राजन् मायया परमात्मनः ॥ १६ ॥
निमित्तमात्रं तत्रासीत् निर्गुणः पुरुषर्षभः ।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥
स खल्विदं भगवान्कालशक्त्या
     गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः ।
करोत्यकर्तैव निहन्त्यहन्ता
     चेष्टा विभूम्नः खलु दुर्विभाव्या ॥ १८ ॥

(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) प्रभुकी आराधना करना बड़ा कठिन है, परन्तु तुमने तो लडक़पनमें ही सम्पूर्ण भूतों के आश्रयस्थान श्रीहरिकी सर्वभूतात्मभाव से आराधना करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया है ॥ ११ ॥ तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। तुम साधुजनों के पथप्रदर्शक हो; फिर भी तुमने ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे किया? ॥ १२ ॥ सर्वात्मा श्री हरि तो अपने से बड़े पुरुषों के प्रति सहनशीलता, छोटों के प्रति दया, बराबरवालों के साथ मित्रता और समस्त जीवोंके साथ समताका बर्ताव करनेसे ही प्रसन्न होते हंप ॥ १३ ॥ और प्रभुके प्रसन्न हो जानेपर पुरुष प्राकृत गुण एवं उनके कार्यरूप लिङ्गशरीरसे छूटकर परमानन्दस्वरूप ब्रह्मपद प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥
बेटा ध्रुव ! देहादिके रूपमें परिणत हुए पञ्चभूतोंसे ही स्त्री-पुरुषका आविर्भाव होता है और फिर उनके पारस्परिक समागमसे दूसरे स्त्री-पुरुष उत्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥ ध्रुव ! इस प्रकार भगवान्‌की मायासे सत्त्वादि गुणोंमें न्यूनाधिकभाव होनेसे ही जैसे भूतोंद्वारा शरीरोंकी रचना होती है, वैसे ही उनकी स्थिति और प्रलय भी होते हैं ॥ १६ ॥ पुरुषश्रेष्ठ ! निर्गुण परमात्मा तो इनमें केवल निमित्तमात्र है; उसके आश्रयसे यह कार्य-कारणात्मक जगत् उसी प्रकार भ्रमता रहता है, जैसे चुम्बकके आश्रयसे लोहा ॥ १७ ॥ काल-शक्तिके द्वारा क्रमश: सत्त्वादि गुणोंमें क्षोभ होनेसे लीलामय भगवान्‌की शक्ति भी सृष्टि आदिके रूपमें विभक्त हो जाती है; अत: भगवान्‌ अकर्ता होकर भी जगत् की रचना करते हैं और संहार करनेवाले न होकर भी इसका संहार करते हैं। सचमुच उन अनन्त प्रभुकी लीला सर्वथा अचिन्तनीय है ॥ १८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀जय श्रीहरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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