बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

सुनन्दनन्दावूचतुः -

भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः श्रृणु ।
यः पञ्चवर्षस्तपसा भवान् देवमतीतृपत् ॥ २३ ॥
तस्याखिलजगद्धातुः आवां देवस्य शार्ङ्‌गिणः ।
पार्षदौ इविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥ २४ ॥
सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया
     यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् ।
आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो
     ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ २५ ॥
अनास्थितं ते पितृभिः अन्यैरप्यङ्‌ग कर्हिचित् ।
आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥
एतद्विमानप्रवरं उत्तमश्लोकमौलिना ।
उपस्थापितमायुष्मन् अधिरोढुं त्वमर्हसि ॥ २७ ॥

सुनन्द और नन्द कहने लगे—राजन् ! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्षकी अवस्थामें ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान्‌को प्रसन्न कर लिया था ॥ २३ ॥ हम उन्हीं निखिलजगन्नियन्ता शार्ङ्गपाणि भगवान्‌ विष्णु के सेवक हैं और आप को भगवान्‌ के धाम में ले जानेके लिये यहाँ आये हैं ॥ २४ ॥ आपने अपनी भक्ति के प्रभाव से विष्णुलोक का अधिकार प्राप्त किया है, जो औरों के लिये बड़ा दुर्लभ है परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँ तक नहीं पहुँच सके, वे नीचे से केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाममें निवास कीजिये ॥ २५ ॥ प्रियवर ! आजतक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पदपर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान्‌ विष्णुका वह परमधाम सारे संसारका वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों ॥ २६ ॥ आयुष्मन् ! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोकशिखामणि श्रीहरिने आपके लिये ही भेजा है, आप इसपर चढऩेयोग्य हैं ॥ २७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀जय श्री हरि: !!🙏
    जय श्रीमन् नारायण
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    नारायण नारायण नारायण नारायण

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - इकतीसवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  चतुर्थ स्कन्ध – इकतीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ ...