॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०७)
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
ऊचुर्निषेधितास्तांस्ते वैवस्वतपुरःसराः ।
के यूयं प्रतिषेद्धारो धर्मराजस्य शासनम् ॥ ३२ ॥
कस्य वा कुत आयाताः कस्मादस्य निषेधथ ।
किं देवा उपदेवा या यूयं किं सिद्धसत्तमाः ॥ ३३ ॥
सर्वे पद्मपलाशाक्षाः पीतकौशेयवाससः ।
किरीटिनः कुण्डलिनो लसत्पुष्करमालिनः ॥ ३४ ॥
सर्वे च नूत्नवयसः सर्वे चारुचतुर्भुजाः ।
धनुर्निषङ्गासिगदा शङ्खचक्राम्बुजश्रियः ॥ ३५ ॥
दिशो वितिमिरालोकाः कुर्वन्तः स्वेन तेजसा ।
किमर्थं धर्मपालस्य किङ्करान्नो निषेधथ ॥ ३६ ॥
उनके (विष्णुदूतों के) रोकनेपर यमराजके दूतोंने उनसे कहा—‘अरे, धर्मराज की आज्ञाका निषेध करनेवाले तुमलोग हो कौन ? ॥ ३२ ॥ तुम किसके दूत हो, कहाँसे आये हो और इसे ले जाने से हमें क्यों रोक रहे हो ? क्या तुमलोग कोई देवता, उपदेवता अथवा सिद्धश्रेष्ठ हो ? ॥ ३३ ॥ हम देखते हैं कि तुम सब लोगोंके नेत्र कमलदलके समान कोमलतासे भरे हैं, तुम पीले-पीले रेशमी वस्त्र पहने हो, तुम्हारे सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और गलोंमें कमलके हार लहरा रहे हैं ॥ ३४ ॥ सबकी नयी अवस्था है, सुन्दर-सुन्दर चार-चार भुजाएँ हैं, सभीके करकमलोंमें धनुष, तरकस, तलवार, गदा, शङ्ख, चक्र, कमल आदि सुशोभित हैं ॥ ३५ ॥ तुमलोगों की अङ्गकान्ति से दिशाओंका अन्धकार और प्राकृत प्रकाश भी दूर हो रहा है। हम धर्मराजके सेवक हैं। हमें तुमलोग क्यों रोक रहे हो ?’ ॥ ३६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💖🥀जय श्रीहरि: !! 🙏
जवाब देंहटाएंहरि हरये नमः कृष्ण माधवाय नमः
नारायण नारायण नारायण नारायण