॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०२)
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और
अजामिलका परमधामगमन
अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि ।
यद् व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरेः ॥ ७ ॥
एतेनैव ह्यघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम् ।
यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम् ॥ ८ ॥
स्तेनः सुरापो मित्रध्रुग् ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
स्त्रीराजपितृगोहन्ता ये च पातकिनोऽपरे ॥ ९ ॥
सर्वेषां अप्यघवतां इदमेव सुनिष्कृतम् ।
नामव्याहरणं विष्णोः यतस्तद् विषया मतिः ॥ १० ॥
यमदूतो ! इसने (अजामिल ने) कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशिका पूरा-पूरा प्रायश्चित्त कर लिया है। क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया है ॥ ७ ॥ जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरोंका उच्चारण किया, उसी समय केवल उतनेसे ही इस पापीके समस्त पापोंका प्रायश्चित्त हो गया ॥ ८ ॥ चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रह्मघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगोंका संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गायको मारनेवाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभीके लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है कि भगवान्के नामोंका उच्चारण [*] किया जाय; क्योंकि भगवन्नामोंके उच्चारणसे मनुष्यकी बुद्धि भगवान्के गुण, लीला और स्वरूपमें रम जाती है और स्वयं भगवान्की उसके प्रति आत्मीयबुद्धि हो जाती ‘मेरे दूर होनेके कारण द्रौपदीने जोर-जोरसे ‘गोविन्द, गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रन्दन करके मुझे पुकारा। वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे हृदयसे उसका भार क्षणभरके लिये भी नहीं हटता है ॥ ९-१० ॥
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[*] इस प्रसङ्गमें ‘नाम-व्याहरण’का अर्थ नामोच्चारणमात्र ही है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्। ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति ।।
(मेरे दूर होने के कारण द्रौपदीजी ने जोर-जोर से ‘गोविन्द-गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रंदन करके मुझे पुकारा | वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे ह्रदय से उसका भार क्षणभर के लिए भी नहीं हटता)
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से
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