॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट०५)
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
अत्र च उदाहरन्ति इमं इतिहासं पुरातनम् ।
दूतानां विष्णुयमयोः संवादस्तं निबोध मे ॥ २० ॥
कान्यकुब्जे द्विजः कश्चित् दासीपतिरजामिलः ।
नाम्ना नष्टसदाचारो दास्याः संसर्गदूषितः ॥ २१ ॥
बन्द्यक्षैः कैतवैश्चौर्यैः गर्हितां वृत्तिमास्थितः ।
बिभ्रत्कुटुम्बं अशुचिः यातयामास देहिनः ॥ २२ ॥
एवं निवसतस्तस्य लालयानस्य तत्सुतान् ।
कालोऽत्यगान् महान् राजन् नष्टाशीत्यायुषः समाः ॥ २३ ॥
तस्य प्रवयसः पुत्रा दश तेषां तु योऽवमः ।
बालो नारायणो नाम्ना पित्रोश्च दयितो भृशम् ॥ २४ ॥
स बद्धहृदयस्तस्मिन् अर्भके कलभाषिणि ।
निरीक्षमाणस्तल्लीलां मुमुदे जरठो भृशम् ॥ २५ ॥
भुञ्जानः प्रपिबन् खादन् बालकं स्नेहयन्त्रितः ।
भोजयन् पाययन्मूढो न वेदागतमन्तकम् ॥ २६ ॥
(शुकदेव जी कहते हैं) परीक्षित् ! इस विषयमें महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। उसमें भगवान् विष्णु और यमराजके दूतोंका संवाद है। तुम मुझसे उसे सुनो ॥ २० ॥ कान्यकुब्ज नगर (कन्नौज)में एक दासीपति ब्राह्मण रहता था। उसका नाम था अजामिल। दासीके संसर्ग से दूषित होनेके कारण उसका सदाचार नष्ट हो चुका था ॥ २१ ॥ वह पतित कभी बटोहियोंको बाँधकर उन्हें लूट लेता, कभी लोगोंको जूएके छलसे हरा देता, किसीका धन धोखा-धड़ीसे ले लेता तो किसीका चुरा लेता। इस प्रकार अत्यन्त निन्दनीय वृत्तिका आश्रय लेकर वह अपने कुटुम्बका पेट भरता था और दूसरे प्राणियोंको बहुत ही सताता था ॥ २२ ॥ परीक्षित् ! इसी प्रकार वह वहाँ रहकर दासीके बच्चोंका लालन-पालन करता रहा। इस प्रकार उसकी आयुका बहुत बड़ा भाग-अट्ठासी वर्ष—बीत गया ॥ २३ ॥ बूढ़े अजामिलके दस पुत्र थे। उनमें सबसे छोटेका नाम था ‘नारायण’। माँ-बाप उससे बहुत प्यार करते थे ॥ २४ ॥ वृद्ध अजामिल ने अत्यन्त मोहके कारण अपना सम्पूर्ण हृदय अपने बच्चे नारायण को सौंप दिया था। वह अपने बच्चेकी तोतली बोली सुन-सुनकर तथा बालसुलभ खेल देख-देखकर फूला नहीं समाता था ॥ २५ ॥ अजामिल बालकके स्नेह बन्धनमें बँध गया था। जब वह खाता तब उसे भी खिलाता, जब पानी पीता तो उसे भी पिलाता। इस प्रकार वह अतिशय मूढ़ हो गया था, उसे इस बातका पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिरपर आ पहुँची है ॥ २६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💖🥀जय श्रीहरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंनारायण नारायण नारायण नारायण
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