॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पहला अध्याय..(पोस्ट११)
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
देह्यज्ञोऽजितषड्वर्गो नेच्छन् कर्माणि कार्यते ।
कोशकार इवात्मानं कर्मणाऽऽच्छाद्य मुह्यति ॥ ५२ ॥
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म गुणैः स्वाभाविकैर्बलात् ॥ ५३ ॥
लब्ध्वा निमित्तमव्यक्तं व्यक्ताव्यक्तं भवत्युत ।
यथायोनि यथाबीजं स्वभावेन बलीयसा ॥ ५४ ॥
एष प्रकृतिसङ्गेन पुरुषस्य विपर्ययः ।
आसीत्स एव न चिराद् ईशसङ्गाद् विलीयते ॥ ५५ ॥
जो जीव अज्ञानवश काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर—इन छ: शत्रुओंपर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, उसे इच्छा न रहते हुए भी विभिन्न वासनाओंके अनुसार अनेकों कर्म करने पड़ते हैं। वैसी स्थितिमें वह रेशमके कीड़ेके समान अपनेको कर्मके जालमें जकड़ लेता है और इस प्रकार अपने हाथों मोहका शिकार बन जाता है ॥ ५२ ॥ कोई शरीरधारी जीव बिना कर्म किये कभी एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रत्येक प्राणीके स्वाभाविक गुण बलपूर्वक विवश करके उससे कर्म कराते हैं ॥ ५३ ॥ जीव अपने पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्यमय संस्कारोंके अनुसार स्थूल और सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। उसकी स्वाभाविक एवं प्रबल वासनाएँ कभी उसे माता के-जैसा (स्त्रीरूप) बना देती हैं, तो कभी पिताके- जैसा (पुरुषरूप) ॥ ५४ ॥ प्रकृतिका संसर्ग होनेसे ही पुरुष अपनेको अपने वास्तविक स्वरूपके विपरीत लिङ्गशरीर मान बैठा है। यह विपर्यय भगवान् के भजन से शीघ्र ही दूर हो जाता है ॥ ५५ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌿🌹💐ॐश्रीपरमात्मने नमः
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हे नाथ नारायण वासुदेव: !!