॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – छब्बीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)
नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन
यस्त्विह वै निजवेदपथादनापद्यपगतः पाखण्डं चोपगतस्तमसिपत्रवनं प्रवेश्य कशया प्रहरन्ति तत्र हासावितस्ततो धावमान उभयतोधारैस्तालवनासिपत्रैश्छिद्यमानसर्वाङ्गो हा हतोऽस्मीति
परमया वेदनया मूर्च्छितः पदे पदे निपतति स्वधर्महा पाखण्डानुगतं फलं भुङ्क्ते ॥ १५ ॥
यस्त्विह वै राजा राजपुरुषोवा अदण्ड्ये दण्डं प्रणयति ब्राह्मणे वाशरीरदण्डं स पापीयान्नरकेऽमुत्र
सूकरमुखे निपतति तत्रातिबलैर्विनिष्पिष्यमाणा - वयवो यथै वे हे क्षुखण्ड आर्तस्वरेण स्वनयन्
क्वचिन्मूर्च्छितः कश्मलमुपगतो यथैवेहादृष्टदोषा उपरुद्धाः ॥ १६ ॥
जो पुरुष किसी प्रकारकी आपत्ति न आनेपर भी अपने वैदिक मार्गको छोडक़र अन्य पाखण्डपूर्ण धर्मोंका आश्रय लेता है, उसे यमदूत असिपत्रवन नरकमें ले जाकर कोड़ोंसे पीटते हैं। जब मारसे बचनेके लिये वह इधर-उधर दौडऩे लगता है, तब उसके सारे अङ्ग तालवन के तलवार के समान पैने पत्तों से, जिनमें दोनों ओर धारें होती हैं, टूक-टूक होने लगते हैं। तब वह अत्यन्त वेदनासे ‘हाय, मैं मरा !’ इस प्रकार चिल्लाता हुआ पद-पदपर मूर्च्छित होकर गिरने लगता है। अपने धर्मको छोडक़र पाखण्डमार्ग में चलने से उसे इस प्रकार अपने कुकर्म का फल भोगना पड़ता है ॥ १५ ॥ इस लोकमें जो पुरुष राजा या राजकर्मचारी होकर किसी निरपराध मनुष्यको दण्ड देता है अथवा ब्राह्मण को शरीरदण्ड देता है, वह महापापी मरकर सूकरमुख नरकमें गिरता है। वहाँ जब महाबली यमदूत उसके अङ्गों को कुचलते हैं, तब वह कोल्हू में पेरे जाते हुए गन्नों के समान पीडि़त होकर, जिस प्रकार इस लोक में उसके द्वारा सताये हुए निरपराध प्राणी रोते-चिल्लाते थे, उसी प्रकार कभी आर्त स्वर से चिल्लाता और कभी मूर्च्छित हो जाता है ॥ १६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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