सोमवार, 15 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— छठा अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

 

देवताओं की भगवान्‌ से स्वधाम सिधारने के लिये प्रार्थना

तथा यादवों को प्रभासक्षेत्र जाने की तैयारी करते देखकर

उद्धव का भगवान्‌ के पास आना

 

श्रीशुक उवाच

अथ ब्रह्मात्मजैर्देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्

भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः १

इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ

ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः २

गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः

ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः ३

द्वारकामुपसञ्जग्मुः सर्वे कृष्णदिदृक्षवः

वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरमः

यशो वितेने लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ४

तस्यां विभ्राजमानायां समृद्धायां महर्द्धिभिः

व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम् ५

स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम्

गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ६

 

श्रीदेवा ऊचुः

नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं

बुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभिः

यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तै-

र्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात् ७

त्वं मायया त्रिगुणयात्मनि दुर्विभाव्यं

व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः

नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै

यत्स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ८

शुद्धिर्नृणां न तु तथेड्य दुराशयानां

विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः

सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध

सच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ९

स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः

क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः

यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्भिर्

व्यूहेऽर्चितः सवनशः स्वरतिक्रमाय १०

यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ

त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा

अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां

जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः ११

पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं

संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः

यः सुप्रणीतममुयार्हणमाददन्नो

भूयात्सदाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः १२

केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको

यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचम्वोः

स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन्

पादः पुनातु भगवन्भजतामघं नः १३

नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति

ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरर्द्यमानाः

कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य

शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य १४

अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानाम्

अव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः

सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः

कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् १५

त्वत्तः पुमान्समधिगम्य ययास्य वीर्यं

धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः

सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं

हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् १६

तत्तस्थूषश्च जगतश्च भवानधीशो

यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्

अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो

येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म १७

स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि

भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः

पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्

यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्यः १८

विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः

पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्

आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गैस्

तीर्थद्वयं शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति १९

 

श्रीबादरायणिरुवाच

इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम्

अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः २०

 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब देवर्षि नारद वसुदेवजीको उपदेश करके चले गये, तब अपने पुत्र सनकादिकों, देवताओं और प्रजापतियोंके साथ ब्रह्माजी, भूतगणोंके साथ सर्वेश्वर महादेवजी और मरुद्गणोंके साथ देवराज इन्द्र द्वारकानगरीमें आये। साथ ही सभी आदित्यगण, आठों वसु, अश्विनीकुमार, ऋभु, अङ्गिराके वंशज ऋषि, ग्यारहों रुद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक, ऋषि, पितर, विद्याधर और किन्नर भी वहीं पहुँचे। इन लोगोंके आगमनका उद्देश्य यह था कि मनुष्यका-सा मनोहर वेष धारण करनेवाले और अपने श्यामसुन्दर विग्रहसे सभी लोगोंका मन अपनी ओर खींचकर रमा लेनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन करें; क्योंकि इस समय उन्होंने अपना श्रीविग्रह प्रकट करके उसके द्वारा तीनों लोकोंमें ऐसी पवित्र कीर्तिका विस्तार किया है, जो समस्त लोकोंके पाप-तापको सदाके लिये मिटा देती है ॥ १—४ ॥ द्वारकापुरी सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यर्योंसे समृद्ध तथा अलौकिक दीप्तिसे देदीप्यमान हो रही थी। वहाँ आकर उन लोगोंने अनूठी छबिसे युक्त भगवान्‌ श्रीकृष्णके दर्शन किये। भगवान्‌की रूप-माधुरीका निॢनमेष नयनोंसे पान करनेपर भी उनके नेत्र तृप्त न होते थे। वे एकटक बहुत देरतक उन्हें देखते ही रहे ॥ ५ ॥ उन लोगोंने स्वर्गके उद्यान नन्दन-वन, चैत्ररथ आदिके दिव्य पुष्पोंसे जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णको ढक दिया और चित्र-विचित्र पदों तथा अर्थोंसे युक्त वाणीके द्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ ६ ॥

देवताओंने प्रार्थना की—स्वामी ! कर्मोंके विकट फंदोंसे छूटनेकी इच्छावाले मुमुक्षुजन भक्ति- भावसे अपने हृदयमें जिसका चिन्तन करते रहते हैं, आपके उसी चरणकमलको हमलोगोंने अपनी बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणीसे साक्षात् नमस्कार किया है। अहो ! आश्चर्य है ! [*] ॥ ७ ॥ अजित ! आप मायिक रज आदि गुणोंमें स्थित होकर इस अचिन्त्य नाम-रूपात्मक प्रपञ्चकी त्रिगुणमयी मायाके द्वारा अपने-आपमें ही रचना करते हैं, पालन करते और संहार करते हैं। यह सब करते हुए भी इन कर्मोंसे आप लिप्त नहीं होते हैं; क्योंकि आप राग-द्वेषादि दोषोंसे सर्वथा मुक्त हैं और अपने निरावरण अखण्ड स्वरूपभूत परमानन्दमें मग्र रहते हैं ॥ ८ ॥ स्तुति करनेयोग्य परमात्मन् ! जिन मनुष्योंकी चित्तवृत्ति राग-द्वेषादिसे कलुषित हैं, वे उपासना, वेदाध्ययन, दान, तपस्या और यज्ञ आदि कर्म भले ही करें; परंतु उनकी वैसी शुद्धि नहीं हो सकती, जैसी श्रवणके द्वारा संपुष्ट शुद्धान्त:करण सज्जन पुरुषोंकी आपकी लीलाकथा, कीर्तिके विषयमें दिनोंदिन बढक़र परिपूर्ण होनेवाली श्रद्धासे होती है ॥ ९ ॥ मननशील मुमुक्षुजन मोक्ष-प्राप्तिके लिये अपने प्रेमसे पिघले हुए हृदयके द्वारा जिन्हें लिये-लिये फिरते हैं, पाञ्चरात्र विधिसे उपासना करनेवाले भक्तजन समान ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस चतुव्र्यूहके रूपमें जिनका पूजन करते हैं और जितेन्द्रिय धीरपुरुष स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके भगवद्धामकी प्राप्तिके लिये तीनों समय जिनकी पूजा किया करते हैं, याज्ञिक लोग तीनों वेदोंके द्वारा बतलायी हुई विधिसे अपने संयत हाथोंमें हविष्य लेकर यज्ञकुण्डमें आहुति देते और उन्हींका चिन्तन करते हैं। आपकी आत्मस्वरूपिणी मायाके जिज्ञासु योगीजन हृदयके अन्तर्देशमें दहरविद्या आदिके द्वारा आपके चरणकमलोंका ही ध्यान करते हैं और आपके बड़े-बड़े प्रेमी भक्तजन उन्हींको अपना परम इष्ट आराध्यदेव मानते हैं। प्रभो ! आपके वे ही चरणकमल हमारी समस्त अशुभ वासनाओं— विषयवासनाओंको भस्म करनेके लिये अग्रिस्वरूप हों। वे अग्रिके समान हमारे पाप-तापोंको भस्म कर दें ॥ १०-११ ॥ प्रभो ! यह भगवती लक्ष्मी आपके वक्ष:स्थलपर मुरझायी हुई बासी वनमालासे भी सौत की तरह  स्पर्धा रखती हैं। फिर भी आप उनकी परवा न कर भक्तोंके द्वारा इस बासी मालासे की हुई पूजा भी प्रेमसे स्वीकार करते हैं। ऐसे भक्तवत्सल प्रभुके चरणकमल सर्वदा हमारी विषय-वासनाओंको जलानेवाले अग्रिस्वरूप हों ॥ १२ ॥ अनन्त ! वामनावतारमें दैत्यराज बलिकी दी हुई पृथ्वीको नापनेके लिये जब आपने अपना पग उठाया था और वह सत्यलोकमें पहुँच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो। ब्रह्माजीके पखारनेके बाद उससे गिरती हुई गङ्गाजीके जलकी तीन धाराएँ ऐसी जान पड़ती थीं, मानो उसमें लगी हुई तीन पताकाएँ फहरा रही हों। उसे देखकर असुरोंकी सेना भयभीत हो गयी थी और देवसेना निर्भय। आपका वह चरणकमल साधुस्वभाव पुरुषोंके लिये आपके धाम वैकुण्ठलोककी प्राप्तिका और दुष्टोंके लिये अधोगतिका कारण है। भगवन् ! आपका वही पादपद्म हम भजन करनेवालोंके सारे पाप-ताप धो-बहा दे ॥ १३ ॥ ब्रह्मा आदि जितने भी शरीरधारी हैं, वे सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंके परस्पर विरोधी त्रिविध भावोंकी टक्करसे जीते-मरते रहते हैं। वे सुख-दु:खके थपेड़ोंसे बाहर नहीं हैं और ठीक वैसे ही आपके वशमें हैं, जैसे नथे हुए बैल अपने स्वामीके वशमें होते हैं। आप उनके लिये भी कालस्वरूप हैं। उनके जीवनका आदि, मध्य और अन्त आपके ही अधीन है। इतना ही नहीं, आप प्रकृति और पुरुषसे भी परे स्वयं पुरुषोत्तम हैं। आपके चरणकमल हमलोगोंका कल्याण करें ॥ १४ ॥ प्रभो आप इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं; क्योंकि शास्त्रोंने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वके भी नियन्त्रण करनेवाले काल हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षाकालरूप तीन नाभियोंवाले संवत्सरके रूपमें सबको क्षयकी ओर ले जानेवाले काल आप ही हैं। आपकी गति अबाध और गम्भीर है। आप स्वयं पुरुषोत्तम हैं ॥ १५ ॥ यह पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता है और फिर मायाके साथ संयुक्त होकर विश्वके महत्तत्त्वरूप गर्भका स्थापन करता है। इसके बाद वह महत्तत्त्व त्रिगुणमयी मायाका अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहङ्कार और मनरूप सात आवरणों (परतों) वाले इस सुवर्णवर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करता है ॥ १६ ॥ इसलिये हृषीकेश ! आप समस्त चराचर जगत्के अधीश्वर हैं। यही कारण है कि मायाकी गुण-विषमताके कारण बननेवाले विभिन्न पदार्थोंका उपभोग करते हुए भी आप उनमें लिप्त नहीं होते। यह केवल आपकी ही बात है। आपके अतिरिक्त दूसरे तो स्वयं उनका त्याग करके भी उन विषयोंसे डरते रहते हैं ॥ १७ ॥ सोलह हजारसे अधिक रानियाँ आपके साथ रहती हैं। वे सब अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे युक्त मनोहर भौहोंके इशारेसे और सुरतालापोंसे प्रौढ़ सम्मोहक कामबाण चलाती हैं और कामकलाकी विविध रीतियोंसे आपका मन आकर्षित करना चाहती हैं; परंतु फिर भी वे अपने परिपुष्ट कामबाणोंसे आपका मन तनिक भी न डिगा सकीं, वे असफल ही रहीं ॥ १८ ॥ आपने त्रिलोकीकी पाप-राशिको धो बहानेके लिये दो प्रकारकी पवित्र नदियाँ बहा रखी हैं—एक तो आपकी अमृतमयी लीलासे भरी कथानदी और दूसरी आपके पाद-प्रक्षालनके जलसे भरी गङ्गाजी। अत: सत्सङ्गसेवी विवेकीजन कानोंके द्वारा आपकी कथा-नदीमें और शरीरके द्वारा गङ्गाजीमें गोता लगाकर दोनों ही तीर्थोंका सेवन करते हैं और अपने पाप-ताप मिटा देते हैं ॥ १९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! समस्त देवताओं और भगवान्‌ शङ्कर के साथ ब्रह्माजीने इस प्रकार भगवान्‌ की स्तुति की। इसके बाद वे प्रणाम करके अपने धाममें जानेके लिये आकाशमें स्थित होकर भगवान्‌ से इस प्रकार कहने लगे ॥ २० ॥

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[1] यहाँ साष्टाङ्ग प्रणामसे तात्पर्य है—

दोर्भ्याँ पदाभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा दृशा॥मनसा वचसा चेति प्रणामोऽष्टाङ्ग ईरित:॥

हाथोंसे, चरणोंसे, घुटनोंसे, वक्ष:स्थलसे, सिरसे, नेत्रोंसे, मनसे और वाणीसे—इन आठ अङ्गोंसे किया गया प्रणाम साष्टाङ्ग प्रणाम कहलाता है।

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

 



रविवार, 14 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

भक्तिहीन पुरुषों की गति और भगवान्‌ की पूजाविधि का वर्णन

 

 इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम् ।

 नानातन्त्रविधानेन कलावपि तथा श्रृणु ॥ ३१ ॥

 कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र पार्षदम् ।

 यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैः यजन्ति हि सुमेधसः ॥ ३२ ॥

 ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं

     तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चिनुतं शरण्यम् ।

 भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं

     वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥ ३३ ॥

 त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सित राज्यलक्ष्मीं

     धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगात् अरण्यम् ।

 मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्

     वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥ ३४ ॥

 एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान् युगवर्तिभिः ।

 मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसा्मीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥

 कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः ।

 यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते ॥ ३६ ॥

 न ह्यतः परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह ।

 यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृतिः ॥ ३७ ॥

 कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम् ।

 कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥ ३८ ॥

 क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः ।

 ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ॥ ३९ ॥

 कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी ।

 ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर ।

 प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेऽमलाशयाः ॥ ४० ॥

 देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां

     न किङ्करो नायमृणी च राजन् ।

 सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं

     गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ॥ ४१ ॥

 स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य

     त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः ।

 विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चित्

     धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ ४२ ॥

 

 श्रीनारद उवाच -

 धर्मान् भागवतानित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्वरः ।

 जायन्तेयान् मुनीन् प्रीतः सोपाध्यायो ह्यपूजयत् ॥ ४३ ॥

 ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धाः सर्वलोकस्य पश्यतः ।

 राजा धर्मानुपातिष्ठन् अवाप परमां गतिम् ॥ ४४ ॥

 त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवतान् श्रुतान् ।

 आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसङ्गो यास्यसे परम् ॥ ४५ ॥

 युवयोः खलु दम्पत्योः यशसा पूरितं जगत् ।

 पुत्रतामगमद् यद् वां भगवानीश्वरो हरिः ॥ ४६ ॥

 दर्शनालिङ्गनालापैः शयनासनभोजनैः ।

 आत्मा वां पावितः कृष्णे पुत्रस्नेहं प्रकुर्वतोः ॥ ४७ ॥

 वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-

     शाल्वादयो गतिविलास-विलोकनाद्यैः ।

 ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ

     तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम् ॥ ४८ ॥

 मापत्यबुद्धिमकृथाः कृष्णे सर्वात्मनीश्वरे ।

 मायामनुष्यभावेन गूढैश्वर्ये परेऽव्यये ॥ ४९ ॥

 भूभारासुरराजन्य हन्तवे गुप्तये सताम् ।

 अवतीर्णस्य निर्वृत्यै यशो लोके वितन्यते ॥ ५० ॥

 

 श्रीशुक उवाच -

 एतत् श्रृत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मितः ।

 देवकी च महाभागा जहतुः मोहमात्मनः ॥ ५१ ॥

 इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद् यः समाहितः ।

 स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५२ ॥

 

राजन् ! द्वापरयुगमें इस प्रकार लोग जगदीश्वर भगवान्‌की स्तुति करते हैं। अब कलियुगमें अनेक तन्त्रोंके विधि-विधानसे भगवान्‌ की जैसी पूजा की जाती है, उसका वर्णन सुनो— ॥ ३१ ॥ कलियुग में भगवान्‌  का श्रीविग्रह होता है कृष्णवर्ण—काले रंगका । जैसे नीलम मणिमेंसे उज्ज्वल कान्तिधारा निकलती रहती है, वैसे ही उनके अङ्ग की छटा भी उज्ज्वल होती है। वे हृदय आदि अङ्ग, कौस्तुभ आदि उपाङ्ग, सुदर्शन आदि अस्त्र और सुनन्द प्रभृति पार्षदोंसे संयुक्त रहते हैं। कलियुगमें श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न पुरुष ऐसे यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करते हैं जिनमें नाम गुण, लीला आदिके कीर्तनकी प्रधानता रहती है ॥ ३२ ॥ वे लोग भगवान्‌ की स्तुति इस प्रकार करते हैं—‘प्रभो आप शरणागत रक्षक हैं। आपके चरणारविन्द सदा-सर्वदा ध्यान करनेयोग्य, माया- मोहके कारण होनेवाले सांसारिक पराजयोंका अन्त कर देनेवाले तथा भक्तोंकी समस्त अभीष्ट वस्तुओंका दान करनेवाले कामधेनुस्वरूप हैं। वे तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले स्वयं परम तीर्थस्वरूप हैं; शिव, ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता उन्हें नमस्कार करते हैं और चाहे जो कोई उनकी शरणमें आ जाय, उसे स्वीकार कर लेते हैं। सेवकोंकी समस्त आॢत और विपत्तिके नाशक तथा संसार-सागरसे पार जानेके लिये जहाज हैं। महापुरुष ! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दोंकी वन्दना करता हूँ ॥ ३३ ॥ भगवन् ! आपके चरणकमलोंकी महिमा कौन कहे ? रामावतारमें अपने पिता दशरथजीके वचनोंसे देवताओंके लिये भी वाञ्छनीय और दुस्त्यज राज्यलक्ष्मीको छोडक़र आपके चरण-कमल वन-वन घूमते फिरे ! सचमुच आप धर्मनिष्ठताकी सीमा हैं। और महापुरुष ! अपनी प्रेयसी सीताजीके चाहनेपर जान-बूझकर आपके चरण-कमल मायामृगके पीछे दौड़ते रहे। सचमुच आप प्रेमकी सीमा हैं। प्रभो ! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दोंकी वन्दना करता हूँ’ ॥ ३४ ॥

राजन् ! इस प्रकार विभिन्न युगोंके लोग अपने-अपने युगके अनुरूप नाम-रूपोंद्वारा विभिन्न प्रकारसे भगवान्‌की आराधना करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—सभी पुरुषार्थोंके एकमात्र स्वामी भगवान्‌ श्रीहरि ही हैं ॥ ३५ ॥ कलियुगमें केवल सङ्कीर्तनसे ही सारे स्वार्थ और परमार्थ बन जाते हैं। इसलिये इस युगका गुण जाननेवाले सारग्राही श्रेष्ठ पुरुष कलियुगकी बड़ी प्रशंसा करते हैं, इससे बड़ा प्रेम करते हैं ॥ ३६ ॥ देहाभिमानी जीव संसारचक्रमें अनादि कालसे भटक रहे हैं। उनके लिये भगवान्‌की लीला, गुण और नामके कीर्तनसे बढक़र और कोई परम लाभ नहीं है; क्योंकि इससे संसारमें भटकना मिट जाता है और परम शान्तिका अनुभव होता है ॥ ३७ ॥ राजन् ! सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रजा चाहती है कि हमारा जन्म कलियुगमें हो; क्योंकि कलियुगमें कहीं-कहीं भगवान्‌ नारायणके शरणागत उन्हींके आश्रयमें रहनेवाले बहुत-से भक्त उत्पन्न होंगे। महाराज विदेह ! कलियुगमें द्रविड़देशमें अधिक भक्त पाये जाते हैं; जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला, पयस्विनी, परम पवित्र कावेरी, महानदी और प्रतीची नामकी नदियाँ बहती हैं। राजन् ! जो मनुष्य इन नदियोंका जल पीते हैं, प्राय: उनका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है और वे भगवान्‌ वासुदेवके भक्त हो जाते हैं ॥ ३८—४० ॥ राजन् ! जो मनुष्य ‘यह करना बाकी है, वह करना आवश्यक है’—इत्यादि कर्म-वासनाओंका अथवा भेदबुद्धिका परित्याग करके सर्वात्मभावसे शरणागतवत्सल, प्रेमके वरदानी भगवान्‌ मुकुन्दकी शरणमें आ गया है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों, प्राणियों, कुटुम्बियों और अतिथियोंके ऋणसे उऋण हो जाता है; वह किसीके अधीन, किसीका सेवक, किसीके बन्धनमें नहीं रहता ॥ ४१ ॥ जो प्रेमी भक्त अपने प्रितयतम भगवान्‌के चरणकमलोंका अनन्यभावसे—दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियोंको छोडक़र—भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जायँ तो परमपुरुष भगवान्‌ श्रीहरि उसके हृदयमें बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदयको शुद्ध कर देते हैं ॥ ४२ ॥

नारदजी कहते हैं—वसुदेवजी ! मिथिलानरेश राजा निमि नौ योगीश्वरोंसे इस प्रकार भागवतधर्मोंका वर्णन सुनकर बहुत ही आनन्दित हुए। उन्होंने अपने ऋत्विज् और आचार्योंके साथ ऋषभनन्दन नव योगीश्वरोंकी पूजा की ॥ ४३ ॥ इसके बाद सब लोगोंके सामने ही वे सिद्ध अन्तर्धान हो गये। विदेहराज निमिने उनसे सुने हुए भागवतधर्मोंका आचरण किया और परमगति प्राप्त की ॥ ४४ ॥ महाभाग्यवान् वसुदेवजी ! मैंने तुम्हारे आगे जिन भागवतधर्मोंका वर्णन किया है, तुम भी यदि श्रद्धाके साथ इनका आचरण करोगे तो अन्तमें सब आसक्तियोंसे छूटकर भगवान्‌का परमपद प्राप्त कर लोगे ॥ ४५ ॥ वसुदेवजी ! तुम्हारे और देवकीके यशसे तो सारा जगत् भरपूर हो रहा है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४६ ॥ तुमलोगोंने भगवान्‌के दर्शन, आलिङ्गन तथा बातचीत करने एवं उन्हें सुलाने, बैठाने, खिलाने आदिके द्वारा वात्सल्य-स्नेह करके अपना हृदय शुद्ध कर लिया है; तुम परम पवित्र हो गये हो ॥ ४७ ॥ वसुदेवजी ! शिशुपाल, पौण्ड्रक और शाल्व आदि राजाओंने तो वैरभावसे श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, लीला-विलास, चितवन-बोलन आदिका स्मरण किया था। वह भी नियमानुसार नहीं, सोते, बैठते, चलते-फिरते—स्वाभाविकरूपसे ही। फिर भी उनकी चित्तवृत्ति श्रीकृष्णाकार हो गयी और वे सारूप्य-मुक्तिके अधिकारी हुए। फिर जो लोग प्रेमभाव और अनुरागसे श्रीकृष्णका चिन्तन करते हैं, उन्हें श्रीकृष्णकी प्राप्ति होनेमें कोई सन्देह है क्या ? ॥ ४८ ॥ वसुदेवजी ! तुम श्रीकृष्णको केवल अपना पुत्र ही मत समझो। वे सर्वात्मा, सर्वेश्वर, कारणातीत और अविनाशी हैं। उन्होंने लीलाके लिये मनुष्यरूप प्रकट करके अपना ऐश्वर्य छिपा रखा है ॥ ४९ ॥ वे पृथ्वीके भारभूत राजवेषधारी असुरोंका नाश और संतोंकी रक्षा करनेके लिये तथा जीवोंको परम शान्ति और मुक्ति देनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसीके लिये जगत् में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है ॥ ५० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्‌ ! नारदजीके मुखसे यह सब सुनकर परम भाग्यवान् वसुदेवजी और परम भाग्यवती देवकीजीको बड़ा ही विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह अवशेष था, उसे उन्होंने तत्क्षण छोड़ दिया ॥ ५१ ॥ राजन् ! यह इतिहास परम पवित्र है। जो एकाग्रचित्तसे इसे धारण करता है, वह अपना सारा शोक-मोह दूर करके ब्रह्मपदको प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥

 

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां एकादशस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

 

 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से 



श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण नभो गतो दिशः सर्वाः सह...