मंगलवार, 31 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

तासु बुद्बुदफेनाभ्यां दृष्टं तद्धरति क्षिपन् ।
हतपुत्रस्ततस्त्वष्टा जुहावेन्द्राय शत्रवे ॥ ११ ॥
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व मा चिरं जहि विद्विषम् ।
अथान्वाहार्यपचनादुत्थितो घोरदर्शनः ॥ १२ ॥
कृतान्त इव लोकानां युगान्तसमये यथा ।
विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्रं दिने दिने ॥ १३ ॥
दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम् ।
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुं मध्याह्नार्कोग्रलोचनम् ॥ १४ ॥
देदीप्यमाने त्रिशिखे शूल आरोप्य रोदसी ।
नृत्यन्तमुन्नदन्तं च चालयन्तं पदा महीम् ॥ १५ ॥
दरीगम्भीरवक्त्रेण पिबता च नभस्तलम् ।
लिहता जिह्वयर्क्षाणि ग्रसता भुवनत्रयम् ॥ १६ ॥
महता रौद्रदंष्ट्रेण जृम्भमाणं मुहुर्मुहुः ।
वित्रस्ता दुद्रुवुर्लोका वीक्ष्य सर्वे दिशो दश ॥ १७ ॥

विश्वरूपकी मृत्युके बाद उनके पिता त्वष्टा ‘हे इन्द्रशत्रो ! तुम्हारी अभिवृद्धि हो और शीघ्र-से- शीघ्र तुम अपने शत्रुको मार डालो’—इस मन्त्र से इन्द्रका शत्रु उत्पन्न करने के लिये हवन करने लगे ॥ ११ ॥ यज्ञ समाप्त होनेपर अन्वाहार्य-पचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) से एक बड़ा भयावना दैत्य प्रकट हुआ। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो लोकों का नाश करनेके लिये प्रलयकालीन विकराल काल ही प्रकट हुआ हो ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! वह प्रतिदिन अपने शरीरके सब ओर बाणके बराबर बढ़ जाया करता था। वह जले हुए पहाड क़े समान काला और बड़े डील-डौल का था। उसके शरीरमेंसे सन्ध्याकालीन बादलोंके समान दीप्ति निकलती रहती थी ॥ १३ ॥ उसके सिरके बाल और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल रंगके तथा नेत्र दोपहरके सूर्यके समान प्रचण्ड थे ॥ १४ ॥ चमकते हुए तीन नोकोंवाले त्रिशूलको लेकर जब वह नाचने, चिल्लाने और कूदने लगता था, उस समय पृथ्वी काँप उठती थी और ऐसा जान पड़ता था कि उस त्रिशूलपर उसने अन्तरिक्षको उठा रखा है ॥ १५ ॥ वह बार-बार जँभाई लेता था। इससे जब उसका कन्दराके समान गम्भीर मुँह खुल जाता, तब जान पड़ता कि वह सारे आकाशको पी जायगा, जीभसे सारे नक्षत्रोंको चाट जायगा और अपनी विशाल एवं विकराल दाढ़ोंवाले मुँहसे तीनों लोकोंको निगल जायगा। उसके भयावने रूपको देखकर सब लोग डर गये और इधर-उधर भागने लगे ॥ १६-१७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

ब्रह्महत्यामञ्जलिना जग्राह यदपीश्वरः ।
संवत्सरान्ते तदघं भूतानां स विशुद्धये ॥ ६ ॥
भूम्यम्बुद्रुमयोषिद्भ्यश्चतुर्धा व्यभजद्धरिः ।
भूमिस्तुरीयं जग्राह खातपूरवरेण वै ॥ ७ ॥
ईरिणं ब्रह्महत्याया रूपं भूमौ प्रदृश्यते ।
तुर्यं छेदविरोहेण वरेण जगृहुर्द्रुमाः ॥ ८ ॥
तेषां निर्यासरूपेण ब्रह्महत्या प्रदृश्यते ।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रियः ।। ९॥
रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते ।
द्रव्यभूयोवरेणापस्तुरीयं जगृहुर्मलम् ॥ १० ॥

इन्द्र चाहते तो विश्वरूपके वधसे लगी हुई हत्याको दूर कर सकते थे; परन्तु उन्होंने ऐसा करना उचित न समझा, वरं हाथ जोडक़र उसे स्वीकार कर लिया तथा एक वर्षतक उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं किया। तदनन्तर सब लोगोंके सामने अपनी शुद्धि प्रकट करनेके लिये उन्होंने अपनी ब्रह्महत्याको चार हिस्सोंमें बाँटकर पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों को दे दिया ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! पृथ्वी ने बदले में यह वरदान लेकर कि जहाँ कहीं गड्ढा होगा, वह समय पर अपने-आप भर जायगा, इन्द्रकी ब्रह्महत्याका चतुर्थांश स्वीकार कर लिया। वही ब्रह्महत्या पृथ्वीमें कहीं-कहीं ऊसरके रूपमें दिखायी पड़ती है ॥ ७ ॥ दूसरा चतुर्थांश वृक्षोंने लिया। उन्हें यह वर मिला कि उनका कोई हिस्सा कट जानेपर फिर जम जायगा। उनमें अब भी गोंदके रूपमें ब्रह्महत्या दिखायी पड़ती है ॥ ८ ॥ स्त्रियों ने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुष का सहवास कर सकें, ब्रह्महत्या का तीसरा चतुर्थांश स्वीकार किया। उनकी ब्रह्महत्या प्रत्येक महीने में रज के रूप से दिखायी पड़ती है ॥ ९ ॥ जलने यह वर पाकर कि खर्च करते रहनेपर भी निर्झर आदिके रूपमें तुम्हारी बढ़ती ही होती रहेगी, ब्रह्महत्या का चौथा चतुर्थांश स्वीकार किया। फेन, बुद्बुद आदि के रूप में वही ब्रह्महत्या दिखायी पड़ती है। अतएव मनुष्य उसे हटाकर जल ग्रहण किया करते हैं ॥ १० ॥

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सोमवार, 30 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

श्रीशुक उवाच

तस्यासन् विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत ।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम ॥ १ ॥
स वै बर्हिषि देवेभ्यो भागं प्रत्यक्षमुच्चकैः ।
अददद्यस्य पितरो देवाः सप्रश्रयं नृप ॥ २ ॥
स एव हि ददौ भागं परोक्षमसुरान् प्रति ।
यजमानोऽवहद्भागं मातृस्नेहवशानुगः ॥ ३ ॥
तद्देवहेलनं तस्य धर्मालीकं सुरेश्वरः ।
आलक्ष्य तरसा भीतस्तच्छीर्षाण्यच्छिनद्रुषा ॥ ४ ॥
सोमपीथं तु यत्तस्य शिर आसीत्कपिञ्जलः ।
कलविङ्कः सुरापीथमन्नादं यत्स तित्तिरिः ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! हमने सुना है कि विश्वरूपके तीन सिर थे। वे एक मुँह से सोमरस तथा दूसरे से सुरा पीते थे और तीसरे से अन्न खाते थे ॥ १ ॥ उनके पिता त्वष्टा आदि बारह आदित्य देवता थे, इसलिये वे यज्ञके समय प्रत्यक्षरूपमें ऊँचे स्वरसे बोलकर बड़े विनयके साथ देवताओंको आहुति देते थे ॥ २ ॥ साथ ही वे छिप-छिपकर असुरोंको भी आहुति दिया करते थे। उनकी माता असुर-कुलकी थीं, इसीलिये वे मातृस्नेहके वशीभूत होकर यज्ञ करते समय उस प्रकार असुरोंको भाग पहुँचाया करते थे ॥ ३ ॥ देवराज इन्द्रने देखा कि इस प्रकार वे देवताओंका अपराध और धर्मकी ओटमें कपट कर रहे हैं। इससे इन्द्र डर गये और क्रोधमें भरकर उन्होंने बड़ी फुर्तीसे उनके तीनों सिर काट लिये ॥ ४ ॥ विश्वरूपका सोमरस पीनेवाला सिर पपीहा, सुरापान करनेवाला गौरैया और अन्न खानेवाला तीतर हो गया ॥ ५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

नारायणकवच का उपदेश

श्रीशुक उवाच

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ||४१||
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् || ४२||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जो पुरुष इस नारायणकवच को समय पर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदरसे झुक जाते हैं और वह सब प्रकारके भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४१ ॥ परीक्षित्‌ ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का  उपभोग करने लगे ॥ ४२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारायणधर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः

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रविवार, 29 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

नारायणकवच का उपदेश

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन्द्विजः
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरुधन्वनि ||३८||
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ||३९||
गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्शिराः
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ||४०||

देवराज ! प्राचीन काल की बात है, एक कौशिकगोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरुभूमिमें त्याग दिया ॥ ३८ ॥ जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उस के ऊपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमानपर बैठकर निकले ॥ ३९ ॥ वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमानसहित आकाश से पृथ्वीपर गिर पड़े । इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही। जब उन्हें वालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायणकवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मणदेवता की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को गये ॥४० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

नारायणकवच का उपदेश
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्
विजेष्यसेऽञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ||३५||
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ||३६||
न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ||३७||

देवराज इन्द्र ! मैंने तुम्हें यह नारायणकवच सुना दिया। इस कवचसे तुम अपनेको सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य-यूथपतियोंको जीत लोगे ॥ ३५ ॥ इस नारायणकवच को धारण करनेवाला पुरुष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता अथवा पैरसे छू देता है, वह तत्काल समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत-पिशाचादि और बाघ आदि हिंसक जीवोंसे कभी किसी प्रकारका भय नहीं होता ॥ ३७ ॥ 

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शनिवार, 28 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

नारायणकवच का उपदेश

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ||३१||
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्
भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ||३२||
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान्हरिः
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ||३३||
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः
प्रहापय लोकभयं स्वनेन 
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ||३४||

‘जितना भी कार्य अथवा कारणरूप जगत् है, वह वास्तवमें भगवान्‌ ही हैं’—इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायँ ॥ ३१ ॥ जो लोग ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान्‌ का स्वरूप समस्त विकल्पों—भेदों से रहित है; फिर भी वे अपनी माया-शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं, यह बात निश्चितरूप से सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान्‌ श्रीहरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ॥ ३२-३३ ॥ जो अपने भयङ्कर अट्टहाससे सब लोगोंके भयको भगा देते हैं और अपने तेजसे सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान्‌ नृसिंह दिशा-विदिशा में, नीचे-ऊपर, बाहर- भीतर—सब ओर हमारी रक्षा करें’ ॥ ३४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

नारायणकवच का उपदेश

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव च ||२७||
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपानुकीर्तनात्
प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ||२८||
गरुडो भगवान्स्तोत्र स्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ||२९||
सर्वापद्भ्यो हरेर्नाम रूपयानायुधानि नः
बुद्धीन्द्रि यमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ||३०||

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छलतारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ों वाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हों और जो-जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों—वे सभी भगवान्‌ के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायँ ॥ २७-२८ ॥ बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान्‌ गरुड और विष्वक्सेन जी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें ॥ २९ ॥ श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ॥ ३० ॥

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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

नारायणकवच का उपदेश
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ- 
पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो 
भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ||२५||
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-
मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि
चक्षूंषि चर्मन्छतचन्द्र छादय 
द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ||२६||

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान्‌ श्रीकृष्णके फूँकनेसे भयङ्कर शब्द करके मेरे शत्रुओंका दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियोंको यहाँसे झटपट भगा दीजिये ॥ २५ ॥ भगवान्‌ की प्यारी तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है। आप भगवान्‌की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दीजिये। भगवान्‌ की प्यारी ढाल ! आप में सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं। आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखें बंद कर दीजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ॥ २६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

नारायणकवच का उपदेश

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि 
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम्
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु 
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ||२३||
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे 
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि
कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो 
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ||२४||

‘सुदर्शन ! आपका आकार चक्र (रथके पहिये) की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि  के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान्‌ की प्रेरणासे सब ओर घूमते रहते हैं। जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूसको जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रु-सेनाको शीघ्र-से-शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ॥ २३ ॥ कौमोद की गदा ! आप से छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है। आप भगवान्‌ अजितकी प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ। इसलिये आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहोंको अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओंको चूर-चूर कर दीजिये ॥ २४ ॥ 

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गुरुवार, 26 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

नारायणकवच का उपदेश

मां केशवो गदया प्रातरव्याद्  
गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्र पाणिः ||२०||
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा 
सायं त्रिधामावतु माधवो माम्
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे 
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ||२१||
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः 
प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते 
विश्वेश्वरो भगवान्कालमूर्तिः ||२२||

प्रात:काल भगवान्‌ केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ आनेपर भगवान्‌ गोविन्द अपनी बाँसुरी लेकर, दोपहरके पहले भगवान्‌ नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहरको भगवान्‌ विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ॥ २० ॥ तीसरे पहरमें भगवान्‌ मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें। सायंकालमें ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त  के बाद हृषीकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्धरात्रि के समय अकेले भगवान्‌ पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ॥ २१ ॥ रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान्‌ जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान्‌ विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ॥ २२ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

नारायणकवच का उपदेश

धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्-  
द्वंद्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् 
बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ||१८||
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्  
बुद्धस्तु पाषण्डगणप्रमादात्
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु 
धर्मावनायोरुकृतावतारः ||१९||

भगवान्‌ धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्रिय भगवान्‌ ऋषभदेव सुख-दु:ख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञभगवान्‌ लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टोंसे और श्रीशेषजी क्रोधवश नामक सर्पों के गण से मेरी रक्षा करें ॥ १८ ॥ 
भगवान्‌ श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें। धर्मरक्षा के लिये महान् अवतार धारण करनेवाले भगवान्‌ कल्कि पापबहुल कलिकालके दोषों से मेरी रक्षा करें ॥ १९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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बुधवार, 25 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

नारायणकवच का उपदेश

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्-
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ||१७||

परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान्‌ मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से[*] और भगवान्‌ कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ॥१७॥ 
...........................................
[*] बत्तीस प्रकारके सेवापराध माने गये हैं—१-सवारीपर चढक़र अथवा पैरोंमें खड़ाऊँ पहनकर श्रीभगवान्‌ के मन्दिरमें जाना। २-रथयात्रा, जन्माष्टमी आदि उत्सवोंका न करना या उनके दर्शन न करना। ३-श्रीमूर्तिके दर्शन करके प्रणाम न करना। ४-अशुचि-अवस्थामें दर्शन करना। ५-एक हाथसे प्रणाम करना। ६-परिक्रमा करते समय भगवान्‌के सामने आकर कुछ न रुककर फिर परिक्रमा करना अथवा केवल सामने ही परिक्रमा करते रहना। ७-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने पैर पसारकर बैठना। ८-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने दोनों घुटनों को ऊँचा करके उनको हाथोंसे लपेटकर बैठ जाना। ९-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने सोना। १०-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने भोजन करना। ११-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने झूठ बोलना। १२-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने जोर से बोलना। १३-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने आपसमें बातचीत करना। १४-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहके सामने चिल्लाना। १५-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने कलह करना। १६-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहके सामने किसी को पीड़ा देना। १७-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने किसीपर अनुग्रह करना। १८-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहके सामने किसीको निष्ठुर वचन बोलना। १९-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहके सामने कम्बलसे सारा शरीर ढक लेना। २०-श्रीभगवान्‌के श्रीविग्रहके सामने दूसरेकी निन्दा करना। २१-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने दूसरे की स्तुति करना। २२-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रह के सामने अश्लील शब्द बोलना। २३-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहके सामने अधोवायुका त्याग करना। २४-शक्ति रहते हुए भी गौण अर्थात् सामान्य उपचारोंसे भगवान्‌की सेवा-पूजा करना। २५-श्रीभगवान्‌ को निवेदित किये बिना किसी भी वस्तु का खाना-पीना। २६-जिस ऋतु में जो फल हो, उसे सबसे पहले श्रीभगवान्‌ को न चढ़ाना। २७-किसी शाक या फलादिके अगले भागको तोडक़र भगवान्‌के व्यञ्जनादिके लिये देना। २८-श्रीभगवान्‌ के श्रीविग्रहको पीठ देकर बैठना। २९-श्रीभगवान्‌के श्रीविग्रहके सामने दूसरे किसीको भी प्रणाम करना। ३०-गुरुदेवकी अभ्यर्थना, कुशल-प्रश्न और उनका स्तवन न करना। ३१-अपने मुखसे अपनी प्रशंसा करना। ३२-किसी भी देवताकी निन्दा करना।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

नारायणकवच का उपदेश
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः 
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं 
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ||१४||
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः 
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे 
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ||१५||
मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात्
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः 
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ||१६||

जिनके घोर अट्टहाससे सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर गये थे, वे दैत्य-यूथपतियोंके शत्रु भगवान्‌ नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानोंमें मेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥ 
अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वी को धारण करनेवाले यज्ञमूर्ति वराहभगवान्‌ मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरोंपर और लक्ष्मणजी के सहित भरतके बड़े भाई भगवान्‌ रामचन्द्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ॥ १५ ॥ भगवान्‌ नारायण मारण-मोहन आदि भयङ्कर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें। ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान्‌ दत्तात्रेय योग के विघ्नों से  और त्रिगुणाधिपति भगवान्‌ कपिल कर्मबन्धनों से मेरी रक्षा करें ॥ १६ ॥ 

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मंगलवार, 24 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

नारायणकवच का उपदेश

आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ||११||
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां 
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्र पृष्ठे
दरारिचर्मासिगदेषुचाप- 
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ||१२||
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात्
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्-
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ||१३||

इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी ज्ञान और वैराग्यसे परिपूर्ण इष्टदेव भगवान्‌का ध्यान करे और अपनेको भी तद्रूप ही चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्या, तेज और तप:स्वरूप इस कवचका पाठ करे— ॥ ११ ॥
‘भगवान्‌ श्रीहरि गरुडज़ीकी पीठपर अपने चरणकमल रखे हुए हैं। अणिमादि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। आठ हाथोंमें शङ्ख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश (फंदा) धारण किये हुए हैं। वे ही ॐकारस्वरूप प्रभु सब प्रकार से, सब ओरसे मेरी रक्षा करें ॥ १२ ॥ मत्स्यमूर्ति भगवान्‌ जलके भीतर जलजन्तुओं से और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें। माया से ब्रह्मचारी का रूप धारण करने वाले वामन भगवान्‌ स्थलपर और विश्वरूप श्रीत्रिविक्रम भगवान्‌ आकाश में मेरी रक्षा करें ॥ १३ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

नारायणकवच का उपदेश

श्रीविश्वरूप उवाच
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ||४||
नारायणपरं वर्म सन्नह्येद्भय आगते
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ||५||
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादॐकारादीनि विन्यसेत्
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ||६||
करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया
प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ||७||
न्यसेद्धृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया न्यसेत् ||८||
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ||९||
सविसर्गं फडन्तं तत्सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्
ॐ विष्णवे नम इति ||१०||

विश्वरूप ने कहा—देवराज इन्द्र ! भयका अवसर उपस्थित होने पर नारायणकवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी विधि यह है कि पहले हाथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथमें कुशकी पवित्री धारण करके उत्तर मुँह बैठ जाय। इसके बाद कवचधारणपर्यन्त और कुछ न बोलनेका निश्चय करके पवित्रतासे ‘ॐ नमो नारायणाय’ और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इन मन्त्रोंके द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि-करन्यास करे। पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर मन्त्रके ॐ आदि आठ अक्षरोंका क्रमश: पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्ष:स्थल, मुख और सिरमें न्यास करे। अथवा पूर्वोक्त मन्त्रके मकारसे लेकर ॐकारपर्यन्त आठ अक्षरोंका सिरसे आरम्भ करके उन्हीं आठ अङ्गों में विपरीत क्रमसे न्यास करे ॥ ४—६ ॥ तदनन्तर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस द्वादशाक्षर मन्त्रके ॐ आदि बारह अक्षरोंका दायीं तर्जनीसे बायीं तर्जनीतक दोनों हाथकी आठ अँगुलियों और दोनों अँगूठोंकी दो-दो गाँठोंमें न्यास करे ॥ ७ ॥ फिर ‘ॐ विष्णवे नम:’ इस मन्त्रके पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदयमें ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र में, ‘ष्’ का भौंहोंके बीचमें, ‘ण’ का चोटीमें, ‘वे’ का दोनों नेत्रोंमें और ‘न’ का शरीरकी सब गाँठोंमें न्यास करे। तदनन्तर ‘ॐ म: अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे। इस प्रकार न्यास करनेसे इस विधिको जाननेवाला पुरुष मन्त्रस्वरूप हो जाता है ॥ ८—१० ॥ 

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सोमवार, 23 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

नारायणकवच का उपदेश

श्रीराजोवाच

यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान्
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ||१||
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्
यथाततायिनः शत्रून्येन गुप्तोऽजयन्मृधे ||२||

श्रीबादरायणिरुवाच

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ||३||

राजा परीक्षित्‌ ने पूछा—भगवन् ! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में—अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राजलक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायणकवच को मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओंपर विजय प्राप्त की ॥ १-२ ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा—परीक्षित्‌ ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने उन्हें नारायणकवच का उपदेश किया। तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ॥ ३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीबादरायणिरुवाच

तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्वरूपो महातपाः
पौरोहित्यं वृतश्चक्रे परमेण समाधिना ||३८||
सुरद्विषां श्रियं गुप्तामौशनस्यापि विद्यया
आच्छिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभुः ||३९||
यया गुप्तः सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभुः
तां प्राह स महेन्द्राय विश्वरूप उदारधीः ||४०||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विश्वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओं से ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगन के साथ उनकी पुरोहिती करने लगे ॥ ३८ ॥ यद्यपि शुक्राचार्य ने अपने नीतिबल से असुरों की सम्पत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ विश्वरूप ने वैष्णवी विद्या के प्रभाव से उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्रको दिला दी ॥ ३९ ॥ राजन् ! जिस विद्या से सुरक्षित होकर इन्द्रने असुरों की सेनापर विजय प्राप्त की थी, उसका उदारबुद्धि विश्वरूप ने ही उन्हें उपदेश किया था ॥ ४० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः

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रविवार, 22 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीविश्वरूप उवाच
विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्चौपव्ययम्
कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम्
प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते ||३५||
अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः
कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्वराः पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मतिः ||३६||
तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत्
भवतां प्रार्थितं सर्वं प्राणैरर्थैश्च साधये ||३७||

विश्वरूपने कहा—पुरोहिती का काम ब्रह्मतेज को क्षीण करनेवाला है। इसलिये धर्मशील महात्माओं ने उसकी निन्दा की है। किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्वर होकर भी मुझ से उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे-जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है ? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ। आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है ॥ ३५ ॥ देवगण ! हम अकिञ्चन हैं। खेती कट जानेपर अथवा अनाजकी हाट उठ जानेपर उसमेंसे गिरे हुए कुछ दाने चुन लाते हैं और उसीसे अपने देवकार्य तथा पितृकार्य सम्पन्न कर लेते हैं। लोकपालो ! इस प्रकार जब मेरी जीविका चल ही रही है, तब मैं पुरोहितीकी निन्दनीय वृत्ति क्यों करूँ ? उससे तो केवल वे ही लोग प्रसन्न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गयी है ॥ ३६ ॥ जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है—फिर भी मैं आपके कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है। इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन-मन-धन से पूरा करूँगा ॥ ३७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीदेवा ऊचुः
वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते
कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः ||२७||
पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम्
अपि पुत्रवतां ब्रह्मन्किमुत ब्रह्मचारिणाम् ||२८||
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः
भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात्क्षितेस्तनुः ||२९||
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्
अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः ||३०||
तस्मात्पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम्
तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि ||३१||
वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम्
यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा ||३२||
न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम्
छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन्वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ||३३||

श्रीऋषिरुवाच
अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरहित्ये महातपाः
स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा ||३४||

देवताओं ने कहा—बेटा विश्वरूप ! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथि के रूप में आये हैं। हम एक प्रकार से तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हम लोगों की समयोचित अभिलाषा पूर्ण करो ॥ २७ ॥ जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २८ ॥ वत्स ! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजी की, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वी की मूर्ति होती है ॥ २९ ॥ (इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्नि की और जगत् के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं ॥ ३० ॥ पुत्र ! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दु:खी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दु:ख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र ! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥ ३१ ॥ तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अत: जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥ ३२ ॥ पुत्र ! आवश्यकता पडऩेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोडक़र केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है ॥ ३३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब देवताओंने इस प्रकार विश्वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्वरूपने प्रसन्न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा ॥ ३४ ॥

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शनिवार, 21 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीब्रह्मोवाच
अहो बत सुरश्रेष्ठा ह्यभद्रं वः कृतं महत्
ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्वर्यान्नाभ्यनन्दत ||२१||
तस्यायमनयस्यासीत्परेभ्यो वः पराभवः
प्रक्षीणेभ्यः स्ववैरिभ्यः समृद्धानां च यत्सुराः ||२२||
मघवन्द्विषतः पश्य प्रक्षीणान्गुर्वतिक्रमात्
सम्प्रत्युपचितान्भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः
आददीरन्निलयनं ममापि भृगुदेवताः ||२३||
त्रिपिष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्थाः
न विप्रगोविन्दगवीश्वराणां भवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम् ||२४||
तद्विश्वरूपं भजताशु विप्रं तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम्
सभाजितोऽर्थान्स विधास्यते वो यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म ||२५||

श्रीशुक उवाच
त एवमुदिता राजन्ब्रह्मणा विगतज्वराः
ऋषिं त्वाष्ट्रमुपव्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन् ||२६||

ब्रह्माजी ने कहा—देवताओ ! यह बड़े खेदकी बात है। सचमुच तुमलोगोंने बहुत बुरा काम किया। हरे, हरे ! तुमलोगोंने ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मणका सत्कार नहीं किया ॥ २१ ॥ देवताओ ! तुम्हारी उसी अनीतिका यह फल है कि आज समृद्धिशाली होनेपर भी तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओंके सामने नीचा देखना पड़ा ॥ २२ ॥ देवराज ! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परंतु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्न हो गये हैं। देवताओ ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे ॥ २३ ॥ भृगुवंशियों ने इन्हें अर्थशास्त्र की पूरी-पूरी शिक्षा दे रखी है। ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगों को नहीं मिल पाता। उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है। ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमङ्गल नहीं होता ॥ २४ ॥ इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके पास जाओ और उन्हींकी सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे ॥ २५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा, तब उनकी चिन्ता दूर हो गयी। वे त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप ऋषिके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर यों कहने लगे ॥ २६ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान्गृहात्
बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया ||१६||
गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन्भगवान्स्वराट्
ध्यायन्धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः ||१७||
तच्छ्रुत्वैवासुराः सर्व आश्रित्यौशनसं मतम्
देवान्प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुर्मदा आततायिनः ||१८||
तैर्विसृष्टेषुभिस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्नाङ्गोरुबाहवः
ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहेन्द्रा नतकन्धराः ||१९||
तांस्तथाभ्यर्दितान्वीक्ष्य भगवानात्मभूरजः
कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन् ||२०||

परीक्षित्‌ ! देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान्‌ बृहस्पतिजी अपने घरसे निकलकर योगबलसे अन्तर्धान हो गये ॥ १६ ॥ देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढुँढ़वाया; परंतु उनका कहीं पता न चला। तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परंतु वे कुछ भी सोच न सके ! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा ॥ १७ ॥ परीक्षित्‌ ! दैत्योंको भी देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्रकी अनबनका पता लग गया। तब उन मदोन्मत्त और आततायी असुरोंने अपने गुरु शुक्राचार्यके आदेशानुसार देवताओंपर विजय पानेके लिये धावा बोल दिया ॥ १८ ॥ उन्होंने देवताओंपर इतने तीखे-तीखे बाणोंकी वर्षा की कि उनके मस्तक, जंघा, बाहु आदि अंग कट- कटकर गिरने लगे। तब इन्द्रके साथ सभी देवता सिर झुकाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ १९ ॥ स्वयम्भू एवं समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि देवताओंकी तो सचमुच बड़ी दुर्दशा हो रही है। अत: उनका हृदय अत्यन्त करुणासे भर गया। वे देवताओंको धीरज बँधाते हुए कहने लगे ॥२०॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

तर्ह्येव प्रतिबुध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः
गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना ||१०||
अहो बत मयासाधु कृतं वै दभ्रबुद्धिना
यन्मयैश्वर्यमत्तेन गुरुः सदसि कात्कृतः ||११||
को गृध्येत्पण्डितो लक्ष्मीं त्रिपिष्टपपतेरपि
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वरः ||१२||
यः पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन्न कञ्चन
प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदुः ||१३||
तेषां कुपथदेष्टॄणां पततां तमसि ह्यधः
ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव ||१४||
अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम्
प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन् ||१५||

(श्रीशुकदेव जी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी समामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे ॥ १० ॥ ‘हाय-हाय ! बड़े खेद की बात है कि भरी सभा में मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेव का तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है ॥ ११ ॥ भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्ग की राजलक्ष्मी को पाने की इच्छा करेगा ? देखो तो सही, आज इसी ने मुझ देवराज को भी असुरों के-से रजोगुणी भाव से भर दिया ॥ १२ ॥ जो लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासनपर बैठा हुआ सम्राट् किसी के आनेपर राजसिंहासन से न उठे, वे धर्म का वास्तविक स्वरूप नहीं जानते ॥ १३ ॥ ऐसा उपदेश करनेवाले कुमार्ग की ओर ले जानेवाले हैं। वे स्वयं घोर नरक में गिरते हैं। उनकी बातपर जो लोग विश्वास करते हैं, वे पत्थर की नाव की तरह डूब जाते हैं ॥ १४ ॥ मेरे गुरुदेव बृहस्पति जी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणों में अपना माथा टेक कर उन्हें मनाऊँगा’ ॥ १५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीराजोवाच
कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ ||१||

श्रीबादरायणिरुवाच
इन्द्र स्त्रिभुवनैश्वर्य मदोल्लङ्घितसत्पथः
मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैरृभुभिर्नृप ||२||
विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च नासत्याभ्यां परिश्रितः
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ||३||
विद्याधराप्सरोभिश्च किन्नरैः पतगोरगैः
निषेव्यमाणो मघवान्स्तूयमानश्च भारत ||४||
उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रितः
पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा ||५||
युक्तश्चान्यैः पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभिः
विराजमानः पौलोम्या सहार्धासनया भृशम् ||६||
स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह
नाभ्यनन्दत सम्प्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ||७||
वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्
नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागतम् ||८||
ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः
आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान्श्रीमदविक्रियाम् ||९||

राजा परीक्षित्‌ ने पूछा—भगवन् ! देवाचार्य बृहस्पतिजी ने अपने प्रिय शिष्य देवताओं को किस कारण त्याग दिया था ? देवताओं ने अपने गुरुदेव का ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन् इन्द्र को त्रिलोकी का ऐश्वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्ड के कारण वे धर्ममर्यादा का, सदाचार का उल्लङ्घन करने लगे थे। एक दिन की बात है, वे भरी सभा में अपनी पत्नी शची के साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवा में उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डल के समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे ॥ २—६ ॥ इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परंतु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरु का सत्कार ही किया। यहाँ तक कि वे अपने आसन से हिले-डुले तक नहीं ॥ ७-८ ॥ त्रिकालदर्शी समर्थ बृहस्पतिजी ने देखा कि यह ऐश्वर्यमद का दोष है ! बस, वे झटपट वहाँ से निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये ॥ ९ ॥

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गुरुवार, 19 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

अथातः श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वशः
यत्र नारायणो देवः स्वांशेनावतरद्विभुः ||३८||
विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भगः
धाता विधाता वरुणो मित्रः शत्रु उरुक्रमः ||३९||
विवस्वतः श्राद्धदेवं संज्ञासूयत वै मनुम्
मिथुनं च महाभागा यमं देवं यमीं तथा
सैव भूत्वाथ वडवा नासत्यौ सुषुवे भुवि ||४०||
छाया शनैश्चरं लेभे सावर्णिं च मनुं ततः
कन्यां च तपतीं या वै वव्रे संवरणं पतिम् ||४१||
अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः
यत्र वै मानुषी जातिर्ब्रह्मणा चोपकल्पिता ||४२||
पूषानपत्यः पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत्पुरा
योऽसौ दक्षाय कुपितं जहास विवृतद्विजः ||४३||
त्वष्टुर्दैत्यात्मजा भार्या रचना नाम कन्यका
सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान् ||४४||
तं वव्रिरे सुरगणा स्वस्रीयं द्विषतामपि
विमतेन परित्यक्ता गुरुणाङ्गिरसेन यत् ||४५||

परीक्षित्‌ ! अब क्रमश: अदिति की वंशपरम्परा सुनो। इस वंश में सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायण ने अपने अंश से वामनरूप में अवतार लिया था ॥ ३८ ॥ अदिति के पुत्र थे—विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (वामन)। यही बारह आदित्य कहलाये ॥ ३९ ॥ विवस्वान् की पत्नी महाभाग्यवती संज्ञा के गर्भ से श्राद्धदेव (वैवस्वत) मनु एवं यम-यमी का जोड़ा पैदा हुआ ! संज्ञा ने ही घोड़ी का रूप धारण करके भगवान्‌ सूर्य के द्वारा भूलोक में दोनों अश्विनीकुमारों को जन्म दिया ॥ ४० ॥ विवस्वान् की दूसरी पत्नी थी छाया। उसके शनैश्चर और सावर्णि मनु नामके दो पुत्र तथा तपती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। तपती ने संवरण को पतिरूप में वरण किया ॥ ४१ ॥ अर्यमा की पत्नी मातृका थी। उसके गर्भ से चर्षणी नामक पुत्र हुए। वे कर्तव्य-अकर्तव्य के ज्ञान से युक्त थे। इसलिये ब्रह्माजी ने उन्हीं के आधारपर मनुष्यजातिकी (ब्राह्मणादि वर्णोंकी) कल्पना की ॥ ४२ ॥ पूषा के कोई सन्तान न हुई। प्राचीन काल में जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्र ने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तब से पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ॥ ४३ ॥ दैत्यों की छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टा की पत्नी थी। रचना के गर्भ से दो पुत्र हुए—संनिवेश और पराक्रमी विश्वरूप ॥ ४४ ॥ इस प्रकार विश्वरूप यद्यपि शत्रुओं के भानजे थे—फिर भी जब देवगुरु बृहस्पति जी ने इन्द्र से अपमानित होकर देवताओं का परित्याग कर दिया, तब देवताओं ने विश्वरूप को ही अपना पुरोहित बनाया था ॥ ४५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

अरिष्टायास्तु गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः
सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकाञ्शृणु ||२९||
द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः
अयोमुखः शङ्कुशिराः स्वर्भानुः कपिलोऽरुणः ||३०||
पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोऽनुतापनः
धूम्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जयः ||३१||
स्वर्भानोः सुप्रभां कन्यामुवाह नमुचिः किल
वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ||३२||
वैश्वानरसुतायाश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः
उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ||३३||
उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप
पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः ||३४||
उपयेमेऽथ भगवान्कश्यपो ब्रह्मचोदितः
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः ||३५||
तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता
जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्र प्रियङ्करः ||३६||
विप्रचित्तिः सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत्
राहुज्येष्ठं केतुशतं ग्रहत्वं य उपागताः ||३७||

अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोड़े आदि एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। दनुके इकसठ पुत्र हुए। उनमें प्रधान-प्रधानके नाम सुनो ॥ २९ ॥ द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शङ्कुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ॥ ३०-३१ ॥ स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया ॥ ३२ ॥ दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं। इनके नाम थे—उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका ॥ ३३ ॥ इनमेंसे उपदानवीके साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ। ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान्‌ कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों—पुलोमा और कालका के साथ विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए। इन्हीं का दूसरा नाम निवातकवच था। ये यज्ञकर्ममें विघ्र डालते थे, इसलिये परीक्षित्‌ ! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला। यह उन दिनों की बात है, जब अर्जुन स्वर्ग में गये हुए थे ॥ ३४—३६ ॥ विप्रचित्ति की पत्नी सिंहिका के गर्भ से एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहों में हो गयी। शेष सौ पुत्रों का नाम केतु था ॥ ३७ ॥

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बुधवार, 18 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दोः पत्न्यस्तु भारत
दक्षशापात्सोऽनपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः ||२३||
पुनः प्रसाद्य तं सोमः कला लेभे क्षये दिताः
शृणु नामानि लोकानां मातॄणां शङ्कराणि च ||२४||
अथ कश्यपपत्नीनां यत्प्रसूतमिदं जगत्
अदितिर्दितिर्दनुः काष्ठा अरिष्टा सुरसा इला ||२५||
मुनिः क्रोधवशा ताम्रा सुरभिः सरमा तिमिः
तिमेर्यादोगणा आसन्श्वापदाः सरमासुताः ||२६||
सुरभेर्महिषा गावो ये चान्ये द्विशफा नृप
ताम्रायाः श्येनगृध्राद्या मुनेरप्सरसां गणाः ||२७||
दन्दशूकादयः सर्पा राजन्क्रोधवशात्मजाः
इलाया भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्च सौरसाः ||२८||

परीक्षित्‌ ! कृत्तिका आदि सत्ताईस नक्षत्राभिमानिनी देवियाँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। रोहिणीसे विशेष प्रेम करनेके कारण चन्द्रमाको दक्षने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षयरोग हो गया था। उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई ॥ २३ ॥ उन्होंने दक्षको फिरसे प्रसन्न करके कृष्णपक्षकी क्षीण कलाओंके शुक्लपक्षमें पूर्ण होनेका वर तो प्राप्त कर लिया, (परन्तु नक्षत्राभिमानी देवियोंसे उन्हें कोई सन्तान न हुई) अब तुम कश्यपपत्नियोंके मङ्गलमय नाम सुनो। वे लोकमाताएँ हैं। उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। उनके नाम हैं—अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनमें तिमिके पुत्र हैं—जलचर जन्तु और सरमाके बाघ आदि हिंसक जीव ॥ २४—२६ ॥ सुरभिके पुत्र हैं—भैंस, गाय तथा दूसरे दो खुरवाले पशु। ताम्राकी सन्तान हैं—बाज, गीध आदि शिकारी पक्षी। मुनिसे अप्सराएँ उत्पन्न हुर्ईं ॥ २७ ॥ क्रोधवशा के पुत्र हुए—साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तु। इलासे वृक्ष, लता आदि पृथ्वीमें उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियाँ और सुरसासे यातुधान (राक्षस) ॥ २८ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

पञ्चयामोऽथ भूतानि येन जाग्रति कर्मसु
सरूपासूत भूतस्य भार्या रुद्रांश्च कोटिशः ||१७||
रैवतोऽजो भवो भीमो वाम उग्रो वृषाकपिः
अजैकपादहिर्ब्रध्नो बहुरूपो महानिति ||१८||
रुद्रस्य पार्षदाश्चान्ये घोराः प्रेतविनायकाः
प्रजापतेरङ्गिरसः स्वधा पत्नी पितॄनथ ||१९||
अथर्वाङ्गिरसं वेदं पुत्रत्वे चाकरोत्सती
कृशाश्वोऽर्चिषि भार्यायां धूमकेतुमजीजनत् ||२०||
धिषणायां वेदशिरो देवलं वयुनं मनुम्
तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च ||२१||
पतङ्ग्यसूत पतगान्यामिनी शलभानथ
सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद्यज्ञेशवाहनम्
सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः ||२२||

भूतकी पत्नी दक्षनन्दिनी सरूपाने कोटि-कोटि रुद्रगण उत्पन्न किये। इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप, और महान्—ये ग्यारह मुख्य हैं। भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयङ्कर भूत और विनायकादिका जन्म हुआ। ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए ॥ १७-१८ ॥ अङ्गिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वाङ्गिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ॥ १९ ॥ कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए—वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ॥ २० ॥ ताक्ष्1र्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं—विनता, कद्रू, पतङ्गी और यामिनी। पतङ्गी से पक्षियों का और यामिनी से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ ॥ २१ ॥ विनता के पुत्र गरुड़ हुए, ये ही भगवान्‌ विष्णु के वाहन हैं। विनता के ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान्‌ सूर्य के सारथि हैं। कद्रू से अनेकों नाग उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥

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मंगलवार, 17 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

ध्रुवस्य भार्या धरणिरसूत विविधाः पुरः
अर्कस्य वासना भार्या पुत्रास्तर्षादयः स्मृताः ||१३||
अग्नेर्भार्या वसोर्धारा पुत्रा द्र विणकादयः
स्कन्दश्च कृत्तिकापुत्रो ये विशाखादयस्ततः ||१४||
दोषस्य शर्वरीपुत्रः शिशुमारो हरेः कला
वास्तोराङ्गिरसीपुत्रो विश्वकर्माकृतीपतिः ||१५||
ततो मनुश्चाक्षुषोऽभूद्विश्वे साध्या मनोः सुताः
विभावसोरसूतोषा व्युष्टं रोचिषमातपम् ||१६||

अर्ककी पत्नी वासनाके गर्भसे तर्ष (तृष्णा) आदि पुत्र हुए। अग्नि नामक वसुकी पत्नी धाराके गर्भसे द्रविणक आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥ कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्नि से ही उत्पन्न हुए। उनसे विशाख आदिका जन्म हुआ। दोषकी पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ। वह भगवान्‌का कलावतार है ॥ १४ ॥ वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके अधिपति विश्वकर्माजी हुए। विश्वकर्माके उनकी भार्या कृतीके गर्भसे चाक्षुष मनु हुए और उनके पुत्र विश्वेदेव एवं साध्यगण हुए ॥ १५ ॥ विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र हुए—व्युष्ट, रोचिष् और आतप। उनमेंसे आतपके पञ्चयाम (दिवस) नामक पुत्र हुआ, उसीके कारण सब जीव अपने-अपने कार्योंमें लगे रहते हैं ॥ १६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

साध्योगणश्च साध्याया अर्थसिद्धिस्तु तत्सुतः
मरुत्वांश्च जयन्तश्च मरुत्वत्या बभूवतुः ||८||
जयन्तो वासुदेवांश उपेन्द्र इति यं विदुः
मौहूर्तिका देवगणा मुहूर्तायाश्च जज्ञिरे ||९||
ये वै फलं प्रयच्छन्ति भूतानां स्वस्वकालजम्
सङ्कल्पायास्तु सङ्कल्पः कामः सङ्कल्पजः स्मृतः ||१०||
वसवोऽष्टौ वसोः पुत्रास्तेषां नामानि मे शृणु
द्रोणः प्राणो ध्रुवोऽर्कोऽग्निर्दोषो वास्तुर्विभावसुः ||११||
द्रोणस्याभिमतेः पत्न्या हर्षशोकभयादयः
प्राणस्योर्जस्वती भार्या सह आयुः पुरोजवः ||१२||

मरुत्वतीके दो पुत्र हुए—मरुत्वान् और जयन्त। जयन्त भगवान्‌ वासुदेवके अंश हैं, जिन्हें लोग उपेन्द्र भी कहते हैं ॥ ८ ॥ मुहूर्ता से मूहूर्त के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए। ये अपने-अपने मूहूर्त में जीवों को उनके कर्मानुसार फल देते हैं ॥ ९ ॥ सङ्कल्पाका पुत्र हुआ संकल्प और उसका काम। वसुके पुत्र आठों वसु हुए। उनके नाम मुझसे सुनो ॥ १० ॥ द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु। द्रोणकी पत्नीका नाम है अभिमति। उससे हर्ष, शोक, भय आदिके अभिमानी देवता उत्पन्न हुए ॥ ११ ॥ प्राणकी पत्नी ऊर्जस्वतीके गर्भसे सह, आयु और पुरोजव नामके तीन पुत्र हुए। ध्रुवकी पत्नी धरणीने अनेक नगरोंके अभिमानी देवता उत्पन्न किये ॥ १२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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सोमवार, 16 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

श्रीशुक उवाच
ततः प्राचेतसोऽसिक्न्यामनुनीतः स्वयम्भुवा ||१||
षष्टिं सञ्जनयामास दुहितॄः पितृवत्सलाः
दश धर्माय कायेन्दोर्द्विषट्त्रिणव दत्तवान् ||२||
भूताङ्गिरः कृशाश्वेभ्यो द्वे द्वे तार्क्ष्याय चापराः
नामधेयान्यमूषां त्वं सापत्यानां च मे शृणु ||३||
यासां प्रसूतिप्रसवैर्लोका आपूरितास्त्रयः
भानुर्लम्बा ककुद्यामिर्विश्वा साध्या मरुत्वती ||४||
वसुर्मुहूर्ता सङ्कल्पा धर्मपत्न्यः सुताञ्शृणु
भानोस्तु देवऋषभ इन्द्र सेनस्ततो नृप ||५||
विद्योत आसील्लम्बायास्ततश्च स्तनयित्नवः
ककुदः सङ्कटस्तस्य कीकटस्तनयो यतः ||६||
भुवो दुर्गाणि यामेयः स्वर्गो नन्दिस्ततोऽभवत्
विश्वेदेवास्तु विश्वाया अप्रजांस्तान्प्रचक्षते ||७||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! तदनन्तर ब्रह्माजी के बहुत अनुनय-विनय करनेपर दक्षप्रजापतिने अपनी पत्नी असिक्री के गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। वे सभी अपने पिता दक्षसे बहुत प्रेम करती थीं ॥ १ ॥ दक्षप्रजापतिने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, दो भूतको, दो अङ्गिराको, दो कृशाश्वको और शेष चार  तार्क्ष्यनामधारी कश्यप को ही ब्याह दीं ॥ २ ॥ परीक्षित्‌ ! तुम इन दक्षकन्याओं और इनकी सन्तानोंके नाम मुझसे सुनो। इन्हींकी वंशपरम्परा तीनों लोकोंमें फैली हुई है ॥ ३ ॥
धर्मकी दस पत्नियाँ थीं—भानु, लम्बा, ककुभ्, जामि, विश्वा, साध्या, मरुत्वती, वसु, मुहूर्ता और सङ्कल्पा। इनके पुत्रों  के नाम सुनो ॥ ४ ॥ राजन् ! भानु का पुत्र देवऋषभ और उसका इन्द्रसेन था। लम्बाका पुत्र हुआ विद्योत और उसके मेघगण ॥ ५ ॥ ककुभ्का पुत्र हुआ सङ्कट, उसका कीकट और कीकटके पुत्र हुए पृथ्वीके सम्पूर्ण दुर्गों (किलों) के अभिमानी देवता। जामि के पुत्र का नाम था स्वर्ग और उसका पुत्र हुआ नन्दी ॥ ६ ॥ विश्वाके विश्वेदेव हुए। उनके कोई सन्तान न हुई। साध्या  से साध्यगण हुए और उनका पुत्र हुआ अर्थसिद्धि ॥ ७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

नानुभूय न जानाति पुमान्विषयतीक्ष्णताम्
निर्विद्यते स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ||४१||
यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम्
कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम् ||४२||
तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः
तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद्भ्रमतः पदम् ||४३||

श्रीशुक उवाच

प्रतिजग्राह तद्बाढं नारदः साधुसम्मतः
एतावान्साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ||४४||

नारद ! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता। इसलिये उनकी दु:खरूपता का अनुभव होने पर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकाने से नहीं होता ॥ ४१ ॥ हमलोग सद्गृहस्थ हैं, अपनी धर्ममर्यादा का पालन करते हैं। एक बार पहले भी तुमने हमारा असह्य अपकार किया था। तब हमने उसे सह लिया ॥ ४२ ॥ तुम तो हमारी वंशपरम्परा का उच्छेद करने पर ही उतारू हो रहे हो। तुमने फिर हमारे साथ वही दुष्टताका व्यवहार किया। इसलिये मूढ़ ! जाओ, लोक-लोकान्तरोंमें भटकते रहो। कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरनेको ठौर नहीं होगी ॥ ४३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! संतशिरोमणि देवर्षि नारद ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्ष का शाप स्वीकार कर लिया। संसार में बस, साधुता इसी का नाम है कि बदला लेने की शक्ति रहनेपर भी दूसरे का किया हुआ अपकार सह लिया जाय ॥ ४४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदशापो नाम पञ्चमोऽध्यायः

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रविवार, 15 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

श्रीदक्ष उवाच
अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया
असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ||३६||
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम्
विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः ||३७||
एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्धरेः
पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रपः ||३८||
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः
ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ||३९||
नेत्थं पुंसां विरागः स्यात्त्वया केवलिना मृषा
मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ||४०||

दक्षप्रजापतिने कहा—ओ दुष्ट ! तुमने झूठमूठ साधुओं का बाना पहन रखा है। हमारे भोलेभाले बालकोंको भिक्षुकोंका मार्ग दिखाकर तुमने हमारा बड़ा अपकार किया है ॥ ३६ ॥ अभी उन्होंने ब्रह्मचर्यसे ऋषि-ऋण, यज्ञसे देव-ऋण और पुत्रोत्पत्ति से पितृ-ऋण नहीं उतारा था। उन्हें अभी कर्मफलकी नश्वरताके सम्बन्धमें भी कुछ विचार नहीं था। परंतु पापात्मन् ! तुमने उनके दोनों लोकोंका सुख चौपट कर दिया ॥ ३७ ॥ सचमुच तुम्हारे हृदयमें दयाका नाम भी नहीं है। तुम इस प्रकार बच्चोंकी बुद्धि बिगाड़ते फिरते हो। तुमने भगवान्‌के पार्षदोंमें रहकर उनकी कीर्तिमें कलङ्क ही लगाया। सचमुच तुम बड़े निर्लज्ज हो ॥ ३८ ॥ मैं जानता हूँ कि भगवान्‌के पार्षद सदा-सर्वदा दुखी प्राणियोंपर दया करनेके लिये व्यग्र रहते हैं। परंतु तुम प्रेमभावका विनाश करनेवाले हो। तुम उन लोगोंसे भी वैर करते हो, जो किसीसे वैर नहीं करते ॥ ३९ ॥ यदि तुम ऐसा समझते हो कि वैराग्यसे ही स्नेहपाश—विषयासक्तिका बन्धन कट सकता है, तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है; क्योंकि तुम्हारे जैसे झूठमूठ वैराग्यका स्वाँग भरनेवालोंसे किसीको वैराग्य नहीं हो सकता ॥ ४० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

इति तानपि राजेन्द्र प्रजासर्गधियो मुनिः
उपेत्य नारदः प्राह वाचः कूटानि पूर्ववत् ||२९||
दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम
अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः ||३०||
भ्रातॄणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित्
स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ||३१||
एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः
तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष ||३२||
सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः
नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ||३३||
एतस्मिन्काल उत्पातान्बहून्पश्यन्प्रजापतिः
पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ||३४||
चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः
देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ||३५||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहले के समान ही कूट वचन कहे ॥२९॥ उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापति के पुत्रो ! मैं तुमलोगों को जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्ग का अनुसन्धान करो ॥ ३० ॥ जो धर्मज्ञ भाई अपने बड़े भाइयों के श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करता है, वही सच्चा भाई है ! वह पुण्यवान् पुरुष परलोक में मरुद्गणों के साथ आनन्द भोगता है ॥ ३१ ॥ परीक्षित्‌ ! शबलाश्वों को इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगों ने भी अपने भाइयों के मार्ग का ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजी का दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ३२ ॥ वे उस पथ के पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही ॥ ३३ ॥
दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत-से अशकुन हो रहे हैं। उनके चित्तमें पुत्रोंके अनिष्टकी आशङ्का हो आयी। इतनेमें ही उन्हें मालूम हुआ कि पहलेकी भाँति अबकी बार भी नारदजीने मेरे पुत्रों को चौपट कर दिया ॥ ३४ ॥ उन्हें अपने पुत्रोंकी  कर्तव्यच्युति से बड़ा शोक हुआ और वे नारदजीपर बड़े क्रोधित हुए उनके मिलने पर क्रोध के मारे दक्षप्रजापति के होठ फडक़ने लगे और वे आवेश में भरकर नारदजी से बोले ॥ ३५ ॥

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शनिवार, 14 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम्
अन्वतप्यत कः शोचन्सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ||२३||
स भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः
पुत्रानजनयद्दक्षः सवलाश्वान्सहस्रिणः ||२४||
ते च पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः
नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ||२५||
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः
जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तत्र महत्तपः ||२६||
अब्भक्षाः कतिचिन्मासान्कतिचिद्वायुभोजनाः
आराधयन्मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ||२७||
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने
विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ||२८||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! जब दक्षप्रजापतिको  मालूम हुआ कि मेरे शीलवान् पुत्र नारद के उपदेशसे कर्तव्यच्युत हो गये हैं, तब वे शोक से व्याकुल हो गये। उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। सचमुच अच्छी सन्तानका होना भी शोकका ही कारण है ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी ने दक्षप्रजापति को बड़ी सान्त्वना दी। तब उन्होंने पञ्चजन-नन्दिनी असिक्री के गर्भ से एक हजार पुत्र और उत्पन्न किये । उनका नाम था शबलाश्व ॥ २४ ॥ वे भी अपने पिता दक्षप्रजापति की आज्ञा पाकर प्रजासृष्टि के उद्देश्य से तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवर पर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयों ने सिद्धि प्राप्त की थी ॥ २५ ॥ शबलाश्वों ने वहाँ जाकर उस सरोवर में स्नान किया। स्नानमात्रसे ही उनके अन्त:करणके सारे मल धुल गये। अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये ॥ २६ ॥ कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओङ्कारस्वरूप भगवान्‌ नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’ —इस मन्त्र[*] का अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्‌ की आराधना की ॥ २७-२८ ॥ 
.............................................
[*] ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने। विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ।।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत्
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१९||
शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम्
कथं तदनुरूपाय गुणविस्रम्भ्युपक्रमेत् ||२०||
इति व्यवसिता राजन्हर्यश्वा एकचेतसः
प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ||२१||
स्वरब्रह्मणि निर्भात हृषीकेशपदाम्बुजे
अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ||२२||

यह काल ही एक चक्र है। यह निरन्तर घूमता रहता है। इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत् को अपनी ओर खींच रहा है। इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है। यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा ? ॥ १९ ॥ शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्रके  द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मों में लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है। इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयों पर विश्वास कर लेता है। अब वह कर्मों से निवृत्त होने की आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है ?’ ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! हर्यश्वों ने एक मत से यही निश्चय किया और नारदजी की परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथ के पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता ॥ २१ ॥ इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्म में—संगीतलहरी में अभिव्यक्त हुए, भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों में अपने चित्त को अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक- लोकान्तरों में विचरने लगे ॥ २२ ॥

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शुक्रवार, 13 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत्
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१५||
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम्
मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१६||
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणः
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१७||
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम्
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१८

यह बुद्धि ही कुलटा स्त्री के समान है। इसके सङ्गसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी ? ॥ १५ ॥ माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ॥ १६ ॥ ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर हैं। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत् का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ॥ १७ ॥ भगवान्‌का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडक़ो अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंस का आश्रय छोडक़र उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है ? ॥ १८ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप 

श्रीशुक उवाच 
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया
 वाचः कूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ||१०|| 
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् 
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||११|| 
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान्स्वाश्रयः परः 
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१२|| 
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्गं गतो यथा 
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१३|| 
नानारूपात्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता 
तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१४|| 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे— ॥ १० ॥ ‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिङ्गशरीर ही, जिसे साधारणत: जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है? ॥ ११ ॥ सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियों से भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परंतु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान्‌ हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्‌के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ॥ १२ ॥ जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तज्र्योति:स्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ॥ १३ ॥ यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है। इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना— विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिको अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है ? ॥ १४ ॥

 शेष आगामी पोस्ट में --
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गुरुवार, 12 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ 

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) 

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
 
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः 
धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ||४|| 
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः 
प्रजाविवृद्धये यत्तान्देवर्षिस्तान्ददर्श ह ||५|| 
उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः 
अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ||६||
 तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम् 
बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ||७|| 
नदीमुभयतो वाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् 
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ||८||
 कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः 
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ||९|| 

नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्त:करण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—‘अरे हर्यश्वो ! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुम लोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ॥ ४—६ ॥ देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्याभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?’ ॥ ७—९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

श्रीशुक उवाच

तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभुः ||१||
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप
पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ||२||
तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः
सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ||३||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के शक्तिसञ्चारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पञ्चजनकी पुत्री असिक्री से हर्यश्व नाम के दस हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥ राजन् ! दक्षके ये सभी पुत्र एक आचरण और एक स्वभावके थे। जब उनके पिता दक्षने उन्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी, तब वे तपस्या करनेके विचारसे पश्चिम दिशाकी ओर गये ॥ २ ॥ पश्चिम दिशामें सिन्धुनदी और समुद्रके सङ्गम पर नारायण-सर नाम का एक महान् तीर्थ है। बड़े-बड़े मुनि और सिद्ध पुरुष वहाँ निवास करते हैं ॥ ३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर...