॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)
नारायणकवच का उपदेश
इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन्द्विजः
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरुधन्वनि ||३८||
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ||३९||
गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्शिराः
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ||४०||
देवराज ! प्राचीन काल की बात है, एक कौशिकगोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरुभूमिमें त्याग दिया ॥ ३८ ॥ जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उस के ऊपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमानपर बैठकर निकले ॥ ३९ ॥ वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमानसहित आकाश से पृथ्वीपर गिर पड़े । इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही। जब उन्हें वालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायणकवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मणदेवता की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को गये ॥४० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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