॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)
नारायणकवच का उपदेश
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्
विजेष्यसेऽञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ||३५||
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ||३६||
न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ||३७||
देवराज इन्द्र ! मैंने तुम्हें यह नारायणकवच सुना दिया। इस कवचसे तुम अपनेको सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य-यूथपतियोंको जीत लोगे ॥ ३५ ॥ इस नारायणकवच को धारण करनेवाला पुरुष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता अथवा पैरसे छू देता है, वह तत्काल समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत-पिशाचादि और बाघ आदि हिंसक जीवोंसे कभी किसी प्रकारका भय नहीं होता ॥ ३७ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से
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