गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

निशम्य कर्माणि गुणानतुल्या-
न्वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि
यदातिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदं 
प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति ||३४||
यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धसत्या
क्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम्
मुहुः श्वसन्वक्ति हरे जगत्पते 
नारायणेत्यात्ममतिर्गतत्रपः ||३५||
तदा पुमान्मुक्तसमस्तबन्धन-
स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः
निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा 
भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ||३६||

जब भगवान्‌ के लीलाशरीरों से किये हुए अद्भुत पराक्रम, उनके अनुपम गुण और चरित्रोंको श्रवण करके अत्यन्त आनन्द के उद्रेक से मनुष्य का रोम-रोम खिल उठता है, आँसुओं के मारे कण्ठ गद्गद हो जाता है और वह सङ्कोच छोडक़र जोर-जोर से गाने-चिल्लाने और नाचने लगता है; जिस समय वह ग्रहग्रस्त पागल की तरह कभी हँसता है, कभी करुण-क्रन्दन करने लगता है, कभी ध्यान करता है तो कभी भगवद्भाव से लोगों की वन्दना करने लगता है; जब वह भगवान्‌ में ही तन्मय हो जाता है, बार-बार लंबी साँस खींचता है और सङ्कोच छोडक़र ‘हरे ! जगत्पते !! नारायण’ !!! कहकर पुकारने लगता है—तब भक्तियोग के महान् प्रभाव से उसके सारे बन्धन कट जाते हैं और भगवद्भाव की ही भावना करते-करते उसका हृदय भी तदाकार—भगवन्मय हो जाता है। उस समय उसके जन्म-मृत्यु के बीजों का खजाना ही जल जाता है और वह पुरुष श्रीभगवान्‌ को प्राप्त कर लेता है ॥ ३४—३६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

हरिः सर्वेषु भूतेषु भगवानास्त ईश्वरः
इति भूतानि मनसा कामैस्तैः साधु मानयेत् ||३२||
एवं निर्जितषड्वर्गैः क्रियते भक्तिरीश्वरे
वासुदेवे भगवति यया संलभ्यते रतिः ||३३||

सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ श्रीहरि समस्त प्राणियों में विराजमान हैं—ऐसी भावना से यथाशक्ति सभी प्राणियों की इच्छा पूर्ण करे और हृदय से उनका सम्मान करे ॥ ३२ ॥ काम,क्रोध,लोभ, मोह,मद और मत्सर—इन छ: शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जो लोग इस प्रकार भगवान्‌ की साधन-भक्ति का अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उस भक्तिके द्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३३ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 1 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

तत्रोपायसहस्राणामयं भगवतोदितः
यदीश्वरे भगवति यथा यैरञ्जसा रतिः ||२९||
गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च
सङ्गेन साधुभक्तानामीश्वराराधनेन च ||३०||
श्रद्धया तत्कथायां च कीर्तनैर्गुणकर्मणाम्
तत्पादाम्बुरुहध्यानात्तल्लिङ्गेक्षार्हणादिभिः ||३१||

यों तो इन त्रिगुणात्मक कर्मों की जड़ उखाड़ फेंकने के लिये अथवा बुद्धि-वृत्तियों का प्रवाह बंद कर देने के लिये सहस्रों साधन हैं; परंतु जिस उपाय से और जैसे सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ में स्वाभाविक निष्काम प्रेम हो जाय, वही उपाय सर्वश्रेष्ठ है । यह बात स्वयं भगवान्‌ ने कही है    ॥ २९ ॥ गुरु की प्रेमपूर्वक सेवा, अपने को जो कुछ मिले वह सब प्रेम से भगवान्‌- को समर्पित कर देना, भगवत्प्रेमी महात्माओं का सत्सङ्ग, भगवान्‌ की आराधना, उनकी कथा- वार्ता में श्रद्धा, उनके गुण और लीलाओं का कीर्तन, उनके चरणकमलों का ध्यान और उनके मन्दिर- मूर्ति आदि का दर्शन-पूजन आदि साधनों से भगवान्‌ में स्वाभाविक प्रेम हो जाता है ॥ ३०-३१ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः
ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ||२५||
एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः
स्वरूपमात्मनो बुध्येद्गन्धैर्वायुमिवान्वयात् ||२६||
एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः
अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवार्प्यते ||२७||
तस्माद्भवद्भिः कर्तव्यं कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्
बीजनिर्हरणं योगः प्रवाहोपरमो धियः ||२८||

जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं । इन वृत्तियों का जिसके द्वारा अनुभव होता है—वही सबसे अतीत, सबका साक्षी परमात्मा है ॥ २५ ॥ जैसे गन्ध से उसके आश्रय वायु का ज्ञान होता है, वैसे ही बुद्धि की इन कर्मजन्य एवं बदलनेवाली तीनों अवस्थाओं के द्वारा इनमें साक्षीरूप से अनुगत आत्मा को जाने ॥ २६ ॥ गुणों और कर्मों के कारण होनेवाला जन्म-मृत्यु का यह चक्र आत्मा को शरीर और प्रकृति से पृथक् न करने के कारण ही है। यह अज्ञानमूलक एवं मिथ्या है । फिर भी स्वप्न के समान जीव को इसकी प्रतीति हो रही है ॥ २७ ॥ इसलिये तुम लोगों को सब से पहले इन गुणों के अनुसार होने वाले कर्मों का बीज ही नष्ट कर देना चाहिये । इससे बुद्धि-वृत्तियों का प्रवाह निवृत्त हो जाता है। इसी को दूसरे शब्दों में योग या परमात्मा से मिलन कहते हैं ॥ २८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९) प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए  नारद...