मंगलवार, 30 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः
विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ||२२||
देहस्तु सर्वसङ्घातो जगत्तस्थुरिति द्विधा
अत्रैव मृग्यः पुरुषो नेति नेतीत्यतत्त्यजन् ||२३||
अन्वयव्यतिरेकेण विवेकेनोशतात्मना
स्वर्गस्थानसमाम्नायैर्विमृशद्भिरसत्वरैः ||२४||

आचार्यों ने मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ—इन आठ तत्त्वों को प्रकृति बतलाया है। उनके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम तथा उनके विकार हैं सोलह—दस इन्द्रियाँ, एक मन और पञ्चमहाभूत । इन सब में एक पुरुषतत्त्व अनुगत है ॥ २२ ॥ इन सब का समुदाय ही देह है । यह दो प्रकार का है—स्थावर और जङ्गम । इसी में अन्त:करण, इन्द्रिय आदि अनात्मवस्तुओं का ‘यह आत्मा नहीं है’—इस प्रकार बाध करते हुए आत्माको ढूँढऩा चाहिये ॥ २३ ॥ आत्मा सब में अनुगत है, परंतु है वह सब से पृथक्। इस प्रकार शुद्ध बुद्धि से धीरे-धीरे संसार की उत्पत्ति, स्थिति और उसके प्रलयपर विचार करना चाहिये। उतावली नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः
फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ||१८|
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्ध एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः
अविक्रियः स्वदृघेतुर्व्यापकोऽसङ्ग्यनावृतः ||१९||
एतैर्द्वादशभिर्विद्वानात्मनो लक्षणैः परैः
अहं ममेत्यसद्भावं देहादौ मोहजं त्यजेत् ||२०||
स्वर्णं यथा ग्रावसु हेमकारः क्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात्
क्षेत्रेषु देहेषु तथात्मयोगैरध्यात्मविद्ब्रह्मगतिं लभेत ||२१||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) जैसे ईश्वरमूर्ति काल की प्रेरणा से वृक्षों के फल लगते,ठहरते,बढ़ते,पकते, क्षीण होते और नष्ट हो जाते हैं—वैसे ही जन्म, अस्तित्व की अनुभूति, वृद्धि, परिणाम, क्षय और विनाश—ये छ: भाव-विकार शरीर में ही देखे जाते हैं,आत्मा से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है ॥१८॥ आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, एक, क्षेत्रज्ञ, आश्रय, निर्विकार, स्वयं-प्रकाश, सब का कारण, व्यापक, असङ्ग तथा आवरणरहित है ॥ १९ ॥ ये बारह आत्मा के उत्कृष्ट लक्षण हैं। इनके द्वारा आत्मतत्त्व को जाननेवाले पुरुष को चाहिये कि शरीर आदि में अज्ञान के कारण जो ‘मैं’ और ‘मेरे’का झूठा भाव हो रहा है, उसे छोड़ दे ॥ २० ॥ जिस प्रकार सुवर्ण की खानों में पत्थर में मिले हुए सुवर्ण को उसके निकालने की विधि जानने वाला स्वर्णकार उन विधियों से उसे प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अध्यात्मतत्त्व को जाननेवाला पुरुष आत्मप्राप्ति के उपायोंद्वारा अपने शरीररूप क्षेत्रमें ही ब्रह्मपदका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २१ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 29 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

ततो मे मातरमृषिः समानीय निजाश्रमे
आश्वास्येहोष्यतां वत्से यावत्ते भर्तुरागमः ||१२||
तथेत्यवात्सीद्देवर्षेरन्तिके साकुतोभया
यावद्दैत्यपतिर्घोरात्तपसो न न्यवर्तत ||१३||
ऋषिं पर्यचरत्तत्र भक्त्या परमया सती
अन्तर्वत्नी स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ||१४||
ऋषिः कारुणिकस्तस्याः प्रादादुभयमीश्वरः
धर्मस्य तत्त्वं ज्ञानं च मामप्युद्दिश्य निर्मलम् ||१५||
तत्तु कालस्य दीर्घत्वात्स्त्रीत्वान्मातुस्तिरोदधे
ऋषिणानुगृहीतं मां नाधुनाप्यजहात्स्मृतिः ||१६||
भवतामपि भूयान्मे यदि श्रद्दधते वचः
वैशारदी धीः श्रद्धातः स्त्रीबालानां च मे यथा ||१७||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) इसके बाद देवर्षि नारदजी मेरी माता को अपने आश्रमपर लिवा गये और उसे समझा-बुझाकर कहा कि—‘बेटी ! जबतक तुम्हारा पति तपस्या करके लौटे, तबतक तुम यहीं रहो’ ॥ १२ ॥ ‘जो आज्ञा’ कहकर वह निर्भयता से देवर्षि नारद के आश्रमपर ही रहने लगी और तबतक रही, जबतक मेरे पिता घोर तपस्या से लौटकर नहीं आये ॥ १३ ॥ मेरी गर्भवती माता मुझ गर्भस्थ शिशु की मङ्गलकामना से और इच्छित समयपर (अर्थात् मेरे पिता के लौटने के बाद) सन्तान उत्पन्न करने की कामना से बड़े प्रेम तथा भक्ति के साथ नारदजी की सेवा-शुश्रूषा करती रही ॥ १४ ॥
देवर्षि नारदजी बड़े दयालु और सर्वसमर्थ हैं। उन्होंने मेरी माँ को भागवतधर्म का रहस्य और विशुद्ध ज्ञान—दोनों का उपदेश किया। उपदेश करते समय उनकी दृष्टि मुझपर भी थी ॥ १५ ॥ बहुत समय बीत जाने के कारण और स्त्री होने के कारण भी मेरी माता को तो अब उस ज्ञान की स्मृति नहीं रही, परंतु देवर्षि की विशेष कृपा होने के कारण मुझे उसकी विस्मृति नहीं हुई ॥१६॥ यदि तुमलोग मेरी इस बातपर श्रद्धा करो तो तुम्हें भी वह ज्ञान हो सकता है। क्योंकि श्रद्धा से स्त्री और बालकों की बुद्धि भी मेरे ही समान शुद्ध हो सकती है ॥ १७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

नीयमानां भयोद्विग्नां रुदतीं कुररीमिव
यदृच्छयागतस्तत्र देवर्षिर्ददृशे पथि ||७||
प्राह नैनां सुरपते नेतुमर्हस्यनागसम्
मुञ्च मुञ्च महाभाग सतीं परपरिग्रहम् ||८||

श्रीइन्द्र उवाच
आस्तेऽस्या जठरे वीर्यमविषह्यं सुरद्विषः
आस्यतां यावत्प्रसवं मोक्ष्येऽर्थपदवीं गतः ||९||

श्रीनारद उवाच
अयं निष्किल्बिषः साक्षान्महाभागवतो महान्
त्वया न प्राप्स्यते संस्थामनन्तानुचरो बली ||१०||
इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेर्मानयन्वचः
अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ||११||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) मेरी माँ भय से घबराकर कुररी पक्षी की भाँति रो रही थी और इन्द्र उसे बलात् लिये जा रहे थे । दैववश देवर्षि नारद उधर आ निकले और उन्होंने मार्ग में मेरी माँ को देख लिया ॥ ७ ॥ उन्होंने कहा—‘देवराज ! यह निरपराध है। इसे ले जाना उचित नहीं । महाभाग ! इस सती-साध्वी परनारी का तिरस्कार मत करो। इसे छोड़ दो, तुरंत छोड़ दो !’ ॥८॥
इन्द्रने कहा—इसके पेट में देवद्रोही हिरण्यकशिपु का अत्यन्त प्रभावशाली वीर्य है । प्रसवपर्यन्त यह मेरे पास रहे, बालक हो जानेपर उसे मारकर मैं इसे छोड़ दूँगा ॥ ९ ॥
नारदजी ने कहा—‘इसके गर्भ में भगवान्‌ का साक्षात् परम प्रेमी भक्त और सेवक,अत्यन्त बली और निष्पाप महात्मा है। तुम में उस को मारने की शक्ति नहीं है’ ॥ १० ॥ देवर्षि नारद की यह बात सुनकर उसका सम्मान करते हुए इन्द्र ने मेरी माता को छोड़ दिया । और फिर इसके गर्भ में भगवद्भक्त है, इस भाव से उन्होंने मेरी माता की प्रदक्षिणा की तथा अपने लोक में चले गये ॥११॥

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रविवार, 28 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

श्रीनारद उवाच
एवं दैत्यसुतैः पृष्टो महाभागवतोऽसुरः
उवाच तान्स्मयमानः स्मरन्मदनुभाषितम् ||१||

श्रीप्रह्लाद उवाच
पितरि प्रस्थितेऽस्माकं तपसे मन्दराचलम्
युद्धोद्यमं परं चक्रुर्विबुधा दानवान्प्रति ||२||
पिपीलिकैरहिरिव दिष्ट्या लोकोपतापनः
पापेन पापोऽभक्षीति वदन्तो वासवादयः ||३||
तेषामतिबलोद्योगं निशम्यासुरयूथपाः
वध्यमानाः सुरैर्भीता दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ||४||
कलत्रपुत्रवित्ताप्तान्गृहान्पशुपरिच्छदान्
नावेक्ष्यमाणास्त्वरिताः सर्वे प्राणपरीप्सवः ||५||
व्यलुम्पन्राजशिबिरममरा जयकाङ्क्षिणः
इन्द्रस्तु राजमहिषीं मातरं मम चाग्रहीत् ||६||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब दैत्यबालकों ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त प्रह्लाद जी को मेरी बात का स्मरण हो आया । कुछ मुसकराते हुए उन्होंने उनसे कहा ॥ १ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—जब हमारे पिता जी तपस्या करने के लिये मन्दराचलपर चले गये, तब इन्द्रादि देवताओं ने दानवों से युद्ध करने का बहुत बड़ा उद्योग किया ॥ २ ॥ वे इस प्रकार कहने लगे कि जैसे चींटियाँ साँप को चाट जाती हैं, वैसे ही लोगों को सताने वाले पापी हिरण्यकशिपु को उसका पाप ही खा गया ॥ ३ ॥ जब दैत्य सेनापतियों को देवताओं की भारी तैयारी का पता चला, तब उनका साहस जाता रहा । वे उनका सामना नहीं कर सके। मार खाकर स्त्री, पुत्र,मित्र, गुरुजन,महल,पशु और साज-सामान की कुछ भी चिन्ता न करके वे अपने प्राण बचाने के लिये बड़ी जल्दी में सब-के-सब इधर-उधर भाग गये ॥ ४-५ ॥ अपनी जीत चाहने वाले देवताओं ने राजमहल में लूट-खसोट मचा दी। यहाँतक कि इन्द्र ने राजरानी मेरी माता कयाधू को भी बन्दी बना लिया ॥ ६ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०९)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

श्रीदैत्यपुत्रा ऊचुः 

प्रह्लाद त्वं वयं चापि नर्तेऽन्यं विद्महे गुरुम् । 
एताभ्यां गुरुपुत्राभ्यां बालानामपि हीश्वरौ ॥ २९ ॥ 
बालस्यान्तःपुरस्थस्य महत्सङ्‌गो दुरन्वयः । 
छिन्धि नः संशयं सौम्य स्यात् चेत् विश्रम्भकारणम् ॥ ३० ॥ 

प्रह्लादजी के सहपाठियों ने पूछा—प्रह्लादजी ! इन दोनों गुरुपुत्रों को छोडक़र और किसी गुरु को तो न तुम जानते हो और न हम । ये ही हम सब बालकों के शासक हैं ॥ २९ ॥ तुम एक तो अभी छोटी अवस्था के हो और दूसरे जन्म से ही महल में अपनी माँ के पास रहे हो । तुम्हारा महात्मा नारदजी से मिलना कुछ असङ्गत-सा जान पड़ता है । प्रियवर ! यदि इस विषय में  विश्वास दिलाने वाली कोई बात हो तो तुम उसे कहकर हमारी शङ्का मिटा दो ॥ ३० ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते षष्ठोऽध्यायः॥६॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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शनिवार, 27 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०८)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

धर्मार्थकाम इति योऽभिहितस्त्रिवर्ग 
     ईक्षा त्रयी नयदमौ विविधा च वार्ता ।
मन्ये तदेतदखिलं निगमस्य सत्यं 
     स्वात्मार्पणं स्वसुहृदः परमस्य पुंसः ॥ २६ ॥ 
ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह 
     नारायणो नरसखः किल नारदाय ।
एकान्तिनां भगवतः तदकिञ्चनानां 
     पादारविन्द रजसाऽऽप्लुतदेहिनां स्यात् ॥ २७ ॥ 
श्रुतं एतन्मया पूर्वं ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् । 
धर्मं भागवतं शुद्धं नारदाद् देवदर्शनात् ॥ २८ ॥ 

यों शास्त्रों में धर्म,अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों का भी वर्णन है । आत्मविद्या,कर्मकाण्ड, न्याय (तर्कशास्त्र), दण्डनीति और जीविका के विविध साधन—ये सभी वेदों के प्रतिपाद्य विषय हैं; परन्तु यदि ये अपने परम हितैषी, परम पुरुष भगवान्‌ श्रीहरि को आत्मसमर्पण करने में सहायक हैं, तभी मैं इन्हें सत्य (सार्थक) मानता हूँ । अन्यथा ये सब-के-सब निरर्थक हैं ॥ २६ ॥ यह निर्मल ज्ञान जो मैंने तुम लोगोंको बतलाया है, बड़ा ही दुर्लभ है। इसे पहले नर- नारायण ने नारदजी को उपदेश किया था और यह ज्ञान उन सब लोगों को प्राप्त हो सकता है, जिन्होंने भगवान्‌ के अनन्यप्रेमी एवं अकिञ्चन भक्तों के चरणकमलों की धूलि से अपने शरीर को नहला लिया है ॥ २७ ॥ यह विज्ञानसहित ज्ञान विशुद्ध भागवतधर्म है। इसे मैंने भगवान्‌ का दर्शन कराने वाले देवर्षि नारदजी के मुँहसे ही पहले-पहल सुना था ॥ २८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

केवलानुभवानन्द स्वरूपः परमेश्वरः । 
माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २३ ॥ 
तस्मात्सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् । 
आसुरं भावमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ २४ ॥ 
तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये 
     किं तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धाः ।
धर्मादयः किमगुणेन च काङ्‌क्षितेन 
     सारंजुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ २५ ॥ 

वे (भगवान) केवल अनुभवस्वरूप, आनन्दस्वरूप एकमात्र परमेश्वर ही हैं। गुणमयी सृष्टि करनेवाली माया के द्वारा ही उनका ऐश्वर्य छिप रहा है। इसके निवृत्त होते ही उनके दर्शन हो जाते हैं ॥ २३ ॥ इसलिये तुमलोग अपने दैत्यपने का, आसुरी सम्पत्ति का त्याग करके समस्त प्राणियों पर दया करो। प्रेमसे उनकी भलाई करो। इसी से भगवान्‌ प्रसन्न होते हैं ॥ २४ ॥ आदिनारायण अनन्त भगवान्‌ के प्रसन्न हो जाने पर ऐसी कौन-सी वस्तु है,जो नहीं मिल जाती ? लोक और परलोक के लिये जिन धर्म, अर्थ आदि की आवश्यकता बतलायी जाती है—वे तो गुणों के परिणाम से बिना प्रयास के स्वयं ही मिलनेवाले हैं । जब हम श्रीभगवान्‌ के चरणामृत का सेवन करने और उनके नाम-गुणों का कीर्तन करने में लगे हैं, तब हमें मोक्ष की भी क्या आवश्यकता है ॥ २५ ॥ 

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शुक्रवार, 26 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

न ह्यच्युतं प्रीणयतो बह्वायासोऽसुरात्मजाः । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सिद्धत्वादिह सर्वतः ॥ १९ ॥ 
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु । 
भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥ २० ॥ 
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा । 
एक एव परो ह्यात्मा भगवान् ईश्वरोऽव्ययः ॥ २१ ॥ 
प्रत्यगात्मस्वरूपेण दृश्यरूपेण च स्वयम् । 
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो हि, अनिर्देश्योऽविकल्पितः ॥ २२ ॥ 

मित्रो ! भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिये कोई बहुत परिश्रम या प्रयत्न नहीं करना पड़ता। क्योंकि वे समस्त प्राणियों के आत्मा हैं और सर्वत्र सब की सत्ता के रूप में स्वयंसिद्ध वस्तु हैं ॥ १९ ॥ ब्रह्मा से लेकर तिनके तक छोटे-बड़े समस्त प्राणियोंमें, पञ्चभूतों से बनी हुई वस्तुओं में,पञ्चभूतों में, सूक्ष्म तन्मात्राओं में, महत्तत्त्व में, तीनों गुणों में और गुणों की साम्यावस्था प्रकृति में एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं। वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्यों की खान हैं ॥ २०-२१ ॥ वे ही अन्तर्यामी द्रष्टा के रूप में हैं और वे ही दृश्य जगत् के रूपमें भी हैं । सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होने पर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापक के रूप में उनका निर्वचन किया जाता है। वस्तुत: उनमें एक भी विकल्प नहीं है ॥ २२ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

कुटुम्बपोषाय वियन् निजायुः 
     न बुध्यतेऽर्थं विहतं प्रमत्तः । 
सर्वत्र तापत्रयदुःखितात्मा 
     निर्विद्यते न स्वकुटुम्बरामः ॥ १४ ॥ 
वित्तेषु नित्याभिनिविष्टचेता 
     विद्वांश्च दोषं परवित्तहर्तुः । 
प्रेत्येह चाथाप्यजितेन्द्रियस्तद् 
     अशान्तकामो हरते कुटुम्बी ॥ १५ ॥ 
विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बं 
     पुष्णन् स्वलोकाय न कल्पते वै । 
यः स्वीयपारक्यविभिन्नभावः 
     तमः प्रपद्येत यथा विमूढः ॥ १६ ॥ 
यतो न कश्चित् क्व च कुत्रचिद् वा 
     दीनः स्वमात्मानमलं समर्थः । 
विमोचितुं कामदृशां विहार 
     क्रीडामृगो यन्निगडो विसर्गः ॥ १७ ॥ 
ततो विदूरात् परिहृत्य दैत्या 
     दैत्येषु सङ्‌गं विषयात्मकेषु । 
उपेत नारायणमादिदेवं 
     स मुक्तसङ्‌गैः इषितोऽपवर्गः ॥ १८ ॥ 

यह मेरा कुटुम्ब है, इस भाव से उस में वह इतना रम जाता है कि उसी के पालन-पोषण के लिये अपनी अमूल्य आयु को गवाँ देता है और उसे यह भी नहीं जान पड़ता कि मेरे जीवन का वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो रहा है। भला, इस प्रमाद की भी कोई सीमा है। यदि इन कामों में कुछ सुख मिले तो भी एक बात है; परंतु यहाँ तो जहाँ-जहाँ वह जाता है, वहीं-वहीं दैहिक, दैविक और भौतिक ताप उसके हृदय को जलाते ही रहते हैं। फिर भी वैराग्य का उदय नहीं होता। कितनी विडम्बना है ! कुटुम्ब की ममता के फेर में पडक़र वह इतना असावधान हो जाता है, उसका मन धनके चिन्तन में सदा इतना लवलीन रहता है कि वह दूसरे का धन चुराने के लौकिक-पारलौकिक दोषों को जानता हुआ भी कामनाओं को वश में न कर सकने के कारण इन्द्रियों के भोग की लालसा से चोरी कर ही बैठता है ॥ १४-१५ ॥ भाइयो ! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियों के पेट पालने में ही लगा रहता है—कभी भगवद्भजन नहीं करता—वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि अपने पराये का भेद-भाव रहने के कारण उसे भी अज्ञानियों के समान ही तम:प्रधान गति प्राप्त होती है ॥ १६ ॥ जो कामिनियों के मनोरञ्जनका सामान—उनका क्रीडामृग बन रहा है और जिसने अपने पैरों में सन्तान की बेड़ी जकड़ ली है, वह बेचारा गरीब—चाहे कोई भी हो, कहीं भी हो—किसी भी प्रकारसे अपना उद्धार नहीं कर सकता ॥ १७ ॥ इसलिये, भाइयो ! तुमलोग विषयासक्त दैत्यों का सङ्ग दूर से ही छोड़ दो और आदिदेव भगवान्‌ नारायण की शरण ग्रहण करो ! क्योंकि जिन्होंने संसार की आसक्ति छोड़ दी है, उन महात्माओं के वे ही परम प्रियतम और परम गति हैं ॥ १८ ॥

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गुरुवार, 25 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०४)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

पुत्रान् स्मरंस्ता दुहितॄर्हृदय्या 
     भ्रातॄन् स्वसॄर्वा पितरौ च दीनौ । 
गृहान् मनोज्ञोः उपरिच्छदांश्च 
     वृत्तीश्च कुल्याः पशुभृत्यवर्गान् ॥ १२ ॥ 
त्यजेत कोशस्कृदिवेहमानः 
     कर्माणि लोभादवितृप्तकामः । 
औपस्थ्यजैह्वं बहुमन्यमानः 
     कथं विरज्येत दुरन्तमोहः ॥ १३ ॥ 

जो अपनी ससुराल गयी हुई प्रिय पुत्रियों, पुत्रों, भाई-बहिनों और दीन अवस्था को प्राप्त पिता-माता, बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर बहुमूल्य सामग्रियों से सजे हुए घरों, कुलपरम्परागत जीविका के साधनों तथा पशुओं और सेवकों के निरन्तर स्मरण में रम गया है, वह भला उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥ १२ ॥ जो जननेन्द्रिय और रसनेन्द्रिय के सुखों को ही सर्वस्व मान बैठा है, जिसकी भोगवासनाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जो लोभवश कर्म-पर-कर्म करता हुआ रेशम के कीड़े की तरह अपने को और भी कड़े बन्धन में जकड़ता जा रहा है और जिसके मो की कोई सीमा नहीं है—वह उनसे किस प्रकार विरक्त हो सकता है और कैसे उनका त्याग कर सकता है ॥ १३ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०३)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

को गृहेषु पुमान्सक्तं आत्मानं अजितेन्द्रियः । 
स्नेहपाशैर्दृढैर्बद्धं उत्सहेत विमोचितुम् ॥ ९ ॥ 
को न्वर्थतृष्णां विसृजेत् प्राणेभ्योऽपि य ईप्सितः । 
यं क्रीणात्यसुभिः प्रेष्ठैः तस्करः सेवको वणिक् ॥ १० ॥ 
कथं प्रियाया अनुकम्पितायाः 
     सङ्‌गं रहस्यं रुचिरांश्च मन्त्रान् । 
सुहृत्सु तत्स्नेहसितः शिशूनां 
     कलाक्षराणामनुरक्तचित्तः ॥ ११ ॥ 

दैत्यबालको ! जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, ऐसा कौन-सा पुरुष होगा, जो घर-गृहस्थी में आसक्त और माया-ममता की मजबूत फाँसी में फँसे हुए अपने-आपको उससे छुड़ाने का साहस कर सके ॥ ९ ॥ जिसे चोर, सेवक एवं व्यापारी अपने अत्यन्त प्यारे प्राणों की भी बाजी लगाकर संग्रह करते हैं और इसलिये उन्हें जो प्राणों से भी अधिक वाञ्छनीय है—उस धन की तृष्णा को भला, कौन त्याग सकता है ॥ १० ॥ जो अपनी प्रियतमा पत्नी के एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी-मीठी सलाह पर अपने को निछावर कर चुका है, भाई-बन्धु और मित्रों के स्नेह-पाश में बँध चुका है और नन्हें-नन्हें शिशुओं की तोतली बोली पर लुभा चुका है—भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥ ११ ॥ 

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बुधवार, 24 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

ततो यतेत कुशलः क्षेमाय भवमाश्रितः । 
शरीरं पौरुषं यावत् न विपद्येत पुष्कलम् ॥ ५ ॥ 
पुंसो वर्षशतं ह्यायुः तदर्धं चाजितात्मनः । 
निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेऽन्धं प्रापितस्तमः ॥ ६ ॥ 
मुग्धस्य बाल्ये कौमारे क्रीडतो याति विंशतिः । 
जरया ग्रस्तदेहस्य यात्यकल्पस्य विंशतिः ॥ ७ ॥ 
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा । 
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥ ८ ॥ 

हमारे सिरपर अनेकों प्रकार के भय सवार रहते हैं। इसलिये यह शरीर—जो भगवत्प्राप्ति के लिये पर्याप्त है—जबतक रोग-शोकादिग्रस्त होकर मृत्युके मुख में नहीं चला जाता, तभी तक बुद्धिमान् पुरुष को अपने कल्याणके  लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥ मनुष्य की पूरी आयु सौ वर्ष की है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर लिया है, उनकी आयु का आधा हिस्सा तो यों ही बीत जाता है। क्योंकि वे रात में घोर तमोगुण—अज्ञान से ग्रस्त होकर सोते रहते हैं ॥ ६ ॥ बचपन में उन्हें अपने हित-अहित का ज्ञान नहीं रहता, कुछ बड़े होने पर कुमार अवस्था में वे खेल-कूदमें लग जाते हैं। इस प्रकार बीस वर्ष का तो पता ही नहीं चलता। जब बुढ़ापा शरीर को ग्रस लेता है, तब अन्त के बीस वर्षों में कुछ करने-धरने की शक्ति ही नहीं रह जाती ॥ ७ ॥ रह गयी बीच की कुछ थोड़ी-सी आयु। उसमें कभी न पूरी होनेवाली बड़ी-बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखनेवाला मोह है और घर-द्वार की वह आसक्ति है, जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कुछ कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान ही नहीं रहता। इस प्रकार बची-खुची आयु भी हाथ से निकल जाती है ॥ ८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

प्रह्लाद उवाच
कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह । 
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥ १ ॥ 
यथा हि पुरुषस्येह विष्णोः पादोपसर्पणम् । 
यदेष सर्वभूतानां प्रिय आत्मेश्वरः सुहृत् ॥ २ ॥ 
सुखं ऐन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम् । 
सर्वत्र लभ्यते दैवाद् यथा दुःखमयत्‍नतः ॥ ३ ॥ 
तत्प्रयासो न कर्तव्यो यत आयुर्व्ययः परम् । 
न तथा विन्दते क्षेमं मुकुन्दचरणाम्बुजम् ॥ ४ ॥ 

प्रह्लादजीने कहा—मित्रो ! इस संसार में मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। इसके द्वारा अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। परंतु पता नहीं कब इसका अन्त हो जाय; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को बुढ़ापे या जवानी के भरोसे न रहकर बचपन में ही भगवान्‌ की प्राप्ति कराने वाले साधनों का अनुष्ठान कर लेना चाहिये ॥ १ ॥ इस मनुष्य-जन्म में श्रीभगवान्‌ के चरणों की शरण लेना ही जीवन की एकमात्र सफलता है। क्योंकि भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं ॥ २ ॥ भाइयो ! इन्द्रियों से जो सुख भोगा जाता है, वह तो—जीव चाहे जिस योनिमें रहे—प्रारब्ध के अनुसार सर्वत्र वैसे ही मिलता रहता है, जैसे बिना किसी प्रकार का प्रयत्न किये, निवारण करनेपर भी दु:ख मिलता है ॥ ३ ॥ इसलिये सांसारिक सुख के उद्देश्य से प्रयत्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि स्वयं मिलनेवाली वस्तुके  लिये परिश्रम करना आयु और शक्ति को व्यर्थ गँवाना है। जो इनमें उलझ जाते हैं, उन्हें भगवान्‌ के परम कल्याण-स्वरूप चरणकमलों की प्राप्ति नहीं होती ॥ ४ ॥ 

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मंगलवार, 23 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

यदाचार्यः परावृत्तो गृहमेधीयकर्मसु
वयस्यैर्बालकैस्तत्र सोपहूतः कृतक्षणैः ||५४||
अथ तान्श्लक्ष्णया वाचा प्रत्याहूय महाबुधः
उवाच विद्वांस्तन्निष्ठां कृपया प्रहसन्निव ||५५||
ते तु तद्गौरवात्सर्वे त्यक्तक्रीडापरिच्छदाः
बाला अदूषितधियो द्वन्द्वारामेरितेहितैः ||५६||
पर्युपासत राजेन्द्र तन्न्यस्तहृदयेक्षणाः
तानाह करुणो मैत्रो महाभागवतोऽसुरः ||५७||

एक दिन गुरुजी गृहस्थी के काम से कहीं बाहर चले गये थे। छुट्टी मिल जाने के कारण समवयस्क बालकों ने प्रह्लाद जी को खेलने के लिये पुकारा ॥ ५४ ॥ प्रह्लादजी परम ज्ञानी थे, उनका प्रेम देखकर उन्होंने उन बालकोंको ही बड़ी मधुर वाणीसे पुकारकर अपने पास बुला लिया। उनसे उनके जन्म-मरण की गति भी छिपी नहीं थी। उनपर कृपा करके हँसते हुए- से उन्हें उपदेश करने लगे ॥ ५५ ॥ युधिष्ठिर ! वे सब अभी बालक ही थे, इसलिये राग-द्वेषपरायण विषयभोगी पुरुषों के उपदेशों से और चेष्टाओं से उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी। इसीसे, और प्रह्लादजी के प्रति आदर-बुद्धि होनेसे उन सबने अपनी खेल-कूदकी सामग्रियोंको छोड़ दिया तथा प्रह्लादजी के पास जाकर उनके चारों ओर बैठ गये और उनके उपदेशमें मन लगाकर बड़े प्रेमसे एकटक उनकी ओर देखने लगे। भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादका हृदय उनके प्रति करुणा और मैत्रीके भावसे भर गया तथा वे उनसे कहने लगे ॥ ५६-५७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादानुचरिते पञ्चमोऽध्यायः

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत्
धर्मो ह्यस्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम् ||५१||
धर्ममर्थं च कामं च नितरां चानुपूर्वशः
प्रह्रादायोचतू राजन्प्रश्रितावनताय च ||५२||
यथा त्रिवर्गं गुरुभिरात्मने उपशिक्षितम्
न साधु मेने तच्छिक्षां द्वन्द्वारामोपवर्णिताम् ||५३||

हिरण्यकशिपु ने ‘अच्छा, ठीक है कहकर गुरुपुत्रों की सलाह मान ली और कहा कि ‘इसे उन धर्मों का उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं’ ॥ ५१ ॥ युधिष्ठिर ! इसके बाद पुरोहित उन्हें लेकर पाठशाला में गये और क्रमश: धर्म, अर्थ और काम—इन तीन पुरुषार्थों की शिक्षा देने लगे। प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवक की भाँति रहते थे ॥ ५२ ॥ परंतु गुरुओंकी वह शिक्षा प्रह्लादको अच्छी न लगी। क्योंकि गुरुजी उन्हें केवल अर्थ, धर्म और कामकी ही शिक्षा देते थे। यह शिक्षा केवल उन लोगोंके लिये है, जो राग-द्वेष आदि द्वन्द्व और विषय- भोगोंमें रस ले रहे हों ॥ ५३ ॥ 

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सोमवार, 22 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

इति तच्चिन्तया किञ्चिन्म्लानश्रियमधोमुखम्
शण्डामर्कावौशनसौ विविक्त इति होचतुः ||४८||
जितं त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवो-
र्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम्
न तस्य चिन्त्यं तव नाथ चक्ष्वहे 
न वै शिशूनां गुणदोषयोः पदम् ||४९||
इमं तु पाशैर्वरुणस्य बद्ध्वा 
निधेहि भीतो न पलायते यथा
बुद्धिश्च पुंसो वयसार्यसेवया 
यावद्गुरुर्भार्गव आगमिष्यति ||५०||

इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु तो मुँह लटकाकर बैठा हुआ है, तब उन्होंने एकान्त में जाकर उससे यह बात कही— ॥ ४८ ॥ ‘स्वामी ! आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। आपके भौंहें टेढ़ी करनेपर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखने में तो आपके लिये चिन्ता की कोई बात नहीं है। भला, बच्चोंके खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है ॥ ४९ ॥ जब तक हमारे पिता शुक्राचार्य जी नहीं आ जाते, तब तक यह डरकर कहीं भाग न जाय। इसलिये इसे वरुणके पाशों से बाँध रखिये। प्राय: ऐसा होता है कि अवस्था की वृद्धि के साथ-साथ और गुरुजनों की सेवा से बुद्धि सुधर जाया करती है’ ॥ ५० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

चिन्तां दीर्घतमां प्राप्तस्तत्कर्तुं नाभ्यपद्यत
एष मे बह्वसाधूक्तो वधोपायाश्च निर्मिताः
तैस्तैद्रोहैरसद्धर्मैर्मुक्तः स्वेनैव तेजसा ||४५||
वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम्
न विस्मरति मेऽनार्यं शुनः शेप इव प्रभुः ||४६||
अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः
नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा ||४७||

वह (हिरण्यकशिपु ) सोचने लगा—‘इसे मैंने बहुत कुछ बुरा- भला कहा, मार डालने के बहुत-से उपाय किये। परंतु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता से अपने प्रभाव से ही बचता गया ॥ ४५ ॥ यह बालक होने पर भी समझदार है और मेरे पास ही नि:शङ्क भाव से रहता है। हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुन:शेप[*] अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारों को न भूलेगा ॥ ४६ ॥ न तो यह किसी से डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है। इसकी शक्ति की थाह नहीं है। अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी। सम्भव है, न भी हो’ ॥ ४७ ॥
...................................... 
[*] शुन:शेप अजीगर्त का मँझला पुत्र था। उसे पिता ने वरुण के यज्ञ में बलि देने के लिये हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व के हाथ बेच दिया था। तब उसके मामा विश्वामित्रजी ने उसकी रक्षा की और वह अपने पिता से विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजी के ही गोत्र में हो गया। यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’के सातवें अध्याय में आवेगी।

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रविवार, 21 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

प्रयासेऽपहते तस्मिन्दैत्येन्द्रः परिशङ्कितः
चकार तद्वधोपायान्निर्बन्धेन युधिष्ठिर ||४२||
दिग्गजैर्दन्दशूकेन्द्रैरभिचारावपातनैः
मायाभिः सन्निरोधैश्च गरदानैरभोजनैः ||४३||
हिमवाय्वग्निसलिलैः पर्वताक्रमणैरपि
न शशाक यदा हन्तुमपापमसुरः सुतम् ||४४||

युधिष्ठिर ! जब शूलों की मार से प्रह्लाद के शरीर पर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपु को बड़ी शङ्का हुई। अब वह प्रह्लाद को मार डालनेके लिये बड़े हठ से भाँति-भाँति के उपाय करने लगा ॥ ४२ ॥ उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर साँपों से डँसवाया, पुरोहितों से कृत्या राक्षसी उत्पन्न करायी, पहाडक़ी चोटी से नीचे डलवा दिया, शम्बरासुर से अनेकों प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियों में बंद करा दिया, विष पिलाया और खाना बंद कर दिया ॥ ४३ ॥ बर्फीली जगह, दहकती हुई आग और समुद्रमें बारी-बारीसे डलवाया, आँधीमें छोड़ दिया तथा पर्वतोंके नीचे दबवा दिया; परंतु इनमेंसे किसी भी उपायसे वह अपने पुत्र निष्पाप प्रह्लादका बाल भी बाँका न कर सका। अपनी विवशता देखकर हिरण्यकशिपु को बड़ी चिन्ता हुई। उसे प्रह्लाद को मारने के लिये और कोई उपाय नहीं सूझ पड़ा ॥ ४४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

नैर्ॠतास्ते समादिष्टा भर्त्रा वै शूलपाणयः
तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः ||३९||
नदन्तो भैरवं नादं छिन्धि भिन्धीति वादिनः
आसीनं चाहनन्शूलैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु ||४०||
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः ||४१||

जब हिरण्यकशिपु ने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल- लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे ॥ ३९-४० ॥ उस समय प्रह्लादजी का चित्त उन परमात्मामें लगा हुआ था, जो मन-वाणी के अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियों के आधार एवं परब्रह्म हैं। इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनों के बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं ॥ ४१ ॥ 

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शनिवार, 20 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं 
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः
महीयसां पादरजोऽभिषेकं 
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ||३२||
इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा
अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले ||३३|
आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभूतलोचनः
वध्यतामाश्वयं वध्यो निःसारयत नैर्ॠताः ||३४||
अयं मे भ्रातृहा सोऽयं हित्वा स्वान्सुहृदोऽधमः
पितृव्यहन्तुः पादौ यो विष्णोर्दासवदर्चति ||३५||
विष्णोर्वा साध्वसौ किं नु करिष्यत्यसमञ्जसः
सौहृदं दुस्त्यजं पित्रोरहाद्यः पञ्चहायनः ||३६||
परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं 
स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहितः
छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं 
शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात्       ||३७||
सर्वैरुपायैर्हन्तव्यः सम्भोजशयनासनैः
सुहृल्लिङ्गधरः शत्रुर्मुनेर्दुष्टमिवेन्द्रियम् ||३८||

जिनकी बुद्धि भगवान्‌ के चरणकमलोंका स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्युरूप अनर्थका सर्वथा नाश हो जाता है। परंतु जो लोग अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के चरणोंकी धूलमें स्नान नहीं कर लेते, उनकी बुद्धि काम्यकर्मों का पूरा सेवन करने पर भी भगवच्चरणों का स्पर्श नहीं कर सकती ॥ ३२ ॥
प्रह्लाद जी इतना कहकर चुप हो गये। हिरण्यकशिपु ने क्रोध के मारे अन्धा होकर उन्हें अपनी गोद से उठाकर भूमिपर पटक दिया ॥ ३३ ॥ प्रह्लाद की बात को वह सह न सका । रोष के मारे उसके नेत्र लाल हो गये। वह कहने लगा—दैत्यो ! इसे यहाँ से बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालनेयोग्य है ॥ ३४ ॥ देखो तो सही—जिसने इसके चाचा को मार डाला, अपने सुहृद्- स्वजनों को छोडक़र यह नीच दास के समान उसी विष्णु के चरणोंकी पूजा करता है ! हो-न-हो, इसके रूप में मेरे भाई को मारनेवाला विष्णु ही आ गया है ॥ ३५ ॥ अब यह विश्वासके योग्य नहीं है। पाँच बरस की अवस्था में ही जिसने अपने माता-पिताके दुस्त्यज वात्सल्यस्नेह को भुला दिया—वह कृतघ्न भला, विष्णु का ही क्या हित करेगा ॥ ३६ ॥ कोई दूसरा भी यदि औषधके समान भलाई करे तो वह एक प्रकारसे पुत्र ही है। पर यदि अपना पुत्र भी अहित करने लगे तो रोगके समान वह शत्रु है। अपने शरीरके ही किसी अङ्गसे सारे शरीरको हानि होती हो तो उसको काट डालना चाहिये। क्योंकि उसे काट देने से शेष शरीर सुख से जी सकता है ॥ ३७ ॥ यह स्वजन का बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है। जैसे योगी की भोगलोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करनेवाला है। इसलिये खाने, सोने, बैठने आदि के समय किसी भी उपाय से इसे मार डालो’ ॥ ३८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीगुरुपुत्र उवाच
न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं सुतो वदत्येष तवेन्द्र शत्रो
नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्नियच्छ मन्युं कददाः स्म मा नः ||२८||

श्रीनारद उवाच
गुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुरः सुतम्
न चेद्गुरुमुखीयं ते कुतोऽभद्रा सती मतिः ||२९||

श्रीप्रह्लाद उवाच
मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा 
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं 
पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ||३०||
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं 
दुराशया ये बहिरर्थमानिनः
अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना-
स्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ||३१||

गुरुपुत्रने कहा—इन्द्रशत्रो ! आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह मेरे या और किसी के बहकाने से नहीं कह रहा है। राजन् ! यह तो इस की जन्मजात स्वाभाविक बुद्धि है । आप क्रोध शान्त कीजिये । व्यर्थ में हमें दोष न लगाइये ॥ २८ ॥
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब गुरुजी ने ऐसा उत्तर दिया, तब हिरण्यकशिपु ने फिर प्रह्लाद से पूछा—‘क्यों रे ! यदि तुझे ऐसी अहित करनेवाली खोटी बुद्धि गुरुमुख से नहीं मिली तो बता, कहाँसे प्राप्त हुई ?’ ॥ २९ ॥
प्रह्लादजीने कहा—पिताजी ! संसारके लोग तो पिसे हुएको पीस रहे हैं, चबाये हुए को चबा रहे हैं। उनकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण वे भोगे हुए विषयों को ही फिर-फिर भोगने के लिये संसाररूप घोर नरक की ओर जा रहे हैं। ऐसे गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि अपने-आप किसी के सिखाने से अथवा अपने ही जैसे लोगोंके सङ्ग से भगवान्‌ श्रीकृष्णमें नहीं लगती ॥ ३० ॥ जो इन्द्रियों से दीखनेवाले बाह्य विषयों को परम इष्ट समझकर मूर्खतावश अन्धों के पीछे अन्धों की तरह गड्ढेमें गिरनेके लिये चले जा रहे हैं और वेदवाणीरूप रस्सीके—काम्यकर्मों के दीर्घ बन्धन में बँधे हुए हैं, उनको यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान्‌ विष्णु ही हैं—उन्हीं की प्राप्ति से हमें सब पुरुषार्थोंकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ३१ ॥ 

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शुक्रवार, 19 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

हिरण्यकशिपुरुवाच
प्रह्रादानूच्यतां तात स्वधीतं किञ्चिदुत्तमम्
कालेनैतावतायुष्मन्यदशिक्षद्गुरोर्भवान् ||२२||

श्रीप्रह्लाद उवाच
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ||२३||
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ||२४||
निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा
गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधरः ||२५||
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षं श्रयतासता
असारं ग्राहितो बालो मामनादृत्य दुर्मते ||२६||
सन्ति ह्यसाधवो लोके दुर्मैत्राश्छद्मवेषिणः
तेषामुदेत्यघं काले रोगः पातकिनामिव ||२७||

हिरण्यकशिपुने कहा—चिरञ्जीव बेटा प्रह्लाद ! इतने दिनों में तुमने गुरुजी से जो शिक्षा प्राप्त की है, उसमेंसे कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाओ ॥ २२ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—पिताजी ! विष्णुभगवान्‌ की भक्ति के नौ भेद हैं—भगवान्‌ के गुण-लीला- नाम आदि का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । यदि भगवान्‌ के प्रति समर्पण के भावसे यह नौ प्रकारकी भक्ति की जाय, तो मैं उसीको उत्तम अध्ययन समझता हूँ ॥ २३-२४ ॥ प्रह्लादकी यह बात सुनते ही क्रोध के मारे हिरण्यकशिपु के ओठ फडक़ने लगे। उसने गुरुपुत्र से कहा— ॥ २५ ॥ रे नीच ब्राह्मण ! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि ! तूने मेरी कुछ भी परवाह न करके इस बच्चे को कैसी निस्सार शिक्षा दे दी ? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओं के आश्रित है ॥ २६ ॥ संसारमें ऐसे दुष्टों की कमी नहीं है, जो मित्र का बाना धारण कर छिपे-छिपे शत्रु का काम करते हैं। परंतु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालों का पाप समय पर रोग के रूप में प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है ॥ २७ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

तत एनं गुरुर्ज्ञात्वा ज्ञातज्ञेयचतुष्टयम्
दैत्येन्द्रं दर्शयामास मातृमृष्टमलङ्कृतम् ||१९||
पादयोः पतितं बालं प्रतिनन्द्याशिषासुरः
परिष्वज्य चिरं दोर्भ्यां परमामाप निर्वृतिम् ||२०||
आरोप्याङ्कमवघ्राय मूर्धन्यश्रुकलाम्बुभिः
आसिञ्चन्विकसद्वक्त्रमिदमाह युधिष्ठिर ||२१||

कुछ समय के बाद जब गुरुजी ने देखा कि प्रह्लाद ने साम, दान, भेद और दण्ड के सम्बन्ध की सारी बातें जान ली हैं, तब वे उन्हें उनकी माँ के पास ले गये । माता ने बड़े लाड़-प्यार से उन्हें नहला-धुलाकर अच्छी तरह गहने-कपड़ों से सजा दिया । इसके बाद वे उन्हें हिरण्यकशिपु के पास ले गये ॥ १९ ॥ प्रह्लाद अपने पिता के चरणों में लोट गये। हिरण्यकशिपु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और दोनों हाथों से उठाकर बहुत देर तक गले से लगाये रखा। उस समय दैत्यराज का हृदय आनन्द से भर रहा था ॥ २० ॥ युधिष्ठिर ! हिरण्यकशिपु ने प्रसन्नमुख प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर उनका सिर सूँघा। उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू गिर-गिरकर प्रह्लाद के शरीर को भिगोने लगे। उसने अपने पुत्र से पूछा ॥ २१ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीनारद उवाच
एतावद्ब्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामतिः
तं सन्निभर्त्स्य कुपितः सुदीनो राजसेवकः ||१५||
आनीयतामरे वेत्रमस्माकमयशस्करः
कुलाङ्गारस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थोऽस्योदितो दमः ||१६||
दैतेयचन्दनवने जातोऽयं कण्टकद्रुमः
यन्मूलोन्मूलपरशोर्विष्णोर्नालायितोऽर्भकः ||१७||
इति तं विविधोपायैर्भीषयंस्तर्जनादिभिः
प्रह्लादं ग्राहयामास त्रिवर्गस्योपपादनम् ||१८||

नारदजी कहते हैं—परमज्ञानी प्रह्लाद अपने गुरु जी से इतना कहकर चुप हो गये। पुरोहित बेचारे राजा के सेवक एवं पराधीन थे। वे डर गये। उन्होंने क्रोध से प्रह्लाद को झिडक़ दिया और कहा— ॥ १५ ॥ ‘अरे, कोई मेरा बेंत तो लाओ । यह हमारी कीर्ति में कलङ्क लगा रहा है। इस दुर्बुद्धि कुलाङ्गार को ठीक करने के लिये चौथा उपाय दण्ड ही उपयुक्त होगा ॥ १६ ॥ दैत्यवंश के चन्दनवन में यह काँटेदार बबूल कहाँ से पैदा हुआ ? जो विष्णु इस वन की जड़ काटने में कुल्हाड़े का काम करते हैं, यह नादान बालक उन्हीं की बेंट बन रहा है; सहायक हो रहा है ॥ १७ ॥ इस प्रकार गुरुजी ने तरह-तरहसे डाँट-डपटकर प्रह्लाद को धमकाया और अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी शिक्षा दी ॥१८॥ 

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बुधवार, 17 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

स यदानुव्रतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते
अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ||१२||
स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-
र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते
मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो 
ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ||१३||
यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन्स्वयमाकर्षसन्निधौ
तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया ||१४||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) वे भगवान्‌ ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्यों की पाशविक बुद्धि नष्ट होती है। इस पशुबुद्धि के कारण ही तो ‘यह मैं हूँ और यह मुझसे भिन्न है’ इस प्रकार का झूठा भेदभाव पैदा होता है ॥ १२ ॥ वही परमात्मा यह आत्मा है। अज्ञानी लोग अपने और पराये का भेद करके उसी का वर्णन किया करते हैं। उनका न जानना भी ठीक ही है; क्योंकि उसके तत्त्व को जानना बहुत कठिन है और ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े वेदज्ञ भी उसके विषय में मोहित हो जाते हैं। वही परमात्मा आपलोगों के शब्दों में मेरी बुद्धि ‘बिगाड़’ रहा है ॥ १३ ॥ गुरुजी ! जैसे चुम्बक के पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणि भगवान्‌ की स्वच्छन्द इच्छा शक्ति से मेरा चित्त भी संसार से अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है ॥ १४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीप्रह्लाद उवाच

परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः
विमोहितधियां दृष्टस्तस्मै भगवते नमः ||११||

प्रह्लादजी ने कहा—जिन मनुष्यों की बुद्धि मोह से ग्रस्त हो रही है, उन्हीं को भगवान्‌ की माया से यह झूठा दुराग्रह होता देखा गया है कि यह ‘अपना’ है और यह ‘पराया’। उन मायापति भगवान्‌ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥ 

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मंगलवार, 16 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

एकदासुरराट्पुत्रमङ्कमारोप्य पाण्डव
पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्भवान् ||४||

श्रीप्रह्लाद उवाच
तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां 
सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात्
हित्वात्मपातं गृहमन्धकूपं 
वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ||५||

श्रीनारद उवाच
श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्यः परपक्षसमाहिताः
जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभिः ||६||
सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभिः
विष्णुपक्षैः प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ||७||
गृहमानीतमाहूय प्रह्रादं दैत्ययाजकाः
प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः ||८||
वत्स प्रह्लाद भद्रं ते सत्यं कथय मा मृषा
बालानति कुतस्तुभ्यमेष बुद्धिविपर्ययः ||९||
बुद्धिभेदः परकृत उताहो ते स्वतोऽभवत्
भण्यतां श्रोतुकामानां गुरूणां कुलनन्दन ||१०||

युधिष्ठिर ! एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को बड़े प्रेमसे गोदमें लेकर पूछा—‘बेटा ! बताओ तो सही, तुम्हें कौन-सी बात अच्छी लगती है ?’ ॥ ४ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—पिताजी ! संसारके प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रहमें पडक़र सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अध:पतन के मूल कारण, घास से ढके हुए अँधेरे कूएँ के समान इस घर को छोडक़र वनमें चले जायँ और भगवान्‌ श्रीहरि की शरण ग्रहण करें ॥ ५ ॥
नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजी के मुँह से शत्रुपक्ष की प्रशंसा से भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा—‘दूसरोंके बहकाने से बच्चों की बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है ॥ ६ ॥ जान पड़ता है गुरुजी के घर पर विष्णु के पक्षपाती कुछ ब्राह्मण वेष बदलकर रहते हैं। बालक की भलीभाँति देख-रेख की जाय, जिससे अब इसकी बुद्धि बहकने न पाये ॥ ७ ॥
जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा ॥ ८ ॥ बेटा प्रह्लाद ! तुम्हारा कल्याण हो। ठीक-ठीक बतलाना। देखो, झूठ न बोलना। यह तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी ? और किसी बालककी बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई ॥ ९ ॥ कुलनन्दन प्रह्लाद ! बताओ तो बेटा ! हम तुम्हारे गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि तुम्हारी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी या किसी ने सचमुच तुम को बहका दिया है ? ॥ १० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीनारद उवाच

पौरोहित्याय भगवान्वृतः काव्यः किलासुरैः
षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ||१||
तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्लादं नयकोविदम्
पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ||२||
यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनुपपाठ च
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ||३||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! दैत्यों ने भगवान्‌ श्रीशुक्राचार्य जी को अपना पुरोहित बनाया था । उनके दो पुत्र थे—शण्ड और अमर्क । वे दोनों राजमहल के पास ही रहकर हिरण्यकशिपु के द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लाद को और दूसरे पढ़ानेयोग्य दैत्य-बालकोंको राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ॥ १-२ ॥ प्रह्लाद गुरुजी का पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का- त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मन से अच्छा नहीं समझते थे । क्योंकि उस पाठ का मूल आधार था अपने और पराये का झूठा आग्रह ॥ ३ ॥ 

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सोमवार, 15 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

युधिष्ठिर उवाच - 

देवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुव्रत । 
यदात्मजाय शुद्धाय पितादात्साधवे ह्यघम् ॥ ४४ ॥ 
पुत्रान् विप्रतिकूलान् स्वान् पितरः पुत्रवत्सलाः । 
उपालभन्ते शिक्षार्थं नैवाघमपरो यथा ॥ ४५ ॥ 
किमुतानुवशान् साधून् तादृशान् गुरुदेवतान् । 
एतत्कौतूहलं ब्रह्मन् अस्माकं विधम प्रभो । 
पितुः पुत्राय यद्द्वेषो मरणाय प्रयोजितः ॥ ४६ ॥ 

युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्र से द्रोह क्यों किया ॥४४॥ पिता तो स्वभाव से ही अपने पुत्रों से प्रेम करते हैं। यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देने के लिये ही डाँटते हैं, शत्रु की तरह वैर-विरोध तो नहीं करते ॥४५॥ फिर प्रह्लाद–जी जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनों में भगवद्भाव करने वाले पुत्रों से भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है । नारदजी ! आप सब कुछ जानते हैं। हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिता ने द्वेष के कारण पुत्र को मार डालना चाहा । आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये॥४६॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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रविवार, 14 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीं आस्ते संस्पर्शनिर्वृतः । 
अस्पन्दप्रणयानन्द सलिलामीलितेक्षणः ॥ ४१ ॥ 
स उत्तमश्लोकपदारविन्दयोः 
     निषेवयाकिञ्चनसङ्‌गलब्धया । 
तन्वन् परां निर्वृतिमात्मनो मुहुः 
     दुसङ्‌गदीनस्य मनः शमं व्यधात् ॥ ४२ ॥ 
तस्मिन् महाभागवते महाभागे महात्मनि । 
हिरण्यकशिपू राजन् अकरोद् अघमात्मजे ॥ ४३ ॥ 

कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्‌ का कोमल संस्पर्श अनुभव करके (प्रह्लाद)आनन्द में मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्द के आँसुओं से भरे रहते ॥ ४१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमलों की यह भक्ति अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के सङ्ग से ही प्राप्त होती है। इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्द में मग्न रहते ही थे; जिन बेचारों का मन कुसङ्ग के कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिर ! प्रह्लाद भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटि के महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्र को भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करने की चेष्टा करने लगा ॥ ४३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत् तन्मनस्तया । 
कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥ ३७ ॥ 
आसीनः पर्यटन् अश्नन् शयानः प्रपिबन् ब्रुवन् । 
नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भितः ॥ ३८ ॥ 
क्वचिद् रुदति वैकुण्ठ चिन्ताशबलचेतनः । 
क्वचिद् हसति तच्चिन्ता ह्लाद उद्‍गायति क्वचित् ॥ ३९ ॥ 
नदति क्वचिद् उत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् । 
क्वचित्तद्‍भावनायुक्तः तन्मयोऽनुचकार ह ॥ ४० ॥ 

युधिष्ठिर ! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोडक़र भगवान्‌ के ध्यान में जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान्‌ श्रीकृष्ण के अनुग्रहरूप ग्रह ने उनके हृदय को इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत् की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥ ३७ ॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान्‌ मुझे अपनी गोद में लेकर आलिङ्गन कर रहे हैं। इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातों का ध्यान बिलकुल न रहता ॥ ३८ ॥ कभी-कभी भगवान्‌ मुझे छोडक़र चले गये, इस भावना में उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोर से रोने लगते। कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेक से ठठाकर हँसने लगते। कभी उनके ध्यान के मधुर आनन्द का अनुभव करके जोर से गाने लगते ॥ ३९ ॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जा का त्याग करके प्रेम में छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीला के चिन्तन में इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हीं का अनुकरण करने लगते ॥ ४० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 13 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

यस्मिन्महद्‍गुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । 
न तेऽधुना पिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३४ ॥ 
यं साधुगाथासदसि रिपवोऽपि सुरा नृप । 
प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवादृशाः ॥ ३५ ॥ 
गुणैरलमसंख्येयै माहात्म्यं तस्य सूच्यते । 
वासुदेवे भगवति यस्य नैसर्गिकी रतिः ॥ ३६ ॥ 

जैसे भगवान्‌ के गुण अनन्त हैं, वैसे ही प्रह्लादके श्रेष्ठ गुणों की भी कोई सीमा नहीं है। महात्मा लोग सदा से उनका वर्णन करते और उन्हें अपनाते आये हैं। तथापि वे आज भी ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं ॥ ३४ ॥ युधिष्ठिर ! यों तो देवता उनके शत्रु हैं; परंतु फिर भी भक्तोंका चरित्र सुननेके लिये जब उन लोगोंकी सभा होती है, तब वे दूसरे भक्तों को प्रह्लाद के समान कहकर उनका सम्मान करते हैं। फिर आप-जैसे अजातशत्रु भगवद्भक्त उनका आदर करेंगे, इसमें तो सन्देह ही क्या है ॥ ३५ ॥ उनकी महिमा का वर्णन करने के लिये अगणित गुणों के कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं। केवल एक ही गुण—भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है ॥ ३६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच - 
इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः । 
न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥ २९ ॥ 
तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्‍भुताः । 
प्रह्लादोऽभून् महांन् तेषां गुणैर्महदुपासकः ॥ ३० ॥ 
ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । 
आत्मवत्सर्वभूतानां एकः प्रियसुहृत्तमः ॥ ३१ ॥ 
दासवत्सन्नतार्याङ्‌घ्रिः पितृवद् दीनवत्सलः । 
भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुषु ईश्वरभावनः ॥ ३२ ॥ 
विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः ॥ ३२ ॥ 
नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः 
     श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक् । 
दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा 
     प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः ॥ ३३ ॥ 

नारदजी कहते हैं—सबके हृदय में ज्ञान का सञ्चार करनेवाले भगवान्‌ ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर ! दैत्यराज हिरण्यकशिपु के बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परंतु गुणों में सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे ॥ ३० ॥ ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियों के साथ अपने ही समान समता का बर्ताव करते और सब के एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे ॥ ३१ ॥ बड़े लोगों के चरणों में सेवक की तरह झुककर रहते थे। गरीबों पर पिता के समान स्नेह रखते थे। बराबरी वालों से भाई के समान प्रेम करते और गुरुजनों में भगवद्भाव रखते थे। विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनता से सम्पन्न होनेपर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छू तक नहीं गयी थी ॥ ३२ ॥ बड़े-बड़े दु:खोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोक के विषयों को उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परंतु वे उन्हें नि:सार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मन में किसी भी वस्तु की लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्त में कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था ॥ ३३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 12 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

एवं ऐश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । 
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापं उपेयुषः ॥ २० ॥ 
तस्योग्रदण्डसंविग्नाः सर्वे लोकाः सपालकाः । 
अन्यत्रालब्धशरणाः शरणं ययुरच्युतम् ॥ २१ ॥ 
तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः । 
यद्‍गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ २२ ॥ 
इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः । 
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ॥ २३ ॥ 
तेषां आविरभूद्वाणी अरूपा मेघनिःस्वना । 
सन्नादयन्ती ककुभः साधूनां अभयङ्‌करी ॥ २४ ॥ 
मा भैष्ट विबुधश्रेष्ठाः सर्वेषां भद्रमस्तु वः । 
मद्दर्शनं हि भूतानां सर्वश्रेयोपपत्तये ॥ २५ ॥ 
ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य यत् । 
तस्य शान्तिं करिष्यामि कालं तावत्प्रतीक्षत ॥ २६ ॥ 
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । 
धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ॥ 
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । 
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद् हनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर ! इस रूप में भी वह भगवान्‌ का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥ २० ॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्‌की शरण ली ॥ २१ ॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—)‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥ २२ ॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की ॥ २३ ॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥ २४ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥ २५ ॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥ कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥ २७ ॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वर के कारण शक्तिसम्पन्न होने पर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥ २८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । 
इज्यमानो हविर्भागान् अग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ १५ ॥ 
अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । 
तथा कामदुघा गावो नानाश्चर्यपदं नभः ॥ १६ ॥ 
रत्‍नाकराश्च रत्‍नौघान् तत्पत्‍न्यश्चोहुरूर्मिभिः । 
क्षारसीधुघृतक्षौद्र दधिक्षीरामृतोदकाः ॥ १७ ॥ 
शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । 
दधार लोकपालानां एक एव पृथग्गुणान् ॥ १८ ॥ 
स इत्थं निर्जितककुब् एकराड् वियान् प्रियान् । 
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः ॥ १९ ॥ 

युधिष्ठिर ! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्म का पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ॥ १५ ॥ पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा- दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानीके समुद्र भी अपनी पत्नी नदियोंके साथ तरङ्गोंके द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे ॥ १७ ॥ पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणों को धारण करता ॥ १८ ॥ इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपने को प्रिय लगनेवाले विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परंतु इतने विषयों से भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्तत: वह इन्द्रियों का दास ही तो था ॥ १९ ॥

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गुरुवार, 11 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

देवोद्यानश्रिया जुष्टं अध्यास्ते स्म त्रिपिष्टपम् । 
महेन्द्रभवनं साक्षात् निर्मितं विश्वकर्मणा । 
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनं अध्युवासाखिलर्द्धिमत् ॥ ८ ॥
यत्र विद्रुमसोपाना महामारकता भुवः । 
यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्‌क्तयः ॥ ९ ॥ 
यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च । 
पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः ॥ १० ॥ 
कूजद्‌भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः । 
रत्‍नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम् ॥ ११ ॥ 
तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो 
     महामना निर्जितलोक एकराट् । 
रेमेऽभिवन्द्याङ्‌घ्रियुगः सुरादिभिः 
     प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ 
तमङ्‌ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना 
     विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । 
उपासतोपायनपाणिभिर्विना 
     त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ 
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं 
     विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः । 
गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहुः 
     विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ॥ १४ ॥ 

अब वह (हिरण्यकशिपु) नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानों के सौन्दर्य से युक्त स्वर्ग में ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्मा का बनाया हुआ इन्द्र का भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवन में तीनों लोकों का सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ उस महल में मूँगे की सीढिय़ाँ, पन्ने की गचें, स्फटिकमणि की दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिक की कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूध के फेन के समान शय्याएँ, जिनपर मोतियों की झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं ॥ ९-१० ॥ सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरों से रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमि पर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ॥ ११ ॥ उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर ! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथों में  भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ॥ १३ ॥ जब वह अपने पुरुषार्थ से इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर ! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ॥ १४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच - 
एवं वृतः शतधृतिः हिरण्यकशिपोरथ । 
प्रादात् तत् तपसा प्रीतो वरान् तस्य सुदुर्लभान् ॥ १ ॥ 

ब्रह्मोवाच - 
ताते मे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम । 
तथापि वितराम्यङ्‌ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥ २ ॥ 
ततो जगाम भगवान् अमोघानुग्रहो विभुः । 
पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ॥ ३ ॥ 
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद् हेममयं वपुः । 
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ 
स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन्महासुरः । 
देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान् ॥ ५ ॥ 
सिद्धचारणविद्याध्रान् ऋषीन् पितृपतीन् मनून् । 
यक्षरक्षःपिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ ॥ ६ ॥ 
सर्वसत्त्वपतीन्जित्वा वशमानीय विश्वजित् । 
जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥ ७ ॥

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से इस प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवोंके लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परंतु दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥ २ ॥
[नारदजी कहते हैं—]ब्रह्माजीके वरदान कभी झूठे नहीं होते। वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं। वरदान मिल जानेके बाद हिरण्यकशिपुने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् प्रजापतियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोकको चले गये ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीसे वर प्राप्त करनेपर हिरण्यकशिपुका शरीर सुवर्णके समान कान्तिमान् एवं हृष्टपुष्ट हो गया। वह अपने भाईकी मृत्युका स्मरण करके भगवान्‌से द्वेष करने लगा ॥ ४ ॥ उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥ ५—७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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बुधवार, 10 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम
भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ||३५||
नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः
न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ||३६||
व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ||३७||
सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथात्मनः
तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ||३८||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  प्रभो ! आप समस्त वरदाताओं में श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणी से—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि—किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ ॥ ३५—३७ ॥ इन्द्रादि समस्त लोकपालोंमें जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो। तपस्वियों और योगियोंको जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये ॥ ३८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिरण्यकशिपोर्वरयाचनं नाम तृतीयोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-
मायुर्लवाद्यवयवैः क्षिणोषि
कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां-
स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ||३१||
त्वत्तः परं नापरमप्यनेज
देजच्च किञ्चिद्व्यतिरिक्तमस्ति
विद्याः कलास्ते तनवश्च सर्वा 
हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः ||३२||
व्यक्तं विभो स्थूलमिदं शरीरं 
येनेन्द्रि यप्राणमनोगुणांस्त्वम्
भुङ्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठ्ये 
अव्यक्त आत्मा पुरुषः पुराणः ||३३||
अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम्
चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ||३४||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागों के द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवों के जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ॥ ३१ ॥ प्रभो ! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आप से भिन्न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी माया से अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भ में स्थित है। आप इसे अपनेमें से ही प्रकट करते हैं ॥ ३२ ॥ प्रभो ! यह व्यक्त ब्रह्माण्ड आपका स्थूल शरीर है। इससे आप इन्द्रिय, प्राण और मनके विषयोंका उपभोग करते हैं। किन्तु उस समय भी आप अपने परम ऐश्वर्यमय स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। वस्तुत: आप पुराणपुरुष, स्थूल-सूक्ष्मसे परे ब्रह्मस्वरूप ही हैं ॥ ३३ ॥ आप अपने अनन्त और अव्यक्त स्वरूप से सारे जगत् में व्याप्त हैं । चेतन और अचेतन दोनों ही आपकी शक्तियाँ हैं । भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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मंगलवार, 9 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

श्रीहिरण्यकशिपुरुवाच
कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसावृतम्
अभिव्यनग्जगदिदं स्वयञ्ज्योतिः स्वरोचिषा ||२६||
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति
रजःसत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ||२७||
नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये
प्राणेन्द्रि यमनोबुद्धि विकारैर्व्यक्तिमीयुषे ||२८||
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च 
प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम्
चित्तस्य चित्तैर्मनैन्द्रियाणां 
पतिर्महान्भूतगुणाशयेशः ||२९||
त्वं सप्ततन्तून्वितनोषि तन्वा 
त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च
त्वमेक आत्मात्मवतामनादि-
रनन्तपारः कविरन्तरात्मा ||३०||

हिरण्यकशिपु ने (ब्रह्माजीसे) कहा—कल्प के अन्त में यह सारी सृष्टि काल के द्वारा प्रेरित तमोगुण से, घने अन्धकार से ढक गयी थी। उस समय स्वयंप्रकाशस्वरूप आपने अपने तेजसे पुन: इसे प्रकट किया ॥ २६ ॥ आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २७ ॥ आप ही जगत् के  मूल कारण हैं। ज्ञान और विज्ञान आपकी मूर्ति हैं। प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि विकारों के द्वारा आपने अपने को प्रकट किया है ॥ २८ ॥ आप मुख्यप्राण सूत्रात्माके रूपसे चराचर जगत् को अपने नियन्त्रण में रखते हैं। आप ही प्रजाके रक्षक भी हैं। भगवन् ! चित्त, चेतना, मन और इन्द्रियोंके स्वामी आप ही हैं। पञ्चभूत; शब्दादि विषय और उनके संस्कारोंके रचयिता भी महत्तत्त्वके रूपमें आप ही हैं ॥ २९ ॥ जो वेद होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—इन ऋत्विजों से होनेवाले यज्ञका प्रतिपादन करते हैं, वे आपके ही शरीर हैं। उन्हींके द्वारा अग्रिष्टोम आदि सात यज्ञोंका आप विस्तार करते हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं। क्योंकि आप अनादि, अनन्त, अपार, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं ॥ ३० ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०६) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति बालस्य ने...