॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
एवं योनिगतो जीवः स नित्यो निरहङ्कृतः ।
यावद् यत्रोपलभ्येत तावत् स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८ ॥
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक् ।
आत्ममायागुणैर्विश्वं आत्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा ।
एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्तॄणां गुणदोषयोः ॥ १० ॥
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।
उदासीनवदासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥
जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भ में आकर जबतक जिस शरीर में रहता है, तभीतक उस शरीरको अपना समझता है ॥ ८ ॥ यह जीव नित्य, अविनाशी, सूक्ष्म (जन्मादिरहित), सबका आश्रय और स्वयंप्रकाश है। इसमें स्वरूपत: जन्म-मृत्यु आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी यह ईश्वररूप होनेके कारण अपनी मायाके गुणोंसे ही अपने-आपको विश्वके रूपमें प्रकट कर देता है ॥ ९ ॥ इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्न-भिन्न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है ॥ १० ॥ यह आत्मा कार्य-कारणका साक्षी और स्वतन्त्र है। इसलिये यह शरीर आदिके गुण-दोष अथवा कर्मफलको ग्रहण नहीं करता, सदा उदासीन भावसे स्थित रहता है ॥ ११ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --