॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट११)
नारायणकवच का उपदेश
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ||३१||
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्
भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ||३२||
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान्हरिः
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ||३३||
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः
प्रहापय लोकभयं स्वनेन
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ||३४||
‘जितना भी कार्य अथवा कारणरूप जगत् है, वह वास्तवमें भगवान् ही हैं’—इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायँ ॥ ३१ ॥ जो लोग ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों—भेदों से रहित है; फिर भी वे अपनी माया-शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं, यह बात निश्चितरूप से सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ॥ ३२-३३ ॥ जो अपने भयङ्कर अट्टहाससे सब लोगोंके भयको भगा देते हैं और अपने तेजसे सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा-विदिशा में, नीचे-ऊपर, बाहर- भीतर—सब ओर हमारी रक्षा करें’ ॥ ३४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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