॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)
नारायणकवच का उपदेश
यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव च ||२७||
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपानुकीर्तनात्
प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ||२८||
गरुडो भगवान्स्तोत्र स्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ||२९||
सर्वापद्भ्यो हरेर्नाम रूपयानायुधानि नः
बुद्धीन्द्रि यमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ||३०||
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छलतारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ों वाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हों और जो-जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों—वे सभी भगवान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायँ ॥ २७-२८ ॥ बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरुड और विष्वक्सेन जी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें ॥ २९ ॥ श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ॥ ३० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
💐🩷💐जय श्री हरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंनमो भगवते वासुदेवाय तुभ्यम् नमः 🙏
नारायण नारायण नारायण नारायण