रविवार, 15 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

इति तानपि राजेन्द्र प्रजासर्गधियो मुनिः
उपेत्य नारदः प्राह वाचः कूटानि पूर्ववत् ||२९||
दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम
अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः ||३०||
भ्रातॄणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित्
स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ||३१||
एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः
तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष ||३२||
सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः
नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ||३३||
एतस्मिन्काल उत्पातान्बहून्पश्यन्प्रजापतिः
पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ||३४||
चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः
देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ||३५||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहले के समान ही कूट वचन कहे ॥२९॥ उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापति के पुत्रो ! मैं तुमलोगों को जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्ग का अनुसन्धान करो ॥ ३० ॥ जो धर्मज्ञ भाई अपने बड़े भाइयों के श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करता है, वही सच्चा भाई है ! वह पुण्यवान् पुरुष परलोक में मरुद्गणों के साथ आनन्द भोगता है ॥ ३१ ॥ परीक्षित्‌ ! शबलाश्वों को इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगों ने भी अपने भाइयों के मार्ग का ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजी का दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ३२ ॥ वे उस पथ के पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही ॥ ३३ ॥
दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत-से अशकुन हो रहे हैं। उनके चित्तमें पुत्रोंके अनिष्टकी आशङ्का हो आयी। इतनेमें ही उन्हें मालूम हुआ कि पहलेकी भाँति अबकी बार भी नारदजीने मेरे पुत्रों को चौपट कर दिया ॥ ३४ ॥ उन्हें अपने पुत्रोंकी  कर्तव्यच्युति से बड़ा शोक हुआ और वे नारदजीपर बड़े क्रोधित हुए उनके मिलने पर क्रोध के मारे दक्षप्रजापति के होठ फडक़ने लगे और वे आवेश में भरकर नारदजी से बोले ॥ ३५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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