शनिवार, 14 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम्
अन्वतप्यत कः शोचन्सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ||२३||
स भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः
पुत्रानजनयद्दक्षः सवलाश्वान्सहस्रिणः ||२४||
ते च पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः
नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ||२५||
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः
जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तत्र महत्तपः ||२६||
अब्भक्षाः कतिचिन्मासान्कतिचिद्वायुभोजनाः
आराधयन्मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ||२७||
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने
विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ||२८||

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) परीक्षित्‌ ! जब दक्षप्रजापतिको  मालूम हुआ कि मेरे शीलवान् पुत्र नारद के उपदेशसे कर्तव्यच्युत हो गये हैं, तब वे शोक से व्याकुल हो गये। उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। सचमुच अच्छी सन्तानका होना भी शोकका ही कारण है ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी ने दक्षप्रजापति को बड़ी सान्त्वना दी। तब उन्होंने पञ्चजन-नन्दिनी असिक्री के गर्भ से एक हजार पुत्र और उत्पन्न किये । उनका नाम था शबलाश्व ॥ २४ ॥ वे भी अपने पिता दक्षप्रजापति की आज्ञा पाकर प्रजासृष्टि के उद्देश्य से तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवर पर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयों ने सिद्धि प्राप्त की थी ॥ २५ ॥ शबलाश्वों ने वहाँ जाकर उस सरोवर में स्नान किया। स्नानमात्रसे ही उनके अन्त:करणके सारे मल धुल गये। अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये ॥ २६ ॥ कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओङ्कारस्वरूप भगवान्‌ नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’ —इस मन्त्र[*] का अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्‌ की आराधना की ॥ २७-२८ ॥ 
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[*] ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने। विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ।।

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌸🌿🌺ॐ नमो नारायणाय🙏
    ॐ श्री परमात्मने नमः
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

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