शनिवार, 14 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध पांचवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप

कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत्
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१९||
शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम्
कथं तदनुरूपाय गुणविस्रम्भ्युपक्रमेत् ||२०||
इति व्यवसिता राजन्हर्यश्वा एकचेतसः
प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ||२१||
स्वरब्रह्मणि निर्भात हृषीकेशपदाम्बुजे
अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ||२२||

यह काल ही एक चक्र है। यह निरन्तर घूमता रहता है। इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत् को अपनी ओर खींच रहा है। इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है। यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा ? ॥ १९ ॥ शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्रके  द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मों में लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है। इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयों पर विश्वास कर लेता है। अब वह कर्मों से निवृत्त होने की आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है ?’ ॥ २० ॥ परीक्षित्‌ ! हर्यश्वों ने एक मत से यही निश्चय किया और नारदजी की परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथ के पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता ॥ २१ ॥ इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्म में—संगीतलहरी में अभिव्यक्त हुए, भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों में अपने चित्त को अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक- लोकान्तरों में विचरने लगे ॥ २२ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. जय हो गिरिराज धरण गोवर्धन गिरधारी महाराज 🙏🙏
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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