॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत्
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१५||
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम्
मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१६||
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणः
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१७||
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम्
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१८
यह बुद्धि ही कुलटा स्त्री के समान है। इसके सङ्गसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी ? ॥ १५ ॥ माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ॥ १६ ॥ ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर हैं। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत् का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ॥ १७ ॥ भगवान्का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडक़ो अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंस का आश्रय छोडक़र उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है ? ॥ १८ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀 ॐ श्री परमात्मने नमः
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