बुधवार, 25 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

नारायणकवच का उपदेश
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः 
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं 
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ||१४||
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः 
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे 
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ||१५||
मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात्
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः 
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ||१६||

जिनके घोर अट्टहाससे सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर गये थे, वे दैत्य-यूथपतियोंके शत्रु भगवान्‌ नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानोंमें मेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥ 
अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वी को धारण करनेवाले यज्ञमूर्ति वराहभगवान्‌ मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरोंपर और लक्ष्मणजी के सहित भरतके बड़े भाई भगवान्‌ रामचन्द्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ॥ १५ ॥ भगवान्‌ नारायण मारण-मोहन आदि भयङ्कर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें। ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान्‌ दत्तात्रेय योग के विघ्नों से  और त्रिगुणाधिपति भगवान्‌ कपिल कर्मबन्धनों से मेरी रक्षा करें ॥ १६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) नारायणकवच का उपदेश सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा- द्धयशीर्षा ...