॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
नारायणकवच का उपदेश
आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ||११||
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्र पृष्ठे
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ||१२||
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात्
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्-
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ||१३||
इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी ज्ञान और वैराग्यसे परिपूर्ण इष्टदेव भगवान्का ध्यान करे और अपनेको भी तद्रूप ही चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्या, तेज और तप:स्वरूप इस कवचका पाठ करे— ॥ ११ ॥
‘भगवान् श्रीहरि गरुडज़ीकी पीठपर अपने चरणकमल रखे हुए हैं। अणिमादि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। आठ हाथोंमें शङ्ख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश (फंदा) धारण किये हुए हैं। वे ही ॐकारस्वरूप प्रभु सब प्रकार से, सब ओरसे मेरी रक्षा करें ॥ १२ ॥ मत्स्यमूर्ति भगवान् जलके भीतर जलजन्तुओं से और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें। माया से ब्रह्मचारी का रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थलपर और विश्वरूप श्रीत्रिविक्रम भगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें ॥ १३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💖🥀जय श्रीमन्न् नारायण हरि: हरि: !!
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