॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)
नारायणकवच का उपदेश
श्रीराजोवाच
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान्
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ||१||
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्
यथाततायिनः शत्रून्येन गुप्तोऽजयन्मृधे ||२||
श्रीबादरायणिरुवाच
वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ||३||
राजा परीक्षित् ने पूछा—भगवन् ! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में—अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राजलक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायणकवच को मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओंपर विजय प्राप्त की ॥ १-२ ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा—परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने उन्हें नारायणकवच का उपदेश किया। तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ॥ ३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि: !!
जवाब देंहटाएंनारायण नारायण नारायण नारायण