॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)
श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
श्रीशुक उवाच
तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभुः ||१||
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप
पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ||२||
तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः
सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ||३||
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! भगवान्के शक्तिसञ्चारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पञ्चजनकी पुत्री असिक्री से हर्यश्व नाम के दस हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥ राजन् ! दक्षके ये सभी पुत्र एक आचरण और एक स्वभावके थे। जब उनके पिता दक्षने उन्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी, तब वे तपस्या करनेके विचारसे पश्चिम दिशाकी ओर गये ॥ २ ॥ पश्चिम दिशामें सिन्धुनदी और समुद्रके सङ्गम पर नारायण-सर नाम का एक महान् तीर्थ है। बड़े-बड़े मुनि और सिद्ध पुरुष वहाँ निवास करते हैं ॥ ३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
💐🌾🥀💐जय श्रीहरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंकृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि: !!
नारायण नारायण नारायण नारायण