॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः
धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ||४||
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः
प्रजाविवृद्धये यत्तान्देवर्षिस्तान्ददर्श ह ||५||
उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः
अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ||६||
तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम्
बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ||७||
नदीमुभयतो वाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम्
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ||८||
कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ||९||
नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्त:करण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—‘अरे हर्यश्वो ! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुम लोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ॥ ४—६ ॥ देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्याभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?’ ॥ ७—९ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
नारायण नारायण नारायण नारायण
जवाब देंहटाएंश्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव: !!