॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)
नारायणकवच का उपदेश
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम्
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ||२३||
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि
कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ||२४||
‘सुदर्शन ! आपका आकार चक्र (रथके पहिये) की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणासे सब ओर घूमते रहते हैं। जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूसको जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रु-सेनाको शीघ्र-से-शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ॥ २३ ॥ कौमोद की गदा ! आप से छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है। आप भगवान् अजितकी प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ। इसलिये आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहोंको अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओंको चूर-चूर कर दीजिये ॥ २४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹🩷🥀जय श्री हरि: !!
जवाब देंहटाएंनमो भगवते वासुदेवाय तुभ्यम् नमः
नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!