॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)
नारायणकवच का उपदेश
धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्-
द्वंद्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद्
बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ||१८||
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्
बुद्धस्तु पाषण्डगणप्रमादात्
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ||१९||
भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्रिय भगवान् ऋषभदेव सुख-दु:ख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञभगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टोंसे और श्रीशेषजी क्रोधवश नामक सर्पों के गण से मेरी रक्षा करें ॥ १८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें। धर्मरक्षा के लिये महान् अवतार धारण करनेवाले भगवान् कल्कि पापबहुल कलिकालके दोषों से मेरी रक्षा करें ॥ १९ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें