॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
चित्रकेतु को पार्वती जी का शाप
श्रीशुक उवाच -
एवं शप्तश्चित्रकेतुः विमानाद् अवरुह्य सः ।
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥ १६ ॥
चित्रकेतुरुवाच -
प्रतिगृह्णामि ते शापं आत्मनोऽञ्जलिनाम्बिके ।
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥
संसारचक्र एतस्मिन् जन्तुरज्ञानमोहितः ।
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः ।
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥
गुणप्रवाह एतस्मिन्कः शापः को न्वनुग्रहः ।
कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥ २० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पार्वतीजी ने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ १६ ॥
चित्रकेतुने कहा—माता पार्वतीजी ! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोडक़र आपका शाप स्वीकार करता हूँ। क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है ॥ १७ ॥ देवि ! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दु:ख भोगता रहता है ॥ १८ ॥ माताजी ! सुख और दु:खको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दु:खका कर्ता माना करते हैं ॥ १९ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दु:ख ॥ २० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --