॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
इत्यामन्त्र्य वरारोहां कन्यामाप्सरसीं नृप
सोमो राजा ययौ दत्त्वा ते धर्मेणोपयेमिरे ||१६||
तेभ्यस्तस्यां समभवद्दक्षः प्राचेतसः किल
यस्य प्रजाविसर्गेण लोका आपूरितास्त्रयः ||१७||
यथा ससर्ज भूतानि दक्षो दुहितृवत्सलः
रेतसा मनसा चैव तन्ममावहितः शृणु ||१८||
मनसैवासृजत्पूर्वं प्रजापतिरिमाः प्रजाः
देवासुरमनुष्यादीन्नभःस्थलजलौकसः ||१९||
तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्गं प्रजापतिः
विन्ध्यपादानुपव्रज्य सोऽचरद्दुष्करं तपः|| २०||
तत्राघमर्षणं नाम तीर्थं पापहरं परम्
उपस्पृश्यानुसवनं तपसातोषयद्धरिम् ||२१||
अस्तौषीद्धंसगुह्येन भगवन्तमधोक्षजम्
तुभ्यं तदभिधास्यामि कस्यातुष्यद्यथा हरिः ||२२||
(श्रीशुकदेवजी कहते हैं) परीक्षित्! वनस्पतियों के राजा चन्द्रमा ने प्रचेताओं को इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्हें प्रम्लोचा अप्सरा की सुन्दरी कन्या दे दी और वे वहाँ से चले गये। प्रचेताओं ने धर्मानुसार उसका पाणिग्रहण किया ॥ १६ ॥ उन्हीं प्रचेताओं के द्वारा उस कन्या के गर्भ से प्राचेतस दक्षकी उत्पत्ति हुई। फिर दक्षकी प्रजा-सृष्टिसे तीनों लोक भर गये ॥ १७ ॥ इनका अपनी पुत्रियोंपर बड़ा प्रेम था। इन्होंने जिस प्रकारअपने संकल्प और वीर्यसे विविध प्राणियोंकी सृष्टि की, वह मैं सुनाता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो ॥ १८ ॥ परीक्षित्! पहले प्रजापति दक्षने जल, थल और आकाशमें रहनेवाले देवता, असुर एवं मनुष्य आदि प्रजाकी सृष्टि अपने संकल्पसे ही की ॥ १९ ॥ जब उन्होंने देखा कि वह सृष्टि बढ़ नहीं रही है, तब उन्होंने विन्ध्याचलके निकटवर्ती पर्वतोंपर जाकर बड़ी घोर तपस्या की ॥ २० ॥ वहाँ एक अत्यन्त श्रेष्ठ तीर्थ है, उसका नाम है—अघमर्षण। वह सारे पापों को धो बहाता है। प्रजापति दक्ष उस तीर्थमें त्रिकाल स्नान करते और तपस्याके द्वारा भगवान् की आराधना करते ॥ २१ ॥ प्रजापति दक्षने इन्द्रियातीत भगवान् की ‘हंसगुह्य’ नामक स्तोत्र से स्तुति की थी। उसी से भगवान् उन पर प्रसन्न हुए थे। मैं तुम्हें वह स्तुति सुनाता हूँ ॥ २२ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से