गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१३)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

किमिदं स्वप्न आहो स्वित् साक्षाद् दृष्टमिहाद्‍भुतम् ।
क्व याता अद्य ते ये मां व्यकर्षन् पाशपाणयः ॥ ३० ॥
अथ ते क्व गताः सिद्धाः चत्वारश्चारुदर्शनाः ।
व्यामोचयन् नीयमानं बद्ध्वा पाशैरधो भुवः ॥ ३१ ॥
अथापि मे दुर्भगस्य विबुधोत्तमदर्शने ।
भवितव्यं मङ्‌गलेन येनात्मा मे प्रसीदति ॥ ३२ ॥
अन्यथा म्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपतेः ।
वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्वा वक्तुमिहार्हति ॥ ३३ ॥
क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः ।
क्व च नारायणेत्येतद् भगवन्नाम मङ्‌गलम् ॥ ३४ ॥
सोऽहं तथा यतिष्यामि यतचित्तेन्द्रियानिलः ।
यथा न भूय आत्मानं अन्धे तमसि मज्जये ॥ ३५ ॥
विमुच्य तमिमं बन्धं अविद्या कामकर्मजम् ।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥ ३६ ॥
मोचये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्याऽऽत्ममायया ।
विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधमः ॥ ३७ ॥
ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम् ।
धास्ये मनो भगवति शुद्धं तत्कीर्तनादिभिः ॥ ३८ ॥

(अजामिल मन-ही-मन सोच रहा है) ‘मैंने अभी जो अद्भुत दृश्य देखा, क्या यह स्वप्न है ? अथवा जाग्रत् अवस्था का ही प्रत्यक्ष अनुभव है ? अभी-अभी जो हाथोंमें फंदा लेकर मुझे खींच रहे थे, वे कहाँ चले गये ? ॥ ३० ॥ अभी-अभी वे मुझे अपने फंदों में फँसाकर पृथ्वी के नीचे ले जा रहे थे, परन्तु चार अत्यन्त सुन्दर सिद्धों ने आकर मुझे छुड़ा लिया ! वे अब कहाँ चले गये ॥ ३१ ॥ यद्यपि मैं इस जन्मका महापापी हूँ, फिर भी मैंने पूर्वजन्मोंमें अवश्य ही शुभकर्म किये होंगे; तभी तो मुझे इन श्रेष्ठ देवताओंके दर्शन हुए। उनकी स्मृतिसे मेरा हृदय अब भी आनन्दसे भर रहा है ॥ ३२ ॥ मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ। यदि पूर्वजन्ममें मैंने पुण्य न किये होते, तो मरनेके समय मेरी जीभ भगवान्‌के मनोमोहक नामका उच्चारण कैसे कर पाती ? ॥ ३३ ॥ कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रह्मतेजको नष्ट करनेवाला तथा कहाँ भगवान्‌का वह परम मङ्गलमय ‘नारायण’ नाम ! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया) ॥ ३४ ॥ अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणोंको वशमें करके ऐसा प्रयत्न करूँगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालूँ ॥ ३५ ॥ अज्ञानवश मैंने अपनेको शरीर समझकर उसके लिये बड़ी-बड़ी कामनाएँ कीं और उनकी पूर्तिके लिये अनेकों कर्म किये। उन्हींका फल है यह बन्धन ! अब मैं इसे काटकर समस्त प्राणियोंका हित करूँगा, वासनाओंको शान्त कर दूँगा, सबसे मित्रताका व्यवहार करूँगा, दुखियोंपर दया करूँगा और पूरे संयमके साथ रहूँगा ॥ ३६ ॥ भगवान्‌की मायाने स्त्रीका रूप धारण करके मुझ अधमको फाँस लिया और क्रीडामृगकी भाँति मुझे बहुत नाच नचाया। अब मैं अपने-आपको उस मायासे मुक्त करूँगा ॥ ३७ ॥ मैंने सत्य वस्तु परमात्माको पहचान लिया है; अत: अब मैं शरीर आदिमें ‘मैं’ तथा ‘मेरे’का भाव छोडक़र भगवन्नामके कीर्तन आदिसे अपने मनको शुद्ध करूँगा और उसे भगवान्‌ में लगाऊँगा ॥ ३८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१२)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

भक्तिमान्भगवत्याशु माहात्म्यश्रवणाद्धरेः ।
अनुतापो महानासीत्स्मरतोऽशुभमात्मनः ॥ २५ ॥
अहो मे परमं कष्टं अभूद् अविजितात्मनः ।
येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायतात्मना ॥ २६ ॥
धिङ्‌मां विगर्हितं सद्‌भिः दुष्कृतं कुलकज्जलम् ।
हित्वा बालां सतीं योऽहं सुरापीमसतीमगाम् ॥ २७ ॥
वृद्धावनाथौ पितरौ नान्यबन्धू तपस्विनौ ।
अहो मयाधुना त्यक्तौ अकृतज्ञेन नीचवत् ॥ २८ ॥
सोऽहं व्यक्तं पतिष्यामि नरके भृशदारुणे ।
धर्मघ्नाः कामिनो यत्र विन्दन्ति यमयातनाः ॥ २९ ॥

सर्वपापापहारी भगवान्‌ की महिमा सुनने से अजामिल के हृदयमें शीघ्र ही भक्तिका उदय हो गया। अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥ (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ ! मैंने एक दासी के गर्भसे पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दु:खकी बात है ॥ २६ ॥ धिक्कार है ! मुझे बार-बार धिक्कार है ! मैं संतोंके द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ ! मैंने अपने कुल में कलङ्क का टीका लगा दिया ! हाय-हाय, मैंने अपनी सती एवं अबोध पत्नीका परित्याग कर दिया और शराब पीनेवाली कुलटाका संसर्ग किया ॥ २७ ॥ मैं कितना नीच हूँ ! मेरे मा-बाप बूढ़े और तपस्वी थे । वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह ! मैं कितना कृतघ्न हूँ ॥ २८ ॥ मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकारकी यमयातना भोगते हैं ॥ २९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट११)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

इति प्रत्युदिता याम्या दूता यात्वा यमान्तिके ।
यमराज्ञे यथा सर्वं आचचक्षुररिन्दम ॥ २१ ॥
द्विजः पाशाद्विनिर्मुक्तो गतभीः प्रकृतिं गतः ।
ववन्दे शिरसा विष्णोः किङ्‌करान् दर्शनोत्सवः ॥ २२ ॥
तं विवक्षुमभिप्रेत्य महापुरुषकिङ्‌कराः ।
सहसा पश्यतस्तस्य तत्रान्तर्दधिरेऽनघ ॥ २३ ॥
अजामिलोऽप्यथाकर्ण्य दूतानां यमकृष्णयोः ।
धर्मं भागवतं शुद्धं त्रैवेद्यं च गुणाश्रयम् ॥ २४ ॥

(श्रीशुकदेव जी कह रहे हैं) प्रिय परीक्षित्‌ ! पार्षदों की यह बात सुनकर यमदूत यमराज के पास गये और उन्हें यह सारा वृत्तान्त ज्यों- का-त्यों सुना दिया ॥ २१ ॥ अजामिल यमदूतों के फंदे से छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया। उसने भगवान्‌ के पार्षदों के दर्शनजनित आनन्द में मग्न होकर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥ २२ ॥ निष्पाप परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ के पार्षदों ने देखा कि अजामिल कुछ कहना चाहता है, तब वे सहसा उसके सामने ही वहीं अन्तर्धान हो गये ॥२३॥ इस अवसर पर अजामिल ने भगवान्‌ के पार्षदों से विशुद्ध भागवतधर्म और यमदूतों के मुख से वेदोक्त सगुण (प्रवृत्तिविषयक) धर्मका श्रवण किया था ॥ २४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*अनेक तार्किकों के मन में यह कल्पना उठती है कि नाम की महिमा वास्तविक नहीं है, अर्थवादमात्र है। उनके मनमें यह धारणा तो हो ही जाती है कि शराबकी एक बूँद भी पतित बनानेके लिये पर्याप्त है, परंतु यह विश्वास नहीं होता कि भगवान्‌का एक नाम भी परम कल्याणकारी है। शास्त्रोंमें भगवन्नाम-महिमाको अर्थवाद समझना पाप बताया है।

पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमा:। 
तैरर्जितानि पुण्यानि तद्वदेव भवन्ति हि ।।
- - - - -
मन्नामकीर्तनफलं विविधं निशम्य 
न श्रद्दधाति मनुते यदुतार्थवादम् ।।
यो मानुषस्तमिह दु:खचये क्षिपामि 
संसारघोरविविधार्तिनिपीडिताङ्गम् ।।
- - - - -
अर्थवादं हरेर्नाम्नि संभावयति यो नर:। 
स पापिष्ठो मनुष्याणां नरके पतति स्फुटम् ।।

‘जो नराधम पुराणों में अर्थवाद की कल्पना करते हैं उनके द्वारा उपार्जित पुण्य वैसे ही हो जाते हैं।’
- - - - - -
‘जो मनुष्य मेरे नाम-कीर्तन के विविध फल सुनकर उसपर श्रद्धा नहीं करता और उसे अर्थवाद मानता है, उसको संसार के विविध घोर तापों से पीडि़त होना पड़ता है और उसे मैं अनेक दु:खों में डाल देता हूँ।’ - - - - ‘जो मनुष्य भगवान्‌ के नाम में अर्थवाद की सम्भावना करता है, वह मनुष्योंमें अत्यन्त पापी है और उसे नरकमें गिरना पड़ता है।’

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०९)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

‘इतिहासोत्तम’ में कहा गया है—

श्रुत्वा नामानि तत्रस्थास्तेनोक्तानि हरेर्द्विज। 
नारका नरकान्मुक्ता: सद्य एव महामुने ।।

‘महामुनि ब्राह्मणदेव ! भक्तराज के मुख से नरक में रहनेवाले प्राणियों ने श्रीहरि के नाम का श्रवण किया और वे तत्काल नरकसे मुक्त हो गये।’
यज्ञ-यागादिरूप धर्म अपने अनुष्ठानके लिये जिस पवित्र देश, काल, पात्र, शक्ति, सामग्री, श्रद्धा, मन्त्र, दक्षिणा आदिकी अपेक्षा रखता है, इस कलियुगमें उसका सम्पन्न होना अत्यन्त कठिन है। भगवन्नाम-संकीर्तनके द्वारा उसका फल अनायास ही प्राप्त किया जा सकता है। भगवान्‌ शङ्कर पार्वतीके प्रति कहते हैं—

ईशोऽहं सर्वजगतां नाम्नां विष्णोर्हि जापक:। 
सत्यं सत्यं वदाम्येव हरेर्नान्या गतिर्नृणाम् ।।

‘सम्पूर्ण जगत् का स्वामी होनेपर भी मैं विष्णुभगवान्‌ के नाम का ही जप करता हूँ। मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ, भगवान्‌ को छोडक़र जीवों के लिये अब कर्मकाण्ड आदि कोई भी गति नहीं है।’ श्रीमद्भागवत में ही यह बात आगे आनेवाली है कि सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चा-पूजा से जो फल मिलता है, कलियुगमें वह केवल भगवन्नाम से मिलता है। और भी है कि कलियुग दोषोंका निधि है, परन्तु इसमें एक महान् गुण यह है कि श्रीकृष्णसंकीर्तनमात्र से ही जीव बन्धनमुक्त होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार एक बार के नामोच्चारण की भी अनन्त महिमा शास्त्रों में कही गयी है। यहाँ मूल प्रसङ्ग में ही—‘एकदापि’ कहा गया है; ‘सकृदुच्चारितं’ का उल्लेख किया जा चुका है। बार-बार जो नामोच्चारण का विधान है, वह आगे और पाप न उत्पन्न हो जायँ, इसके लिये है। ऐसे वचन भी मिलते हैं कि भगवान्‌ के नाम का उच्चारण करने से भूत, वर्तमान और भविष्य के सारे ही पाप भस्म हो जाते है, यथा—

वर्तमानं च यत् पापं यद् भूतं यद् भविष्यति। 
तत्सर्वं निर्दहत्याशु गोविन्दानलकीर्तनम् ।।

फिर भी भगवत्प्रेमी जीवको पापोंके नाशपर अधिक दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; उसे तो भक्ति-भावकी दृढ़ताके लिये, भगवान्‌के चरणोंमें अधिकाधिक प्रेम बढ़ता जाय, इस दृष्टि से अहर्निश नित्य-निरन्तर भगवान्‌ के मधुर-मधुर नाम जपते जाना चाहिये। जितनी अधिक निष्कामता होगी, उतनी-ही-उतनी नामकी पूर्णता प्रकट होती जायगी, अनुभव में आती जायगी।

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०८)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। 
भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटय: ।।
सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षणानि व्रतानि च। 
तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च ।।
वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुव: शतम्। 
कृष्णनामजपस्यास्य कलां नाहर्न्ति षोडशीम् ।।

‘जिसकी जिह्वापर ‘कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण’ यह मङ्गलमय नाम नृत्य करता रहता है, उसकी कोटि-कोटि महापातकराशि तत्काल भस्म हो जाती है। सारे यज्ञ, लाखों व्रत, सर्वतीर्थ-स्नान, तप, अनेकों उपवास, हजारों वेद-पाठ, पृथ्वीकी सैकड़ों प्रदक्षिणा कृष्णनाम जपके सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हो सकतीं।’
भगवन्नामके कीर्तन में ही यह फल हो, सो बात नहीं। उनके श्रवण और स्मरण में भी वही फल है। दशम स्कन्ध के अन्त में कहेंगे ‘जिनके नामका स्मरण और उच्चारण अमङ्गलघ्न है।’ शिवगीता और पद्मपुराणमें कहा है—

आश्चर्ये वा भये शोके क्षते वा मम नाम य:। 
व्याजेन वा स्मरेद्यस्तु स याति परमां गतिम् ।।
प्रयाणे चाप्रयाणे च यन्नाम स्मरतां नृणाम्। 
सद्यो नश्यति पापौघो नमस्तस्मै चिदात्मने ।।

‘भगवान्‌ कहते हैं कि आश्चर्य, भय, शोक, क्षत (चोट लगने) आदि के अवसर पर जो मेरा नाम बोल उठता है या किसी व्याज से स्मरण करता है, वह परमगति को प्राप्त होता है। मृत्यु या जीवन—चाहे जब कभी भगवान्‌का नाम स्मरण करनेवाले मनुष्योंकी पाप-राशि तत्काल नष्ट हो जाती है। उन चिदात्मा प्रभुको नमस्कार है।’

शेष आगामी पोस्ट में --
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*नाम-सङ्कीर्तन में देश-काल आदि के नियम भी नहीं हैं | यथा—

न देशकालनियम: शौचाशौचविनिर्णय:। परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते ।।

न देशनियमो राजन्न कालनियमस्तथा। विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने ।।
कालोऽस्ति यज्ञे दाने वा स्नाने कालोऽस्ति सज्जपे। विष्णुसंकीर्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीपते ।।
गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि पिबन्भुञ्जञ्जपंस्तथा। कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्यमुच्यते पापकञ्चुकात् ।।

अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: ।।

‘देश-कालका नियम नहीं है, शौच-अशौच आदिका निर्णय करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। केवल ‘राम-राम’ यह संकीर्तन करनेमात्रसे जीव मुक्त हो जाता है। - - - भगवान्‌ के नाम का संकीर्तन करने में न देश का नियम है और न तो काल का। इसमें कोई सन्देह नहीं। राजन् ! यज्ञ, दान, तीर्थस्नान अथवा विधिपूर्वक जपके लिये शुद्ध कालकी अपेक्षा है, परन्तु भगवन्नामके इस संकीर्तनमें काल-शुद्धिकी कोई आवश्यकता नहीं है। चलते-फिरते, खड़े रहते— सोते, खाते-पीते और जप करते हुए भी ‘कृष्ण-कृष्ण’ ऐसा संकीर्तन करके मनुष्य पाप के केंचुल से छूट जाता है। - - अपवित्र हो या पवित्र—सभी अवस्थाओंमें (चाहे किसी भी अवस्थामें) जो कमलनयन भगवान्‌का स्मरण करता है, वह बाहर भीतर-पवित्र हो जाता है।’

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*भगवान्‌के नामका उच्चारण केवल पापको ही निवृत्त करता है, इसका और कोई फल नहीं है, यह धारणा भ्रमपूर्ण है; क्योंकि शास्त्रमें कहा है—

सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।।

‘जिसने हरि’—ये दो अक्षर एक बार भी उच्चारण कर लिये, उसने मोक्ष प्राप्त करनेके लिये परिकर बाँध लिया, फेंट कस ली।’ इस वचनसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम मोक्षका भी साधन है। मोक्षके साथ-ही-साथ यह धर्म, अर्थ और कामका भी साधन है; क्योंकि ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें त्रिवर्ग-सिद्धिका भी नाम ही कारण बतलाया गया है—

न गङ्गा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्। जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:। अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधै: सदक्षिणै:। यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्। दु:खक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।

‘जिसकी जिह्वाके नोकपर ‘हरि’ ये दो अक्षर बसते हैं, उसे गङ्गा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्करकी कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नामसे ही मिल जाता है। जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया। जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणाके सहित अश्वमेध आदि यज्ञोंके द्वारा यजन कर लिया। ‘हरि’ ये दो अक्षर मृत्युके पश्चात् परलोकके मार्गमें प्रयाण करनेवाले प्राणोंके लिये पाथेय (मार्गके लिये भोजन की सामग्री) हैं, संसाररूप रोगोंके लिये सिद्ध औषध हैं और जीवनके दु:ख और क्लेशोंके लिये परित्राण हैं।’
इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम अर्थ, धर्म, काम—इन तीन वर्गोंका भी साधक है। यह बात ‘हरि’, ‘नारायण’ आदि कुछ विशेष नामों के सम्बन्ध में ही नहीं है, प्रत्युत सभी नामों के सम्बन्ध में है; क्योंकि स्थान-स्थान पर यह बात सामान्यरूप से कही गयी है कि अनन्त के नाम, विष्णु के नाम, हरि के नाम इत्यादि। भगवान्‌ के सभी नामों में एक ही शक्ति है।
नाम-सङ्कीर्तन आदिमें वर्ण-आश्रमका भी नियम नहीं है—

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शूद्रान्त्यजातय:।
यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम्। सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति सनातनम् ।।

‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदि जहाँ-तहाँ विष्णुभगवान्‌के नामका अनुकीर्तन करते रहते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त होकर सनातन परमात्माको प्राप्त होते हैं।’

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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

यथागदं वीर्यतमं उपयुक्तं यदृच्छया ।
अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान् मंत्रोऽप्युदाहृतः ॥ १९ ॥

श्रीशुक उवाच –

ते एवं सुविनिर्णीय धर्मं भागवतं नृप ।
तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन् ॥ २० ॥

जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृतको उसका गुण न जानकर अनजान में पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवाले को अमर बना देता है, वैसे ही अनजान में उच्चारण करनेपर भी भगवान्‌ का नाम [*] अपना फल देकर ही रहता है (वस्तुशक्ति श्रद्धा की अपेक्षा नहीं करती) ॥ १९ ॥ 
श्रीशुकदेव जी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार भगवान्‌ के पार्षदों ने भागवतधर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया ॥
 २०॥
....................................................
[*]वस्तु की स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत। 

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृत:। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावक: ।।

‘दुष्टचित्त मनुष्यके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी भगवान्‌ श्रीहरि पापोंको हर लेते हैं। अनजानमें या अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि जलाती ही है।’

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

अथैनं मापनयत कृताशेषाघनिष्कृतम् ।
यदसौ भगवन्नाम म्रियमाणः समग्रहीत् ॥ १३ ॥
साङ्‌केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा ।
वैकुण्ठनामग्रहणं अशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥
पतितः स्खलितो भग्नः सन्दष्टस्तप्त आहतः ।
हरिरित्यवशेनाह पुमान्नार्हति यातनाम् ॥ १५ ॥
गुरूणां च लघूनां च गुरूणि च लघूनि च ।
प्रायश्चित्तानि पापानां ज्ञात्वोक्तानि महर्षिभिः ॥ १६ ॥
तैस्तान्यघानि पूयन्ते तपोदानजपादिभिः ।
नाधर्मजं तद् हृदयं तदपीशाङ्‌घ्रिसेवया ॥ १७ ॥
अज्ञानादथवा ज्ञानात् उत्तमश्लोकनाम यत् ।
सङ्‌कीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानलः ॥ १८ ॥

इसलिये यमदूतो ! तुमलोग अजामिल को मत ले जाओ। इसने सारे पापों का प्रायश्चित्त कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय [*] भगवान्‌ के नाम का उच्चारण किया है ॥ १३ ॥
बड़े-बड़े महात्मा पुरुष यह बात जानते हैं कि संकेतमें (किसी दूसरे अभिप्रायसे), परिहासमें, तान अलापनेमें अथवा किसीकी अवहेलना करनेमें भी यदि कोई भगवान्‌के नामोंका उच्चारण करता है तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ॥ जो मनुष्य गिरते समय, पैर फिसलते समय, अङ्ग-भङ्ग होते समय और साँपके डँसते, आगमें जलते तथा चोट लगते समय भी विवशतासे ‘हरि- हरि’ कहकर भगवान्‌के नामका उच्चारण कर लेता है, वह यमयातनाका पात्र नहीं रह जाता ॥ १५ ॥ महर्षियोंने जानबूझकर बड़े पापोंके लिये बड़े और छोटे पापोंके लिये छोटे प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ १६ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि उन तपस्या, दान, जप आदि प्रायश्चित्तोंके द्वारा वे पाप नष्ट हो जाते हैं। परन्तु उन पापोंसे मलिन हुआ उसका हृदय शुद्ध नहीं होता। भगवान्‌के चरणोंकी सेवासे वह भी शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ 
यमदूतो ! जैसे जान या अनजान में र्ईंधनसे अग्नि का स्पर्श हो जाय तो वह भस्म हो ही जाता है, वैसे ही जान-बूझकर या अनजान में भगवान्‌ के नामों का सङ्कीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं ॥ १८ ॥ 
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[*] पापकी निवृत्तिके लिये भगवन्नामका एक अंश ही पर्याप्त है, जैसे ‘राम’ का ‘रा’। इसने तो सम्पूर्ण नामका उच्चारण कर लिया। मरते समय का अर्थ ठीक मरने का क्षण ही नहीं है, क्योंकि मरनेके क्षण जैसे कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि करनेके लिये विधि नहीं हो सकती, वैसे नामोच्चारणकी भी नहीं है। इसलिये ‘म्रियमाण’ शब्दका यह अभिप्राय है कि अब आगे इससे कोई पाप होनेकी सम्भावना नहीं है।

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट१३)

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