॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।
गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २३ ॥
दृश्यमाना विनार्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः ।
कर्मभिर्ध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २४ ॥
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।
देहिनो विविधक्लेश सन्तापकृदुदाहृतः ॥ २५ ॥
तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।
द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ २६ ॥
श्रीनारद उवाच -
एतां मन्त्रोपनिषदं प्रतीच्छ प्रयतो मम ।
यां धारयन् सप्तरात्राद् द्रष्टा सङ्कर्षणं प्रभुम् ॥ २७ ॥
यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे
शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।
सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं
प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ २८ ॥
शूरसेन ! अतएव ये सभी शोक, मोह, भय और दु:ख के कारण हैं, मन के खेल-खिलौने हैं, सर्वथा कल्पित और मिथ्या हैं; क्योंकि ये न होने पर भी दिखायी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि ये एक क्षण दीखने पर भी दूसरे क्षण लुप्त हो जाते हैं । ये गन्धर्वनगर, स्वप्न, जादू और मनोरथ की वस्तुओं के समान सर्वथा असत्य हैं । जो लोग कर्म-वासनाओं से प्रेरित होकर विषयों का चिन्तन करते रहते हैं; उन्हीं का मन अनेक प्रकार के कर्मों की सृष्टि करता है ॥ २३-२४ ॥ जीवात्मा का यह देह—जो पञ्चभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों का संघात है—जीव को विविध प्रकार के क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है ॥ २५ ॥ इसलिये तुम अपने मन को विषयों में भटकने से रोककर शान्त करो, स्वस्थ करो और फिर उस मनके द्वारा अपने वास्तविक स्वरूपका विचार करो तथा इस द्वैत-भ्रममें नित्यत्वकी बुद्धि छोडक़र परम शान्तिस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाओ ॥ २६ ॥
देवर्षि नारदने कहा—राजन् ! तुम एकाग्रचित्त से मुझसे यह मन्त्रोपनिषद् ग्रहण करो। इसे धारण करनेसे सात रातमें ही तुम्हें भगवान् सङ्कर्षणका दर्शन होगा ॥ २७ ॥ नरेन्द्र ! प्राचीन कालमें भगवान् शङ्कर आदि ने श्रीसङ्कर्षणदेव के ही चरणकमलों का आश्रय लिया था । इससे उन्होंने द्वैत- भ्रम का परित्याग कर दिया और उनकी उस महिमा को प्राप्त हुए, जिससे बढक़र तो कोई है ही नहीं, समान भी नहीं है। तुम भी बहुत शीघ्र ही भगवान् के उसी परमपद को प्राप्त कर लोगे ॥ २८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुसान्त्वनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
शेष आगामी पोस्ट में --