रविवार, 10 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

चित्रकेतुरुवाच - 
एष लोकगुरुः साक्षात् धर्मं वक्ता शरीरिणाम् । 
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः । 
अङ्‌कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति । 
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच - 
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप । 
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् । 
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥

चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥ ६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥ ७ ॥ प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! भगवान्‌ शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान्‌ शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा— ॥ ९-१० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीशुक उवाच 

यतश्चान्तर्हितोऽनन्तः तस्यै कृत्वा दिशे नमः । 
विद्याधरश्चित्रकेतुः चचार गगने चरः ॥ १ ॥
स लक्षं वर्षलक्षाणां अव्याहतबलेन्द्रियः । 
स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणैः ॥ २ ॥
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्‌कल्पसिद्धिषु । 
रेमे विद्याधरस्त्रीभिः गापयन् हरिमीश्वरम् ॥ ३ ॥
एकदा स विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता । 
गिरिशं ददृशे गच्छन् परीतं सिद्धचारणैः ॥ ४ ॥
आलिङ्‌ग्याङ्‌कीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि । 
उवाच देव्याः श्रृण्वन्त्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान्‌ सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ॥ १ ॥ महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों तक सब प्रकार के संकल्पों को पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वत की घाटियों में विहार करते रहे। उनके शरीर का बल और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के गुण और लीलाओं का गान करती रहतीं ॥ २-३ ॥ एक दिन चित्रकेतु भगवान्‌ के दिये हुए तेजोमय विमानपर सवार होकर कहीं जा रहे थे। इसी समय उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शङ्कर बड़े-बड़े मुनियोंकी सभामें सिद्ध-चारणोंके बीच बैठे हुए हैं और साथ ही भगवती पार्वतीको अपनी गोदमें बैठाकर एक हाथसे उन्हें आलिङ्गन किये हुए हैं, यह देखकर चित्रकेतु विमानपर चढ़े हुए ही उनके पास चले गये और भगवती पार्वतीको सुना-सुनाकर जोर से हँसने और कहने लगे ॥ ४-५ ॥

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शनिवार, 9 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् । 
आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ॥ ६१ ॥
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिः निर्मुक्तः स्वेन तेजसा । 
ज्ञानविज्ञानसन्तृप्तो मद्‍भक्तः पुरुषो भवेत् ॥ ६२ ॥
एतावानेव मनुजैः योगनैपुण्यबुद्धिभिः । 
स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥ ६३ ॥
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन् अप्रमत्तो वचो मम । 
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥ ६४ ॥

श्रीशुक उवाच - 

आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्‍गुरुः । 
पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ॥ ६५ ॥

जो मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्म के पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है—यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है ॥ ६१ ॥ यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए विषय-भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय ॥ ६२ ॥ जो लोग योगमार्गका तत्त्व समझनेमें निपुण हैं, उनको भलीभाँति समझ लेना चाहिये कि जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर ले ॥ ६३ ॥ राजन्! यदि तुम मेरे इस उपदेश को सावधान होकर श्रद्धाभाव से धारण करोगे तो ज्ञान एवं विज्ञान से सम्पन्न होकर शीघ्र ही सिद्ध हो जाओगे ॥६॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! जगद्गुरु विश्वात्मा भगवान्‌ श्रीहरि चित्रकेतुको इस प्रकार समझा-बुझाकर उनके सामने ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतोः परमात्मदर्शनं नाम षोडशोऽध्या‍यः ॥ १६ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा । 
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । 
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
यदेतद् विस्मृतं पुंसो मद्‍भावं भिन्नमात्मनः । 
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् । 
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचिन् शममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् । 
अभयं चाप्यनीहायां सङ्‌कल्पाद् विरमेत्कविः ॥ ५९ ॥
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः । 
ततोऽनिवृत्तिः अप्राप्तिः दुखस्य च सुखस्य च ॥ ६० ॥

(श्रीभगवान्‌ कहते हैं) सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायता से अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो ॥ ५५ ॥ पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओं का अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओं में अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है ॥ ५६ ॥ जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पडऩा पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है ॥ ५७ ॥ यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ५८ ॥ राजन् ! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है; और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दु:ख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ॥ ५९ ॥ जगत् के सभी स्त्रीपुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दु:खोंसे पिण्ड छूटे; परंतु उन कर्मोंसे न तो उनका दु:ख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ॥ ६० ॥ 

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शुक्रवार, 8 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

संस्तुतो भगवान् एवं अनन्तस्तमभाषत । 
विद्याधरपतिं प्रीतः चित्रकेतुं कुरूद्वह ॥ ४९ ॥

श्रीभगवान् उवाच - 

यन्नारदाङ्‌गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् । 
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । 
शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । 
उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
यथा सुषुप्तः पुरुषो विश्वं पश्यति चात्मनि । 
आत्मानमेकदेशस्थं मन्यते स्वप्न उत्थितः ॥ ५३ ॥
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । 
मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्‌की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान्‌ ने कहा—चित्रकेतो ! देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५० ॥ मैं ही समस्त प्राणियोंके रूपमें हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ और मैं ही पालनकर्ता भी हूँ। शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म दोनों ही मेरे सनातन रूप हैं ॥ ५१ ॥ आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं ॥ ५२ ॥ जैसे स्वप्न में सोया हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारके एक कोनेमें स्थित देखता है, परंतु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्वरकी ही माया हैं—यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये ॥ ५३-५४ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

विदितमनन्त समस्तं 
     तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम् । 
विज्ञाप्यं परमगुरोः 
     कियदिव सवितुरिव खद्योतैः ॥ ४६ ॥
नमस्तुभ्यं भगवते 
     सकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय । 
दुरवसितात्मगतये 
     कुयोगिनां भिदा परमहंसाय ॥ ४७ ॥
यं वै श्वसन्तमनु विश्वसृजः श्वसन्ति 
     यं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति । 
भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्ध्नि
     तस्मै नमो भगवतेऽस्तु सहस्रमूर्ध्ने ॥ ४८ ॥ 

हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हैं। अतएव संसार में प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ ॥ ४६ ॥ भगवन् ! आपकी ही अध्यक्षतामें सारे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। कुयोगीजन भेददृष्टिके कारण आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाते। आपका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त शुद्ध है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४७ ॥ आपकी चेष्टा से शक्ति प्राप्त करके ही ब्रह्मा आदि लोकपालगण चेष्टा करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी दृष्टिसे जीवित होकर ही ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करनेमें समर्थ होती हैं। यह भूमण्डल आपके सिरपर सरसों के दाने के समान जान पड़ता है। मैं आप सहस्रशीर्षा भगवान्‌ को बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४८ ॥

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गुरुवार, 7 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

न हि भगवन्नघटितमिदं 
     त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः । 
यन्नाम सकृच्छ्रवणात् 
     पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
अथ भगवन् वयमधुना 
     त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः । 
सुरऋषिणा यदुदितं 
     तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥

भगवन् ! आपके दर्शनमात्र से ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्त: करण का सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है ॥ ४५ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

कः क्षेमो निजपरयोः 
     कियान्वार्थः स्वपरद्रुहा धर्मेण । 
स्वद्रोहात्तव कोपः 
     परसम्पीडया च तथाधर्मः ॥ ४२ ॥
न व्यभिचरति तवेक्षा 
     यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः । 
स्थिरचरसत्त्वकदम्बेष्व
     पृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः ॥ ४३ ॥

सकाम धर्म अपना और दूसरेका भी अहित करनेवाला है। उससे अपना या पराया—किसी का कोई भी प्रयोजन और हित सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत सकाम धर्मसे जब अनुष्ठान करनेवालेका चित्त दुखता है, तब आप रुष्ट होते हैं और जब दूसरेका चित्त दुखता है, तब वह धर्म नहीं रहता—अधर्म हो जाता है ॥ ४२ ॥ भगवन् ! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्म का निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं ॥ ४३ ॥ 

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बुधवार, 6 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

जितमजित तदा भवता 
     यदाह भागवतं धर्ममनवद्यम् । 
निष्किञ्चना ये मुनय 
     आत्मारामा यमुपासतेऽपवर्गाय ॥ ४० ॥
विषममतिर्न यत्र नृणां 
     त्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र । 
विषमधिया रचितो यः 
     स ह्यविशुद्धः क्षयिष्णुरधर्मबहुलः ॥ ४१ ॥

हे अजित ! जिस समय आपने विशुद्ध भागवतधर्म का उपदेश किया था, उसी समय आपने सब को जीत लिया । क्योंकि अपने पास कुछ भी संग्रह-परिग्रह न रखनेवाले, किसी भी वस्तु  में अहंता-ममता न करनेवाले आत्माराम सनकादि परमर्षि भी परम साम्य और मोक्ष प्राप्त करनेके लिये उसी भागवतधर्मका आश्रय लेते हैं ॥ ४० ॥ वह भागवतधर्म इतना शुद्ध है कि उसमें सकाम धर्मोंके समान मनुष्योंकी वह विषमबुद्धि नहीं होती कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह तू है और यह तेरा है।’ इसके विपरीत जिस धर्मके मूलमें ही विषमताका बीज बो दिया जाता है, वह तो अशुद्ध, नाशवान् और अधर्मबहुल होता है ॥ ४१ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

विषयतृषो नरपशवो 
     य उपासते विभूतीर्न परं त्वाम् । 
तेषामाशिष ईश तदनु 
     विनश्यन्ति यथा राजकुलम् ॥ ३८ ॥
कामधियस्त्वयि रचिता 
     न परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि । 
ज्ञानात्मन्यगुणमये 
     गुणगणतोऽस्य द्वन्द्वजालानि ॥ ३९ ॥

जो नरपशु केवल विषयभोग ही चाहते हैं, वे आपका भजन न करके आपके विभूतिस्वरूप इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। प्रभो ! जैसे राजकुलका नाश होनेके पश्चात् उसके अनुयायियोंकी जीविका भी जाती रहती है, वैसे ही क्षुद्र उपास्यदेवोंका नाश होनेपर उनके दिये हुए भोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ परमात्मन् ! आप ज्ञानस्वरूप और निर्गुण हैं। इसलिये आपके प्रति की हुई सकाम भावना भी अन्यान्य कर्मोंके समान जन्म-मृत्युरूप फल देनेवाली नहीं होती, जैसे भुने हुए बीजोंसे अङ्कुर नहीं उगते। क्योंकि जीवको जो सुख-दु:ख आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं वे सत्त्वादि गुणों से ही होते हैं, निर्गुणसे नहीं ॥ ३९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप चित्रकेतुरुवाच -  एष ...