*श्रीजानकीवल्लभो विजयते**
सच्चा सुधारक
गोस्वामी तुलसीदासजी (पोस्ट 02)
गोस्वामी तुलसीदासजी (पोस्ट 02)
( बाबा राघवदासजी )
दिनरात भजनमें संलग्न रहनेपर भी आप (तुलसीदास जी) कहते हैं-
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पापपुञ्जहारी॥
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पापपुञ्जहारी॥
कितना बड़ा आत्म-विश्लेषण है !
हम आजकल तनिकसा पूजा-पाठ करके अपनेको कृतार्थ समझ लेते हैं और उस कृतकृत्यकी आड़में मनमाने पाप करनेमें भी नहीं सकुचाते। इतना होनेपर भी लोगों के सामने बड़े भक्त, सदाचारी और निर्दोष बनने का दावा करते हैं। पर गोस्वामीजी महाराज जैसे परम पवित्र महापुरुष जीवनभर सच्ची भक्ति और मानसिक भजन में लगे रहने पर भी अपनी मानवीय दुर्बलताओं को अपने इष्टदेव श्रीराम के सामने कितनी स्पष्टता से प्रकट करते हैं। यही उनके सच्चे सुधारक होनेका ज्वलन्त प्रमाण है। आप बड़े ही आर्त्त भावसे कहते हैं-
कौन जतन बिनती करिये।
निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये॥
जेहि साधन हरि द्रवहु जानि जन सो हठि परिहरिये।
जाते विपत्ति-जाल निसिदिन दुख तोहि पथ अनुसरिये॥
जानत हूं मन बचन करम पर-हित कीन्हें तरिये।
सो विपरीत देखि परसुख बिनु कारन ही जरिये॥
स्रुति पुरान सबको मत यह सत्संग सुदृढ़ धरिये।
निज अभिमान मोह ईर्षावस तिनहिं न आदरिये॥
संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जाते भवनिधि परिये।
कहो, अब नाथ! कौन बलतें संसार-सोक हरिये॥
जब कब निज करुना-सुभावतें द्रवहु तो निस्तरिये।
तुलसिदास बिस्वास आन नहिं कत पचि पचि मरिये॥
निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये॥
जेहि साधन हरि द्रवहु जानि जन सो हठि परिहरिये।
जाते विपत्ति-जाल निसिदिन दुख तोहि पथ अनुसरिये॥
जानत हूं मन बचन करम पर-हित कीन्हें तरिये।
सो विपरीत देखि परसुख बिनु कारन ही जरिये॥
स्रुति पुरान सबको मत यह सत्संग सुदृढ़ धरिये।
निज अभिमान मोह ईर्षावस तिनहिं न आदरिये॥
संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जाते भवनिधि परिये।
कहो, अब नाथ! कौन बलतें संसार-सोक हरिये॥
जब कब निज करुना-सुभावतें द्रवहु तो निस्तरिये।
तुलसिदास बिस्वास आन नहिं कत पचि पचि मरिये॥
अपने दोषोंके वर्णन के साथ ही करुणामय नाथ पर कितना भरोसा है। दूसरों को उपदेश देकर उनका सुधार करनेवाले और भगवान् के आश्रय की उपेक्षा करने वाले आत्म-विस्मृत हम लोगों को गोस्वामीजी महाराज की इस विनय से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
गोस्वामी जी महाराज के इस आत्मसंशोधन के कार्य को उनके सद्ग्रन्थों द्वारा जानकर हमें अपनी दुर्बलताओं का अनुभव करके एकमात्र सर्वगुणाधार सर्वनियन्ता सर्वशक्तिमान भगवान् की शरण ग्रहण करनेके लिये तैयार हो जाना चाहिये । भगवान् की शरणसे समस्त पापों का नाश होकर सारा सुधार स्वयमेव हो जायगा ।
भगवान्की यह घोषणा याद रखनी चाहिये-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
जय सियाराम !
------००४. ०२. भाद्रपद कृष्ण ११ सं० १९८६वि०. कल्याण ( पृ० ५७१ )
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