मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

||श्री परमात्मने नम: || विवेक चूडामणि (पोस्ट.४४)

||श्री परमात्मने नम: || 

विवेक चूडामणि (पोस्ट.४४)

आवरणशक्ति और विक्षेपशक्ति 

कवलितदिननाथे दुर्दिने सान्द्रमेघै
र्व्यथयति हिमझञ्झावायुरुग्रोयथैतान् ।
अविरततमसात्मन्यावृते मूढबुद्धिं 
क्षपयति बहुदुःखैस्तीव्रविक्षेपशक्तिः ॥ १४५ ॥

(जिस प्रकार किसी दुर्दिन में [जिस दिन आंधी, मेघ आदि का विशेष उत्पात हो] सघन मेघों के द्वारा सूर्यदेव के आच्छादित होने पर अति भयंकर और ठण्डी ठण्डी आंधी सबको खिन्न कर देती है, उसी प्रकार बुद्धि के निरन्तर तमोगुण से आवृत होने पर मूढ़ पुरुष को विक्षेप-शक्ति नाना प्रकार के दु:खों से सन्तप्त करती है)

एताभ्यामेव शक्तिभ्यां बन्धः पुंसः समागतः ।
याभ्यां विमोहितो देहं मत्वात्मानं भ्रमत्ययम् ॥ १४६ ॥

(इन दोनों [आवरण और विक्षेप] शक्तियों से ही पुरुष को बन्धन की प्राप्ति हुई है और इन्हीं से मोहित होकर यह देह को आत्मा मानकर संसार-चक्र में भ्रमता रहता है)

नारायण ! नारायण !!

शेष आगामी पोस्ट में 
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित “विवेक चूडामणि”..हिन्दी अनुवाद सहित(कोड-133) पुस्तकसे


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