रविवार, 5 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट ०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

न चैते पुत्रक भ्रातुः हन्तारो धनदानुगाः ।
विसर्गादानयोस्तात पुंसो दैवं हि कारणम् ॥ २४ ॥
स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च ।
अथापि ह्यनहङ्‌कारात् नाज्यते गुणकर्मभिः ॥ २५ ॥
एष भूतानि भूतात्मा भूतेशो भूतभावनः ।
स्वशक्त्या मायया युक्तः सृजत्यत्ति च पाति च ॥ २६ ॥
तमेव मृत्युममृतं तात दैवं
     सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम् ।
यस्मै बलिं विश्वसृजो हरन्ति
     गावो यथा वै नसि दामयन्त्रिताः ॥ २७ ॥
यः पञ्चवर्षो जननीं त्वं विहाय
     मातुः सपत्न्यां वचसा भिन्नमर्मा ।
वनं गतस्तपसा प्रत्यगक्षं
     आराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्याः ॥ २८ ॥
तमेनमङ्‌गात्मनि मुक्तविग्रहे
     व्यपाश्रितं निर्गुणमेकमक्षरम् ।
आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्मदृग्
     यस्मिन् इदं भेदमसत्प्रतीयते ॥ २९ ॥
त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त
     आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ ।
भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या
     ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम् ॥ ३० ॥

(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) बेटा ! ये कुबेर के अनुचर तुम्हारे भाई को मारनेवाले नहीं हैं, क्योंकि मनुष्यके जन्म-मरणका वास्तविक कारण तो ईश्वर है ॥ २४ ॥ एकमात्र वही संसारको रचता, पालता और नष्ट करता है, किन्तु अहंकारशून्य होनेके कारण इसके गुण और कर्मोंसे वह सदा निर्लेप रहता है ॥ २५ ॥ वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, नियन्ता और रक्षा करनेवाले प्रभु ही अपनी मायाशक्तिसे युक्त होकर समस्त जीवोंका सृजन, पालन और संहार करते हैं ॥ २६ ॥ जिस प्रकार नाक में नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिक का बोझा ढोते रहते हैं, उसी प्रकार जगत् की  रचना करनेवाले ब्रह्मादि भी नामरूप डोरीसे बँधे हुए उन्हीं की आज्ञाका पालन करते हैं। वे अभक्तोंके लिये मृत्युरूप और भक्तोंके लिये अमृतरूप हैं तथा संसारके एकमात्र आश्रय हैं। तात ! तुम सब प्रकार उन्हीं परमात्माकी शरण लो ॥ २७ ॥ तुम पाँच वर्षकी ही अवस्थामें अपनी सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर माँकी गोद छोडक़र वनको चले गये थे। वहाँ तपस्याद्वारा जिन हृषीकेश भगवान्‌की आराधना करके तुमने त्रिलोकीसे ऊपर ध्रुवपद प्राप्त किया है और जो तुम्हारे वैरभावहीन सरल हृदयमें वात्सल्यवश विशेषरूपसे विराजमान हुए थे, उन निर्गुण अद्वितीय अविनाशी और नित्यमुक्त परमात्माको अध्यात्मदृष्टिसे अपने अन्त:करणमें ढूँढ़ो। उनमें यह भेदभावमय प्रपञ्च न होनेपर भी प्रतीत हो रहा है ॥ २८-२९ ॥ ऐसा करनेसे सर्वशक्तिसम्पन्न परमानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी भगवान्‌ अनन्तमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति होगी और उसके प्रभावसे तुम मैं-मेरेपन के रूपमें दृढ़ हुई अविद्या की गाँठ को काट डालोगे ॥ ३० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


2 टिप्‍पणियां:

  1. 🌹💖🥀जय श्रीहरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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