सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और 
अजामिलका परमधामगमन

*भगवान्‌के नामका उच्चारण केवल पापको ही निवृत्त करता है, इसका और कोई फल नहीं है, यह धारणा भ्रमपूर्ण है; क्योंकि शास्त्रमें कहा है—

सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।।

‘जिसने हरि’—ये दो अक्षर एक बार भी उच्चारण कर लिये, उसने मोक्ष प्राप्त करनेके लिये परिकर बाँध लिया, फेंट कस ली।’ इस वचनसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम मोक्षका भी साधन है। मोक्षके साथ-ही-साथ यह धर्म, अर्थ और कामका भी साधन है; क्योंकि ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें त्रिवर्ग-सिद्धिका भी नाम ही कारण बतलाया गया है—

न गङ्गा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्। जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:। अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधै: सदक्षिणै:। यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्। दु:खक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।

‘जिसकी जिह्वाके नोकपर ‘हरि’ ये दो अक्षर बसते हैं, उसे गङ्गा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्करकी कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नामसे ही मिल जाता है। जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया। जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणाके सहित अश्वमेध आदि यज्ञोंके द्वारा यजन कर लिया। ‘हरि’ ये दो अक्षर मृत्युके पश्चात् परलोकके मार्गमें प्रयाण करनेवाले प्राणोंके लिये पाथेय (मार्गके लिये भोजन की सामग्री) हैं, संसाररूप रोगोंके लिये सिद्ध औषध हैं और जीवनके दु:ख और क्लेशोंके लिये परित्राण हैं।’
इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम अर्थ, धर्म, काम—इन तीन वर्गोंका भी साधक है। यह बात ‘हरि’, ‘नारायण’ आदि कुछ विशेष नामों के सम्बन्ध में ही नहीं है, प्रत्युत सभी नामों के सम्बन्ध में है; क्योंकि स्थान-स्थान पर यह बात सामान्यरूप से कही गयी है कि अनन्त के नाम, विष्णु के नाम, हरि के नाम इत्यादि। भगवान्‌ के सभी नामों में एक ही शक्ति है।
नाम-सङ्कीर्तन आदिमें वर्ण-आश्रमका भी नियम नहीं है—

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शूद्रान्त्यजातय:।
यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम्। सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति सनातनम् ।।

‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदि जहाँ-तहाँ विष्णुभगवान्‌के नामका अनुकीर्तन करते रहते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त होकर सनातन परमात्माको प्राप्त होते हैं।’

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. हरि:शरणम् हरिशरणम् हरि:शरणम् 🙏💟
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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