॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)
विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान् की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना
पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-
स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।
एकोऽरविन्दात्पतितस्ततार
तस्माद्भयाद्येन स नोऽस्तु पारः ॥ २४ ॥
य एक ईशो निजमायया नः
ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।
वयं न यस्यापि पुरः समीहतः
पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २५ ॥
प्राचीन काल में प्रचण्ड पवन के थपेड़ों से उठी हुई उत्ताल तरङ्गों की गर्जना के कारण ब्रह्माजी भगवान् के नाभिकमल से अत्यन्त भयानक प्रलयकालीन जल में गिर पड़े थे। यद्यपि वे असहाय थे, तथापि जिनकी कृपा से वे उस विपत्ति से बच सके, वे ही भगवान् हमें इस सङ्कट से पार करें ॥ २४ ॥ उन्हीं प्रभु ने अद्वितीय होने पर भी अपनी माया से हमारी रचना की और उन्हीं के अनुग्रह से हमलोग सृष्टिकार्य का सञ्चालन करते हैं। यद्यपि वे हमारे सामने ही सब प्रकार की चेष्टाएँ कर-करा रहे हैं, तथापि ‘हम स्वतन्त्र ईश्वर हैं’—अपने इस अभिमानके कारण हमलोग उनके स्वरूपको देख नहीं पाते ॥ २५ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
जवाब देंहटाएंहे नाथ नारायण वासुदेव: !!
नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!