॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान् की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना
श्रीदेवा ऊचुः
वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका
ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।
हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ
बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २१ ॥
अविस्मितं तं परिपूर्णकामं
स्वेनैव लाभेन समं प्रशान्तम् ।
विनोपसर्पत्यपरं हि बालिशः
श्वलाङ्गुलेनातितितर्ति सिन्धुम् ॥ २२ ॥
यस्योरुशृङ्गे जगतीं स्वनावं
मनुर्यथाबध्य ततार दुर्गम् ।
स एव नस्त्वाष्ट्रभयाद्दुरन्तात्
त्राताश्रितान् वारिचरोऽपि नूनम् ॥ २३ ॥
देवताओं ने भगवान् से प्रार्थना की—वायु, आकाश, अग्रि, जल और पृथ्वी—ये पाँचों भूत, इन से बने हुए तीनों लोक उनके अधिपति ब्रह्मादि तथा हम सब देवता जिस काल से डरकर उसे पूजा- सामग्री की भेंट दिया करते हैं, वही काल भगवान् से भयभीत रहता है। इसलिये अब भगवान् ही हमारे रक्षक हैं ॥ २१ ॥ प्रभो ! आपके लिये कोई नयी बात न होनेके कारण कुछ भी देखकर आप विस्मित नहीं होते। आप अपने स्वरूपके साक्षात्कारसे ही सर्वथा पूर्णकाम, सम एवं शान्त हैं। जो आपको छोडक़र किसी दूसरे की शरण लेता है, वह मूर्ख है। वह मानो कुत्ते की पूँछ पकडक़र समुद्र पार करना चाहता है ॥ २२ ॥ वैवस्वत मनु पिछले कल्प के अन्तमें जिनके विशाल सींग में पृथ्वीरूप नौकाको बाँधकर अनायास ही प्रलयकालीन सङ्कटसे बच गये, वे ही मत्स्यभगवान् हम शरणागतोंको वृत्रासुरके द्वारा उपस्थित किये हुए दुस्तर भयसे अवश्य बचायेंगे ॥ २३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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