सोमवार, 27 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

ततो नृपान्तःपुरवर्तिनो जना 
     नराश्च नार्यश्च निशम्य रोदनम् । 
आगत्य तुल्यव्यसनाः सुदुःखिताः 
     ताश्च व्यलीकं रुरुदुः कृतागसः ॥ ४९ ॥
श्रुत्वा मृतं पुत्रमलक्षितान्तकं 
     विनष्टदृष्टिः प्रपतम् स्खलन्पथि । 
स्नेहानुबन्धैधितया शुचा भृशं 
     विमूर्च्छितोऽनुप्रकृतिर्द्विजैर्वृतः ॥ ५० ॥
पपात बालस्य स पादमूले 
     मृतस्य विस्रस्तशिरोरुहाम्बरः । 
दीर्घं श्वसन् बाष्पकलोपरोधतो 
     निरुद्धकण्ठो न शशाक भाषितुम् ॥ ५१ ॥
पतिं निरीक्ष्योरुशुचार्पितं तदा 
     मृतं च बालं सुतमेकसन्ततिम् । 
जनस्य राज्ञी प्रकृतेश्च हृद्रुजं 
     सती दधाना विललाप चित्रधा ॥ ५२ ॥
स्तनद्वयं कुङ्‌कुमपङ्‌कमण्डितं 
     निषिञ्चती साञ्जनबाष्पबिन्दुभिः । 
विकीर्य केशान्विगलत्स्रजः सुतं 
     शुशोच चित्रं कुररीव सुस्वरम् ॥ ५३ ॥

तदनन्तर महारानी का रुदन सुनकर रनिवास के सभी स्त्री-पुरुष वहाँ दौड़ आये और सहानुभूतिवश अत्यन्त दुखी होकर रोने लगे। वे हत्यारी रानियाँ भी वहाँ आकर झूठमूठ रोने का ढोंग करने लगीं ॥ ४९ ॥ जब राजा चित्रकेतु को पता लगा कि मेरे पुत्र की अकारण ही मृत्यु हो गयी है, तब अत्यन्त स्नेह के कारण शोकके आवेग से उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वे धीरे-धीरे अपने मन्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ मार्ग में गिरते-पड़ते मृत बालक के पास पहुँचे और मूर्च्छित होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े। उनके केश और वस्त्र इधर-उधर बिखर गये। वे लंबी-लंबी साँस लेने लगे। आँसुओं की अधिकता से उनका गला रुँध गया और वे कुछ भी बोल न सके ॥ ५०-५१ ॥  पतिप्राणा रानी कृतद्युति अपने पति चित्रकेतु को अत्यन्त शोकाकुल और इकलौते नन्हें-से बच्चे को मरा हुआ देख भाँति-भाँति से विलाप करने लगीं । उनका यह दु:ख देखकर मन्त्री आदि सभी उपस्थित मनुष्य शोकग्रस्त हो गये ॥ ५२ ॥ महारानी के नेत्रों से इतने आँसू बह रहे थे कि वे उनकी आँखों का अंजन लेकर केसर और चन्दन से चर्चित वक्ष:स्थल को भिगोने लगे। उनके बाल बिखर रहे थे तथा उनमें गुँथे हुए फूल गिर रहे थे। इस प्रकार वे पुत्र के लिये कुररी पक्षी के समान उच्चस्वर में विविध प्रकार से विलाप कर रही थीं ॥ ५३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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